रूस की फरवरी क्रान्ति के अमूल्य सबक

Submitted by cgpiadmin on शनि, 01/04/2017 - 18:47

रूस की फरवरी क्रान्ति मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और सैनिकों का एक प्रसिद्ध जन-विद्रोह थी जिसने सैकड़ों वर्षों से रूस में चले आ रहे ज़ार के शासन का तख्ता पलट किया। जन-विद्रोह के उन 8 दिनों की शुरुआत 8 मार्च, 1917 को हुई थी जो उस समय के रूसी कैलेंडर के मुताबिक 23 फरवरी था।

रूस में 1917 के वर्ष की शुरुआत विशाल हड़तालों के साथ हुई, जिनमें रूस के सभी मुख्य शहरों के हज़ारों मज़दूरों ने हिस्सा लिया। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन मेहनतकश महिला और पुरुष अभूतपूर्व पैमान पर बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आये। अगले कुछ दिनों में हुई राजनीतिक हड़तालें और प्रदर्शन जन-क्रान्ति का रूप धारण करने लगे, और जा़रशाही मुर्दाबाद!”, “युद्ध बंद करो!” और हमें रोटी चाहिए!” जैसे नारे लाल बैनरों पर उभरने लगे।

Demonstrators with placards Feb 1917
Banners: “Power to the Workers’, Soldiers’, and Peasants’
Soviets”; “Down with the Minister Capitalists”

12 मार्च को राजधानी पेत्रोग्राद में सैनिकों ने सड़कों पर उतरे मज़दूरों के प्रदर्शन पर गोलियां चलाने से इंकार कर दिया। सैनिकों को प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रेरित करने में प्रदर्शनकारी महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सैनिकों ने लोगों पर गोलियां चलाने से इंकार कर दिया, इस बात की ख़बर दूर-दूर तक फैल गयी। ख़बर सुनकर, देश भर में, लाखों की संख्या में मज़दूर और किसान विद्रोह करने के लिए प्रेरित हुए।

राजधानी में, मज़दूरों के प्रतिनिधियों की सोवियत उभर कर आई, जिसमें कारखानों और मिलों के मज़दूर, सैनिकों के प्रतिनिधि, जिन्होंने विद्रोह कर दिया था तथा कम्युनिस्ट पार्टियां और कम्युनिस्ट गुट शामिल थे। इस सोवियत (मज़दूरों की परिषद) ने, पेत्रोग्राद के सभी वार्डों में, लोगों की सत्ता को स्थापित करने के लिए का कमिसार नियुक्त किये। उन्होंने राजधानी के सभी लोगों को अपने वार्डों में स्थानीय समितियां बनाने और सारे स्थानीय मसलों के प्रबंधन को अपने हाथों में लेने का आह्वान किया (देखिये बॉक्स: सोवियतें)। मज़दूरों और विद्रोही सैनिकों ने ज़ार के मंत्रियों और सेना के जनरलों को गिरफ्तार करना शुरू कर दिया। उन्होंने राजनीतिक कैदियों को जेल से रिहा कर दिया, जो बाद में क्रान्ति में शामिल हो गए। किसानों ने बड़े जमींदारों के अनाज़ के गोदामों पर अपना कब्ज़ा जमाना शुरू कर दिया।

15 मार्च (रूसी कैलेंडर के अनुसार 2 मार्च) को ज़ार निकोलस द्वितीय को सारी सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया गया। ज़ार का तख्ता पलट हो गया और उसकी जगह पर (रूसी संसद) ड्यूमा में मौजूद पार्टियों की अस्थायी सरकार का गठन किया गया।

रूस में फरवरी क्रान्ति की वजह से एक अजीब सी परिस्थिति पैदा हो गयी, यह परिस्थिति थी दुहरी सत्ता की। एक ओर सरमायदार थे जो अंतर-साम्राज्यवादी जंग में रूस की मौजूदगी को और लम्बे समय तक बरकरार रखना चाहते थे। दूसरी ओर था मज़दूर वर्ग और रूस के बहुसंख्य मेहनतकश लोग और सैनिक, जो अपनी सोवियतों में संगठित थे और जंग को खत्म करने की मांग कर रहे थे।

न तो सरमायदारों के पास इतनी राजनीतिक ताक़त थी कि वे सोवियतों को खत्म कर सकते थे, और न ही सोवियतें उस अस्थायी सरकार को खत्म करने को तैयार थीं। इस तरह से वहां एक त्रिशंकु स्थिति पैदा हो गयी थी। (देखिये बाक्स: दुहरी सत्ता पर लेनिन के विचार)

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

1905-07 के दौरान रूस एक क्रान्तिकारी दौर से गुजर चुका था। ज़ार की कमजोरी का फायदा उठाते हुए, जो कि मंचूरिया की जंग में हार गया था, मज़दूर वर्ग और किसान उससे एक के बाद एक रियायतें हासिल करने में सफल हो रहे थे। जापान के साथ शांति समझौते के बाद ज़ार ने लोगों के जन-विद्रोह को कुचलने के लिए प्रति-क्रान्तिकारी हमले शुरू किए। 1908-12 के बीच क्रान्ति के पीछे हटने का दौर देखा गया।

सोवियतें

Petrograd Soviet meeting 1917 मज़दूरों के प्रतिनिधियों का सोवियत मज़दूर वर्ग के आजमाये और परखे गए सेनानियों की परिषद है, जिनका चयन और चुनाव मज़दूर खुद अपने साथियों के बीच से करते हैं। इस तरह के लोकप्रिय राजनीतिक संगठन 1905 के विद्रोह के दौरान सेंट पीटर्सबर्ग (जो बाद में पेत्रोग्राद के नाम से जाना गया) में औद्योगिक मज़दूरों के बीच उभर कर आया।

इस तरह के संगठन यानी सोवियतों का विचार मज़दूरों के दिमाग में पहले से ही जीवित था और जैसे ही ज़ारशाही को उखाड़ फेंका गया, उन्होंने इसे लागू किया। जबकि 1905 में केवल मज़दूरों के प्रतिनिधियों के सोवियत ही गठित किये गए थे, बोल्शेविकों की पहल पर फरवरी 1917 में मज़दूरों और सैनिकों के प्रतिनिधियों के सोवियत उभर कर आये, जिससे मज़दूरों और किसानों के बीच का गठजोड़ और अधिक मजबूत हुआ।

फरवरी क्रान्ति के शुरुआती दिनों में ही पेत्रोग्राद के मज़दूरों के प्रतिनिधियों का सोवियत उभरकर आया था। पहले तो सोवियतों के चुनाव अलग-अलग कारखानों में स्वतः स्फूर्त तरीके से शुरू हुए और कुछ दिनों के भीतर राजधानी के सभी कारखानों में फैल गए। लगभग 300 लोगों ने टॉरैड पैलेस में एक बैठक में भाग लिया और एक अस्थायी कार्यकारी समिति का चयन किया। कुछ दिनों के भीतर, कारखानों और सेना के निर्वाचित प्रतिनिधि सोवियत में शामिल हुए। दो हफ्तों में निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या 3,000 हो गई। इसी तरह की प्रक्रिया मॉस्को और अन्य शहरों में भी हुई थी।

पेत्रोग्राद सोवियत ने खुद को मज़दूरों और सैनिकों का केंद्रीय संगठन घोषित किया और जून 1917 में सोवियतों की पहली कांग्रेस तक, क्रांतिकारी आंदोलन के अखिल रूसी केंद्र के रूप में काम किया। पेत्रोग्राद सोवियत ने जिला सोवियतों को संगठित करने के लिए विशेष प्रतिनिधियों को नियुक्त किया और एक नागरिक सेना (जिसमें प्रत्येक 1,000 मज़दूरों के लिए 100 स्वयंसेवक थे) के गठन की शुरुआत की। 14 मार्च को, पेत्रोग्राद सोवियत ने “पेत्रोग्राद दुर्गसेना को आदेश संख्या 1” को जारी किया। इस आदेश के तहत मज़दूरों और सैनिकों के प्रतिनिधियों की सोवियत ने आदेश जारी किया है कि: “सभी कंपनियों, बटालियनों ... में तत्काल चुनाव करके उनके आम सदस्यों के बीच से निर्वाचित प्रतिनिधियों की समितियां चुनी जानी चाहियें।

“सभी राजनीतिक कार्यों में, सेना की इकाइयां, सोवियतों ... और उनकी समितियों के अधीन होंगी।

“राज्य ड्यूमा के सैन्य आयोग के आदेशों का पालन होना चाहिये। इसमें एक ही अपवाद हो सकता है जब ये सोवियतों के आदेशों के विपरीत हो।

“सभी तरह के हथियारों को कंपनी व बटालियनों की समितियों को सौंपना होगा और उनके नियंत्रण में रखना होगा, किसी भी हालत में, ये अफसरों को जारी नहीं किये जायेंगे, चाहे वे उनकी मांग भी कर रहे हों। ...”

यानी कि सोवियत ने सभी सैन्य इकाइयों को अपने राजनीतिक कार्यों में केवल सोवियत द्वारा निर्देशित होने और सभी हथियारों को सैनिकों की कंपनी और बटालियन समितियों के इस्तेमाल और नियंत्रण में रखने का आदेश दिया। राज्य ड्यूमा (संसद) की अस्थायी समिति द्वारा जारी किए गए आदेशों का पालन केवल तभी कर सकती है, जब वे सोवियतों के आदेशों के विपरीत न हों।

16 मार्च को सोवियत ने कई आयोगों को नियुक्त किया: जैसे कि खाद्य सामग्री, सैन्य मामले, कानून और व्यवस्था तथा प्रेस।

इस दौर में, रूस में अर्ध-सामंती संबंधों के चलते, बड़े जमींदारों द्वारा किसानों के शोषण के साथ-साथ, उद्योग और खेती में पूंजीवाद का विकास हुआ। उस समय रूस में तीन मुख्य राजनीतिक शक्तियां थी। ज़ार की राजशाही सामंती जमींदारों, कुलीन नौकरशाहों और सैन्य तबके का तंत्र थी। कैडेट और अक्तूबरवादी पार्टियां, जो आगे चलकर संवैधानिक जनवादी पार्टी कहलाई, रूस के औद्योगिक सरमायदारों और पूंजीवादी जमींदारों की पार्टी थी, जिसे ब्रिटेन और फ्रांस के साम्राज्यवादियों का समर्थन था। कम्युनिस्ट, जो कि रूसी सोशल डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी में संगठित थे, तेज़ी से बढ़ते हुए श्रमजीवी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे। इसके अलावा मध्यम तबकों की भी कुछ पार्टियां थीं, जैसे समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी, जो श्रमजीवियों और सरमायदारों के बीच झूलती रहती थी। 

1912 से ही क्रान्ति की नयी लहर के चिन्ह नज़र आने लगे, जब लेना में सोने की खानों के 500 से अधिक मज़दूरों का ज़ार की सशस्त्र पुलिस द्वारा गोलियों से कत्ल किये जाने के खिलाफ़, अप्रैल और मई के महीने में बड़ी-बड़ी राजनीतिक हड़तालें फूट पड़ीं। इस वर्ष मई दिवस पर हड़तालों और प्रदर्शनों में 4,00,000 से अधिक मज़दूरों ने हिस्सा लिया और जनवादी गणतंत्र, 8-घंटे का कार्य-दिवस, और सभी जमींदारों की जमीनें ने हड़पने जैसे क्रान्तिकारी नारे उठाये।

1914 में पहला विश्व युद्ध शुरू हुआ। यह साम्राज्यवादियों के दो परस्पर विरोधी गुटों के बीच का युद्ध था। एक तरफ था, बर्तानवी और फ्रांसीसी उपनिवेशवादी शक्तियों का गठजोड़, जिसके लिये ज़ारवादी रूस लाखों की संख्या में सैनिकों की आपूर्ति करता था। दूसरी तरफ था, जर्मन साम्राज्यवाद के साथ ऑस्ट्रो-हंगरी और तुर्की साम्राज्य का गठजोड़। यह जंग लड़ी जा रही थी - दुनिया के सबसे बड़े लुटेरे नवाबों के बीच, दुनिया के बाज़ारों और प्रभाव क्षेत्रों का आपस में पुनः बंटवारा करने के लिए। इन शोषकों के हितों के लिए दुनिया भर के सभी देशों के मज़दूरों और किसानों को एक दूसरे के हाथों मरवाया जा रहा था। सभी देशों के पूंजीपति जंग के असली मकसद को लोगों से छुपा रहे थे। हर एक साम्राज्यवादी सरकार यह ऐलान कर रही थी कि वे अपने देश की हिफाज़त के लिए जंग लड़ रहे हैं।

रूस में तकरीबन एक करोड़ दस लाख किसानों और 40 लाख मज़दूरों को उनके आर्थिक कार्यों से हटाकर सेना में भर्ती कर दिया गया। कई मिलों और कारखानों को बंद कर दिया गया। खेत मज़दूरों की कमी के कारण कम भूमि पर फसलें उगाई गईं। आम जनता और जंग के मैदान में सैनिकों को भूखा और नंगा रहना पड़ रहा था, उनके पैरों में जूते तक नहीं बचे थे। जंग ने देश के सारे संसाधन खत्म करने शुरू कर दिये थे। ज़ार के विरोध का दिखावा करते हुए, कंस्टीट्यूश्नल डमोक्रेटिक पार्टी, सरकार की विदेश नीति का समर्थन कर रही थी। औद्योगिक पूंजीपति जंग से मोटा मुनाफ़ा बना रहे थे और पूंजीवादी जमींदार खाद्य सामग्री की कमी का फायदा उठा रहे थे।

उस वक्त द्वितीय इंटरनेशनल दुनिया के स्तर पर कम्युनिस्ट पार्टियों का अंतर्राष्ट्रीय संगठन था, जिसकी सदस्य पार्टियां खुद को सोशल डमोक्रेटिक लेबर पार्टियां कहलाती थीं। द्वितीय इंटरनेशनल में उन पार्टियों का दबदबा था जो इस अंतर-साम्राज्यवादी युद्ध में अपने” देश के सरमायदारों का साथ दे रही थीं। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और यूरोप के अन्य देशों की इन पार्टियों ने अपने देश के मज़दूरों से कहा कि वे जंग का समर्थन करें और पितृ-भूमि के रक्षा” की खातिर दूसरे देश के अपने ही वर्ग के भाइयों का कत्ल करें। जर्मनी की सोशल डमोक्रेटिक पार्टी ने रूसी बर्बरता” से जर्मनी की रक्षा का आह्वान किया।

इन परिस्थितियों में, रूस की सोशल डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी (बोल्शेविक) द्वितीय इंटरनेशनल के सामाजिक-अंधराष्ट्रवाद के खिलाफ़ डटकर खड़ी हो गयी। कम्युनिस्ट घोषणापत्र के नारे - दुनिया के मज़दूरों, एक हो! की हिफाज़त में बोल्शेविक डटकर खड़े थे। बोल्शेविकों ने मज़दूरों, किसानों और सैनिकों से आह्वान किया कि वे सरमायदारी साम्राज्यवादी राज्य के इस बेअसूल लुटेरी जंग को सरमायदारों के राज के खिलाफ़ गृहयुद्ध में बदल दें। (देखिये बॉक्स: बोल्शेविक पार्टी) यूरोपीय देशों की सोशल डेमोक्रेटिक लेबर पार्टियों के मार्क्सवादी पंडितों का यह मानना था कि इस अंतर-साम्राज्यवादी जंग को मज़दूर वर्ग और अन्य मेहनतकश लोगों द्वारा क्रान्तिकारी गृहयुद्ध में बदलना असंभव है, और उन्होंने लेनिन और बोल्शेविक पार्टी का मजाक उड़ाया। उस समय के अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर वर्ग आंदोलन पर हावी, अवसरवाद और सामाजिक-अंधराष्ट्रवाद की धारा के विपरीत चलते हुए, बोल्शेविक पार्टी अपने क्रान्तिकारी रास्ते पर चलती रही।

कामरेड लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक पार्टी मज़दूर वर्ग के संगठित और सचेत राजनीतिक आंदोलन को अगुवाई देने में सफल रही, जिसने समाज की बुनियाद में सत्ता के नए तंत्र को जन्म दिया, जिसे मज़दूरों के प्रतिनिधियों की सोवियतें कहते हैं। पार्टी ने ज़ार की सेना के सैनिकों के बीच सुनियोजित प्रचार किया और सैनिकों के प्रतिनिधियों की सोवियतें बनाने के खुफिया काम को अगुवाई दी। बोल्शेविक पार्टी ने खेत मज़दूरों और गरीब किसानों के बीच सोवियतें बनाने के काम को भी अगुवाई दी।

वह रूस के मज़दूरों, किसानों, सैनिकों, महिलाओं और नौजवानों के लिये क्रान्तिकारी ऊर्जा थी, जिसके फलस्वरूप ज़ार की राजशाही का तख्ता पलट हुआ। लेकिन रूस के सरमायदारों ने, बर्तानवी और फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों के समर्थन से दावपेंच चलाकर अस्थायी सरकार पर अपना नियंत्रण बनाया।  

रूस के लोगों पर अपना राज बरकरार रखने की कोशिश में सरमायदारों की अस्थायी सरकार ने लोगों को कुछ नागरिक अधिकार दिए और उन राजनीतिक कैदियों को रिहा किया, जिन्हें ज़ार की राजशाही ने जेलों में बंद कर रखा था। अस्थायी सरकार के साथ-साथ सोवियतें भी भ्रूणावस्था में श्रमजीवियों के राज्य बतौर चलती रहीं, शांति, रोटी और आज़ादी के लिए तरस रहे मेहनतकश लोगों के हितों की हिफाज़त में एक साधन बतौर।

Winter Palace protest
Protests in Petrograd in January 1917

अगले पड़ाव की तैयारी

बोल्शेविक पार्टी ने फरवरी क्रान्ति का वैज्ञानिक विश्लेषण किया, कि इस क्रान्ति ने क्या हासिल किया, और क्या हासिल करने में नाकामयाब रही। पार्टी ने विश्लेषण किया कि ज़ार की राजशाही का तख्ता पलटना इस क्रान्ति की एक बड़ी उपलब्धि है। पार्टी ने यह भी माना कि राजनीतिक सत्ता मज़दूर वर्ग और मेहनतकश लोगों के हाथों में नहीं आई है। क्रान्ति को उसके तार्किक निष्कर्ष तक ले जाने की महत्वपूर्ण स्थिति अभी हासिल नहीं हुई है।

पार्टी ने न केवल इस हकीक़त को पहचाना, बल्कि यह भी विश्लेषण किया कि वर्ग चेतना और संगठन की कमी की वजह से सोवियतें अपने हाथों में राजनीतिक सत्ता नहीं ले पायीं। जंग के दौरान तक़रीबन 40 प्रतिशत स्थायी मज़दूरों को सेना में भर्ती कर दिया गया। उनकी जगह पर बड़े पैमाने पर छोटी पूंजी के मालिक, कारीगर और दुकानदार, कारखानों में काम पर रखे गए। क्रान्ति की पहली सफलता के नशे में, टटपूंजिये तबके से आये कई मज़दूर सरमायदारों के हाथों में सत्ता देने के लिए राजी हो गए। यह मज़दूर टटपूंजिया सरमायदारों के राजनीतिक नेता और बोल्शेविक पार्टी से भागे हुए मेंशेविकों के प्रभाव में आ गए। ऐसे नेताओं ने मज़दूरों को वर्ग-सहकार्यता का पाठ पढ़ाया और सरमायदारों की अस्थायी सरकार के बारे में भ्रम फैलाया। इन कारणों की वजह से, मज़दूरों और सैनिकों के प्रतिनिधियों की सोवियतों ने सरमायदारों के हाथों में सत्ता सौंप दी। 

दुहरी सत्ता पर लेनिन के विचार

प्रत्येक क्रान्ति का मूलभूत प्रश्न राज्य सत्ता का प्रश्न है। इस प्रश्न को समझे बिना क्रान्ति के निदेशन की तो बात ही क्या, क्रान्ति में सचेत ढंग से किसी तरह की शिरकत करने का कोई सवाल नहीं उठ सकता।

हमारी क्रान्ति की सबसे ज्यादा उल्लेखनीय विलक्षणता यह है कि उसने दुहरी सत्ता का निर्माण किया है। यह तथ्य सबसे पहले समझा जाना चाहिए; इसे न समझने पर हम आगे नहीं बढ़ सकते। पुराने “फोर्मूलों” को, उदाहरण के लिए, बोल्शेविज्म के फार्मूले को परिपूरित तथा संशोधित कर सकना जानना चाहिए, इसलिए कि वे जहां समग्र रूप से सही पाए गए हैं, वहां उनका ठोस मूर्त रूप और ही सिद्ध हुआ है। दुहरी सत्ता के बारे में पहले किसी ने नहीं सोचा था और न ही कोई सोच सकता था।

दुहरी सत्ता क्या है? अस्थायी सरकार, बुर्जुआ वर्ग की सरकार की बगल में अभी तक निर्बल, अल्पविकसित, फिर भी असंदिग्ध रूप में वस्तुतः विद्यमान तथा विकसित हो रही दूसरी सरकार प्रकट हुई है: मज़दूर तथा सैनिक प्रतिनिधि सोवियतें।

इस दूसरी सरकार का वर्गीय ढांचा क्या है? यह सर्वहाराओं तथा किसानों (सिपाहियों की वर्दी में) की है। इस सरकार का राजनीतिक स्वरूप क्या है? यह क्रान्तिकारी अधिनायकत्व, यानी सीधे क्रान्तिकारी हस्तगतकरण पर, नीचे के जनसाधारण की पहल पर आधारित सत्ता है, किसी केन्द्रीकृत राज्य सत्ता द्वारा बनाए गए कानून पर आधारित नहीं। यह सत्ता उस तरह की सत्ता कतई नहीं है, जिस तरह की सत्ता आम तौर पर बुर्जुआ-जनवादी जनतंत्रों में अब तक व्याप्त है, जिनका यूरोप के अग्रगामी देशों और अमरीका में बोलबाला है।

... यह सत्ता उसी किस्म की है, जैसा 1871 में पेरिस कम्यून था। उस किस्म के बुनियादी लक्षण ये हैं: (1) सत्ता का स्रोत कानून नहीं है, जिस पर संसद पहले से विचार-विमर्श कर चुकी हो और जिसे उसने जारी किया हो, अपितु उसका स्रोत मुफ़स्सिल में निचले जनसाधारण की पहल, चालू फिकरे के अनुसार प्रत्यक्ष “हस्तगतकरण” है; (2) सेना तथा पुलिस की, जो जनता से अलग-थलग, और उसके विरुद्ध खड़ी की गयी संस्थाएं हैं, स्थान पर सारी जनता की हथियारबंदी; इस तरह की सत्ता के अंतर्गत राजकीय व्यवस्था की स्वयं सशस्त्र मज़दूरों तथा किसानों, द्वारा, स्वयं हथियारबंद जनता द्वारा रक्षा की जाती है; (3) अफसरों, नौकरशाहों का स्थान या तो स्वयं जनता की प्रत्यक्ष सत्ता ले लेती है, या उन्हें कम से कम विशेष नियंत्रण में रखा जाता है; वे न केवल निर्वाचित आधिकारियों में बदल दिए जाते हैं, अपितु जनता की पहली ही मांग पर उन्हें हटाया भी जा सकता है; उन्हें महज अधिकृत प्रतिनिधि की स्थिति में पहुंचा दिया जाता है; ऊंचे, बुर्जुआ वेतनवाली “नौकरियां” संभाली हुई सुविधाभोगी श्रेणी से वे मज़दूरों के एक खास “प्रकार के औज़ार” बन जाते हैं, जिनका वेतन एक अच्छे मज़दूर के वेतन से ज्यादा नहीं होता।

स्रोत: लेनिन की संकलित रचनाएं (दस खंडों में), खंड 6, 1915-17, प्रगति प्रकाशन, मॉस्को, 1983, पृष्ठ 341-342।

तथ्यों पर आधारित इस तरह के वैज्ञानिक विश्लेषण की वजह से ही, बोल्शेविक पार्टी ऐसी परिस्थितियां तैयार कर पाई जिससे अक्तूबर क्रान्ति में आगे चलकर श्रमजीवी वर्ग को जीत हासिल हुई।

फरवरी क्रान्ति के वैज्ञानिक विश्लेषण से निकाले गए निष्कर्षों के आधार पर बोल्शेविक पार्टी ने अपने लिए यह कार्य तय किया कि अब उसे बड़े संयम के साथ मेहनतकश जनसमुदाय को यह समझाना होगा कि अस्थायी सरकार सरमायदार वर्ग की सरकार है, उसका साम्राज्यवादी चरित्र है; और वह कभी भी लोगों की शांति, रोटी और आज़ादी की मांगों को पूरा नहीं कर सकती। इसलिए सारी सत्ता को सोवियतों के हाथों में सौंपा जाना चाहिए। लेनिन की प्रसिद्ध अप्रैल थीसिस का यही सार है, जिसे लेनिन ने 4 अप्रैल, 1917 को अखिल-रूस मज़दूरों और सैनिकों की सोवियतों के अधिवेशन में पेश किया था।

अपनी अप्रैल थीसिस में लेनिन ने बताया कि जनसमुदाय को यह दिखाना होगा कि मज़दूर प्रतिनिधियों की सोवियतें ही क्रान्तिकारी सरकार का एकमात्र संभावित स्वरूप हैं, और इसलिए हमारी जिम्मेदारी यह है कि, जब तक यह सरकार सरमायदारों के प्रभाव में काम करती रहेगी, तब तक हमें बड़े ही संयम के साथ, सुनियोजित और लगातार उनके दांवपेंचों में गलतियों का पर्दाफाश लोगों के सामने करते रहना होगा, जो पर्दाफाश खास तौर से जनसमुदाय की व्यवहारिक ज़रूरतों से मेल खाता हो।”

लेनिन की अप्रैल थीसिस में दी गयी कार्यदिशा पर चलते हुए बोल्शेविक पार्टी लगातार मज़दूरों, सैनिकों और किसानों को यह समझाती रही कि ज़ार का तख्ता पलट करने के तुरंत बाद ज़रूरी है कि क्रान्ति को अगले चरण की ओर बढ़ा दिया जाए। यह चरण है तमाम मेहनतकश और पीड़ित जनसमुदाय के साथ गठबंधन में श्रमजीवी वर्ग द्वारा अपनी क्रान्तिकारी सत्ता कायम करना।

दो तरह की राज्य व्यवस्था के बीच के मुख्य अंतर को समझाते हुए लेनिन ने लिखा: “(जैसा कि इतिहास ने साबित किया है) संसदीय सरमायदारी जनतंत्र से पीछे की ओर राजशाही की तरफ जाना बेहद आसान है, क्योंकि दमन की सारी मशीनरी - सेना, पुलिस और नौकरशाही - ये सारे वैसे के वैसे ही बरकरार रखे जाते हैं। लेकिन कम्यून और सोवियतें इस तंत्र को तहस-नहस करके इसको खत्म कर देती हैं।

संसदीय सरमायदारी गणतंत्र, जनसमुदाय के स्वतंत्र राजनीतिक जीवन का गला घोंट देती है, और नीचे से ऊपर तक राज्य के जनतांत्रिक संगठन के सभी साधनों में लोगों की प्रत्यक्ष भागीदारी में रुकावट डालती है। सोवियतों में इसके ठीक विपरीत होता है।”

बोल्शेविक पार्टी ने इस बड़े ही कठिन और संयम से चलाये जाने वाले कार्य को, मज़दूरों, किसानों और सैनिकों के बीच राजनीतिक तौर से सक्रिय लोगों को अपने देश के सामूहिक मालिक और हुक्मरान बनाने की ज़रूरत के बारे में बताने का कार्य जारी रखा। इस तरह से बोल्शेविक पार्टी ने अंत में सारी सत्ता सोवियतों के हाथों में हस्तांतरित करने के लिए आत्मगत हालात पैदा किये, जिसे महान अक्तूबर समाजवादी क्रान्ति के नाम से जाना जाता है।

क्रान्ति के सबक

रूस के मज़दूर वर्ग और उनके सहयोगियों ने श्रमजीवी क्रान्ति को जीत दिलाई, जिसे हिरावल कम्युनिस्ट पार्टी ने नेतृत्व दिया, जो अपनी सोच और कार्य में क्रान्तिकारी दिशा से कभी विचलित नहीं हुई।

1917 के रूस के अनुभव से यह साबित होता है कि क्रान्ति के जनतांत्रिक और समाजवादी पड़ावों के बीच किसी दरार, किसी लम्बी अवधि की ज़रूरत नहीं है। क्रान्ति का श्रमजीवी नेतृत्व यह सुनिश्चित करेगा कि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन की प्रक्रिया कहीं बीच मझधार में न छूटे, बल्कि उसे उसके तार्किक नतीजे तक ले जायेगा, जहां समाज से हर तरह के शोषण और वर्गीय भेदभाव को मिटा दिया जायेगा।

सरमायदारी-जनवाद के कार्यों से समाजवादी कार्यों तक क्रान्ति कितनी रफ़्तार से चलती है, यह किसी और बात पर नहीं, बल्कि श्रमजीवी वर्ग की तैयारी के स्तर पर निर्भर करता है। लेनिनवाद का यह निष्कर्ष 1917 में रूस की क्रान्ति में पूरी तरह से साबित हो गया, जब पहली क्रान्ति में ज़ार की राजशाही का खात्मा हुआ और दूसरी क्रान्ति में जब श्रमजीवी सत्ताधारी वर्ग बन गया तथा जिसने गहरे समाजवादी परिवर्तनों के लिये पहल की।    

बोल्शेविक पार्टी

19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध के दौरान रूस में समाजवाद और कम्युनिज़्म के लिए आंदोलन विकसित हुआ। यह नरोदवादियों और कानूनी मार्क्सवादियों” के खिलाफ़ एक ठोस विचारधारात्मक संघर्ष के दौरान बढ़ा।

नरोदवाद ने प्रचार किया कि क्रान्ति की अगुवाई में मुख्य भूमिका किसानों द्वारा निभाई जाएगी, मज़दूर वर्ग द्वारा नहीं; उन्होंने लोगों के संघर्ष की जगह, व्यक्तिगत नायकों के संघर्षों को विकल्प के रूप में पेश किया। “कानूनी मार्क्सवादियों”, जो पूंजीपतियों के हितों के लिए मज़दूर आंदोलन को अनुकूलित करना चाहते थे, ने मार्क्सवाद के मूल सिद्धांत को यानी श्रमजीवी वर्ग की क्रान्ति और श्रमजीवी वर्ग के अधिनायकत्व के सिद्धांत से इनकार किया।

कॉमरेड लेनिन ने इन दोनों प्रवृत्तियों के खिलाफ़ एक दृढ़ संघर्ष लड़ा था। उन्होंने मज़दूर वर्ग के नेतृत्व में मज़दूरों और किसानों के क्रान्तिकारी गठबंधन के विचार को आगे बढ़ाया और कहा कि ज़ारशाही, जमींदारों और सरमायदारों का तख्ता पलट करने का मुख्य साधन यही है।

1911 तक, 1898 में स्थापित रूसी सोशल डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी (आर.एस.डी.एल.पी.) की विशेषता इसके भीतर की सोच और कार्रवाई की विरोधाभासी लाइनें थीं। लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविकों की लाइन, सशस्त्र सामूहिक विद्रोह के द्वारा ज़ार की राजशाही को उखाड़ फेंकने के लिए दिशा दिखा रही थी। इस लाइन ने किसानों को अपनी ओर लाकर और संवैधानिक-लोकतांत्रिक सरमायदारी वर्ग को अलग करके, श्रमजीवी वर्ग का वर्चस्व स्थापित करने की तरफ इशारा किया, ताकि पूंजीवाद को दफनाया जा सके और समाजवाद का निर्माण किया जा सके। मेंशेविकों की लाइन ज़ारशाही में “सुधार” लाने की ओर थी कि संवैधानिक-लोकतांत्रिक ताक़तों के साथ गठबंधन बनाकर, सरमायदारों के वर्चस्व को स्थापित रखा जाये, ताकि क्रान्ति सरमायदारी लोकतंत्र के दायरे तक ही सीमित रहे।

जनवरी 1912 में आर.एस.डी.एल.पी. के सम्मेलन में, सभी क्रान्तिकारी तत्व बोल्शेविक लाइन के इर्द-गिर्द एकजुट हुए और मेंशेविक लाइन के कट्टर अनुयाइयों ने पार्टी छोड़ दी। यहां एक नए प्रकार की पार्टी उभरी, रूसी सोशल डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी (बोल्शेविक) के नाम से। बाद में उसका नाम बदलकर सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक) कर दिया गया।

बोल्शेविक पार्टी लोकतांत्रिक केन्द्रीयवाद के आधार पर, क्रान्तिकारी लाइन के इर्द-गिर्द फौलादी रूप से एकजुट हुई थी। पार्टी के पास हथियार बतौर प्राव्दा नामक श्रमिकों का शानदार अखबार था, जिसका उपयोग करते हुये, पार्टी ने क्रान्तिकारी मज़दूरों की एक नई पीढ़ी को भर्ती किया और उन्हें प्रशिक्षित किया। श्रमजीवी वर्ग संघर्ष के विकास पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा जिससे 1912 में शुरू हुई क्रान्तिकारी लहर में भारी वृद्धि हुई।

जब 1914 में युद्ध शुरू हुआ, तब बोल्शेविक पार्टी ने युद्ध के खिलाफ़ केवल निन्दा प्रस्ताव पेश करने तक ही अपने आपको सीमित नहीं रखा। पार्टी ने युद्ध के खिलाफ़ व्यापक पैमाने पर अभियान चलाये और लोगों को संगठित किया। पार्टी ने कानूनी और गैर-कानूनी माध्यमों का इस्तेमान करके, बड़े पैमाने पर आंदोलन किया और प्रचार चलाया, जो कि जनता के गुस्से के साथ में प्रतिध्वनित हुआ।

बोल्शेविकों ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न का हल निकला: सरमायदारी संसद की जगह पर क्या आएगा? या यूं कहिये क्रान्ति को सत्ता किस संस्थान के हाथों में सौंपनी चाहिए? बोल्शेविक पार्टी ने इस प्रश्न का समाधान अपने व्यवहारिक कार्य से करके दिखाया, जब उसने समाज की बुनियाद पर लोगों के लोकप्रिय प्रतिनिधि संगठन बनाने, और उन्हें क्रान्तिकारी राजनीतिक चेतना से भरने का काम किया। जब समय आया तो पार्टी ने आह्वान दिया और सोवियतों ने संपूर्ण सत्ता अपने हाथों में ले ली।

रूस की क्रान्ति से सबक लेने का मतलब है, कि हम हिन्दोस्तानी कम्युनिस्टों को इस भ्रम को तोड़ना होगा कि हमारे देश का मज़दूर वर्ग राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में लेने के काबिल नहीं है। इसका मतलब है मज़दूरों, किसानों और सैनिकों के बीच ऐसी समितियां बनाने के कार्य में अगुवाई देना, जो उनके हाथों में राजनीतिक सत्ता का साधन बनेंगी। रूस की क्रान्ति से सबक लेने का मतलब है, मज़दूर वर्ग की एक हिरावल पार्टी बनाना और उसे मजबूत करना, एक क्रान्तिकारी लेनिनवादी पार्टी, जिसमें सभी हिन्दोस्तानी कम्युनिस्ट क्रान्ति के लिए कार्य करेंगे।

तथ्य यह दिखाते हैं कि हिन्दोस्तान में राजनीतिक आज़ादी के बाद सरमायदारों की सत्ता मजबूत हुई है। 1947 में बर्तानवी संसद के एक कानून के द्वारा राजनीतिक सत्ता बर्तानवी साम्राज्यवादियों के हाथों से हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों के हाथों में हस्तांतरित की गयी, जो कि देश के बड़े जमींदारों और उन सभी परजीवी तत्वों के साथ जुड़े हुए थे, जिन्हें बस्तीवादी लूट से फायदा हुआ था। हिन्दोस्तानी राज्य, सरमायदारों के हाथों में लोगों को बांटने और उनपर राज करने का हथियार बना रहा, जिसे बर्तानवी बस्तीवादी पीछे छोड़ गए थे। श्रमजीवी और बहुसंख्यक मेहनतकश लोग सत्ताहीन ही बने रहे।   

श्रमजीवी वर्ग को मेहनतकश किसानों और तमाम दबी-कुचली बहुसंख्यक आबादी के सहयोग में राजनीतिक सत्ता हथियाने की लेनिनवादी लाइन से भटककर, हिन्दोस्तानी कम्युनिस्ट समाजवाद का संसदीय रास्ता” की संशोधनवादी लाइन के शिकार हो गए, जिसे 1950 के दशक में ख्रुश्चेव की अगुवाई में सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी ने फैलाया था। 1917 में इसी रास्ते को बोल्शेविकों ने ठुकराया था और उसे परास्त किया था। यह रास्ता है मज़दूर वर्ग के लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरमायदारों और उनके संसदीय जनतंत्र पर निर्भर रहने का रास्ता, जो रास्ता केवल सरमायदारों की हुक्मशाही को बरकरार रखने के काम आता है। 

1960 के दशक में हिन्दोस्तानी कम्युनिस्टों के बीच क्रान्तिकारियों ने सोवियत संशोधनवाद और समाजवाद के संसदीय रास्ते की जकड़ से मुक्त होने का प्रयास किया था। लेकिन उनका यह प्रयास चीनी संशोधनवादियों की लाइन में भटक गया, जो किसानों पर निर्भर रहने और गांव में गुरिल्ला युद्ध के द्वारा शहरों को घेरने के दांवपेंच की लाइन है, और श्रमजीवी वर्ग को सरमायदारों के संसदीय भ्रमजाल के प्रभाव में भटकने के लिए छोड़ देने की लाइन है।

रूस की क्रान्ति का महत्वपूर्ण सबक यह है कि सरमायदारों की सत्ता को उखाड़ फेंकने का काम चंद नायकों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, फिर वे चाहे कितने ही बहादुर क्यों न हों। बोल्शेविकों की बहादुरी इस बात में निहित है कि उन्होंने बड़ी सफलता से श्रमजीवी वर्ग को किसानों और तमाम दबे-कुचले लोगों के साथ गठबंधन में, राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में लेने के लिए सचेत बनाया और उनको संगठित करने का काम सफलतापूर्वक किया।  

रूस की क्रान्ति से सबक लेने का मतलब है हम कम्युनिस्टों को सरमायदारी संसदवाद के साथ व्यक्तिगत आतंकवाद और देहातों से शहरों को घेरने के लाइन को ठुकराना है। हमें मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों को राजनीतिक बनाने, उनकी एकता बनाने के लिए उनके बीच समितियां और परिषदें बनाने के कार्य को अगुवाई देनी होगी, और उनकी फौरी मांगों को हासिल करने के लिए तमाम शोषित लोगों को इस सोच के साथ संगठित करना होगा, कि उनको अपने हाथों में सत्ता लेने के लिए तैयार होना है।

रूस की क्रान्ति से सबक लेने का मतलब है, सामाजिक-जनवाद और अंधराष्ट्रवाद के साथ बिना किसी समझौते के संघर्ष चलाना, जैसे कि बोल्शेविक पार्टी ने 100 वर्ष पहले किया था। हमें अपने” सरमायदारों के युद्ध की योजना और पाकिस्तान के खिलाफ़ कट्टर देशभक्ति के प्रचार का विरोध करना होगा।

हिन्दोस्तान की राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा” के नारे के साथ किसी भी तरह से समझौता करने का विरोध करना होगा। इस नारे के आधार पर हमारे देश का हुक्मरान वर्ग राजकीय आतंकवाद और देश के भीतर सभी जनतांत्रिक, मानव अधिकारों और राष्ट्रीय अधिकारों को बर्बर तरीके से कुचलने को जायज़ ठहराता है। 

सार में, इतिहास से सबक लेकर चलने का मतलब होगा कि हमारा एकमात्र लक्ष्य है - श्रमजीवी वर्ग की हुक्मशाही स्थापित करना। केवल श्रमजीवी वर्ग की हुक्मशाही ही देश को साम्राज्यवादी व्यवस्था से, पूंजीवाद से, बस्तीवाद, सामंतवाद और जातिवादी व्यवस्था के अवशेषों से मुक्ति दिला सकती है।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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