मई दिवस की उत्पत्ति

Submitted by cgpiadmin on सोम, 17/04/2017 - 19:39

14 जुलाई, 1889 को, बैस्टिल के पतन की 100वीं वर्षगांठ पर कई देशों के संगठित क्रांतिकारी सर्वहारा आंदोलनों के नेताओं ने पेरिस में एक साथ मिलकर द्वितिय इंटरनेशनल की स्थापना की। हालांकि फ्रेडरिक एंगेल्स व्यक्तिगत रूप से इस सम्मेलन में शामिल नहीं हो सके, लेकिन उन्होंने इसकी कार्यवाही में मार्गदर्शक भूमिका निभाई। कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा स्थापित प्रथम इंटरनेशनल के दौर में, मार्क्सवाद ने मज़दूर वर्ग के आंदोलन में अराजकतावाद और अन्य टूटपूंजिया रुझानों के खिलाफ़ निर्णायक विजय हासिल की थी। यूरोप और उत्तरी अमरीका के सभी पूंजीवादी देशों में मज़दूर वर्ग की पार्टियां उभरीं और मजबूत हुईं। इस दौरान कई देशों में राजनीतिक अधिकारों के लिए मज़दूर वर्ग के आंदोलन मजबूत हो गए थे। इन परिस्थितियों में, पेरिस कांग्रेस ने घोषणा की कि 1 मई, 1890 को दुनियाभर में श्रमिक दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

हिन्दोस्तान में प्रथम मई दिवस

हिन्दोस्तान में मई दिवस समारोह, अन्तर्राष्ट्रीय मज़दूर वर्ग दिवस का एक अभिन्न हिस्सा रहा है, जो हर वर्ष दुनियाभर में 1 मई को आयोजित किया जाता है।

हिन्दोस्तान में पहली बार मई दिवस चेन्नई (पहले मद्रास) में लेबर किसान पार्टी ऑफ हिन्दुस्तान द्वारा 1 मई, 1923 में आयोजित किया गया। यह पहली बार था जब लाल झंडा हिन्दोस्तान की धरती पर फहराया गया। पार्टी के नेता कामरेड सिंगारावेलू चेट्टियार ने 1923 में मई दिवस का दो जगह पर आयोजन करने का प्रबंध किया था। मद्रास हाई कोर्ट के सामने समुद्र तट पर एक सभा आयोजित की गई और दूसरी सभा ट्रिपलीकेन में समुद्र के किनारे की गई।

चेन्नई में मई दिवस समारोह का आयोजन मज़दूर वर्ग की समाजवादी चेतना के उदय की झलक थी। हिन्दोस्तानी मज़दूर वर्ग ने अपनी क्रांतिकारी क्षमता का परिचय पहले ही दे दिया था, जब वह लोकमान्य तिलक की गिरफ्तारी के विरोध में, जो कि देशद्रोह के आरोप में की गई थी के खिलाफ़ बड़ी तादाद में बस्तीवाद-विरोधी आंदोलन में उतर आया था। 

इसके बाद प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद, 1918-1921 के दौरान बड़े पैमाने पर हड़ताली आंदोलन पूरे देश में फैल गए। 1918 के अंत में मुंबई के सूती मिल मज़दूरों ने बेहतर मज़दूरी और काम करने व जीवन जीने की बेहतर परिस्थितियों की मांग को लेकर पूरे उद्योग को ठप्प कर दिया था। फासीवादी कानून रोलेट एक्ट के खिलाफ़ पूरे देश में रेल मज़दूर और कपड़ा मिलों के मज़दूर एक शक्तिशाली संघर्ष में आगे आये। नवम्बर 1921 में मुंबई के प्रिंस ऑफ वेल्स की यात्रा के विरोध में लाखों मज़दूरों ने एक देशव्यापी आम हड़ताल में हिस्सा लिया और मुंबई की कपड़ा मिलों के मज़दूरों ने पूरे शहर का चक्का जाम कर दिया।

इस पूरे दौर में बड़ी संख्या में ट्रेड यूनियनों का गठन किया जा रहा था। 31 अक्तूबर, 1920 को देश के पहले ट्रेड यूनियन केंद्र के रूप में, ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना की गयी।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, ग़दर क्रांतिकारियों के वीरतापूर्ण कार्य और 1917 में सोवियत संघ में महान अक्तूबर क्रांति की विजय से हिन्दोस्तानी मज़दूर वर्ग को प्रेरणा मिली।

सिंगारावेलू चेट्टियार, 1925 में बनी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे।

देश में मनाये गए प्रथम मई दिवस के प्रतीक के रूप में चेन्नई के मरीना बीच पर ट्राइंफ ऑफ लेबर स्टेचू (श्रमिक विजय प्रतिमा) को स्थापित किया गया।

पेरिस कांग्रेस ने निम्नलिखित प्रस्ताव को अपनाया:  “पेरिस कांग्रेस एक महान अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शन आयोजित करने का फैसला लेती है, ताकि सारी दुनिया में, सभी शहरों में, एक ही दिन दुनियाभर में सभी मेहनतकश अपने हुक्मरानों से कानूनी रूप से 8 घंटे के कार्यदिवस की मांग करें और पेरिस कांग्रेस के सभी फैसलों को अमल में लायें। क्योंकि, अमरीका के लेबर फेडरेशन ने दिसम्बर 1888 में सेंट लुईस के अधिवेशन में, 1 मई, 1890 को इस तरह के प्रदर्शन आयोजित करने का फैसला लिया है, हम सब इस दिन को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन के लिए स्वीकार करते हैं। हर एक देश के मज़दूरों को अपने देश की हालतों के मुताबिक प्रदर्शन आयोजित करने चाहिए।”

मई दिवस की उत्पत्ति का कार्य-दिवस को छोटा करने के लिए संघर्ष के साथ करीबी रिश्ता है, जो कि मज़दूर वर्ग के लिए राजनीतिक महत्व की प्रमुख मांग है। इस संघर्ष की शुरुआत ब्रिटेन, अमरीका और यूरोपीय देशों में फैक्ट्री व्यवस्था के आने के साथ हुई।

हालांकि अधिक वेतन की मांग हड़तालों का सबसे आम कारण थी, जबकि पूंजीपति मालिकों के खिलाफ़ मज़दूरों ने अपने मांगपत्रों में काम के सीमित घंटों की मांग और संगठित होने के अधिकार की मांग को हमेशा सबसे आगे रखा।

विगत वर्षों की तुलना में अमरीका में 1885 और 1886 के दौरान हुई हड़तालों की संख्या में वृद्धि ने मज़दूरों की लड़ाकू भावना को दर्शाया था। कई शहरों और विभिन्न उद्योगों में मज़दूर “8 घंटे का काम, 8 घंटे का मनोरंजन और 8 घंटे आराम” की मांग को लेकर एकजुट होने लगे। उन्होंने इस मांग को लेकर 1 मई, 1886 को एक विशाल हड़ताल करने की तैयारी की। 

हड़ताल का केन्द्र शिकागो में था, जहां हड़ताल के लिये आंदोलन सबसे व्यापक था, लेकिन कई और शहर भी एक मई के संघर्ष में शामिल हुए। न्यूयॉर्क, बाल्टीमोर, वॉशिंगटन, मिल्वौकी, सिनसिनाटी, सेंट लुइस, पिट्सबर्ग, डेट्रायट और कई अन्य शहरों ने हड़ताल में अच्छी भागीदारी की। हड़ताल के लिये आंदोलन की एक विशेषता यह थी कि इस संघर्ष में अकुशल और असंगठित मज़दूर भी शामिल हुए और उस दौर में समर्थक हड़तालें काफी प्रचलित थीं।

1 मई, 1886 को, शिकागो के मज़दूरों ने शहर के संगठित मज़दूर आंदोलन के आह्वान पर अपना काम रोक दिया और बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आये। यह अभी तक के मज़दूर आंदोलन में देखा गया वर्ग एकता का सबसे प्रभावशाली प्रदर्शन था। अमरीका में 8 घंटे का आंदोलन, जिसका परिणाम 1 मई, 1886 को हुई हड़ताल थी, यह अपने आप में मज़दूर वर्ग के लड़ाकू इतिहास में एक शानदार अध्याय है।

शिकागो के श्रमिकों के इस विजयी मार्च को पूंजीपतियों और पूंजीवादी राज्य की संयुक्त ताक़त के बल पर ही रोका जा सका, जो मज़दूर आंदोलन के लड़ाकू नेताओं को खत्म करने के लिये प्रतिबद्ध थी, ताकि शिकागो के संपूर्ण मज़दूर आन्दोलन को जबरदस्त धक्का पहुंचाकर उसे ख़त्म किया जा सके। 3-4 मई, 1886 की घटनायें, जिन्हें हे-मार्केट के कत्लेआम के नाम से जाना जाता है, 1 मई की हड़ताल का ही सीधा नतीजा थी।

3 मई को पुलिस ने शिकागो में मैक्कॉर्मिक रीपर वक्र्स में हड़ताली मज़दूरों की शांतिपूर्ण बैठक पर कातिलाना हमला किया, जिसके चलते छह श्रमिकों की मौत हो गयी। पुलिस द्वारा अकारण किये गये बर्बर हमले के जवाब में, मज़दूरों ने 4 मई को हे-मार्केट स्क्वायर में एक प्रदर्शन का आयोजन किया। सभा पूरी तरह से शांतिपूर्ण थी और जब सभा खत्म होने ही वाली थी तभी पुलिस के एजेंटों ने मज़दूरों की भीड़ में एक बम फेंक दिया। पुलिस और उनके एजेंटों द्वारा जानबूझकर आयोजित इस अराजकता और हिंसा में कई लोग मारे गए और बहुत से घायल हो गए।

अमरीका के पूंजीवादी मीडिया ने बड़े पैमाने पर मज़दूर-विरोधी अभियान चलाया, जिसके द्वारा मज़दूरों को अराजकतावादी और अपराधी के रूप में पेश किया गया और उनको फांसी पर चढ़ाने की मांग की गई। सात मज़दूरों को मौत की सज़ा सुनाई गई। उनमें से एक मज़दूर ने आत्महत्या कर ली और चार मज़दूरों को फांसी दी गई। बाद में इस बात का पर्दाफाश हुआ कि इस घटना पर चलाया गया मुकदमा केवल एक दिखावा था। कुछ समय के लिए, अमरीका का पूंजीपति वर्ग, मज़दूर वर्ग पर क्रूर हमले करते हुए, उनके अधिकारों के आंदोलन को दबाने में सफल रहा। लेकिन, वह मज़दूरों की लड़ाकू भावना को नष्ट करने में नाकामयाब रहा। मज़दूरों ने 1 मई, 1890 को पूरे अमरीका में रैलियों को आयोजित करने का फैसला किया।

1 मई, 1890 को लिखे गए कम्युनिस्ट घोषणापत्र के चैथे जर्मन संस्करण की प्रस्तावना में, अंतर्राष्ट्रीय श्रमजीवी संगठनों के इतिहास की समीक्षा करते हुए, एंगेल्स ने पहले अंतर्राष्ट्रीय मई दिवस के महत्व पर ध्यान आकर्षित किया।

“जब मैं ये पंक्तियां लिख रहा हूं, यूरोप और अमरीका के मज़दूर अपनी ताक़त का जायजा ले रहे हैं; दुनिया में पहली बार मज़दूर एक झंडे के तले, एक सेना की तरह, एक लक्ष्य के लिए संगठित हुए हैं: कानून द्वारा मान्य 8 घंटे का कार्य दिवस... आज हम जो नज़ारा देख रहे हैं, उसे देखकर दुनियाभर के तमाम देशों के पूंजीपति और जमींदार यह महसूस करेंगे कि आज असलियत में दुनियाभर के मज़दूर एकजुट हैं। काश आज माक्र्स इस नज़ारे को देखने के लिए मेरे साथ होते”!

उस समय से, पूरी दुनिया के मज़दूरों ने 1 मई को सभी देशों के मज़दूरों के बीच एकजुटता के दिवस के रूप में मनाया है - पूंजीवाद के खिलाफ़ और सभी प्रकार के शोषण से मुक्ति के सांझे संघर्ष के दिवस के रूप में।

Tag:    मई दिवस की उत्पत्ति    Apr 16-30 2017    Struggle for Rights    Rights     2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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