राष्ट्रवाद के नाम पर विद्यार्थियों के बीच राजनीतिक चर्चा पर पाबंदी

Submitted by cgpiadmin on गुरु, 16/03/2017 - 20:02

2 फरवरी, 2017 को जोधपुर में जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग ने साहित्य के माध्यम से इतिहास का पुनर्निर्माण - राष्ट्र, पहचान और संस्कृति” इस विषय पर एक गोष्ठी का आयोजन किया। गोष्ठी के अगले दिन भारतीय जनता पार्टी की विद्यार्थी शाखा, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने पूरे विश्वविद्यालय को बंद करवा दिया और कहा कि जिस प्राध्यापक ने इस गोष्ठी को संबोधित किया था उन्होंने “राष्ट्र विरोधी विचार” पेश किये थे। जिस प्राध्यापक ने इस गोष्ठी का आयोजन किया था उसे विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा निलंबित कर दिया गया।

protest march21 फरवरी, 2017 को दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज के अंग्रेजी विभाग ने “विद्रोह की संस्कृति” विषय पर एक गोष्ठी का आयोजन किया। इस सभा में भी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने रुकावट पैदा की। वे इस बात का विरोध कर रहे थे कि इस गोष्ठी में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के दो छात्र कार्यकर्ता बतौर वक्ता आमंत्रित हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के इन दोनों छात्रों पर पिछले साल नकली विडियो के आधार पर “देश-विरोधी” होने का आरोप लगाया गया था। रामजस कॉलेज के प्रधानाध्यापक पर दबाव डाला गया कि वे इस गोष्ठी को आयोजित न होने दें। अगले दिन जब छात्रों और शिक्षकों ने इसके विरोध में शिकायत करने के लिए पुलिस थाने तक प्रदर्शन किया तब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने इस विरोध प्रदर्शन पर पुलिस की मौजूदगी में हमला किया और पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की।

देश के अन्य राज्यों के विश्वविद्यालयों में भी इस तरह के हमले हो रहे हैं। सरकार के आला मंत्रियों के वक्तव्यों से यह साफ नज़र आता है कि सत्ता में बैठे लोगों का इन हमलों के लिए पूरा समर्थन है। 25 फरवरी, 2017 को लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पोलिटिकल साइंस में एक सभा को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि जो भी हिन्दोस्तान के भीतर राष्ट्र और राष्ट्रीय अधिकारों की बात करता है वह ‘देश की संप्रभुता और एकता’ के खिलाफ़ है। इसलिए वह ‘विनाशकारी गठबंधन’ का हिस्सा है और ‘राष्ट्र-विरोधी’ है। इसलिए उसकी आज़ादी को हिन्दोस्तान के संविधान के मुताबिक कानूनी तौर से सीमित किया जा सकता है।”

जेटली के ये शब्द हमारे देश के इज़ारेदार घरानों की अगुवाई में हुक्मरान पूंजीपति वर्ग के नज़रिये की झलक देते हैं, जो इस देश की भूमि और प्राकृतिक संसाधनों को अपने बाप की जायदाद समझते है, जिसको मनमर्जी से लूटा जा सकता है। इस बस्तीवादी लूट के खिलाफ़ मज़दूर, किसान, महिलायें और नौजवान, आदिवासी लोग, दबे-कुचले राष्ट्रों के लोग, जो भी आवाज़ उठाते हैं और अपने अधिकारों की मांग करते हैं - उन्हें “देशद्रोही” करार दिया जाता है और उन पर “विनाशकारी गठबंधन” का हिस्सा होने का आरोप लगाया जाता है।

राष्ट्रवाद के नाम पर भाजपा सरकार विश्वविद्यालयों और शिक्षा संस्थानों में राजनीतिक सवालों पर चर्चा को फासीवादी तरीकों से दबाने को जायज़ ठहराने की कोशिश कर रही है। शिक्षकों को उनके विचारों के लिए प्रताड़ित किया जा रहा है। विद्यार्थियों पर हमले किये जा रहे हैं। जानबूझकर लोगों के बीच एक-दूसरे के खिलाफ़ उन्माद भड़काया जा रहा है और जो कोई भी देश और समाज के सामने सवालों को हल करने के बारे में अलग विचार रखता है, उसे राष्ट्र-विरोधी करार दिया जा रहा है। देश की “संप्रभुता और अखंडता” की हिफाज़त करने के नाम पर लोगों के ज़मीर के अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है।

असलियत यह है कि हिन्दोस्तान में कई राष्ट्र और राष्ट्रीयतायें बसती हैं। लेकिन हिन्दोस्तान का संविधान इन राष्ट्रों और राष्ट्रीयताओं के अस्तित्व को भी मानने से इंकार करता है, उनके अधिकारों की हिफाज़त करना तो बहुत दूर की बात है। संविधान ज़मीर के अधिकार सहित अन्य मानव अधिकारों की रक्षा भी नहीं करता है।

अपने समाज में जो टकराव चल रहे हैं, उन राजनीतिक सवालों को “कानून और व्यवस्था” का सवाल बनाकर उनका समाधान नहीं किया जा सकता। इसके विपरीत एक के बाद एक सरकारों द्वारा अपनाये गये रास्ते के कारण ही लोगों की एकता और भाइचारे को ख़तरा पहुंचा है। शासक वर्ग ही देशद्रोही गतिविधियों के लिये जिम्मेदार है न कि वे लोग जो लोगों के मानव अधिकारों, लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय अधिकारों का समर्थन करते हैं।

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Mar 16-31 2017    Struggle for Rights    Rights     2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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