कृषि के संकट से बाहर निकलने का कौन सा रास्ता है?

Submitted by cgpiadmin on सोम, 01/05/2017 - 14:57

4 अप्रैल, 2017 को मद्रास उच्च अदालत ने तमिलनाडु की सरकार को निर्देश दिए कि वह किसानों द्वारा सहकारी बैंकों से लिए गए कर्ज़ों को माफ़ कर दे। मद्रास उच्च अदालत का यह निर्देश ऐसे वक्त पर आया है, जब सूखे से पीड़ित तमिलनाडु के किसान, पिछले कई सप्ताहों से दिल्ली में धरने पर बैठे हैं। सभी टीवी चैनलों ने उनकी दयनीय हालत को अपने प्रसारण में दिखाया है।

11 अप्रैल, 2017 को उत्तर प्रदेश की हाल ही में गठित भाजपा की सरकार ने 1,00,000 रुपये से कम के कर्ज़ों को माफ़ करने की घोषणा की है जिसका फायदा तथाकथित तौर से 2 करोड़ “छोटे और सीमांत किसानों” को मिलेगा। महाराष्ट्र में भाजपा के नेतृत्व की सरकार ने भी इसी तरह की योजना लाने का इरादा प्रकट किया है।

महाराष्ट्र सरकार ने अरहर पैदा करने वाले किसानों के साथ लापरवाही की

2013-2014 तथा 2014-2015 के सूखा-प्रभावित वर्षों में सरकार ने किसानों को गन्ना व कपास जैसी नगदी फसलें पैदा करने के बजाय अरहर दाल उगाने के लिए प्रोत्साहित किया क्योंकि पिछले वर्ष में अरहर का उत्पादन काफी कम हुआ था और अरहर की कीमत काफी बढ़ जाने के कारण लोग बेहद नाराज हो गए थे।

लेकिन सरकार की सिफारिश मानकर अरहर का उत्पादन शुरू करने वाले किसानों की सरकार ने कोई परवाह नहीं की। पिछले साल अच्छी बारिश के कारण महाराष्ट्र में अरहर का उत्पादन पांच गुना बढ़कर 20 लाख टन तक पहुंच गया है। इसकी वजह से बाज़ार में कीमतें तेज़ी से घटकर 4200-4500 रुपये प्रति क्विंटल हो गयी हैं जबकि वह पिछले वर्ष 8500-9000 रुपये थीं। महाराष्ट्र सरकार अरहर को 5500 रुपये प्रति क्विंटल के न्यूनतम समर्थन दाम पर खरीदने के वायदे से मुकर गयी है। जब केन्द्रीय सरकार ने खरीदने की 22 अप्रैल की अंतिम तारीख को आगे करने से इंकार कर दिया तो महाराष्ट्र सरकार ने तुरंत दाल खरीदने वाले 300 केन्द्रों को बंद कर दिया जबकि 500 करोड़ रुपये की कीमत की 10 लाख टन अरहर दाल खरीदना अभी भी बाकी है। इसके अलावा यह खबर भी आ रही है कि व्यापारी सरकारी खरीद करने वाली संस्थाओं से 3700-4200 रुपये प्रति क्विंटल में अरहर खरीदकर फिर उन्हीं को 5500 रुपये के न्यूनतम समर्थन दाम में बेच रहे हैं। दूसरी तरफ, किसानों को खरीफ की फसल के लिए पैसे चाहिये, इसलिए वे खुले बाज़ार में न्यूनतम समर्थन दाम से 1000 रुपये कम भाव में बेचने के लिए मजबूर हो रहे हैं और उनका बड़ा नुकसान हो रहा है।

यह सारा घटनाक्रम यह दिखाता है कि हमारे देश में कृषि का संकट बहुत गहरा हो गया है, जिसमें करोड़ों किसान भुखमरी के कगार पर खड़े हैं। इस बारे में कोई न कोई कदम उठाना हुक्मरान वर्ग के लिए राजनीतिक तौर से बेहद ज़रूरी हो गया है।

मुश्किल में फंसे किसानों के कर्ज़ को माफ़ करने की मांग हाल के वर्षों में तेज़ होती रही है। हर साल बड़े पैमाने पर सरकारी खजाने से बड़े सरमायदारों को दी जाने वाली कर्ज़ माफ़ी के चलते, अब सरकार द्वारा किसानों को भी थोड़ी सी रियायत नहीं देना, असंभव हो गया है। अपनी साख बचाए रखने के लिए सरकार को ऐसा करना ज़रूरी हो गया है।

केन्द्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा किसानों को दी जाने वाली कर्ज़ माफ़ी की योजना का अनुभव यह दिखाता है कि किसानों को दी गयी कर्ज़ माफ़ी, उनको संकट से बाहर निकालने के लिए कभी भी पर्याप्त नहीं होती है। कुछ ही किसानों को इसका फायदा मिलता है परन्तु अधिकांश इससे वंचित रह जाते हैं। यदि यह योजना सही ढंग से लागू की भी जाती है और सभी को इसका लाभ मिल भी जाता है, तब भी कर्ज़ माफ़ी की रकम केवल कुछ ही समय के लिए ही राहत पहुंचा पाती है। कर्ज़ माफ़ी किसान के लिए बेहद ज़रूरी है, लेकिन उसको संकट से बाहर निकालने के लिए पर्याप्त नहीं है। जब तक कृषि से होने वाली आमदनी कम रहेगी और कृषि करना अधिक से अधिक जोखिम भरा बना रहेगा, तब तक कृषि का संकट बार-बार आता रहेगा, कभी जल्दी तो कभी कुछ देर बाद।

समस्या की जड़

कृषि में समस्या की जड़ इस ज़मीनी हकीक़त में है कि कृषि उत्पादन के सभी आयाम अधिक से अधिक गति से हिन्दोस्तानी और विदेशी बड़े इज़ारेदार कंपनियों के लिए अधिकतम मुनाफे़ बनाने की दिशा में अग्रसर होते जा रहे हैं। बड़ी इज़ारेदार कंपनियां बीज, उर्वरक, कीटनाशक के साथ-साथ फसल की खरीदी, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि -निर्यात के बाज़ारों में तेज़ी से अपना प्रसार करती जा रही हैं। एकीकृत थोक एवं खुदरा व्यापार कंपनियां कृषि से पैदा होने वाली वस्तुओं के मूल्य पर बढ़ते पैमाने पर अपना दावा कर रही हैं, जिसका खामियाजा खेत में पसीना बहा रहे किसानों को भुगतना पड़ रहा है। बैंक बड़े पैमाने पर कृषि की ज़मीन पर अपना नियंत्रण जमा रहे हैं।

बर्तानवी ईस्ट इंडिया कंपनी के आने से पहले हमारे इस उप-महाद्वीप में राज्य और ज़मीन जोतने वालों के बीच के संबंध एक दूसरे के अधिकार और कर्तव्य को स्वीकार करने पर आधारित थे। राज्य को ज़मीन पर लगान वसूलने का अधिकार था और साथ ही ज़मीन जोतने के लिए ज़रूरी सिंचाई की सुविधा और अन्य वस्तुओं की आपूर्ति करना उसका कर्तव्य था। ज़मीन जोतने वालों का ज़मीन पर अपनी मालिकी जताने का तब तक अधिकार था, जब तक वे उस ज़मीन को जोतते थे, खाद्य वस्तुएं और अन्य ज़रूरी फसलें उगाते थे।Monthly income

उस जमाने में ज़मीन को क्रय-विक्रय की वस्तु नहीं माना जाता था। उसे बेचा या खरीदा नहीं जा सकता था। ज़मीन को प्रकृति की देन माना जाता था। राज्य किसी परिवार या परिवारों के समूह को किसी खास उद्देश्य के लिए ज़मीन दिया करता था, जैसे खेत जोतने और फसल उगाने या चरागाह बनाने तथा अन्य किसी सामाजिक तौर से ज़रूरी कार्य के लिए। जबकि किसी व्यक्ति के पास ज़मीन हो सकती थी, लेकिन वह उसे किसी अन्य व्यक्ति को बेच नहीं सकता था। जब तक ज़मीन जोतने वाला वह व्यक्ति समाज के लिए ज़रूरी फसल पैदा करता था, तब तक वह ज़मीन उसके पास सुरक्षित थी। यदि वह व्यक्ति ज़मीन का गलत इस्तेमाल करता था, तो राज्य उस ज़मीन को वापस ले सकता था और किसी अन्य व्यक्ति को दे सकता था। लेकिन यदि उस ज़मीन का इस्तेमाल उसके घोषित उद्देश्य के अनुसार किया जा रहा है तो राज्य को उसमें दखलंदाजी करने का कोई अधिकार नही था। 

बर्तानवी बस्तीवादियों ने युगों पुराने उत्पादन के इन संबंधों को बर्बाद कर दिया और अधिकार व कर्तव्य के बीच संबंध के सिद्धांत को मिट्टी में मिला दिया। उन्होंने एक ऐसे राज्य का निर्माण किया जो केवल बर्तानवी पूंजीपतियों द्वारा लूट के असीमित अधिकारों को मान्यता देता है और मूल हिन्दोस्तानी, जो ज़मीन जोतते हैं, उनके केवल कर्तव्य हैं, कोई अधिकार नहीं। जिन मुट्ठीभर हिन्दोस्तानियों ने इस बस्तीवादी व्यवस्था के साथ समझौता किया और उसके साथ हाथ मिलाया, उन्हें इस बस्तीवादी राज्य ने विशेषाधिकार बांटे और जमींदारों व अन्य शोषक बिचैलियों के वर्ग को पैदा किया। 1947 के बाद हमारे देश के बड़े पूंजीपतियों और बड़े जमींदारों ने बस्तीवाद के जमाने से विरासत में मिले इस लुटेरे राज्य और व्यवस्था को और अधिक विकसित किया।Land possession

बस्तीवादी हुकूमत से आज़ादी के बाद के कुछ दशकों के दौरान इस राज्य ने भूमि सुधार के कदम उठाये, जिससे सामंती जमींदारों द्वारा किसानों के दमन और लूट के कुछ सबसे अधिक नफ़रत किये जाने वाले तरीकों को हटाया गया और कृषि में पूंजीवादी विकास के लिए आयाम खोल दिए गए। हरित क्रांति के झंडे तले, राज्य ने कुछ चुनिन्दा क्षेत्रों में बड़े जमींदारों द्वारा बड़े पैमाने पर पूंजीवादी कृषि को बढ़ावा दिया और मध्यम व गरीब किसानों के बीच व्यावसायिक कृषि को प्रोत्साहन दिया। देशभर में ज़रूरी खाद्यानों की खरीदी के लिए सार्वजनिक वितरण व्यवस्था बनायी गयी। देहातों में किसानों के लिए कर्ज़े की व्यवस्था का प्रसार करने और उनकी बचत को केन्द्रित करके इज़ारेदार पूंजीपतियों के लिए वित्त पूंजी का संकेन्द्रण करने के लिए, बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया।  

1990 के दशक से उदारीकरण और निजीकरण के रास्ते भूमंडलीकरण के झंडे तले, राज्य के हस्तक्षेप को इस तरह से बदला गया ताकि इज़ारेदार घरानों के वैश्विक स्तर पर प्रसार करने की आक्रामक कार्यक्रम को मदद मिले।

“मुक्त बाज़ार” ने मूल मंत्र का ऐलान किया कि हर एक किसान परिवार को अपना ख्याल खुद रखना होगा। बड़े सरमायदारों ने अब तक चली आ रही अपर्याप्त राज्य समर्थित व्यवस्था का भी विनाश करना शुरू कर दिया है। कृषि में उपयोग होने वाली वस्तुओं और कृषि उत्पादों के बाज़ार को बड़ी हिन्दोस्तानी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खोल दिया गया। इसके चलते कृषि से होने वाली आमदनी में बेहद और अप्रत्याशित अनिश्चितता पैदा हो गयी। कृषि में उपयोग होने वाली वस्तुओं के दाम तेज़ी से बढे़, जिसके चलते किसान बैंकों पर और अधिक निर्भर होने लगे। इसके साथ-साथ मौसम और कृषि उत्पादों की कीमतों में उतार-चढ़ाव की वजह से आमदनी और भी अधिक अनिश्चित हो गयी। किसी एक साल में अच्छी फसल से किसान और अधिक कर्ज़ा उठाने के लिए प्रेरित होता है तो, एक या दो बुरे वर्ष उसे बेहद खस्ता हालत में पहुंचा देते हैं।

Indebtedness-of-agricultural-households

2016 में जब शहरी इलाकों में बाज़ार में टमाटर की कीमत 15 रुपये प्रति किलो चल रही थी, उस वक्त किसान, जिसने तीन महीने अथक मेहनत करके बम्पर फसल उगाई थी, उसे केवल 30-50 पैसे प्रति किलो का दाम मिल रहा था। छत्तीसगढ़ के जशपुर, कर्नाटक के चिकमंगलूर और महाराष्ट्र के नाशिक में किसानों द्वारा अपनी टमाटर की फसल को सड़कों पर फेंकने की रिपोर्टें आई थीं। 

2016 में महाराष्ट्र और कर्नाटक में अरहर की दाल पैदा करने वाले किसानों ने मेहनत करके रिकॉर्ड पैदावार की, लेकिन उनको अपनी फसल, उत्पादन की कीमत से भी कम दाम में बेचनी पड़ी। कर्नाटन कृषि कीमत आयोग के अनुसार राज्य में इसके उत्पादन का कुल खर्च 6403 रुपये प्रति क्विंटल पड़ता है। उसके एक साल पहले केन्द्र सरकार ने 10,114 रुपये प्रति क्विंटल की दर से अरहर दाल का आयात किया था। जब किसी खाद्यान्न की कमी होती है तब सरकार ऊंची कीमत देकर उसका आयात करती है, लेकिन जब घरेलू उत्पादन बढ़ जाता है तब, किसानों को उसका नुकसान उठाना पड़ता है।

ये केवल कुछ उदहारण हैं जो साफ दिखाते हैं कि किस तरह से हमारे देश में ज़मीन जोतने वाले किसानों को बेहद गैर-बराबरी और शोषण पर आधारित संबंधों का सामना करना पड़ता है और राज्य उनकी रोज़ी-रोटी की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी  को उठाने से इंकार करता है। 

केवल एक ही रास्ता

कृषि को मौजूदा गंभीर हालत से बाहर निकालने और खतरनाक रास्ते पर चलने से रोकने का केवल एक ही रास्ता है। कृषि और सामाजिक उत्पादन के सभी क्षेत्रों की दिशा और उसके लक्ष्य को बदलना होगा। इसके लिए इज़ारेदार घरानों के लिए अधिकतम मुनाफे़ सुनिश्चित करने की बजाय, सामाजिक उत्पादन का लक्ष्य सभी के लिए रोज़गार और खुशहाली सुनिश्चित करना होना चाहिए।  

कृषि उत्पादन और विनिमय के संबंधों को इस तरह से बदलना होगा कि आज के आधुनिक युग की हालतों में, राज्य और ज़मीन जोतने वालों के अधिकार और कर्तव्य के बीच परस्पर संबंधों के सिद्धांत को पुनः स्थापित किया जा सके। ज़मीन जोतने वालों का यह कर्तव्य है कि वे ज़मीन को पूरी गुणवत्ता के साथ जोतें और पर्याप्त मात्रा में समाज के लिए उपयोगी फसल पैदा करें। जबकि राज्य का यह कर्तव्य है कि वह कृषि की सिंचाई के लिए पानी और अन्य लागत वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करे और स्थिर एवं उचित दामों पर फसल और उत्पादों की खरीदी की गारंटी दे।  

इस कर्तव्य को पूरा करने के लिए राज्य को कृषि लागत वस्तुओं और उत्पादों से संबंधित बड़े पैमाने पर चलाये जा रहे सभी व्यापार को अपने नियंत्रण में करना होगा। इसके साथ ही बैंकों की कार्यदिशा को भी अधिकतम मुनाफे़ बनाने से बदलकर, सामाजिक उत्पादन की विस्तार की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में मोड़ना होगा।

कृषि व्यापार और बैंकों को सामाजिक नियंत्रण में लाने से एक ऐसी आधुनिक सर्वव्यापी सार्वजनिक खरीदी और वितरण प्रणाली स्थापित करना संभव होगा, जिसमें सभी फसलों और उपभोग की सभी ज़रूरी वस्तुओं को शामिल किया जा सकेगा।    

राज्य जो सभी के लिए रोज़गार और खाद्यान्न मुहैया कराने के लिए वचनबद्ध है, वह छोटे किसानों को, जो कि ज़मीन के छोटे-छोटे टुकड़ों पर मेहनत कर रहे हैं, उन्हें स्वेच्छा से एकजुट होकर बड़े पैमाने पर सामूहिक कृषि करने के लिए प्रोत्साहित करेगा। एक बेहद उत्पादक आधुनिक उद्यम बतौर इस तरह की सामूहिक कृषि का विकास करने के लिए समर्थन प्रदान करेगा।

ज़मीन को एक वस्तु के रूप में नहीं देखा जा सकता, जिसे निजी हाथों में बेचा और खरीदा जा सकता है। ज़मीन को एक सामाजिक योजना के तहत नियोजित किया जाना चाहिए, जिसमें कृषि और पशुपालन की ज़रूरत, उद्योग और सेवाओं की ज़रूरत, आवास और अन्य सामाजिक ज़रूरतों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। ज़मीन से संबंधित बस्तीवादी कानून को तुरन्त रद्द किया जाना चाहिए। उसकी जगह पर एक नया कानून बनाया जाना चाहिए, जो ज़मीन और अन्य प्राकृतिक संसाधनों को राष्ट्र की संपत्ति मानेगा और तमाम ज़रूरतों के बीच तथा समाज के सामान्य हितों के बीच आपसी समन्वय स्थापित करेगा।

यह कार्यक्रम अर्थव्यवस्था की कार्यदिशा को बदलने का कार्यक्रम है, जिसके इर्द-गिर्द मज़दूर वर्ग को बहुसंख्यक किसानों के साथ मजबूत गठबंधन बनाने की ज़रूरत है। मज़दूरों और किसानों को एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष चलाना होगा और यह मांग करनी होगी कि राज्य को अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। हमें अपना फौरी संघर्ष इस नज़रिये के साथ चलाना चाहिए कि हमें राजनीतिक सत्ता पर कब्ज़ा करना है और एक ऐसे राज्य की स्थापना करनी है जो उन सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करेगा जो उपभोग की तमाम वस्तुओं को पैदा करते हैं और खास तौर से वे, जो खेत जोतते हैं।

Tag:    May 1-15 2017    Political-Economy    Economy     Privatisation    Rights     2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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