प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा को उम्रकैद की सज़ा :

Submitted by cgpiadmin on शनि, 01/04/2017 - 18:23

ज़मीर के अधिकार के उल्लंघन में एक फासीवादी सज़ा

प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा और उनके चार अन्य साथियों को 7 मार्च, 2017 को महाराष्ट्र के गड़चिरौली की सत्र अदालत ने उम्रकैद की सज़ा सुनाई। प्रोफेसर साईबाबा, जो कि 90 प्रतिशत विकलांग हैं, उन्हें इससे पहले 9 मई, 2014 को गिरफ्तार किया गया था, जब पुलिस ने उन्हें उनके निवास स्थान से बिना कोई नोटिस दिए गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के बाद उन्हें 14 महीने के लिए नागपुर की सेन्ट्रल जेल में बंद किया गया था। इसके बाद, मार्च 2016 में, बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण उन्हें जमानत दी गई थी।

प्रोफेसर साईबाबा, हेम मिश्रा, महेश टिकरी, पांडु नारोटे, प्रशांत राही और विजय टिकरी को फासीवादी कानून ‘गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यू.ए.पी.ए) की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया गया है। इन लोगों की गिरफ्तारी के खिलाफ़ देश के विभिन्न भागों में व्यापक विरोध किया गया है। दिल्ली के कई विश्वविद्यालयों के छात्रों और शिक्षकों के संगठनों ने एक संयुक्त बयान जारी किया, जिसमें उन सभी को सज़ा देने और जेल भेजे जाने की निंदा की गई है। छात्रों और शिक्षकों के संगठनों ने 11 मार्च को संसद के सामने एक संयुक्त विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया, जिसमें गिरफ्तार किए गए लोगों की बिना शर्त रिहाई और यू.ए.पी.ए. को तत्काल रद्द किये जाने की भी मांग की गई।

प्रोफेसर साईबाबा और उनके साथी, जो छात्र और सांस्कृतिक कार्यकर्ता हैं, कथित रूप से सी.पी.आई. (माओवादी) से जुड़े होने के लिए दोषी ठहराए गए हैं। सत्रीय अदालत का यह फैसला, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पहले सुनाये गए फैसलों के खिलाफ़ जाता है, जिसमें यह कहा गया है कि “केवल प्रतिबंधित संगठन की सदस्यता, व्यक्ति को आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं बनाती, जब तक कि वह खुद हिंसा न करे या हिंसा के लिए लोगों को न उकसाये या हिंसा के द्वारा सार्वजनिक गड़बड़ी पैदा न करे या उसके लिए उकसाए”। प्रोफेसर साईबाबा के वकील के मुताबिक, इस मामले में प्रोफेसर साईबाबा के खिलाफ़ “किसी भी हिंसा में शामिल होने, या हिंसा के लिए उकसाने में, या हिंसा फैलाने में कोई सक्रिय भागीदारी करने” का कोई भी सबूत नहीं है।

न्यायाधीश ने साईबाबा और उनके साथियों पर “राज्य के खिलाफ़ जंग करने” का आरोप लगाया है। आगे उसने कहा कि “1982 से लेकर आज तक, गड़चिरौली जिले में परिस्थिति लकवाग्रस्त है और कुछ भी औद्योगिक तथा अन्य विकास का काम इसीलिये नहीं हुआ है क्योंकि वहां नक्सलवादियों और उनकी हिंसक कार्यवाइयों का डर है। अतः मेरे विचार में अपराधियों के लिये उम्रकैद की सज़ा भी पर्याप्त सज़ा नहीं है, परन्तु अदालत के हाथ यू.ए.पी.ए. की धारा 18 और 20 के आदेश से बंधे हैं ...” अदालत ने साईबाबा और उनके साथियों को उम्र कैद की जो सज़ा सुनाई है, वह भी किन्हीं हिंसक गतिविधियों के सबूत के आधार पर नहीं, बल्कि उन्हें नक्सलवादी और हिंसक उपद्रवी बताकर एक राक्षस के रूप में पेश करके। उन्हें सिर्फ इसलिये राज्य के खिलाफ़ जंग करने के लिये अपराधी ठहराया गया है क्योंकि वे अपनी विचारधारा में अडिग हैं और सरकार की जन-विरोधी नीतियों का विरोध करते हैं।

प्रोफेसर साईबाबा सलवा-जुडूम और ऑपरेशन ग्रीनहंट द्वारा मानव अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ़ बोलने के लिए अच्छी तरह से जाने जाते हैं। व्यापक रूप से यह सभी को पता है कि 2014 में उनकी गिरफ्तारी और हिरासत में उनको क्रूर यातनायें देने का काम, उनकी आवाज़ को दबाने के लिए किये गये थे। राज्य द्वारा लोकतांत्रिक

अधिकारों के हनन के खिलाफ़ बोलने वाले कई व्यक्तियों पर यू.ए.पी.ए. के तहत आरोप लगाये गए हैं, जिसमें सबसे अधिक कठोर प्रावधान हैं, और असहमति को अपराध करार देने के लिए इसका लगातार इस्तेमाल किया गया है। यह अधिनियम 1967 में पारित किया गया था, तथा 2008 और 2012 में इसकी शक्तियों का विस्तार किया गया था। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य है, लोगों को प्रताड़ित करने के लिए राज्य को कठोर शक्तियां देना।

प्रोफेसर साईबाबा को अपराधी ठहराना राजकीय आतंकवाद के सिवाय और कुछ नहीं है। अपने अधिकारों के लिये संघर्ष करने वाले मज़दूरों, किसानों और आदिवासी लोगों का राज्य क्रूर दमन करता है तथा ज़मीर वाले उन सभी स्त्री-पुरुषों को जेलों में डालता है और उन्हें यातनायें देता है, जो इसका पर्दाफाश और विरोध करते हैं। हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी राज्य द्वारा ज़मीर के अधिकार पर इस सबसे नये हमले की कड़ी निंदा करती है और मांग करती है कि फासीवादी कानून यू.ए.पी.ए. को तुरंत रद्द किया जाये।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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