एक पर हमला, सब पर हमला! पूंजीवादी हमलों के खिलाफ़ मज़दूर वर्ग के विरोध संघर्ष का निर्माण करो और मजबूत करो!

Submitted by cgpiadmin on सोम, 03/04/2017 - 10:47

कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का मई दिवस की तैयारी के लिये आह्वान, 2 अप्रैल, 2017

मज़दूर साथियों,

इस वर्ष मई दिवस ऐसे समय पर आ रहा है जब मारुती-सुज़ुकी कंपनी के 13 मज़दूरों को आजीवन कारावास की भयंकर और नाजायज़ सज़ा सुनाई गयी है। इसके खिलाफ़ जन-विरोध बढ़ता ही जा रहा है। उनका अपराध केवल इतना है कि वे अपने अधिकारों की हिफ़ाज़त में खड़े हुए और एक लड़ाकू यूनियन बनाने की जुर्रत की।

18 मार्च, 2017 को जब से गुड़गांव की सत्रीय अदालत ने अपना आदेश सुनाया है उस वक्त से पूरे देश में, उस आदेश के खिलाफ़ जन प्रदर्शन बढ़ते ही जा रहे हैं। 23 मार्च को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत दिवस के अवसर पर गुड़गांव-मानेसर-बावल के हजारों मज़दूरों ने ट्रेड यूनियन कौंसिल गुड़गाव, के झंडे तले विशाल रैली का आयोजन किया। सभी क्षेत्रों के मज़दूरों ने एकजुट होकर यह कसम खाई कि जब तक इन मज़दूरों के खिलाफ़ अदालत के फैसले को खारिज़ नहीं किया जाता और फर्ज़ी आरोपों के तहत निकाले गए मज़दूरों को नौकरी पर वापस नहीं लिया जाता, तब तक वे अपने संघर्ष को जारी रखेंगे। इस ऐलान के बाद मज़दूरों के सभी केन्द्रीय फेडरेशनों ने मिलकर फैसला किया है कि 5 अप्रैल को देशभर में विरोध प्रदर्शन आयोजित किये जायेंगे।

मारुती-सुजुकी कंपनी के मज़दूरों पर हमला, पूरे मज़दूर वर्ग पर हमला है। देश और विदेश के सबसे बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों के इशारे पर यह हमला किया गया है। इसका उद्देश्य है सभी मज़दूरों के बीच खौफ़ फैलाना और यह सन्देश देना कि “यदि तुमने अपने अधिकारों के लिए लड़ने के जुर्रत की तो, तुम्हारा भी यही हश्र होगा”।

लेकिन इन हमलों के विरोध में मज़दूर वर्ग की प्रतिक्रिया यह दिखाती है कि वह अपने अधिकारों के लिए लड़ने के प्रति दृढ़ संकल्प है और वह पूंजीपति वर्ग की गीदड़-भभकी से डरने वाला नहीं है। गुड़गांव में आयोजित विरोध प्रदर्शनों में शामिल हजारों-हजारों मज़दूरों से लेकर, देशभर के लाखों-करोड़ों मज़दूरों की एकजुट आवाज़ दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। देशभर में अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों के मज़दूर मारुती-सुजुकी के गिरफ्तार मज़दूरों को रिहा करने और उन्हें फिर से नौकरी पर लेने की मांग उठा रहे हैं।

साथियों,

हिन्दोस्तान के मज़दूर वर्ग का संघर्ष, इस अमानवीय पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ़ अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन का अभिन्न हिस्सा है। हमारे देश में और दुनियाभर में पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ़ मज़दूर वर्ग और मेहनतकश लोगों के विरोध प्रदर्शन, पिछले कुछ वर्षों से बढ़ती संख्या में और बढ़ते पैमाने पर हो रहे हैं। इज़ारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने के लिए मज़दूर वर्ग के अधिकारों पर हमलों के खिलाफ़ विरोध बढ़ता ही जा रहा है। दुनियाभर में व्यापार और पूंजीनिवेश के समझौतों के खिलाफ़ व्यापक पैमाने पर विरोध हो रहा है। इन समझौतों के चलते आज़ाद और संप्रभु राज्यों की सरकारों पर पूंजीवादी कंपनियों का आधिपत्य चलता है।

परस्पर-विरोधी हितों वाले दो वर्गों के बीच घमासान संघर्ष चल रहा है। एक तरफ है पूंजीपति वर्ग, जिसके सरगना हैं इज़ारेदार पूंजीपति घराने, जो मज़दूरों में खौफ फैलाकर उन्हें अपने आगे झुकाना चाहते हैं। मज़दूरों का शोषण तीव्र करते हुए, अधिकतम मुनाफे़ बनाना चाहते हैं। दूसरी तरफ खड़ा है मज़दूर वर्ग। हम मज़दूर अपने किसान साथियों के साथ मिलकर, एक इंसान बतौर और देश की तमाम दौलत के निर्माता बतौर, अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं।

तीन साल पहले देशी और विदेशी इज़ारेदार पूंजीपतियों ने नयी दिल्ली की लोकसभा में भा.ज.पा. की अगुवाई वाली पूर्ण बहुमत की सरकार बिठाई। इज़ारेदार पूंजीपतियों ने मोदी सरकार को यह जिम्मेदारी दी है कि वह उनके मज़दूर-विरोधी, किसान-विरोधी, राष्ट्र-विरोधी और समाज-विरोधी कार्यक्रम को और अधिक तेज़ी के साथ लागू करे। “मेक इन इंडिया”, “स्टार्ट-अप इंडिया”, “करोबारों को सुगम बनाने” के लिए बेहतर माहौल बनाने के नारों के तहत हिन्दोस्तान की सरकार, मज़दूरों के अधिकारों को पैरों तले रौंद रही है।

सरकार कारखाना अधिनियम और ठेका मज़दूरी अधिनियम में मज़दूर-विरोधी बदलाव लाकर करोड़ों मज़दूरों को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित कर रही है। नौजवान मज़दूरों को अप्रेंटिस और ट्रेनी के नाम से नौकरी पर रखा जा रहा है और उनका अति-शोषण किया जा रहा है। गारमेंट उद्योग में निर्धारित-समय के लिये अनुबंध, अब आम होता जा रहा है और इस प्रणाली का इस्तेमाल मज़दूरों में काम की असुरक्षा फैलाने तथा उनका शोषण और तेज़ करने के लिए किया जा रहा है।

साथियों,

मज़दूरों के शोषण और लूट को और तीव्र किये बगैर, हर तरफ मौत और बर्बादी फैलाये बगैर, हुक्मरान पूंजीपति वर्ग अपना राज चलाने में असमर्थ है। पूंजीपतियों की परस्पर विरोधी पार्टियों की सरकारें, एक के बाद एक सत्ता में आती हैं और राष्ट्र को बचाने की बातें करती हैं। असलियत में ये पार्टियां श्रम के शोषण को बढ़ाने, किसानों को लूटने और हमारे प्राकृतिक संसाधनों को बर्बाद करने में साम्राज्यवादियों के साथ सांठ-गांठ करती हैं। मज़दूरों को और मानव अधिकारों की सुरक्षा में शोषण-दमन और भेदभावों का विरोध करने वालों को “राष्ट्र-विरोधी” घोषित कर किया जाता है।

जनसमुदाय के सभी शोषित और पीड़ित तबकों में से केवल मज़दूर वर्ग ही ऐसा वर्ग है, जिसके पास पूंजीपतियों को रोकने और उनकी सत्ता को उखाड़ फेंककर, समाज की दिशा को बदलने की ताक़त और काबिलियत है। हमें अपने सारे फौरी संघर्षों को इसी नज़रिये और मकसद के साथ चलाना होगा कि, इन संघर्षों के ज़रिये हम इतनी ताक़त जुटाएं कि मिलकर पूंजीपतियों के राज को उखाड़ फेंक और उसकी जगह पर मज़दूरों और किसानों का राज बसा सकें। मज़दूर वर्ग की एकता और मज़दूर-किसान गठबंधन को मजबूत करना ही आगे का रास्ता है।

हमारे जीवन के लंबे अनुभव ने हमें बार-बार दिखाया है कि अपने अधिकारों की हिफ़ाज़त के लिए हम मौजूदा राज्य की अदालतों पर निर्भर नहीं रह सकते। हम मौजूदा संसदीय जनतंत्र और उसकी राजनीतिक प्रक्रिया पर भी निर्भर नहीं रह सकते। ये सब पूंजीपति वर्ग की सेवा के लिये बनाये गए तंत्र हैं। हमें खुद अपने एकजुट संघर्ष के तंत्र बनाने होंगे और उन्हें इतना मजबूत करना होगा कि यह तंत्र ही भविष्य की हमारी नयी राजनीतिक सत्ता के तंत्र बन जायें।

एक सबसे महत्वपूर्ण और फौरी कार्य हमारे सामने यह है कि फैक्ट्रियों और औद्योगिक क्षेत्रों में मज़दूरों की एकता कमेटियों का निर्माण करें और उनको मजबूत करें। इस तरह की कमेटियां कई जगह पर उभर चुकी हैं। अलग-अलग फैक्ट्रियों के मज़दूर, अलग-अलग यूनियनों के नेता, अलग-अलग पार्टियों के कम्युनिस्ट, मज़दूरों के अधिकारों की हिफ़ाज़त में एक साथ आ रहे हैं। मज़दूरों की एकता कमेटियां और कौंसिलें, पूरे औद्योगिक इलाकों में मज़दूरों को सामूहिक अगुवाई देने के लिए काम कर रही हैं।

इन मज़दूरों की एकता कमेटियों को बनाने और उनको मजबूत करने में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम उन सभी अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करें, जिनके लिये हम सभी दिहाड़ी मज़दूर और वेतनभोगी मज़दूर बतौर हक़दार हैं। एक इंसान और मज़दूर होने के नाते हमारे कुछ अधिकार बनते हैं। इन अधिकारों में शामिल हैं - मनुष्य जैसे इज्ज़त से जीने का अधिकार, अपनी पसंद की यूनियन बनाने का अधिकार, 8 घंटे काम के दिन का अधिकार, आराम करने और मनोरंजन करने का अधिकार, स्वास्थ्य सेवा का अधिकार, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा का अधिकार। एकजुट मज़दूर वर्ग प्रतिरोध मोर्चे के मांगपत्र में सबसे ऊपर इन अधिकारों के लिए संवैधानिक गारंटी की मांग रखनी होगी।

अपने अधिकारों की हिफ़ाज़त में यह संघर्ष हमें इस नज़रिये और लक्ष्य के साथ चलाना होगा कि हमें हिन्दोस्तान का नव-निर्माण करना है। इस नव-निर्माण का अर्थ है - पूरी राज्य सत्ता का पुनर्गठन और अर्थव्यवस्था की दिशा बदलना। सामाजिक उत्पादन का लक्ष्य होना चाहिए, मज़दूरों और किसानों की लगातार बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करना, न कि इज़ारेदार पूंजीपतियों की अमिट लालच को पूरा करना। अपने हाथों में राज्य सत्ता लेकर हम मज़दूर और किसान सामाजिक उत्पादन के सभी मुख्य साधनों को पूंजीपतियों के हाथों से छीनकर सामाजिक नियंत्रण में लायेंगे। हम एक नए राज्य की स्थापना करेंगे और एक नया संविधान बनायेंगे, जिसके तहत सभी मज़दूरों, किसानों, औरतों और नौजवानों, सभी मनुष्यों के लिए अधिकारों की अनुल्लंघनीय संवैधानिक गारंटी होगी।

आओ साथियों, आज हम सब एकजुट होकर मई दिवस 2017 को इस शान से मनायें कि यह मज़दूर वर्ग की ताक़त और एकता की मिसाल बन जाये! आओ, हम सब संगठित हो जायें, एक नए हिन्दोस्तान के निर्माण के लिए, जहां सभी के लिए सुख और सुरक्षा की गारंटी होगी।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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