कश्मीर में सेना जानबूझकर नागरिकों को निशाना बनाती है :

Submitted by cgpiadmin on सोम, 17/04/2017 - 19:23

कश्मीर की समस्या का सैन्य समाधान नहीं हो सकता!

27 मार्च को बडगाम जिले में चादूरा के एक गांव दरबाग में तीन युवकों की मौत हो गयी, जब “मुठभेड़” की जगह पर इकट्ठा सैकड़ों लोगों पर सशस्त्र बलों ने जानबूझकर गोलियां चलायीं।

सबको याद होगा कि इस वर्ष फरवरी में हिन्दोस्तानी सेना प्रमुख जनरल रावत ने सेना द्वारा आम नागरिकों पर किये जा रहे हमलों को सही ठहराते हुए कहा था कि “मुठभेड़ों में बाधा पैदा करने वाली भीड़” को “उग्रवादियों का खुला समर्थक” माना जायेगा और उनको भी निर्दयता पूर्वक मार डाला जायेगा। उस वक्त के रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर ने सार्वजनिक रूप से इस नीति को सही बताया था।

जनरल रावत ने जो कुछ सार्वजनिक रूप से कहा, असलियत में पिछले 27 से भी अधिक वर्षों से यह हिन्दोस्तानी राज्य की नीति रही है। हिन्दोस्तानी राज्य सभी कश्मीरी लोगों के साथ दुश्मन की तरह बर्ताव करता है। कश्मीर में राजनीतिक समस्या का राजनीतिक हल निकालने की बजाय, हिन्दोस्तानी राज्य ने कश्मीर के लोगों के खिलाफ़ वहशी राजकीय आतंक छेड़ दिया है। 

ऐसी कई खबरें आई हैं कि किस तरह से सशस्त्र बल गांव और शहरों में “कॉबिंग ऑपरेशन” के दौरान लोगों को उठाकर ले जाते हैं। उसके बाद उन्हें “खतरनाक आतंकवादी” करार देते हुए फर्ज़ी मुठभेड़ों में मार डालते हैं। हिन्दोस्तान के अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मनगढ़ंत कहानियां फैलाई जाती हैं कि किस तरह से ये खतरनाक “आतंकवादी” सीमा पार से आये थे और हमारे देश में तमाम तरह की आतंकवादी कार्यवाइयों को अंजाम देने की योजना बना रहे थे। समय-समय पर सशस्त्र बलों के सदस्यों को फर्ज़ी मुठभेड़ आयोजित करने के लिए वीरता पुरस्कार भी दिए जाते हैं। लेकिन बाद में तहकीकात से पता चलता है कि मारे गए लोग बेकसूर थे या हिरासत में रखे गये नौजवान थे और उनके खिलाफ़ कोई भी अपराध साबित नहीं हुए थे। 

आज कश्मीर एक सैनिक छावनी में बदल गया है और कश्मीर के लोग सेना के जूतों तले जी रहे हैं। इस वक्त कश्मीर में 7 लाख से अधिक सैनिक और अर्ध-सैनिक बल तैनात हैं। सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम के तहत सशत्र बलों और सुरक्षा कर्मियों के खिलाफ़ कोई भी कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती है। लोगों को यातनायें देने, मार डालने, महिलाओं से बलात्कार करने और लूटपाट करने की उनको पूरी आज़ादी है।

ऐसी हालतों के चलते कश्मीर के लोग स्वाभाविक रूप से बेहद गुस्से में हैं। कश्मीर से आई रिपोर्टें बताती हैं कि जब कभी किसी “मुठभेड़” की खबर आती है तो आप-पास के गांव के हजारों लोग घटना स्थल पर इकट्ठा हो जाते हैं और सशस्त्र बलों की दुष्ट योजनाओं के खिलाफ़ प्रदर्शन करते हैं। कश्मीर के सभी हिस्सों में यह प्रवृत्ति तेज़ी से फैलती जा रही है। 27 मार्च को हुई घटना, ऐसी ही एक घटना थी। ऐसी सभी घटनाओं में सशत्र बल, लोगों पर अंधाधुंध गोलीबारी करते हैं, जिसमें न केवल प्रदर्शनकारी मारे जाते हैं और घायल होते हैं बल्कि आस-पड़ोस के लोग और यहां तक कि अपने घरों में बैठे लोग भी इसका शिकार बनते हैं। हर एक घटना के बाद विरोध प्रदर्शन और भी बढ़ जाते हैं और इसके साथ ही सेना और सशस्त्र बलों की हिंसा और गोलीबारी भी बढ़ जाती है, जिसमें और अधिक लोग घायल होते हैं और मारे जाते हैं। इस चक्र के चलते कश्मीरी लोगों और हिन्दोस्तानी राज्य, उसकी सेना और सुरक्षा तंत्र के बीच अलगाव बढ़ता ही जाता है। 

यह साफ है कि सेना द्वारा कश्मीर के लोगों पर वहशी दमन, लोगों के दिलों से प्रतिरोध की चिंगारी बुझा नहीं पाया है। लोग यथास्थिति को मानने से इंकार कर रहे हैं।

30 मार्च को अखबारों ने गृह मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से कहा कि कश्मीर में निगरानी और जासूसी के लिए इज़राइल द्वारा निर्मित ड्रोन का इस्तेमाल किया जा रहा है। सुरक्षा तंत्र के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया है कि सरकार का यह मानना है कि जम्मू और कश्मीर में जो हालात हैं, वे इज़राइल के कब्ज़ेवाले गाज़ा पट्टी के हालात की तरह हैं और कश्मीर में इज़राइल द्वारा निर्मित ड्रोन का इस्तेमाल यह दिखाता है कि हिन्दोस्तानी राज्य, कश्मीर में वही फौज़ी रणनीति अपना रहा है। जिस तरह की फौज़ी रणनीति इज़राइली राज्य फिलिस्तीनी लोगों के खिलाफ़ गाज़ा में अपना रहा है।

हिन्दोस्तानी राज्य और उसके सशस्त्र बलों की दहशत से मुक्त जीवन जीने के कश्मीरी लोगों की आकांक्षाओं को बलपूर्वक दबाया नहीं जा सकता। हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी हिन्दोस्तानी राज्य की नीति की निंदा करती है और समस्या के राजनीतिक समाधान का आह्वान करती है जिसमें कश्मीर के लोगों के आत्म-निर्धारण के अधिकार का सम्मान किया जायेगा, यानी इस बात को स्वीकार किया जायेगा कि किसी भी दबाव और दखलंदाजी के बगैर, कश्मीर के लोगों को अपने राजनीतिक भविष्य का फैसला करने का अधिकार है।

Tag:    सैन्य समाधान    कश्मीर में सेना    Apr 16-30 2017    Political-Economy    Rights     2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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