बाबरी मस्जिद के विध्वंस का मुकदमा अदालत ने पुनर्जीवित किया

Submitted by cgpiadmin on सोम, 01/05/2017 - 15:00

19 अप्रैल, 2017 को, सुप्रीम कोर्ट ने यह घोषणा की कि 6 दिसम्बर, 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस का आपराधिक मामला जिसमें भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती तथा 11 अन्य के खिलाफ़ मुकदमे को दोबारा चलाया जाएगा। मुकदमे की सुनवाई होने तक इसको रायबरेली से लखनऊ स्थानांतरित कर दिया गया, प्रतिदिन की सुनवाई के आदेश दिए गए और सुनवाई पूरी करने के लिए दो साल की समय सीमा दी गई।

फैसला लेने के बाद दो न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि “वर्तमान मामले में, यह अपराध जो हिन्दोस्तान के संविधान के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ढांचे को हिला चुका है, जो करीबन 25 साल पहले हुआ था। दोषियों के खिलाफ़ अभी तक मुकदमा दर्ज़ नहीं हो पाया है क्योंकि सी.बी.आई. ने उपरोक्त दोषियों पर संयुक्त मुकदमा नहीं चालाया है। साथ में तकनीकी गलतियां हुई हैं जो बड़ी आसानी से ठीक की जा सकती थीं परंतु राज्य सरकार द्वारा ठीक नहीं की गईं।”

बाबरी मस्जिद के विध्वंस से पहले तथा बाद में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक उन्माद और बदले की भावना जानबूझकर भड़काई गई। स्मारक का विनाश और व्यापक पैमान पर सांप्रदायिक हिंसा दो प्रमुख पार्टियों के संचालन में किया गया था, जिनमें केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी की सरकार और उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई थी।

इस ऐतिहासिक स्मारक के विध्वंस से संबंधित दो अलग-अलग मुकदमे बाद में केन्द्र सरकार द्वारा दायर किये गये - एक कारसेवकों या भगवान राम के भक्तों के खिलाफ़ जिन पर ढांचे का विध्वंस करने का आरोप है और दूसरा षड्यंत्र का मुकदमा भाजपा के नेताओं के खिलाफ़ है। इनमें पहला मुकदमा लखनऊ की अदालत में चलाया गया और दूसरा षड्यंत्र का मुकदमा रायबरेली में चलाया गया।

इस षड्यंत्रकारी मुकदमे के उन सभी आरोपियों को मई 2001 में रायबरेली की अदालत द्वारा रिहा कर दिया गया। बाद में इलाहाबाद उच्च अदालत ने रायबरेली की अदालत के फैसले को बरकरार रखा। 2010 में सी.बी.आई. ने इस फैसले को चुनौती देते हुए सर्वोच्च अदालत में अपील की। सात साल बाद, अचानक ही सर्वोच्च अदालत ने इस मुकदमे को पुनर्जीवित किया और आदेश दिया कि अगले 24 महीनों में इस मुकदमे को फिर से सक्रियता से सुना जाये। 

बाबरी मस्जिद के विध्वंस के षड्यंत्र में केवल भाजपा के कुछ मुख्य नेता ही शामिल नहीं थे। इस षड्यंत्र को देषी और विदेशी पूंजीपतियों के हितों के लिए रचा गया था। वे देश में सांप्रदायिक झगड़े और अराजकता फैलाना चाहते थे ताकि वे अपने उदारीकरण और निजीकरण के जन-विरोधी कार्यक्रम को आगे बढ़ा सकें। यही कारण है कि उन्होंने अपने प्रमुख राजनीतिक दलों और संगठनों की सहायता से बाबरी मस्जिद के विध्वंस को अंजाम दिया। 15वीं सदी के स्मारक को नष्ट करने का जघन्य अपराध और सांप्रदायिक हिंसा का आयोजन करने के लिए षासक वर्ग और संपूर्ण राज्य तंत्र जिम्मेदार है। इस अपराध में केन्द्र में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की नेतृत्व वाली सरकार और उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली सरकार षामिल थीं। इस अपराध में ऐतिहासिक स्मारक की रक्षा के लिये और लोगों के जीवन की रक्षा के लिए जिम्मेदार, पुलिस व अर्ध-सैनिक बलों के प्रमुख तथा केंद्रीय और राज्य गृह विभागों के मंत्री व नौकरशाही के मुखिये जैसे लोग गुनहगार हैं।

देखने पर लगता है कि सर्वोच्च अदालत लंबे समय की इस मांग पर प्रतिक्रिया दे रही है कि बाबरी मस्जिद का विध्वंस करने वालों को सज़ा दी जानी चाहिए। हालांकि इसके पीछे एक भयावह और छुपा हुआ एजेंडा है। ऐतिहासिक साक्ष्यों से पता चलता है कि जब भी अयोध्या विवाद का मामला हिन्दोस्तानी राज्य के किसी भी अंग द्वारा पुनजीर्वित किया गया है, चाहे वह सरकार हो या अदालत, तो भी इसका कोई समाधान नहीं निकला है। इसके विपरीत इसने सांप्रदायिक फूट और विवादों को बढ़ावा देने का काम किया है। सर्वोच्च अदालत द्वारा दिये गये 24 महीने के संदर्भ का अर्थ है कि 2019 के अगले लोकसभा चुनाव तक यह एक मुख्य मुद्दा बना रहेगा।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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