शहीद भगत सिंह का आह्वान - हिन्दोस्तान की धरती पर क्रान्ति तथा समाजवाद के लिए काम करें!

Submitted by cgpiadmin on गुरु, 16/03/2017 - 20:20

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 10 मार्च, 2017

Bhagat Singh Jail photo23 मार्च, 1931 को बर्तानवी राज ने भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को सज़ा-ए-मौत दी थी। उस दिन की याद में आज भी हिन्दोस्तान के सभी क्रान्तिकारी उस मकसद के लिए दुगुने जोश के साथ लड़ने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हैं, जिसको हासिल करने के लिए हमारे शहीद लड़े थे और अपने जीवन का बलिदान किया था। वह मकसद है क्रान्ति तथा समाजवादी हिन्दोस्तान।

एक साल पहले, इसी दिन प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया था, कि अपनी जवानी में इन तीन बहादुर नौजवानों ने अपने जीवन का बलिदान इसलिए किया कि उनके बाद की पीढ़ियां आज़ादी की सांस ले सकें।”

लेकिन हकीक़त तो यह है कि करीब 70 साल पहले बस्तीवादी राज का अंत होने के बावजूद, हमारे देश के बहुसंख्यक लोग आज़ादी की सांस नहीं ले पा रहे हैं। मज़दूर आज़ाद नहीं हैं, बेरोज़गारी, महंगाई और काम की जगहों पर अत्यधिक शोषण से। किसान आज़ाद नहीं हैं, रोज़ी-रोटी की बढ़ती असुरक्षा से और पूंजीवादी हितों की खातिर अपनी भूमि का अधिग्रहण किये जाने के खतरे से। महिलाएं आज़ाद नहीं हैं, उनके खिलाफ़ भेदभाव तथा पुराने और नये तरीके के दमन और हिंसा से। विश्वविद्यालय और शिक्षा संस्थानों में राजनीतिक मसलों पर चर्चा करने के लिए विद्यार्थियों को आज़ादी नहीं है। राजकीय और व्यक्तिगत आतंकवाद और गुंडागर्दी के वातावरण से समाज आज़ाद नहीं है। छोटी जातियों के लोग अपने खिलाफ़ हो रहे भेदभाव और किये जा रहे सामाजिक अलगाव से आज़ाद नहीं हैं। सांप्रदायिक हिंसा के खतरे से, धार्मिक समूह आज़ाद नहीं हैं।

आज अपने देश में सिर्फ अल्पसंख्यक बड़े पूंजीपतियों, बड़े जमींदारों तथा अन्य परजीवियों को, विदेशी पूंजीपतियों के सहयोग से सभी मेहनतकश लोगों का शोषण करने तथा लूटने की खुली आज़ादी है। वैश्विक वित्त पूंजी तथा साम्राज्यवादी व्यवस्था के शिकंजे से हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था आज़ाद नहीं है।

जाहिर है कि यह वह आज़ाद हिन्दोस्तान नहीं है जिसके लिए भगत सिंह तथा उनके साथियों ने अपनी ज़िंदगियों की कुरबानी दी थी।

हमारा संघर्ष तब तक जारी रहेगा, जब तक कुछ मुट्ठीभर लोग, चाहे वे विदेशी हों या देशी या फिर इन दोनों का गठबंधन, हमारे लोगों के श्रम तथा संसाधनों का शोषण करते रहेंगे। कोई भी ताक़त हमें इस रास्ते से हटा नहीं सकती।” ग़दरियों के ये प्रेरक शब्द, जिनको भगत सिंह तथा उनके साथी बार-बार दोहराते थे, ज़मीर वाले हर हिन्दोस्तानी के दिल को छू जाते हैं और अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

कोई भी इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि आज भी हमारे लोगों के श्रम तथा संसाधनों का देशी और विदेशी पूंजीपतियों द्वारा शोषण होता है। और इसीलिए, जैसे कि हमारे क्रान्तिकारी शहीदों ने कहा था, हर तरह के शोषण तथा दमन से आज़ाद हिन्दोस्तान के लिए हमारा संघर्ष जारी है।

हिन्दुस्तान ग़दर पार्टी के शब्दों और कार्यों से भगत सिंह को प्रेरणा मिली थी। यह हिन्दोस्तानियों की पहली क्रान्तिकारी राजनीतिक पार्टी थी। आम लोगों की सशस्त्र बग़ावत के द्वारा हिन्दोस्तान की धरती से बस्तीवादी बर्तानवी शासन को उखाड़ फेंकने के मकसद से 1913 में उसका गठन हुआ था। रूस की महान समाजवादी अक्तूबर क्रांति से और 1920 के दशक में सोवियत संघ में समाजवाद की जीत से उन्हें प्रेरणा मिली और उन्होंने इससे बहुत कुछ सीखा भी।

हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन जो आगे चलकर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन बना, इस संगठन के सक्रिय सदस्य बतौर, भगत सिंह और उनके साथी बस्तीवादी बर्तानवी हिन्दोस्तानी राज्य को पूरी तरह से तहस-नहस करने और उसकी जगह पर संपूर्ण रूप से एक नये राज्य का गठन करने के लिये प्रतिबद्ध थे। हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के 1925 के घोषणापत्र ने इंकलाब का राजनीतिक मकसद एक ऐसे हिन्दोस्तान के संयुक्त राज्य संघ का निर्माण करना बताया था, जो बर्तानवी बस्तीवादी शासन से आज़ादी के लिए संघर्ष में साथ आये हुए तमाम राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं तथा लोगों के संप्रभु अधिकारों का आदर करेगा।

शहीद भगत सिंह का श्रमजीवी अंतर्राष्ट्रीयतावाद, मौजूदा हिन्दोस्तानी राज्य की अधिकारिक लाइन के बिल्कुल विपरीत है। मौजूदा हिन्दोस्तानी राज्य एक राष्ट्र” की बात करता है, और जो भी कश्मीरी, पंजाबी या देश के अन्य घटकों के लोगों के राष्ट्रीय अधिकारों के बारे में आवाज़ उठाता है, तो उसे राष्ट्र-विरोधी” करार दिया जाता है।

बस्तीवाद-विरोधी संघर्ष के दौरान, भगत सिंह तथा अन्य क्रान्तिकारियों का श्रमजीवी अंतर्राष्ट्रीयतावादी भाव, कांग्रेस पार्टी तथा मुस्लिम लीग के फरेबी राष्ट्रवाद के बिल्कुल विपरीत था। इन पार्टियों ने हिन्दोस्तान के बहुराष्ट्रीय चरित्र को मानने से इंकार किया था। ये पार्टियां बर्तानवी साम्राज्यवाद की रणनीति सांप्रदायिक आधार पर फूट डालो और राज करो का मोहरा बनीं। इसका परिणाम यह हुआ कि देश के कई इलाकों का मनमाने ढंग से विभाजन किया गया और पंजाब तथा बंगाल राष्ट्रों को तोड़कर एक हिंदू बहुसंख्यक” राज्य और एक मुस्लिम बहुसंख्यक” राज्य का निर्माण किया गया।

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को सज़ा-ए-मौत इसलिए दी गयी थी, क्योंकि वे बर्तानवी बस्तीवाद के खिलाफ़ बिना समझौते के संघर्ष और उसे पूरी तरह से उखाड़ फेंकने के हिमायती थे। इसके विपरीत कांग्रेस पार्टी, मुस्लिम लीग तथा अन्य पार्टियों ने बस्तीवादी प्रणाली में अपनी जगह बनाने की कोशिश की। बस्तीवादी राज्य ने भगत सिंह तथा उनके साथियों को इसलिए फांसी दी थी, क्योंकि उनकी क्रान्तिकारी भूमिका से उसको खतरा था। आने वाली पीढ़ियों की नज़रों में उनको बदनाम करने के लिए बस्तीवादियों ने उन पर आतंकवादी” होने की मोहर लगाई।

बर्तानवी बस्तीवादी अदालत में भगत सिंह ने अपनी कार्यवाहियों के समर्थन में जो कहा, उससे साफ नज़र आता है कि वे न ही आतंकवादी थे, और न ही कांग्रेस पार्टी और भाजपा जैसे राष्ट्रवादी”। वे तो समाजवाद तथा कम्युनिज़्म का लक्ष्य हासिल करने के लिए साम्राज्यवाद तथा बस्तीवाद के खिलाफ़ बिना समझौता किये लड़नेवाले क्रान्तिकारी थे।

क्रांति का मतलब क्या होता है, इस सवाल का जवाब देते हुए भगत सिंह ने अपने मुक़दमें के दौरान कहा था कि: क्रांति का अर्थ यह नहीं कि खूनी हिंसा ज़रूरी हो या व्यक्तिगत बदले की भावना हो। क्रांति का अर्थ बम और पिस्तौल का प्रयोग नहीं है। ‘क्रांति’ से हमारा मतलब है कि वर्तमान व्यवस्था, जो खुलेआम नाइंसाफी पर आधारित है, बदलनी चाहिये। उत्पादक या श्रमिक समाज के सबसे आवश्यक तत्व हैं परन्तु शोषकों द्वारा उनके श्रम के फल को लूटा जाता है और उन्हें अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित किया जाता है। किसान, जो सबके लिये अनाज पैदा करता है, अपने परिवार सहित भूखा मरता है; बुनकर जो दुनिया के बाज़ार में कपड़ों की सप्लाई करता है, उसके पास अपने व अपने बच्चों के तन को ढकने के लिये कपड़े नहीं होते हैं; राजमिस्त्री, लोहार और बढ़ई, जो शानदार महल खड़े करते हैं, झुग्गी-बस्तियों में जानवरों की ज़िंदगी जीते हैं। पूंजीपति और शोषक, जो समाज के परजीवी हैं, अपनी मनमर्जी के अनुसार दसों-लाखों रुपयों की फजूलखर्ची करते हैं। इन भयानक विषमताओं और जबरदस्ती से बनाए रखी गई असमानता से अराजकता फैलना अनिवार्य है। यह परिस्थिति ज्यादा देर तक नहीं चल सकती और यह स्पष्ट है कि मस्ती से चलने वाली वर्तमान समाजिक व्यवस्था एक ज्वालामुखी के मुंह पर बैठी है।

इस पूरी सभ्यता के ढांचे को अगर समय पर न बचाया जाये तो यह गिर जायेगा। अतः एक मूलभूत परिवर्तन की आवश्यकता है और जो इस बात को समझते हैं, उनका यह फर्ज़ बनता है कि समाज को समाजवादी आधार पर पुनर्गठित करें। जब तक ऐसा नहीं किया जायेगा और इंसान द्वारा इंसान तथा किसी एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्रों के शोषण को खत्म नहीं किया जायेगा, तब तक मानवजाति को तड़पाने वाली पीड़ाओं और तबाही को नहीं रोका जा सकेगा। जंग को खत्म करने और विश्वव्यापी शांति का युग स्थापित करने की सारी बातें बेहद कपटी हैं।

क्रांति से हमारा मतलब है कि अंत में ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित की जाये जिसमें इस प्रकार की तबाही का खतरा न हो, और जिसमें श्रमजीवी वर्ग की संप्रभुता को मान्यता प्राप्त हो और एक विश्वव्यापी संघ हो जो मानवजाति को पूंजीवाद की जकड़ व साम्राज्यवादी जंग के दुख-दर्द से बचायेगा।

यह हमारा आदर्श है और इस आदर्श से प्ररित होकर हमने उचित तरीके से और काफी जोर से चेतावनी दी है। परन्तु अगर हमारी चेतावनी को नहीं सुना जाता है और वर्तमान सरकार की व्यवस्था स्वाभाविक तौर पर उभरती हुई ताक़तों के रास्ते में एक रुकावट बनती रहती है, तो एक घमासान संघर्ष होगा, जिसमें सभी रुकावटों को उखाड़कर फेंक दिया जायेगा और श्रमजीवी वर्ग का अधिनायकत्व स्थापित होगा, जो क्रांति के आदर्श को पूरा करने का रास्ता खोलेगा।”

आज हिन्दोस्तानी समाज को जो आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक समस्याएं घेरे हुई हैं, उनकी जड़े 1947 के सत्ता के हस्तांतरण” में है। यह पर्दे के पीछे किया गया सौदा था जिसके ज़रिये सामाजिक क्रांति के बगैर राजनीतिक आज़ादी हासिल की गयी और इंकलाब के रास्ते को रोकने के लिए राज्य का बस्तीवादी तंत्र तथा कानून का राज्य” बरकरार रखे गए।

भगत सिंह के रास्ते पर चलने का मतलब है वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर सामूहिक कार्य द्वारा हिन्दोस्तानी समाज की समस्याओं का समाधान करने के लिए संगठित होना। जिसका मतलब है यह समझना कि हिन्दोस्तान, एक ऐसी क्रान्ति के लिए तरस रहा है, जो पूंजीवाद के साथ-साथ साम्राज्यवाद, सामंतवाद और बस्तीवाद के सभी अवशेषों का मिटा देगी।

समय की मांग है कि एक ऐसी क्रान्ति हो, जो इज़ारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में बड़े पूंजीपतियों की हुकूमत का अंत करेगी और मज़दूरों-किसानों की हुकूमत स्थापित करेगी, जिससे राष्ट्रीय सम्पत्ति का फायदा मेहनतकश लोगों को मिलेगा। क्रान्ति के द्वारा मौजूदा राज्य की जगह पूरी तरह से एक नया राज्य स्थापित किया जायेगा, एक स्वेच्छा पर आधारित हिन्दोस्तानी संघ बनाया जायेगा जैसा कि हमारे ग़दरियों ने सोचा था। तभी हम हिन्दोस्तानी लोग सही मायने में आज़ादी की सांस ले पायेंगे।

मज़दूर वर्ग की हुक्मशाही का यह नया राज्य, मेहनतकश लोगों को तमाम तरह के शोषण से आज़ाद करेगा, ज़मीन जोतनेवालों को असुरक्षा से आज़ाद करेगा, जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव, राष्ट्रीय दमन तथा तमाम तरह के उत्पीड़न से आजा़द करेगा। दूसरों की मेहनत के फल पर जीने वाले अल्पसंख्यक शोषकों का “अधिकार” और उसके आर्थिक आधार का अंत किया जायेगा। यह नया राज्य साम्राज्यवादी व्यवस्था के साथ पूरी तरह से रिश्ता तोड़ देगा और दुनिया की सभी साम्राज्यवाद-विरोधी ताक़तों के सहयोग से एक आत्म-निर्भर समाजवादी अर्थव्यवस्था का निर्माण करेगा।

शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के शब्द और उनके कार्य अमर रहें!

इंक़लाब ज़िंदाबाद!

Tag:    Bhagat Singh    Mar 16-31 2017    Statements    History    2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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