मज़दूर वर्ग के एकजुट विरोध को मजबूत करें!

Submitted by cgpiadmin on सोम, 01/05/2017 - 09:28

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का आह्वान, 29 अप्रैल, 2017

मज़दूर साथियों,

अपनी रोज़ी-रोटी और अधिकारों पर पूंजीपति वर्ग के हमलों का बहादुरी से मुक़ाबला करने वाले, हिन्दोस्तान और सभी देशों के मज़दूरों का हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी, मई दिवस 2017 के अवसर पर क्रांतिकारी अभिवादन करती है।

बैंकिंग, बीमा, मशीनरी विनिर्माण, रक्षा, रेलवे, एयरलाइन्स और अन्य क्षेत्रों के मज़दूरों को हम सलाम करते हैं, जो हिन्दोस्तानी सरकार की निजीकरण की योजनाओं का डटकर विरोध कर रहे हैं। हम ऑटोमोबाइल और तेज़ी से आगे बढ़ने वाले नए-नए क्षेत्रों के मज़दूरों को सलाम करते हैं, जो अपने यूनियन बनाने के अधिकार के लिए दिलेर संघर्ष कर रहे हैं। हम आशा कर्मियों और आंगनवाड़ी मज़दूरों को सलाम करते हैं, जो मज़दूर बतौर अपने अधिकारों की हिफ़ाज़त में बहादुरी से संघर्ष कर रहे हैं। ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम के तहत अपने अधिकारों के लिए लड़ने के उद्देश्य से यूनियन बनाने वाले ग्रामीण मज़दूरों को हम सलाम करते हैं। हम हिन्दोस्तान के मज़दूर वर्ग को सलाम करते हैं, जिसने मारुति के मज़दूरों के खिलाफ़ अदालत के कठोर फैसले का मुंहतोड़ जवाब दिया है।

मई दिवस एक महत्वपूर्ण अवसर है, जब हम बीते वर्ष के दौरान हुए वर्ग संघर्ष के अनुभवों की समीक्षा करते हैं और आगामी वर्ष के लिए कार्यदिशा निर्धारित करते हैं। हमें सूझ-बूझ के साथ वर्तमान परिस्थिति का मूल्यांकन करना होगा और आगे की कार्यदिशा को तय करना होगा। जिस कार्यक्रम को मज़दूर खुद बनायेंगे, जिसकी वे खुद रक्षा करेंगे, जिसके लिए वे खुद पूरे जोश और विश्वास के साथ संघर्ष करेंगे, अपने ऐसे कार्यक्रम के आधार पर ही मज़दूर वर्ग आगे बढ़ सकता है।

सारी दुनिया में, बीते 12 महीनों में, पूंजीपति वर्ग के हमलों के खिलाफ़ मज़दूर वर्ग के विरोध संघर्ष में काफी वृद्धि देखने में आयी है। इससे पूंजीपति वर्ग की समस्यायें और बढ़ गयी हैं। दुनियाभर के पूंजीपति 2008-09 के संकट से पूर्व प्राप्त होने वाली ऊंची मुनाफ़ादरों को फिर से हासिल करने की बेतहाशा कोशिशें कर रहे हैं। पूंजीपति वर्ग की सेवा में काम कर रही सरकारें मज़दूर वर्ग की एकता को तोड़ने के लिए अधिक से अधिक हद तक, नस्लवादी, सांप्रदायिक और फासीवादी हमलों का सहारा ले रही हैं।

हमारे देश में बीते 12 महीनों में, निजीकरण और उदारीकरण के खिलाफ़ तथा मज़दूरों के अधिकारों पर खुलेआम हमलों के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शनों में मज़दूरों की भागीदारी में काफी वृद्धि देखने में आयी है। पिछले वर्ष के सितंबर में हुयी आम हड़ताल में कई करोड़ मज़दूरों ने भाग लिया था।

शासक पूंजीपति वर्ग बड़े-बड़े पूंजीवादी घरानों की अमीरी को बढ़ाने के समाज-विरोधी कार्यक्रम को तथाकथित भ्रष्टाचार मिटाने और ग़रीबों की हालत सुधारने के कार्यक्रम बतौर पेश करने के लिए, प्रधानमंत्री मोदी की भाषणबाजी की कुशलता पर निर्भर कर रहे हैं। प्रधानमंत्री वादा कर रहे हैं कि जल्दी ही “बड़े-बड़े सुधार” लायेंगे, जिसका यह मतलब है कि मज़दूरों और किसानों के अधिकारों पर और बड़े-बड़े हमले होने वाले हैं। इस कार्यक्रम पर जो भी सवाल उठाता है या इसका विरोध करता है, उसे “राष्ट्र-विरोधी” करार दिया जा रहा है और उसके साथ अपराधी जैसा बर्ताव किया जा रहा है।

अधिक से अधिक मज़दूर अपने ही अनुभव से समझ रहे हैं कि हमें एकजुट होकर सामूहिक संघर्ष करना होगा। इस समझ के साथ, मज़दूरों की एकता बढ़ती जा रही है। परन्तु पूंजीपति वर्ग के बंटवारा करने वाले राजनीतिक दांवपेचों की वजह से, इस एकता को तोड़ने की लगातार कोशिश की जा रही है।

सांप्रदायिक और जातिवादी बंटवारों को भड़काने के अलावा, पूंजीपति वर्ग बहुपार्टीवादी प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र की राजनीतिक प्रक्रिया का इस्तेमाल करके मज़दूरों को लगातार बांटने, भटकाने और पूंजीपतियों की आपसी शत्रुता में इस या उस पक्ष के साथ जुड़ने को मजबूर करते हैं।

पूंजीपति वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाली कई पार्टियां हैं, जो कार्यकारी ताक़त पर नियंत्रण करने के लिए आपस में लड़ती रहती हैं। मज़दूरों को पूंजीपति वर्ग की विभिन्न पार्टियों के बीच बांटकर इस या उस पार्टी के साथ बांधकर रखा जाता है। चाहे संसद का चुनाव हो या राज्य विधानसभाओं का या फिर स्थानीय निकायों का, हर चुनाव का इस्तेमाल करके, शासक पूंजीपति वर्ग मज़दूरों को बांटता है। मज़दूरों को यह झूठ बताया जाता है कि मुख्य संघर्ष संसद में इन प्रतिस्पर्धी पार्टियों के बीच में है।

पूंजीपति वर्ग और उसके नेता इस सच्चाई को छिपाना चाहते हैं कि मुख्य संघर्ष मज़दूर वर्ग और पूंजीपति वर्ग के बीच में है। वे इस बात को छिपाना चाहते हैं कि न सिर्फ सत्तारूढ़ पार्टी बल्कि संसदीय विपक्ष और संपूर्ण राज्य मशीनरी पूंजीपति वर्ग की सेवा में काम करते हैं।

मारुति के मज़दूरों के हालिया मामले सहित, जीवन का पूरा अनुभव इसी कड़वी सच्चाई को बार-बार सामने लाता है कि अदालतें और पुलिस हमेशा ही पूंजीपति मालिकों की सेवा में काम करती हैं और मज़दूरों के अधिकारों पर हमला करती हैं। मारुति के मज़दूरों के मामले में, जब केन्द्र सरकार और हरियाणा सरकार में कांग्रेस पार्टी की अगुवाई थी और अब, जब केन्द्र सरकार और हरियाणा सरकार में भाजपा की अगुवाई है, दोनों ही स्थितियों में, उन पर समान रूप से हमले होते रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि सिर्फ कोई खास एक पार्टी ही नहीं बल्कि संपूर्ण राज्य मशीनरी पूंजीपति वर्ग की सेवा में काम करती है।

लगभग 150 इज़ारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग ही समाज के कार्यक्रम को तय करता है और पूरे समाज पर अपनी मनमर्जी को थोपता है। उसके कार्यक्रम का विरोध करने वालों को राज्य के बल से कुचल दिया जाता है। चुनावों के ज़रिये वह अपने अंदरूनी अंतर्विरोधों को हल करता है और अपने शासन को वैधता देता है। इज़ारेदार पूंजीपति अपने विशाल धनबल और राज्य तथा मीडिया पर अपने नियंत्रण के ज़रिये अपनी विश्वसनीय पार्टियों में से किसी एक को चुनाव में जिताते हैं। धन और सत्ता का इतना

अधिक संकेन्द्रण हो गया है कि आजकल नए और पुराने तरीकों की तरह-तरह की हेराफेरी से “शानदार बहुमत वाली जीतें” हासिल की जाती हैं।

जबकि बड़े सरमायदार चुनावों के नतीजों को निर्धारित करते हैं, तो उन नतीजों को “जनादेश” के रूप में पेश किया जाता है, ताकि मज़दूर वर्ग का हौसला तोड़ा जाए। मिसाल के तौर पर, आजकल यह प्रचार किया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के चुनावों का नतीजा दिखाता है कि अधिकतम मेहनतकश लोग भाजपा का शासन चाहते हैं।

वर्तमान बहुपार्टीवादी प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र का एक बहुत ही खतरनाक परिणाम यह है कि मज़दूरों में यह भ्रम फैलाया जाता है कि उनका भाग्य और भविष्य चुनाव जीतकर सत्ता में आने वाली पार्टी पर निर्भर है। इस तरह, शासक पूंजीपति वर्ग, मज़दूर वर्ग को वर्तमान व्यवस्था के अन्दर बांधकर रखता है, ताकि मज़दूर वर्ग हमेशा इसी व्यवस्था के अन्दर ही “बेहतर विकल्प” तलाशता रहे। जब कांग्रेस पार्टी बदनाम हो गयी थी तो भाजपा को “स्वच्छ” विकल्प बताया गया। जब भाजपा का शासन असहनीय हो जाता है तो कांग्रेस पार्टी को “धर्मनिरपेक्ष” विकल्प बताया जाता है। जब समय-समय पर एक पार्टी को सत्ता से हटाकर उसकी जगह पर दूसरी पार्टी को सत्ता पर बैठाया जाता है, तो इज़ारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग के अधिनायकत्व में कोई परिवर्तन नहीं होता है। मज़दूरों और किसानों की हालतें बद से बदतर होती जाती हैं। हरेक नयी सरकार पिछली सरकार से ज्यादा क्रूरता के साथ, लोगों के अधिकारों पर हमला करती है।

हमें संसदीय लोकतंत्र की वर्तमान व्यवस्था, जो एक प्रकार का पूंजीवादी अधिनायकत्व है, जिसके विकल्प की ज़रूरत है। हमें श्रमजीवी लोकतंत्र की व्यवस्था स्थापित करने की ज़रूरत है, जिसमें मेहनतकश बहुसंख्या के मतानुसार समाज चलेगा, न कि शोषक अल्पसंख्या के मतानुसार।

हमें एक आधुनिक नए संविधान की स्थापना करने की ज़रूरत है, जिसमें फैसले लेने की सर्वोच्च ताक़त लोगों के हाथों में होगी। राजनीतिक पार्टियों को इज़ाज़त नहीं दी जानी चाहिए कि वे लोगों को सत्ता से बाहर रखें। राजनीतिक पार्टियों की भूमिका होनी चाहिए यह सुनिश्चित करना कि सत्ता लोगों के हाथ में रहे और कोई भी निहित स्वार्थ उसे हड़प न सके।

निर्वाचन क्षेत्र के लोग चुनाव के उम्मीदवारों का चयन करेंगे। चुने गए प्रतिनिधि को सारी ताक़तें सौंपने की बजाय, लोग उन्हें कुछ ताक़तें ही सौंपेंगे। हमें चुने गए प्रतिनिधि को जवाबदेह ठहराने और किसी भी समय वापस बुलाने के अधिकार

को अपने हाथों में रखना होगा। हमें कानून प्रस्तावित करने का अधिकार अपने हाथों में रखना होगा। अपने हाथों में राजनीतिक सत्ता लेकर, हम मेहनतकश बहुसंख्या अर्थव्यवस्था को नयी दिशा दिला सकेंगे, ताकि लोगों की ज़रूरतें पूरी की जायें, न कि पूंजीपतियों की लालच।

मज़दूर साथियों,

पूंजीपति वर्ग यह सोचता है कि मारुति के 13 मज़दूरों को आजीवन कारावास का कठोर अदालती फैसला सुनाकर, “सभी मज़दूरों को एक सबक सिखाया जाएगा”। परन्तु देशभर में मज़दूर सड़कों पर उतर आये हैं और मारुति के मज़दूरों व संपूर्ण मज़दूर वर्ग के लिए इन्साफ की मांग कर रहे हैं।

हमारे सामने एक महत्वपूर्ण काम है फैक्टरियों और औद्योगिक क्षेत्रों में मज़दूर एकता समितियां गठित करना तथा उन्हें मजबूत करना। ऐसी समितियां कई जगह बन चुकी हैं। अलग-अलग क्षेत्रों के मज़दूर, अलग-अलग यूनियनों के नेता और अलग-अलग पार्टियों के साथ जुड़े हुए कम्युनिस्ट, सभी मज़दूरों के अधिकारों की हिफ़ाज़त में एकजुट हो रहे हैं। मज़दूर एकता समितियां और परिषदें सभी औद्योगिक क्षेत्रों के मज़दूरों के संघर्षों को अगुवाई देने में मदद दे रही हैं।

मज़दूर एकता समितियों को बनाने और मजबूत करने के लिए मुख्य काम सभी मज़दूरों के अधिकारों की हिफ़ाज़त में लगातार संघर्ष करना है। हम मज़दूरों के, इंसान होने के नाते तथा वेतनभोगी मज़दूर होने के नाते, कई अधिकार हैं। सम्मान के साथ इंसान लायक जीवन जीने का अधिकार, अपनी पसंद का यूनियन बनाने का अधिकार, दैनिक काम पर 8 घंटे की सीमा का अधिकार, आराम और मनोरंजन, स्वास्थ्य सेवा, पेंशन व सामाजिक सुरक्षा का अधिकार - ये इस प्रकार के कुछ प्रमुख अधिकार हैं।

मज़दूरों, किसानों और सभी उत्पीड़ित लोगों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने के साथ-साथ, हमें तथाकथित सुधरा हुआ व स्वच्छ पूंजीवाद के बारे में, सरमायदारों के संसदीय लोकतंत्र और वर्तमान व्यवस्था के अन्दर तथाकथित विकल्पों के बारे में सभी भ्रमों का डटकर विरोध करना होगा। एक ही असली विकल्प है - क्रांतिकारी विकल्प।

हमें अपने अधिकारों की हिफ़ाज़त में संघर्ष को हिन्दोस्तान का नव-निर्माण करने के नज़रिए के साथ करना होगा। हिन्दोस्तान के नव-निर्माण का मतलब है इज़ारेदार पूंजीपतियों की अमिट लालच को पूरा करने के लिए नहीं बल्कि मेहनतकशों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए राज्य को पुनर्गठित करना और अर्थव्यवस्था को नयी दिशा दिलाना।

मई दिवस ज़िंदाबाद!

दुनिया के मज़दूरों एक हो!

इंक़लाब ज़िंदाबाद!

Tag:    अमिट लालच    आजीवन    May 1-15 2017    Statements    Privatisation    Rights     2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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