वर्तमान परिस्थिति और हमारे कार्य

Submitted by cgpiadmin on शनि, 01/04/2017 - 18:55

केन्द्रीय समिति की परिपूर्ण सभा का मूल्यांकन, मार्च 2017

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की 6ठी केन्द्रीय समिति की दूसरी परिपूर्ण सभा 25-26 मार्च, 2017 को हुयी। सारी दुनिया की गतिविधियों का मूल्यांकन करते हुए, परिपूर्ण सभा इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अंतर-साम्राज्यवादी अंतर्विरोध तेज़ होते जा रहे हैं और पूंजीपति शासक वर्ग अपना शासन चलाने के लिए फासीवादी तौर-तरीकों का सहारा लेने की बढ़ती प्रवृत्ति को प्रकट कर रहा है। बड़े हिन्दोस्तानी सरमायदार बहुत ही खतरनाक रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं और अपने खुदगर्ज़ हितों को पूरा करने के लिए, हमें प्रतिक्रियावादी जंग में घसीट सकते है। परिपूर्ण सभा में इस निष्कर्ष को दोहराया गया कि सरमायदारों को पराजित करने के काबिल एकमात्र ताक़त श्रमजीवी वर्ग है, जिसे इस काम में सफलता पाने के लिए किसानों और दूसरे उत्पीड़ित लोगों के साथ गठबंधन बनाना होगा।

परिपूर्ण सभा में यह मूल्यांकन किया गया कि हम कम्युनिस्टों से आज वक्त की मांग है कि बड़े सरमायदारों के हमलों के खिलाफ़, एक शक्तिशाली मज़दूर वर्ग प्रतिरोध आन्दोलन को संगठित करने में अपनी पूरी एकताबद्ध ताक़त लगा दें। हमें मज़दूर वर्ग को एक ऐसा राज्य और व्यवस्था स्थापित करने के क्रान्तिकारी कार्यक्रम के साथ लैस करना होगा, जो सभी प्रकार के शोषण और दमन को मिटाकर, सिर्फ बातों में नहीं बल्कि हकीक़त में, सबकी खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित करेगी।

वैश्विक गतिविधियां

अमरीका में, ट्रम्प प्रशासन के अन्दर, बड़ी-बड़ी पूंजीवादी कंपनियों के भूतपूर्व प्रधान अगुवा पदों पर बैठे हैं। कई क्षेत्रों में, इज़ारेदार पूंजीपतियों को स्वास्थ्य और सुरक्षा के मापदंडों तथा मज़दूरों के अधिकारों से संबंधित कानूनों का पालन न करने की छूट दी जा रही है। मुसलमानों और 6 मुसलमान-बहुल देशों के नागरिकों को निशाना बनाकर, यातायात पर पाबंदियों और अन्य पाबंदियों को लगाकर, लोगों में नस्लवादी उन्माद और डर फैलाया जा रहा है। मेक्सिकन और अन्य आप्रवासी मज़दूरों पर शारीरिक हमले किये जा रहे हैं। अपनी सरकार से असहमति जताने वाले अमरीकी नागरिकों पर पुलिस के हमले बढ़ते जा रहे हैं।

सत्ता में आते ही, अंतर्राष्ट्रीय तौर पर, ट्रम्प प्रशासन के प्रथम कार्यों में से एक था यमन पर हमले करना और वहां बड़ी संख्या में बेकसूर पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को मौत के घाट उतारना। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के इलाकों के अन्दर, ड्रोन हमले जारी रखे गए हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प ने संदिग्ध आतंकवादियोंको यातनाएं देने की प्रक्रिया, जो अमरीकी राज्य अब तक अवैध रूप से करता रहा है, को वैधता दिलाने के कदमों का समर्थन किया है। यह स्पष्ट है कि अमरीकी साम्राज्यवाद फासीवाद और जंग के रास्ते पर, अंतर्राष्ट्रीय चाल-चलन के सभी कायदों का हनन करने के रास्ते पर और आतंकवाद पर जंगके नाम पर गुप्त रूप से सशस्त्र गिरोहों को प्रश्रय देकर व खुलेआम सैनिक हमले करके दूसरे राष्ट्रों को नष्ट करने के रास्ते पर चलता जा रहा है।

ट्रम्प की सरकार ने ट्रांस-पेसिफिक सांझेदारी से अपने देश को बाहर निकाल दिया है और ऐलान किया है कि मेक्सिको व कनाडा के साथ नार्थ अमेरिकन फ्री ट्रेड अग्रीमेंट (एन.ए.एफ.टी.ए.) की शर्तों पर पुनः समझौता करेगा। उसने प्रस्तावित ट्रान्स अटलांटिक ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट पार्टनरशिप (टी.टी.आई.पी.) के प्रति विरोध भी प्रकट किया है। एक तरफ वे अमरीकी इज़ारेदार पूंजीपति जो वैश्विक व्यापर समझौतों से लाभ उठाना चाहते हैं, और दूसरी तरफ वे जो अमरीकी उत्पादों के घरेलू बाज़ार को सुरक्षित रखकर लाभ उठाना चाहते हैं, इन दोनों के बीच तीक्ष्ण अंतर्विरोध हैं।

मार्च महीने के बीच में, अमरीका और दक्षिण कोरिया की सेनाओं ने उत्तर कोरिया को निशाना बनाकर, कोरिया उपमहाद्वीप पर सबसे बड़े सैनिक अभ्यासों में से एक किया। उस युद्ध अभ्यास में 300,000 से अधिक दक्षिण कोरियाई और अमरीकी सैनिकों ने भाग लिया। उस अभ्यास का उद्देश्य था यह सन्देश देना कि अमरीका उत्तर कोरिया पर हमला करने और वहां सत्ता परिवर्तन करने को तैयार है। चीन ने यह प्रस्ताव किया था कि अगर उत्तर कोरिया की सरकार अपना परमाणु परीक्षण बंद कर दे तो उसके बदले में, अमरीका दक्षिण कोरिया के साथ अपने संयुक्त युद्ध अभ्यासों को भी रोक दे। परन्तु अमरीकी साम्राज्यवादियों ने चीन के उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। अपनी एशिया धुर्री नीति के अंतर्गत, अमरीकी साम्राज्यवाद ने इस समय जापान और ओकिनावा से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक, चीन को घेरकर, 400 से अधिक सैनिक अड्डे स्थापित कर रखे हैं।

अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी एशिया धुर्री नीति के अंतर्गत, चीन को निशाना बनाते हुए, हिन्दोस्तान के साथ एक रणनैतिक संबंध को भी मजबूत कर रहे हैं। वे हिन्दोस्तानी राज्य को कई मुद्दों पर चीन के साथ मुकाबला करने को उकसा रहे हैं। इस दिशा में हिन्दोस्तानी राज्य ने जो कदम उठाये हैं, उनसे हिन्दोस्तान और चीन के बीच अंतर्विरोध और तीखे हो गए हैं।

हिन्दोस्तान के विदेश सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, दोनों ने हाल के हफ्तों में अमरीका की यात्रा की। किन-किन बातों पर उनकी चर्चा हुयी, यह अब तक स्पष्ट नहीं किया गया है। यह अनुमान लगाया जा रहा है कि हिन्दोस्तान अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान के खिलाफ़ अपनी हमलावर योजनाओं के लिए अमरीका का समर्थन मांग रहा है, जबकि अमरीका अफगानिस्तान में अपनी योजनाओं के लिए हिन्दोस्तान का सैनिक सहयोग मांग रहा है। अमरीकी साम्राज्यवाद और जर्मन साम्राज्यवाद के बीच अंतर्विरोध भी तेज़ हो रहे हैं। 17-19 फरवरी को हुयी 53वीं वार्षिक म्युनिख सुरक्षा गोष्ठी में यह खुलासा किया गया कि जर्मनी ने तेज़ी से सैन्यीकरण करने के रास्ते को अपनाने का फैसला किया है। जर्मन साम्राज्यवादी यूरोपीय संघ को, अपनी अगुवाई में एक ऐसे आर्थिक, राजनीतिक और सैनिक संघ में तब्दील करने की कोशिश कर रहे हैं, जो आगे चलकर किसी समय, नाटो के ज़रिये अमरीकी साम्राज्यवाद की दादागिरी को ठुकरा कर अलग हो सकता है। ऐसी खबरें आयी हैं कि जर्मनी फ्रांस के परमाणु अस्त्रागार के विस्तार के लिए धन देकर, उस अस्त्रागार पर खुद अपना नियंत्रण जमाना चाहता है। गोष्ठी में अमरीकी उप-राष्ट्रपति ने नाटो सैनिक गठबंधन में अमरीका की अगुवा भूमिका को बनाये रखने के इरादे को दोहराया।

हिन्दोस्तान में गतिविधियां

हिन्दोस्तान और विदेश के इज़ारेदार पूंजीपतियों ने हाल में पांच राज्यों में हुए चुनावों के ज़रिये, अपने जन-विरोधी कार्यक्रम के लिए जनादेश रचने में सफलता हासिल की है। इज़ारेदार पूंजीपति चुनावों के नतीजों का इस्तेमाल करके एक ऐसे रास्ते को वैधता देने की कोशिश कर रहे हैं, जो अधिकतम जनसमुदाय के हितों के खिलाफ़ है। इज़ारेदार पूंजीपति चुनावों के नतीजों का इस्तेमाल करके, मोदी को 2024 तक हिन्दोस्तान को अगुवाई देने के लिए जनता की पसंदबतौर प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं।

मारुति के कई मज़दूरों को कत्ल के फर्ज़ी आरोपों के आधार पर आजीवन कैद की सज़ा देना, विश्वविद्यालयों के प्रगतिशील छात्रों का लगातार उत्पीड़न, तथाकथित गौ-रक्षक गिरोहों द्वारा बेझिझक हमले, ये सब हुक्मरान बड़े सरमायदारों के फासीवादी हमलों के लक्षण हैं। अयोध्या विवाद को फिर से आगे लाना, “लेनदेन करके समझौता करनेका सुप्रीम कोर्ट का आदेश - ये दिखाते हैं कि बड़े सरमायदार अपने समाज-विरोधी और साम्राज्यवादी कार्यक्रम के खिलाफ़ मज़दूर वर्ग और किसानों के बढ़ते विरोध को गुमराह करने और बांटने के लिए, अपनी पुरानी बांटो और राज करोकी कार्यनीति को चलाते रहेंगे।

अपने अधिकारों पर इन फासीवादी हमलों के खिलाफ़, मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। इस गुस्से को क्रांतिकारी दिशा में आगे ले जाना हम कम्युनिस्टों के सामने चुनौती है, ताकि भाजपा के धर्मनिरपेक्ष संसदीय विकल्प की हिमायत करने वाले एक बार फिर जनता के गुस्से को गुमराह न कर सकें।

बीते वर्ष के नवम्बर महीने में हुए पार्टी के 5वें महाधिवेशन के बाद, पार्टी के अखबार मज़दूर एकता लहर के उत्पादन के काम को और मजबूती व पेशेवर तरीके से करने के लिए अपनाये गए कदमों का परिपूर्ण सभा में सकारात्मक मूल्यांकन किया गया। इस बात को दोहराया गया कि पार्टी के अखबार की भूमिका न सिर्फ सामूहिक प्रचारक और सामूहिक उत्साहक की है, बल्कि सामूहिक संगठनकर्ता की भी है। क्रान्तिकारी सिद्धांत और पार्टी की नीति के बारे में सवालों समेत, मज़दूर वर्ग के अगुवा भाग के सामने तमाम सवालों पर चर्चा करने और इसके साथ-साथ संघर्षों पर रिपोर्ट करने और व्यापक मेहनतकश जनसमुदाय को प्रभावित करने वाली गतिविधियों पर अपने विचार देने की पार्टी के अखबार की नीति की फिर से पुष्टि की गयी।

हमारे कार्य

हाल के चुनावों से अनेक पार्टियों और दलों के कार्यकर्ता अब समझने लगे हैं कि लोग जिन मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे हैं, उनमें और चुनावों के परिणामों के बीच कोई संबंध नहीं हैं। संसदीय लोकतंत्र की वर्तमान व्यवस्था में जनमत सर्वोपरिके दावे का झूठ और खोखलापन दिन-ब-दिन स्पष्ट होता जा रहा है। हमें इन हालतों का इस्तेमाल करके, नव-निर्माण - एक ऐसी नयी व्यवस्था की स्थापना जिसमें लोग खुद समाज का एजेंडा तय करेंगे और मेहनतकश जनसमुदाय का मत समाज पर लागू होगा - की ज़रूरत के बारे में प्रचार को तेज़ करना होगा।

पार्टी के अख़बार को मजबूत करने और उसके स्वरूप व विषय वस्तु में उन्नति लाने के लिए महत्वपूर्ण संगठनात्मक कदम लेने के बाद, हमें अब पार्टी के अखबार की बिक्री और वितरण को और बढ़ाने की चुनौती पर ध्यान देना होगा। हमें अब तक की सीमाओं को लांघकर, नयी सोच व योजना के साथ इस काम को करना होगा। प्रत्येक इलाके में, एक सोची-समझी योजना के अनुसार, मज़दूरों के उन खास तबकों, जिनके बीच में हमारा लगातार काम चलता है, को लक्ष्य बनाकर, पार्टी के अखबार की बिक्री और वितरण को आयोजित करना होगा।

हर इलाके में, बड़े-बड़े उद्योगों और सेवाओं में काम करने वाले मज़दूरों को लक्ष्य बनाकर, प्रचार और आन्दोलन आयोजित करना, यह हमारा निरंतर काम होना चाहिए। मज़दूर वर्ग के उन तबकों में पार्टी के अखबार के पाठकों की संख्या को बढ़ाना होगा, उनके साथ नियमित तौर पर संपर्क रखना होगा, अध्ययन समूह संगठित करने होंगे और पार्टी के बुनियादी संगठन स्थापित करने होंगे।

परिपूर्ण सभा में यह फैसला लिया गया कि सभी पार्टी संगठनों को इस वर्ष के मई दिवस के लिए फौरन जन अभियान शुरू कर देने चाहिए। रेलवे, सड़क परिवहन, बैंकिंग, एयरलाइन्स, ऑटो उद्योग, वस्त्र उद्योग, शिक्षक, डॉक्टर, नर्स, इत्यादि जैसे सभी क्षेत्रों के मज़दूरों के बीच में हमें जन अभियान चलाने चाहिए। हमें महिलाओं, नौजवानों और छात्रों को इस वर्ष के मई दिवस के प्रदर्शनों में भाग लेने के लिए लामबंध करना चाहिए। हमारे मुख्य संदेशों और नारों का प्रचार करने के लिए हमें रचनात्मक रूप से सोशल मीडिया का प्रयोग करना चाहिए।

परिपूर्ण सभा में इस बात पर ध्यान दिया गया कि मज़दूर एकता लहर अखबार के 1-15 अप्रैल के अंक के साथ, रूसी क्रांति के सौ वर्ष के अवसर पर पार्टी के प्रचार और शिक्षण अभियान की शुरुआत हो गयी है। रूसी क्रांति की शताब्दी से संबंधित चर्चाओं और सभाओं को आयोजित करते समय, सभी इलाका समितियों को पार्टी के अखबार में प्रकाशित लेखों का इस्तेमाल करना चाहिए और उनसे मार्गदर्शन लेना चाहिए।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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