लेनिन के ‘दूर देश से पत्र’ के कुछ अंश

Submitted by cgpiadmin on शनि, 01/04/2017 - 18:37

रूसी सरमायदार लेनिन को अपना सबसे ख़तरनाक दुश्मन समझते थे और ज़ार सरकार उन्हें जान से मारने की पूरी कोशिश में थी, इसलिये लेनिन कई वर्षों तक निर्वासन में रहे। फरवरी क्रांति के समय, 7 और 12 मार्च के बीच (नये कैलेंडर के अनुसार 20 से 25 मार्च), लेनिन ने पार्टी के मुखपत्र में प्रकाशित करने के लिये स्विटज़रलैंड से चार ’दूर देश से पत्र’ लिखे। ये अंश उनके पहले पत्र से लिये गये हैं जो उन्होंने ज़ार सरकार के गिरने के छः दिनों में लिखा था। लेनिन का पांचवां पत्र उनकी स्विटज़रलैंड से वापसी की पूर्वसंध्या 26 मार्च (नयी तिथि 8 अप्रैल) तक अधूरा रहा।

पहला पत्र प्राव्दा के 14वें और 15वें अंक में 21 और 22 मार्च (नयी तिथि 3 और 4 अप्रैल) को, संपादक मंडल ने इसे काफी छोटा करके और कुछ अन्य बदलावों के साथ प्रकाशित किया था। इन पत्रों का पूरा मसौदा 1949 में, लेनिन की संकलित रचनाओं के चैथे रूसी संस्करण में पहली बार प्रकाशित हुआ था। दूसरा, तीसरा और चैथा पत्र 1917 में प्रकाशित नहीं हुए थे। पांचवें अपूर्ण पत्र के आधारभूत विचारों को लेनिन ने आगे विकसित करके “युक्तियों पर पत्र“ और “अपनी क्रान्ति में श्रमजीवियों के कार्य” का लेखन किया था।

साम्राज्यवादी विश्वयुद्ध द्वारा समाजवादी क्रान्ति की जंग छिड़ चुकी है। यह पहली क्रान्ति है यकीनन अखिरी नहीं! ...

सारे रूस के मज़दूरों की तरह पेत्रोग्राद के मज़दूरों ने ज़ारशाही राजतंत्र के विरुद्ध आज़ादी के लिए, किसानों के वास्ते ज़मीन के लिए, शान्ति के लिए, साम्राज्यवादी कत्लेआम के विरुद्ध आत्मत्याग की भावना से लड़ाई की। आंग्ल-फ्रांसीसी साम्राज्यवादी पूंजी ने इस कत्लेआम को जारी रखने और उग्र बनाने के हितार्थ दरबारी षड्यंत्र रचे ... चुपके-चुपके पूर्णतया तैयार नयी सरकार बनायी, जिसने ज़ारशाही पर सर्वहारा संघर्ष के पहले प्रहारों के बाद ही वस्तुतः सत्ता हथिया ली।

Lenin in Feb revolution यह नयी सरकार... व्यक्तियों का कोई संयोगिक जमघट नहीं है। ये हैं रूस में राजनीतिक सत्ता तक पहुंचने वाले नए वर्ग के प्रतिनिधि, पूंजीवादी जमींदारों और उन बुर्जुआ लोगों के वर्ग के प्रतिनिधि, जो आर्थिक दृष्टि से बहुत पहले से हमारे देश पर राज करते आए हैं।

इस सरकार - वर्तमान यु़द्ध के दृष्टिकोण से सारतः अरबों डॉलर की “कंपनी”: ’इंग्लैंड और फ्रांस’ की निरि एजेंट - के साथ-साथ मुख्य, अनाधिकारिक, अभी तक अविकसित, अपेक्षाकृत निर्बल मज़दूर सरकार ने भी जन्म लिया, जो सर्वहारा वर्ग और शहरी तथा देहाती आबादी के सारे गरीब हिस्से के हित व्यक्त करती है। यह है पेत्रोग्राद में मज़दूर प्रतिनिधि सोवियत, जो सैनिकों और किसानों के साथ और साथ ही खेत-मज़दूरों के साथ... प्रथमतया संबंध बनाने का प्रयास कर रही है...

ऐसी है वास्तविक राजनीतिक स्थिति, जिसका हमें यथासंभव अधिकतम वस्तुगत सटीकता के साथ सबसे पहले निर्धारण करना होगा ताकि मार्क्सवादी कार्यनीति को एकमात्र सुदृढ़ बुनियाद पर, जिस पर उसे खड़ा किया जाना चाहिए, तथ्यों की बुनियाद पर आधारित किया जा सके।

ज़ारशाही राजतंत्र चकनाचूर किया जा चुका है, परंतु अभी नष्ट नहीं हुआ है।

साम्राज्यवादी युद्ध “अंत तक” लड़ने की इच्छुक, दरअसल वित्तीय कंपनी ’इंग्लैंड और फ्रांस’ की एजेंट अक्तूबरवादी-कैडेटीय बुर्जुआ सरकार जनता को अधिक से अधिक ऐसी आज़ादियों और रिश्वतों का वचन देने के लिए विवश है, जिन्हें इस बात से संगति रखना चाहिए कि इस सरकार की जनता पर अपनी सत्ता निरंतर बनी रहे और साम्राज्यवादी कत्लेआम जारी रखने की संभावना बनी रहे।

मज़दूर प्रतिनिधि सोवियत मज़दूरों का संगठन, मज़दूर सरकार का भ्रूण रूप, आबादी के सारे गरीब जनसमुदाय का, यानी 9/10 आबादी का, शान्ति, रोटी और आज़ादी के इच्छुकों का प्रतिनिधि है।

इन तीन शक्तियों का संघर्ष इस समय उत्पन्न स्थिति को निर्धारित करता है, जो क्रान्ति की पहली मंजिल से दूसरी मंजिल में संक्रमण की द्योतक है।

पहली और दूसरी शक्तियों के बीच विरोध गहन नहीं है, अस्थायी है, उसे परिस्थितियों के मात्र संगम, साम्राज्यवादी युद्ध के आकस्मिक मोड़ ने जन्म दिया है। ...नयी सरकार ज़ारशाही राजतंत्र को अंतिम रूप से खत्म करने से पहले ही जमींदार रोमानोव वंश के साथ सौदेबाजी करना शुरू कर चुकी है। अक्तूबरवादी-कैडेटीय किस्म के बुर्जुआ वर्ग को मेहनतकशों के विरुद्ध पूंजी के विशेषाधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए नौकरशाही और सेना के प्रधान के रूप में राजतंत्र की आवश्यकता है।...

नहीं, ज़ारशाही राजतंत्र के विरुद्ध सच्चे संघर्ष के लिए, आज़ादी की मात्र शब्दों में नहीं, ...व्यवहार में गारंटी करने के लिए मज़दूरों को नयी सरकार का समर्थन नहीं करना चाहिए, अपितु इस सरकार को मज़दूरों का ’समर्थन’ करना चाहिए! इसलिए कि आज़ादी की ओर ज़ारशाही को पूर्ण रूप से मिटाने की एकमात्र गारंटी है सर्वहारा वर्ग की हथियारबंदी, मज़दूर प्रतिनिधि सोवियत की भूमिका, महत्व तथा शक्ति का दृढ़ीकरण, विस्तार तथा विकास।

हमारी क्रान्ति बुर्जुआ क्रान्ति है - इसलिए मज़दूरों को बुर्जुआ लोगों का समर्थन करना चाहिए। जैसे कि प्लेखानोव के कल के शब्दों की तरह पोत्रेसोव, ग्वोज्देव, छेईद्जे जैसे लोग कहते हैं।

हमारी क्रान्ति बुर्जुआ क्रान्ति है - हम, मार्क्सवादी कहते हैं - इसलिए मज़दूरों को जनता की आंखें खोलकर उसे बुर्जुआ राजनीतिज्ञों की धोखधड़ी दिखा देनी चाहिए, उसे सिखाना चाहिए कि वह शब्दों पर यकीन न करे, पूरी तरह अपनी शक्ति पर, अपने संगठन पर, अपनी एकता, अपने हथियारों पर भरोसा करे।

अक्तूबरवादियों और कैडटों, गुचकोवों और मिल्युकोवों की सरकार जनता को न तो शान्ति, न रोटी और न ही आज़ादी दे सकती है - यदि वह ईमानदारी से चाहे (गुचकोव और ल्वोव की ईमानदारी की बात केवल दुधमुंहे बच्चे ही सोच सकते हैं), तब भी नहीं दे सकती।

शान्ति नहीं-क्योंकि यह युद्ध की सरकार है, साम्राज्यवादी कत्लेआम जारी रखने की सरकार है, लूटमार की सरकार है, जो आर्मीनिया, गैलीशिया, तुर्की को लूटने, कुस्तुन्तुनिया का समामेलन करने, पोलैंड, कूरलैंड, लिथुआनिया, आदि को फिर से फतह करने की इच्छुक है।

रोटी नहीं - क्योंकि यह बुर्जुआ सरकार है। वह जनता को हद से हद “मेधावी ढंग से संगठित अकाल” देती है, जैसा कि जर्मनी ने दिया था। परंतु जनता अकाल सहना नहीं चाहेगी।...

आज़ादी नहीं - क्योंकि यह जमींदारों-पूंजीपतियों की सरकार है, जो जनता से डरती है और जो रोमानोव राजवंश के साथ सौदेबाजी करना शुरू भी कर चुकी है।...

इस समय अपने को क्रान्ति की मौजूदा मंजिल में वर्ग संघर्ष तथा वर्ग शक्तियों के संतुलन के विश्लेषण तक सीमित रखते हुए हमें एक और प्रश्न पेश करना होगा: इस क्रान्ति में सर्वहारा के साथी कौन हैं?

उसके दो साथी हैं: पहला, उन अर्ध-सर्वहाराओं तथा अंशतः छोटे किसानों के व्यापक जनसमुदाय, जिनकी संख्या कई करोड़ है और जो रूस में आबादी की भारी बहुसंख्या है।...

हमें अब सर्वप्रथम और सर्वोपरि इन जनसमुदायों को प्रबुद्ध बनाने और संगठित करने के लिए नयी व्यवस्था की सापेक्ष स्वतंत्रता और मज़दूर प्रतिनिधि सोवियतों का लाभ उठाना चाहिए। किसान प्रतिनिधि सोवियतें और खेत-मज़दूर प्रतिनिधि सोवियतें - यह है हमारे सबसे गंभीर कार्यभारों में से एक।...

दूसरा, रूसी सर्वहारा का साथी समस्त युद्धरत देशों और सामान्यतः समस्त देशों का सर्वहारा है। वह इस समय काफी हद तक युद्ध के भार से दबा हुआ है और उसके नाम से ...यूरोपीय सामाजिक-अंधराष्ट्रवादी बहुधा बोला करते हैं। परंतु सर्वहारा वर्ग की उनके प्रभाव से मुक्ति का कार्य साम्राज्यवादी युद्ध के प्रत्येक माह के साथ आगे बढ़ा है, और रूसी क्रान्ति इस प्रक्रिया को अनिवार्यतः बहुत बड़े पैमाने पर तेज़ करेगी।

इन दो साथियों के साथ सर्वहारा वर्ग मौजूदा संक्रमणात्मक घड़ी की विशेषताओं का उपयोग करते हुए, ...पहले जनवादी जनतंत्र की उपलब्धि और जमींदारों पर किसान समुदाय की पूर्ण विजय की ओर, और फिर समाजवाद की ओर बढ़ सकता है और बढ़ेगा, मात्र जो युद्ध से थकी-मांदी जनता को शान्ति, रोटी और आज़ादी दे सकता है।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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