बैंकों के संकट का समाधान - बैंकों का सामाजीकरण है न कि निजीकरण!

Submitted by cgpiadmin on गुरु, 16/03/2017 - 20:13

पिछले कुछ वर्षों से हिन्दोस्तान के बैंक घोर संकट का सामना कर रहे है। बैंकों ने जो बड़े व्यापारिक कर्जे़ दिए थे उनके एक बहुत बड़े हिस्से की वसूली नहीं हुयी है और वे नॉन परफोर्मिंग एसेट (एन.पी.ए.) या न चुकाये गये कर्ज़ बन गये हैं। कोई भी कर्ज़ जिसका मूलधन और ब्याज 90 दिनों से ज्यादा तक बकाया रहता है उसे नहीं चुकाया गया कर्ज़ कहा जाता है। ये ऐसा कर्ज़ होता है जिसका भुगतान कर्ज़दार समझौते के मुताबिक नहीं कर रहा है।

1 अप्रैल, 2015 से 31 मार्च, 2016 तक शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध सरकारी और निजी बैंकों के कुल एन.पी.ए. का आंकड़ा 3,00,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 5,80,000 करोड़ रुपये हो गया है। यह आंकड़ा 31 दिसम्बर, 2016 को और अधिक बढ़कर 6,50,000 करोड़ रुपये हो गया है। कुल कर्ज़ में न चुकाये गये कर्ज़ का अंश अब 11 प्रतिशत से अधिक है और यह बढ़ता ही जा रहा है। हाल ही में प्रकाशित भारतीय रिज़र्व बैंक की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में कहा गया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एन.पी.ए. का अंश जो कि सितंबर 2016 में 11.8 प्रतिशत था, मार्च 2017 को यह 12.5 प्रतिशत तक बढ़ सकता है और मार्च 2018 को यह 12.9 प्रतिशत हो सकता है”

पूंजीवादी कंपनियों को दिया जाने वाला कर्ज़ लोगों की बचत के धन से जाता है जिसे लोग बैंकों में जमा करके रखते हैं। जब पूंजीपति अपना लिया हुआ कर्ज़ वापस करने में नाकाम रहते हैं, तो जमा करने वाले लोगों का धन खतरे में आ जाता है। ऐसी हालत में यदि बैंक खुद को दिवालिया घोषित कर देता है, यानी बैंक यह मानता है कि लोगों को उनका पैसा लौटाने की अपनी जिम्मेदारी को वह पूरा नहीं कर सकता, तो ऐसे में लोगों पर अपनी मेहनत से बचाए गये धन का कुछ हिस्सा या पूरी ही बचत के डूब जाने का खतरा बना रहता है।

पिछले कई वर्षों से बैंकों के मज़दूरों की यूनियनें न चुकाये गये कर्ज़ों के बारे में अपनी चिंता व्यक्त करती आ रही हैं। लेकिन केन्द्र सरकार और बैंकों के प्रबंधकों ने इस हक़ीक़त को जानबूझकर छुपा रखा है। 2015 में इस बात का पर्दाफाश होने लगा जब रिज़र्व बैंक ने शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध सभी बैंकों को एकाउंटिंग के अंतर्राष्ट्रीय मानकों और एन.पी.ए. संबंधी नियमों के मुताबिक इसकी रिपोर्ट करने के लिए बाध्य किया।

इस बात का सबसे ज्यादा पर्दाफाश हो रहा है कि किस तरह से हिन्दोस्तानी सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक दोनों ही उन बड़े पूंजीपतियों के हितों का समर्थन कर रहे हैं, जिन्होंने बैंकों का कर्ज़ा वापस नहीं किया है और अधिकांश बैंकों को गहरे संकट में डाल दिया है। बैंकों का कर्ज़ा वापस न करने वाले पूंजीपतियों द्वारा पैदा किये गए संकट का बोझ, सरकार अब मेहनतकश लोगों पर डाल रही है। सरकार ने नोटबंदी करके लोगों को जबरन अपनी बचत का सारा पैसे बैंकों में जमा के लिए मजबूर कर दिया, और अब सरकार ने बचत पर दी जाने वाली ब्याज दर को कम करना शुरू कर दिया है।

इज़ारेदार पूंजीपतियों का दबदबा

हजारों करोड़ों रुपये के कर्ज़ों के बंटवारे के अनुमोदन सहित सभी मुख्य आर्थिक फैसलों पर इज़ारेदार पूंजीपति घराने हावी होते हैं। बैंकों के संकट की यह मुख्य वजह है।

सबसे बड़ी पूंजीवादी कंपनियों को बैंकों से सबसे अधिक कर्ज़ दिया जाता है। 31 मार्च, 2015 तक, दस सबसे बड़े इज़ारेदार पूंजीपति कर्ज़दारों के पास, सरकारी बैंकों के 7,32,780 करोड़ रुपये बकाया थे, जिनको उन्होंने नहीं चुकाया था। इस सूची में सबसे ऊपर हैं - रिलायेन्स, वेदांता, एस्सार, अदानी और जेपी समूह की कंपनियां। इज़ारेदार घराने किसी भी तरह के पूंजी निवेश या सट्टेबाज़ी के लिए कर्ज़ पाने की इजाज़त हासिल कर लेते हैं। जब तक उनके अधिकतम मुनाफे़ बनते रहते हैं, वे बैंकों को कर्ज़ की रकम वापस करते रहते हैं। लेकिन जब उनको अपेक्षित मुनाफे़ नहीं मिलते हैं, वे बैंकों की बकाया रकम का भुगतान करना बंद कर देते हैं।

यदि कोई किसान या छोटा व्यापारी बैंक से कर्ज़ लेता है और एक महीने के लिए किश्त नहीं भरता है, तो बैंक तुरंत कर्ज़ की रकम वसूल करने के कदम उठाता है और कर्ज़ की एवज़ में दिखाई गई संपत्ति को ज़ब्त कर लेता है। लेकिन जब कोई बड़ा पूंजीपति कर्ज़ की रकम वापस करने में नाकाम होता है, तब बैंक ऐसा नहीं करते हैं। कर्ज़दार पूंजीपति सत्ता में बैठे किसी व्यक्ति को फोन करता है और तुरंत उच्च स्तरीय मीटिंग बुलाई जाती है, जो यह पता करने की कोशिश करती है कि किस तरह से कर्ज़ के इस बोझ को आम लोगों की पीठ पर लादा जाये।

अनेक माध्यमों के ज़रिये इज़ारेदार पूंजीपति घराने बैंकों के प्रबंधकों के कामकाज को भी प्रभावित करते हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक के बोर्ड में टाटा संस का अध्यक्ष, महिंद्रा इंटर-ट्रेड का अध्यक्ष और भारत में स्थित बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन का मुखिया शामिल हैं।

बैंक बड़ी पूंजीवादी कंपनियों को छोटे व्यापारियों और किसानों से भी कम ब्याज दर पर कर्ज़ देते हैं। जितना बड़ा पूंजीपति है, उतनी ही कम ब्याज दर पर कर्ज़ पाता है और शर्तें भी उतनी ही ज्यादा आसान होती हैं। इसके पीछे बैंकों द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि बड़े पूंजीपतियों को कर्ज़ देने में अन्य लोगों की तुलना में “कम जोखिम” होता है। जब यह तथाकथित कम जोखिम वाले कर्ज़ वापस नहीं आते हैं तब एक संकट खड़ा हो जाता है, जैसा कि दुनियाभर में पूंजीवाद के घोर संकट के मौजूदा दौर में हो रहा है।

इस तरह से बैंकों पर इज़ारेदार पूंजीपतियों का दबदबा ही संकट की जड़ है। बैंक, जो कि लोगों की बचत को जमा करते हैं और उसका इस्तेमाल उत्पादक उद्यमों में निवेश करने, उनको चलाने में पूंजी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए करते हैं, आज पूरी तरह से इज़ारेदार पूंजीपति घरानों के प्रभाव में हैं और उनके हितों के लिए चलाये जा रहे हैं।

पूंजीपति वर्ग का सुधार का एजेंडा

पिछले कुछ वर्षों से इज़ारेदार पूंजीपति हिन्दोस्तान में बैंकों के सुधार के अजेंडे के बारे में प्रचार करते आये हैं इसमें शामिल हैं एकत्रीकरण, डिजिटलीकरण और निजीकरण।

एकत्रीकरण का मतलब है विलयन और अधिग्रहण के ज़रिये बैंकों की संख्या को कम करना, जिससे नौकरियां कम होंगी। पिछले महीने केन्द्रीय मंत्रीमंडल ने भारतीय स्टेट बैंक के पांच सहायक बैंकों के विलयन को मंजूरी दे दी। डिजिटलीकरण के नाम पर किये जा रहे सुधार का मकसद, बैंकों के मुनाफ़ों को बढ़ाना है। हाल ही में बनाये गए नए भुगतान बैंकों” ने जिन पर सबसे बड़े इज़ारेदार घरानों का नियंत्रण है, उन्होंने प्रत्येक इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन पर शुल्क लगाकर अधिकतम मुनाफे़ कमाने शुरू कर दिये हैं।

पिछले कई वर्षों से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बड़े हिस्से का निजीकरण करने की योजना की तैयारी चल रही है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी को बेचकर उसे 50 प्रतिशत से भी कम करने की योजना है। इस योजना का लक्ष्य है, इन बैंकों को इज़ारेदार घरानों की मालिकी में देने तथा बैंकों को इज़ारेदार घरानों के सीधे नियंत्रण लाने के रास्ते को खोल देना। बैंकों के निजीकरण की इस योजना को अमल में लाने के लिए मोदी सरकार सही वक्त का इंतजार कर रही है।

निजीकरण का समर्थन करने वाले यह दावा करते हैं कि बैंकों को चलाने में राजनीतिक हस्तक्षेप” हटाने से बैंकिंग क्षेत्र और अधिक कुशल तथा स्वस्थ होगा। बैंकों पर से राज्य के नियंत्रण को पूरी तरह से हटाना, बैंकों के संकट का हल नहीं है और हाल ही में अमरीकी अर्थव्यवस्था में वित्तीय संकट से लगे धक्के से यह साबित हो गया है, जो कि पूरी दुनिया में फैल चुका है। विशाल बैंकों द्वारा अनियंत्रित सट्टेबाजी इस संकट के फूट पड़ने का कारण थी।

असलियत यह है कि पूंजीपति वर्ग खुद अपने लालच पर कोई नियंत्रण नहीं रख सकता। इसके लिए मज़दूर वर्ग को कार्यवाई करनी होगी। पहले अर्थव्यवस्था में अधिकतम निजी मुनाफे़ बनाने की संभावना पर प्रतिबन्ध लगाना होगा और अंत में इस संभावना को पूरी तरह से खत्म करना होगा।

मज़दूर वर्ग का क्रान्तिकारी अजेंडा

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के 10 लाख से भी अधिक मज़दूरों की इस वक्त एक फौरी मांग यह है कि रिज़र्व बैंक को उन पूंजीपतियों के नामों को सार्वजनिक करना चाहिए, जिन्होंने इन बैंकों का कर्ज़ा वापस नहीं किया है और सरकार को कर्ज़ की वसूली के लिए उनकी सारी जायदाद पर कब्ज़ा पर लेना चाहिए। दूसरी मांग यह है कि बैंकों के अधिकारियों और बोर्ड के निदेशकों की जिम्मेदारी निर्धारित की जानी चाहिए जिन्होंने न चुकाये गये कर्ज़ को स्वीकृति दी तथा उन लोगों को सज़ा दी जानी चाहिए, जिन्होंने कर्ज़ दिलाने में इन पूंजीपति कर्ज़दारों के साथ सांठ-गांठ की।

भारतीय रिज़र्व बैंक उन बड़े पूंजीपति कर्ज़दारों के नामों को सार्वजनिक करने से इंकार कर रहा है जिन्होंने बैंकों का कर्ज़ा वापस नहीं किया है। जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया है कि सूचना के अधिकार कानून के प्रावधानों का पालन किया जाना चाहिए और लोगों द्वारा मांगी गयी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए”

मज़दूर वर्ग का रणनीतिक लक्ष्य है बैंक और अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों की कार्यदिशा को लोगों के ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में बदलना, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने की दिशा में। बैंकों के सारे कार्यों को सामाजिक उत्पादन की ज़रूरत को पूरा करने लिये और व्यक्तियों तथा परिवारों के लिए सुरक्षित बचत और संकट के समय कर्ज़ की ज़रूरत को पूरा करने की दिशा में बदलना। कर्ज़ पर ली जाने वाली ब्याज दर को किसी व्यक्ति की अदा करने की क्षमता से जोड़ा जाना चाहिए, न कि “जोखिम के आंकलन” से। संक्षेप में कहें तो, बैंकों के संकट का समाधान है, बैंकिंग क्षेत्र की कार्यदिशा को पूरी तरह से बदलना।

जब 1969 में निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था, तो उसे इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने इस तरह से पेश किया था जैसे कि वह एक समाजवादी सुधार था। लेकिन हमारे जीवन का अनुभव दिखाता है कि वह कदम इज़ारेदार पूंजीपतियों के उस वक्त के अजेंडे का ही हिस्सा था। उस वक्त पूंजीपति चाहते थे कि देशभर के ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की हजारों शाखाओं को बनाने का खर्च राज्य उठाये और ग्रामीण बचत का सारा पैसा पूंजीपतियों के हाथों में सिमट जाये।

90 के दशक से इज़ारेदार पूंजीपति घराने उदारीकरण और निजीकरण के रास्ते भूमंडलीकरण के झंडे तले सुधार का एक नया अजेंडा चला रहे हंै। बैंकिंग के क्षेत्र में उनका लक्ष्य है, बैंकों को अधिक मुनाफे़दार बनाना और सबसे ज्यादा मुनाफे़दार बैंकों को खरीदकर अपने निजी साम्राज्य का हिस्सा बनाना।

मज़दूर वर्ग का लक्ष्य है, बैंकिंग के क्षेत्र का सामाजीकरण करना। जबकि राष्ट्रीयकरण ज़रूरी है, लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। न केवल बैंकों को लोगों के नियंत्रण में लाना होगा बल्कि पूरे सरकारी तंत्र और राज्य की तमाम एजेंसियों को भी लोगों के नियंत्रण में लाना होगा। इसके लिए मज़दूर वर्ग को किसानों और सभी मेहनतकश लोगों के साथ गठबंधन बनाकर राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में लेनी होगी और बैंकों पर सामाजिक मालिकी और नियंत्रण स्थापित करना होगा तथा पूरी अर्थव्यवस्था की कार्यदिशा को पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने से बदलकर लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में ले जाना होगा।

Tag:    Mar 16-31 2017    Political-Economy    Economy     2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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