दिल्ली में राजनीतिक मंच :

Submitted by cgpiadmin on शनि, 01/04/2017 - 18:32

राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया में बुनियादी सुधार की ज़रूरत

LRS Political Forum March 15 मार्च, 2017 को लोक राज संगठन ने “राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया में बुनियादी सुधार की ज़रूरत” इस ज्वलंत विषय पर दिल्ली में, एक गोलमेज गोष्ठी का आयोजन किया। हाल ही में हुये पांच राज्यों - उत्तर प्रदेश, मणिपुर, उत्तराखंड, पंजाब और गोवा, के विधानसभा चुनावों पर चर्चा हुयी। इसमें शामिल होने वाले सभी संगठन और व्यक्ति, सामूहिक तौर पर और व्यक्तिगत तौर से इस बात पर सहमत थे कि लोगों को इसमें पूरी तरह से दरकिनार किया गया है। जबकि यह ढोल पीटा जाता है कि हिन्दोस्तान दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र है। इस गोष्ठी में कई पार्टियों और संगठनों के कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया।

लोक राज संगठन के अध्यक्ष एस. राघवन ने बहुत से उदाहरण देते हुये यह बताया कि चुनावों में खुलेआम हेराफेरी, ई.वी.एम. में गड़बड़ी, पूंजीपतियों द्वारा नियंत्रित मीडिया का इस्तेमाल, धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल, यह दिखाता है कि किस तरह से बड़े औद्योगिक घराने यह तय करते हैं कि कौन सी राजनीतिक पार्टी, उनके हितों की सबसे अच्छी तरह सेवा करेगी और फिर वे उसी पार्टी को सत्ता में लाते हैं। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि जो भी पार्टी सरकार बनाती है, वह देशी-विदेशी बड़े इज़ारेदारों के आर्थिक और राजनीतिक अजेंडे को ही लागू करती है। हिन्दोस्तानी लोग संप्रभु नहीं हैं, लोगों को अपने उम्मीदवारों का चयन करने का अधिकार नहीं है और अपने जीवन को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण फैसलों के प्रति अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों को जवाबदेह ठहराने और उन्हें वापस बुलाने का कोई अधिकार नहीं है। यह व्यवस्था बस्तीवादी विरासत की ही निरंतरता है, यह बताते हुए, उन्होंने सभी सहभागियों को इस व्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन की ज़रूरत पर अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने सभी सहभागियों से आह्वान किया कि वे इस सवाल पर अपने विचार ज़रूर रखें कि -  क्या नई व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जो यह सुनिश्चित करे कि लोग ही असली निर्णयकर्ता हों।

श्री राघवन की प्रस्तुति के बाद कई लोगों ने अपने विचार रखे। इनमें शामिल हैं - क्रांतिकारी युवा संगठन से कामरेड आलोक, इंडियन काउंसिल ऑफ टेªड यूनियन से कामरेड नरेन्द्र, कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी से कामरेड प्रकाश राव, सी.पी.आई. (एम.एल.) से कामरेड पी.के. शाही, युवा भारत से दयानंद, देशीय मक्कल शक्ति कच्ची से महेश्वरम, यूनाइटेड सिख मिशन से हरमिंदर सिंह। लोक राज संगठन के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं, जिनमें शामिल हैं - प्रोफेसर भरत सेठ, एडवोकेट गौतम, धर्मेंद्र कुमार, संतोष कुमार और पूनम, ने अपने हस्तक्षेप से चर्चा में जोश भर दिया।

सभी की सहमति थी कि हमारे देश में लोकतंत्र की प्रक्रिया और व्यवस्था लोगों की इच्छा को प्रतिबिंबित नहीं करती है। गोष्ठी में शामिल लोगों के विचार थे कि, बड़े इज़ारेदार राज्य को नियंत्रित करते हैं, तथा अपनी पसंद की सरकार को लाने के लिए चुनाव का इस्तेमाल करते हैं। बहुत सारे लोगों ने अपने स्वयं के अनुभव के आधार पर, इस बात पर प्रकाश डाला कि, किस तरह से नियमित तौर से चुनावों में धांधली होती है।

वक्ताओं ने महाराष्ट्र के निगम चुनावों और पांच राज्यों की विधानसभा के चुनावों में पूंजीपतियों और उनके द्वारा नियंत्रित मीडिया की भूमिका के बारे में भी बताया।

सभी ने कहा कि ये चुनाव ऐसे समय पर आयोजित किए जा रहे हैं, जब बड़े इज़ारेदार घराने मज़दूरों और किसानों के अधिकारों और उनकी रोज़ी-रोटी पर चैतरफा हमले कर रहे हैं। जो लोग इनके अजेंडे से सहमति नहीं रखते हैं उन्हे वे “राष्ट्र-विरोधी” और “देशद्रोही” करार दे रहे हैं! लोग इन हमलों के आगे नहीं झुक रहे हैं और इनके खिलाफ़ लड़ रहे हैं। इन परिस्थतियों में, शासक वर्ग इन चुनावों का इस्तेमाल यह बताने के लिए कर रहे हैं कि इस जन-विरोधी एजेंडे की लिए उनको “जनादेश” प्राप्त है। यह एक बहुत बड़ा झूठ है और लोगों के सामने हमें इसका पर्दाफाश करना होगा।

वक्ताओं ने बताया कि सच्चाई तो यह है कि मणिपुर के बहुसंख्य लोग सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम (आफ्स्पा) का विरोध कर रहे हैं, हिन्दोस्तान के बहुसंख्य लोग शोषण और अधिकारों पर हो रहे हमलों का विरोध कर रहे हैं, लेकिन मौजूदा चुनावी प्रक्रिया में इसकी कोई भी झलक नज़र नहीं आती और बार-बार यह प्रक्रिया उसी शोषक वर्ग की एक या दूसरी पार्टी को सत्ता में बिठाती। एक वक्ता ने बताया कि इन दिनों चुनाव को प्रबंधन विशेषज्ञों द्वारा व्यवसायिक मॉडल के रूप में चलाया जा रहा है।

वक्ताओं ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि राजनीतिक पार्टियों की भूमिका है लोगों को संगठित करना और अपने अधिकारों के प्रति जागरुक करना, लोगों को शासन चलाने योग्य बनाना। लेकिन शासक वर्ग की राजनीतिक पार्टियां वास्तव में लोगों को राजनीति से दूर करती हैं। वे लोगों को धर्म, जाति, नस्ल, क्षेत्र, आदि के आधार पर बांटती हैं और उनकी एकता को तोड़ती हैं। शासक वर्ग की विभिन्न पार्टियों के बीच में दरअसल कोई अंतर नहीं है, चाहे उन पर धर्मनिरपेक्ष होने या सांप्रदायिक होने का ठप्पा लगाया जाता हो। वे सभी पूंजीपति वर्ग के एजेंडे की रक्षा करती हैं और मज़दूर वर्ग और किसानों के अधिकारों पर हमला करती हैं।

एक वक्ता ने 1915 की हिन्दुस्तान ग़दर पार्टी के क्रांतिकारी ग़दरियों, शहीद भगत सिंह और उनके साथियों के विचारों को याद करते हुये कहा कि शोषण तब तक खत्म नहीं होगा जब तक लोग खुद अपने भविष्य के निर्माता नहीं बन जाते। ग़दरियों और शहीदों के विचारों और आज की व्यवस्था की तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि मौजूदा राज्य की बुनियाद बस्तीवादी है और इससे लोगों को कुछ भी हासिल नहीं हुआ है। हमें यह मानना होगा और शहीदों के अधूरे लक्ष्य को पूरा करने के लिए संघर्ष को बढ़ाना होगा। हमें लोगों को एकजुट करना होगा और यह समझाना होगा कि इस राज्य की बुनियाद जन-विरोधी है।

विभिन्न वक्ताओं ने राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया में बुनियादी परिवर्तन के लिए ज़रूरी कदमों पर अपने सुझाव पेश किये, जिसके द्वारा असलियत में लोगों के हाथों में सत्ता होगी।

चर्चा का सार पेश करते हुए, लोक राज संगठन की सुचरिता ने सभी को एकजुट होकर, इस बुनियादी परिवर्तन की दिशा में अपने संघर्ष को आगे बढ़ाने का आह्वान किया - एक ऐसा तंत्र बनाने का संघर्ष, जिसमें लोग स्वयं अपने उम्मीदवार चुन सकेंगे, चुने गए प्रतिनिधियों को जवाबदेह बना सकेंगे, उनको किसी भी वक्त वापस बुला सकेंगे और नए कानून प्रस्तावित कर सकेंगे। चर्चा से यह निष्कर्ष निकल कर आया कि इन बदलावों की फौरी तौर पर ज़रूरत है तभी लोग सही मायने में संप्रभु होंगे।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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