इज़ारेदारों के अजेंडे को बढ़ाने के लिए राज्यसभा की अवहेलना

Submitted by cgpiadmin on सोम, 17/04/2017 - 19:34

मार्च के दौरान लोकसभा में पांच विधेयक “धन विधेयक” के रूप में पेश किये गए। इनमें शामिल हैं वित्त विधेयक और वस्तु तथा सेवा कर (जी.एस.टी.) से संबंधित चार अन्य विधेयक।

वित्त विधेयक 2017

वित्त विधेयक एक ऐसा विधेयक है जो हर साल केंद्रीय बजट के साथ संसद में पेश किया जाता है। एक बार वित्त विधेयक संसद से पारित हो गया और राष्ट्रपति द्वारा उस पर दस्तखत हो गए, तब से इस विधेयक में प्रस्तावित करों, खर्चों और कर्ज़ के लक्ष्यों को पूरा करने का कार्य शुरू हो जाता है।  

2017 के वित्त विधेयक का दायरा बहुत व्यापक है। बजट के प्रस्तावों के अलावा इसमें कई कानूनों में 40 से अधिक संशोधन शामिल किये गए हैं, जैसे लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, भारतीय पोस्ट ऑफिस अधिनियम, भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, तेल उद्योग (विकास) अधिनियम, तथा भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम।

धन विधेयक

हिन्दोस्तान के संविधान में धन विधेयक संबंधी उपाय ब्रिटिश संसदीय प्रक्रिया से नकल किये गए हैं। हिन्दोस्तान के संविधान की धारा 109(1) यह कहती है कि किसी भी धन विधेयक को पहले लोकसभा में ही लाया जा सकता है और लोकसभा में पारित होने के बाद, लोकसभा का अध्यक्ष इसे धन विधेयक बतौर प्रमाणित करके राज्यसभा में पेश करने के लिये भेज देता है। लेकिन, राज्यसभा धन विधेयक को नामंजूर नहीं कर सकती। राज्यसभा को उसे 14 दिन के भीतर अपनी सिफारिशों के साथ लोकसभा को वापस भेज देना होता है। उन सिफारिशों को लोकसभा मंजूर कर सकती है या ठुकरा सकती है। दोनों ही परिस्थितियों में ऐसा मान लिया जाता है, कि उस विधेयक को संसद के दोनों सदनों ने पारित कर दिया है। हिन्दोस्तान के संविधान की धारा 109(5) यह कहती है कि यदि राज्यसभा अधिनियम को 14 दिन में लौटा नहीं पाती तब भी विधेयक को संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाता है।

संविधान की धारा 110(1) के मुताबिक कोई भी विधेयक धन विधेयक तभी माना जायेगा जब उसमें कर व अन्य वसूलियां, सरकारी कर्ज़ के विनियमन संबंधी मसले और सार्वजनिक खर्चे की मंजूरी से संबंधित मसले ही हों। 

संविधान की धारा 110(3) कहती है कि यदि यह प्रश्न उठता है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, तो उस पर लोकसभा के अध्यक्ष का निर्णय अंतिम होगा”।

संविधान की धारा 110(1) के मुताबिक यह बात साफ है कि वित्त विधेयक 2017 किसी भी तरह से धन विधेयक कहे जाने के योग्य नहीं है। लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ने इसे धन विधेयक कहते हुए प्रमाणित किया है और संविधान की धारा 110(3) के मुताबिक लोकसभा के अध्यक्ष का निर्णय अंतिम है।

संविधान की लगभग सभी धाराओं की तरह, धारा 110 में एक उपखंड है जो कार्यकारिणी द्वारा मनमाने तरीके से सत्ता के दुरुपयोग पर तथाकथित “अंकुश” लगाने के किये शामिल किया गया है और साथ ही एक अन्य उपखंड में कार्यकारिणी को इसकी अवहेलना करने का प्रावधान दिया गया है। यह इस संविधान के दोहरे मापदंड को साफ दर्शाता है।

वित्त विधेयक 2017 में जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम संबंधित संशोधन प्रस्तावित किया गया है, उसका मकसद राजनीतिक पार्टियों को कॉर्पोरेट घरानों से असीमित पैमाने पर अज्ञात चंदा देने की प्रथा को कानूनी मान्यता देना है। मौजूदा कानून के मुताबिक, कोई भी कंपनी पिछले 3 साल में अपने कुल औसत मुनाफे़ की 7.5 प्रतिशत तक की रकम राजनीतिक पार्टियों को चंदे के रूप में दे सकती है। ऐसा करते हुए उस कंपनी को अपने चंदे की रकम और राजनीतिक पार्टी का नाम, अपने लाभ-हानि खाते में दिखाना पड़ता है। वित्त विधेयक 2017 संशोधन प्रस्तावों के तहत चुनावी बांड नामक एक नए वित्तीय साधन जारी किये जाने से ये शर्तें हटा दी गई है। इस सुधार से बड़े इज़ारेदार पूंजीवादी घराने अब नगदी से भरा सूटकेस देने की बजाय और भी बड़ा चंदा इन चुनावी बांडों के द्वारा दे सकते हैं।  

चुनावी मैदान में पूंजीवादी हितों का दबदबा, भ्रष्टाचार के सबसे बड़े रूपों में से एक है, जिसके ज़रिये सबसे उच्चतम स्तर पर लोगों का फैसला लेने का अधिकार, निजी हितों के अधीन किया जाता है। चुनावी बांड के ज़रिये कॉर्पोरेट चंदा देने के लिए सारे दरवाज़े खोल देने का मतबल है, भ्रष्टाचार को कानूनी मान्यता देना। इस संशोधन की वजह से इज़ारेदार पूंजीवादी घरानों की पार्टियों और अन्य पार्टियों के बीच खाई और भी बढ़ जाएगी, जो पहले से ही काफी गहरी है। इस कदम का मकसद है हिन्दोस्तानी प्रणाली को अमरीकी प्रणाली जैसा बनाना, जिसमें कुछ इज़ारेदार घरानों द्वारा वित्त-पोषित पार्टियां पूरी राजनीतिक व्यवस्था पर हावी होती हैं और अन्य किसी पार्टी के लिए चुनाव में हिस्सा लेने तक की गुंजाईश नहीं रहती है। 

इस वित्त विधेयक में और भी कई काले व विवादास्पद कदम शामिल हैं। इनके तहत ऐसे प्रावधान किये जा रहे हैं जिससे आयकर विभाग किसी भी व्यक्ति पर छापा मार सकता है, विभाग को इसके लिए शक की वजह का खुलासा करने और जानकारी का स्रोत बताने की ज़रूरत नहीं रहेगी। इन संशोधनों के तहत कार्यकारिणी को किसी भी ट्रिब्यूनल का अध्यक्ष और सदस्य चुनने की पूरी छूट होगी और इस तरह की समीतियों के चुनाव में न्यायपालिका की भूमिका को खत्म कर दिया गया है। सभी पंजीकृत करदाताओं के लिए आधार अनिवार्य कर दिया गया है।

मोदी सरकार को इसका अंदाजा था कि इस राजनीतिक चंदा संशोधन और अन्य कदमों पर राज्यसभा में विरोध का सामना करना पड़ सकता है। इसीलिए इन सभी संशोधनों को वित्त विधेयक 2017 में शामिल कर दिया गया और उसे “धन विधेयक” के रूप में पेश करके पास कर दिया गया। जबकि सभी विधेयकों को अधिनियम बनने के लिए संसद के दोनों सदनों, लोकसभा और राज्यसभा में पारित करना ज़रूरी होता है, लेकिन “वित्त विधेयक” को राज्यसभा की मंजूरी की ज़रूरत नहीं होती है (बॉक्स देखिये)। जैसा कि देखा गया, राज्यसभा ने वित्त विधेयक पर पांच बदलाव प्रस्तावित किये, लेकिन लोकसभा ने उन प्रस्तावों को ठुकरा दिया। वित्त विधेयक अब संसद में पारित माना जा रहा है और अब वह कानून बन चुका है। 

वस्तु एवं सेवाकर विधेयक 

कई केंद्रीय और राज्य स्तर के अप्रत्यक्ष करों की जगह पर एक ही जी.एस.टी. लाया जा रहा है। इन अप्रत्यक्ष करों में शामिल हैं केंद्रीय उत्पाद शुल्क, अतिरिक्त उत्पाद शुल्क, सेवा कर, राज्य मूल्य वर्धित कर (वैट) और मनोरंजन कर, इन्हें हटाकर केंद्रीय और राज्य सरकारें मिलकर एक ही कर को लागू करेंगी। यह एक ऐसा सुधार है जिसकी मांग हिन्दोस्तान और विदेश के इज़ारेदार पूंजीपति घराने कई सालों से करते आये हैं।

जी.एस.टी. कर निर्धारित करने की राज्य सरकार की स्वायत्ता को घटाने का एक बड़ा सुधार है। इस पर राज्यसभा में पूरी चर्चा करना ज़रूरी था। लेकिन इसे भी धन विधेयक के रूप में पेश करके, इस विषय पर चर्चा नहीं होने दी गयी। जबकि प्रधानमंत्री “सहकारी संघवाद” का दावा करते हैं, लेकिन धीरे-धीरे अधिक से अधिक ताक़त केंद्रीय मंत्रिमंडल के हाथों में सिमटती जा रही है।

निष्कर्ष

राजनीतिक पार्टियों के लिए असीमित अज्ञात कॉर्पोरेट चंदे को कानूनी मान्यता देकर, बड़े सरमायदार पूरी राजनीतिक प्रक्रिया पर अपने दबदबे और संपूर्ण नियंत्रण को कानूनी मान्यता दे रहे हैं। इससे वे पूरे समाज पर अपनी हुकूमत को और अधिक असरदार तरीके से थोप पायेंगे। फैसला लेने का अधिकार बढ़ते पैमाने पर कार्यकारिणी के हाथों में संकेंद्रित होता जा रहा है। जो कोई इज़ारेदार पूंजीपतियों के रास्ते में आने की कोशिश करता है, उसको भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ाई के नाम पर निशाना बनाने के लिए, केंद्रीय कर विभाग को और अधिक पुलिस अधिकारों तथा निरंकुश प्राधिकारों से लैस किया जा रहा है।

इज़ारेदार पूंजीपति घरानों के इस फासीवादी हमले को टक्कर देने के लिए, मौजूदा संसदीय लोकतंत्र की सीमा को तोड़कर हमें बाहर निकलने की ज़रूरत है। वित्त विधेयक 2017 और जी.एस.टी. विधेयकों को धन विधेयक के रूप में संसद में पारित करना, यह साफ दिखाता है कि मौजूदा व्यवस्था असलियत में केंद्रीय मंत्रिमंडल का शासन है। यह साफ दिखाता है कि संसदीय प्रक्रिया और मौजूदा संविधान, कार्यकारिणी की मनमानी के अधिकार पर किसी भी तरह का “अंकुश” नहीं लगाता है।

संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था जो कि हमारे देश में मौजूद है वह केवल राज करने वाले मुट्ठीभर अल्पसंख्यक शोषकों के बीच अंतर्विरोधों को हल करने का एक तंत्र है। इस व्यवस्था में बहुसंख्यक शोषित मज़दूरों और किसानों के हितों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया जाता है। वार्षिक बजट, जो कि मेहनतकश लोगों के सिर पर अप्रत्यक्ष करों का बोझ बढ़ाता रहता है और जिसके चलते बाज़ार में रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी होती रहती हैं, वह बजट हर साल बिना किसी अर्थपूर्ण चर्चा के पारित कर दिया जाता है।

जबकि शोषित बहुसंख्यक लोगों को इस व्यवस्था में सत्ता से बाहर रखा जाता है, अल्पसंख्यक शोषक वर्ग के अलग-अलग निहित स्वार्थ रखने वाले तबकों को राज्य की कार्यकारी सत्ता पर अपना नियंत्रण जमाने के लिए आपस में टकराने के लिए खुला मैदान दिया जाता है। मुट्ठीभर इज़ारेदारों के हाथों में लगातार संकेन्द्रित होती दौलत की झलक, सबसे बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों के बढ़ते दबदबे में साफ नज़र आती है।

हिन्दोस्तानी संसदीय लोकतंत्र का उद्गम बर्तानवी बस्तीवादी हुक्मरानों द्वारा प्रस्थापित सीमित प्रतिनिधित्व की प्रक्रिया में निहित है, जिसमें बर्तानवी बस्तीवादी हुक्मरानों ने अपने राज को मजबूत करने के लिए हिन्दोस्तान के तमाम कुलीन तबकों को सीमित प्रतिनिधित्व के आधार पर अपनी शासन व्यवस्था में जगह दी। 1947 के बाद हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदारों ने पूंजीवादी विकास के अलग-अलग पड़ावों में अन्य कुलीन तबकों के निहित हितों को शामिल करने के लिए इसी व्यवस्था का इस्तेमाल किया, जबकि मेहनतकश बहुसंख्यक लोगों को हर वक्त सत्ता से दूर रखा गया।  

आज के माहौल में जब हिन्दोस्तान के इज़ारेदार पूंजीपति अपने आक्रामक साम्राज्यवादी रास्ते पर चल पड़े हैं, तब वह अन्य कुलीन तबकों को उस हद तक शामिल करने के लिए तैयार नहीं हैं, जितना कि वे पहले थे। इसीलिए वह राजनीतिक मैदान में भी पूरे देश के स्तर पर सत्ता में अपनी वफादार पार्टियों की इज़ारेदारी को और मजबूत करना चाहते हैं।

इज़ारेदार पूंजीपतियों के फासीवादी हमलों का सामना करने के लिए यह ज़रूरी है कि हम एक नए नज़रिये और दृष्टिकोण से मौजूदा सरमायदारी संसदीय लोकतंत्र की जगह पर आधुनिक श्रमजीवी लोकतंत्र की एक बेहतर व्यवस्था स्थापित करें, जहां फैसले लेने की संप्रभु ताक़त संसद, लोकसभा, मंत्रिमंडल या राष्ट्रपति में नहीं होगी, बल्कि लोगों में निहित होगी।

Tag:    धन विधेयक    वित्त विधेयक    Apr 16-30 2017    Struggle for Rights    Rights     2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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