असम में सांप्रदायिक झगड़े भड़काये जा रहे हैं

Submitted by cgpiadmin on शनि, 01/04/2017 - 17:55

6 मार्च को निखिल भारत बंगाली उदबस्तू सम्मान्य समिति (एन.आई.बी.बी.यू.एस.एस.) नामक संगठन ने असम के सिलापथर नगर में, एक दिवसीय विरोध प्रदर्शन और रैली का आयोजन किया और मांग रखी कि बंगाली हिन्दुओं के नाम संदिग्ध मतदाताओं की सूची से हटा दिए जायें। रिपोर्ट मिली है कि प्रदर्शनकारियों ने ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (ए.ए.एस.यू.) के दफ्तर में उपद्रव मचाया और संगठन के कई कार्यकर्ताओं को घायल कर दिया।

बांग्लादेश से आये प्रवासी बड़ी संख्या में पिछले कई सालों से यहां रह रहे हैं, इस स्थिति को देखते हुए, असम में कौन मतदाता है और कौन नहीं है, यह एक संवेदनशील मुद्दा है। असम में हिन्दोस्तानी राज्य ने इस मुद्दे का इस्तेमाल करके सांप्रदायिक तनाव को बार-बार बढ़ावा दिया है और जनसंहार आयोजित किये हैं जिनमें हजारों मासूम लोगों का कत्ल किया गया है और उनका खून बहाया गया है जैसा कि नेल्ली जनसंहार में हुआ। 1985 में ए.ए.एस.यू. और उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बीच हुये असम समझौते के मुताबिक, 1971 को अंतिम वर्ष मानकर यह तय किया जाना था कि कौन विदेशी है और कौन नहीं। 1997 में असम के मतदाताओं की सूची में संशोधन करते हुए, चुनाव आयोग ने जिनकी नागरिकता “संदिग्ध” है उन “संदिग्ध मतदाताओं” को इंगित करने के लिए उनके नाम के आगे “डी” अक्षर को जोड़ दिया था।

कांग्रेस और भाजपा हमेशा से असम के लोगों को भाषा के आधार पर असमी और बंगाली बोलने वालों, जातियता के आधार पर और उनके धर्म के आधार पर विभाजित करती रही हैं। हिन्दोस्तानी राज्य लोगों को अब इस आधार पर भी बांट रहा है, कि कौन बांग्लादेश से 1971 से पहले आये, जिन्होंने असम में अपना घर बनाया और कौन हैं जो उसके बाद आए।

केंद्र सरकार ने नागरिकता (संशोधन) विधेयक-2016 को पारित करने की कोशिश की है जो हिंदू धर्म के बांग्लादेशियों को नागरिकता के अधिकार देता है, बशर्ते वे पांच साल तक हिन्दोस्तान में रह चुके हों। बांग्लादेश से प्रवासियों को धार्मिक आधार पर विभाजित करने के लिए यह पैशाचिक चाल है। असम की विशेष परिस्थिति में, इसका उद्देश्य शरणार्थियों के खिलाफ़ असम के लोगों की भावनाओं को केवल भड़काना ही नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य यह भी है कि धर्म के आधार पर बांग्लादेश से आये प्रवासियों को भी एक दूसरे के खिलाफ़ कर दिया जाये।

सिलापथर शहर, असम के धेमाजी जिले में है और गुवाहाटी से 445 किलोमीटर दूर है। यहां लगभग 20 से 30 प्रतिशत बंगाली बोलने वाली आबादी है। 6 मार्च की घटनाओं के बाद, सिलापथर में लगभग एक सप्ताह तक कर्फ्यू लगाकर रखा गया। असमी और बंगाली लोगों के बीच तथा हिंदुओं और मुसलमनों के बीच सांप्रदायिक विभाजन के प्रयास राज्य और उनकी एजेंसियों द्वारा किए जा रहे हैं। जिसका सिलापथर में सभी समुदायों और स्थानीय लोगों के संगठनों ने मिलकर खंडन किया है।

एस.एफ.आई. की असम की राज्य इकाई और सर्व असम आदिवासी संघ, कृषक मुक्ति संग्राम समिति (के.एम.एस.एस.), असम साहित्य सभा (लेखकों और कलाकारों के संगठन), विभिन्न समुदायों के 6 छात्र संगठनों, ताई अहोम यूबा परिषद, असम के मुस्लिम छात्र संघ, 11 पार्टियों के मंच - लेफ्ट डेमोक्रेटिक मंच - तथा कई अन्य लोगों ने इसकी कड़ी निंदा की है। उन्होंने अपराधियों के खिलाफ़ तत्काल कार्रवाई की मांग की है। बंगाली लोगों के कई संगठनों ने भी इसकी कड़ी निंदा की है, उन्होंने दावा किया है कि यह हमला “पूर्व-नियोजित” था और सांप्रदायिक तनाव को भड़काने और शहर में शांतिपूर्वक रह रहे बंगाली और असमी लोगों को विभाजित करने के लिए आयोजित किया गया था।

हिन्दोस्तानी राज्य ने हमेशा से ही असम में रहने वाले लोगों की एकता को तोड़ने का प्रयास किया है, इस बात को लेकर कि क्या वे “मूलनिवासी” या “विदेशी” हैं, यानी अन्य राज्यों, विशेषकर बंगाल के प्रवासियों के बारे में। राज्य ने असम के लोगों को बांग्लादेश से आकर बसे हुए लोगों के खिलाफ़ सुनियोजित रूप से भड़काने की कोशिश की है तथा असमी लोगों को बंगालियों के खिलाफ़, मुसलमानों और हिंदुओं को एक दूसरे के खिलाफ़, इत्यादि। चुनाव आयोग द्वारा “डी” श्रेणी का बनाया जाना, नागरिकता का नकारना तथा लोगों के कई वर्गों का निरंतर उत्पीड़न करना, नागरिकता (संशोधन) बिल-2016 का पास होना, जिसका निशाना हिंदू बांग्लादेशियों को नागरिकता प्रदान करना है - इन सबका उद्देश्य है, सभी लोगों के बीच असुरक्षा, संदेह और अविश्वास पैदा करना और बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा, जनसंहार और विनाश के आयोजन के आधार को बनाना।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी, राज्य द्वारा हमारे लोगों की एकता को तोड़ने के प्रयास की कड़ी निंदा करती है।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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