केन्द्र द्वारा मणिपुर में आफ्स्पा पर सर्वोच्च अदालत के फैसले का विरोध

Submitted by cgpiadmin on सोम, 01/05/2017 - 15:05

12 अप्रैल, 2017 को केन्द्र सरकार ने सर्वोच्च अदालत में एक याचिका दायर की है, जिसमें 8 जुलाई, 2016 को सर्वोच्च अदालत द्वारा सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम (आफ्स्पा) संबंधी दो फैसलों को वापस लेने की दलील दी गयी है। ये दो फैसले सशस्त्र बलों द्वारा इस अधिनियम के तहत बेगुनाहों का कत्ल करने पर उनके खिलाफ़ किसी भी कानूनी कार्यवाही पर पाबन्दी से संबंधित हैं। सर्वोच्च अदालत ने यह फैसला दिया था कि आफ्स्पा के तहत सशस्त्र बलों द्वारा बेगुनाह लोगों का कत्ल करने पर उन्हें कोई दंड मुक्ति नहीं है। सर्वोच्च अदालत ने ये आदेश दिए हैं कि फर्ज़ी मुठभेड़ में बेगुनाह लोगों के कत्ल किये जाने के सभी आरोपों की राज्य द्वारा जांच की जानी चाहिए। लेकिन अदालत ने यह फैसला नहीं किया है कि इसकी जांच किस एजेंसी द्वारा की जानी चाहिए।

सशस्त्र बलों द्वारा फर्ज़ी मुठभेड़ों में मारे गए लोगों के परिजनों के एक संगठन, एक्स्ट्रा जुडिशल एक्सीक्यूशन विक्टिम फैमिलीज़ एसोसिएशन मणिपुर, द्वारा 2012 में दाखिल की गई याचिका पर सर्वोच्च अदालत ने जुलाई 2016 को यह फैसला दिया था। इस याचिका में 1528 फर्ज़ी मुठभेड़ों की जानकारी दर्ज़ की गयी थी और यह बताया गया था कि 1970 के दशक से अब तक हुई इन फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में शामिल सेना के किसी भी जवान पर कोई भी कार्यवाही नहीं की गयी।

सर्वोच्च अदालत ने यह फैसला सुनाते हुए कहा था कि तथाकथित “अशांत क्षेत्रों” के मामले में भी “फौजदारी अदालत में दंडमुक्ति की कोई अवधारणा नहीं है”। सर्वोच्च अदालत ने आगे यह कहा कि “यदि हमारे देश के सशस्त्र बलों को केवल इस शक के आधार पर कि वह ‘दुश्मन’ है, किसी नागरिक को मार डालने के लिए तैनात किया जाता है, या इस्तेमाल किया जाता है, तो यह हमारे देश में न केवल कानून के राज के लिए, बल्कि जनतंत्र पर भी गंभीर खतरा होगा... हमारे सशस्त्र बलों द्वारा की गयी हर हत्या पर जब कभी कोई शिकायत आती है कि वह सत्ता का गलत उपयोग का मामला है, तो उसकी पूरी जांच की जानी चाहिए, इसमें अशांत क्षेत्रों में हुई हत्या भी शामिल है”।

केन्द्र सरकार की यह याचिका ऐसे वक्त में दायर की जा रही है जब सर्वोच्च अदालत को अप्रैल 18, 19 और 20 को, इस बात का फैसला करना है कि हुई फ़र्ज़ी मुठभेड़ों की जांच किस एजेंसी द्वारा की जानी चाहिए। एक्स्ट्रा जूडिशल एक्सीक्यूशन विक्टिम फैमिलीज़ एसोसिएशन ने यह मांग की थी कि इनकी जांच सी.बी.आई. या फिर विशेष जांच दल (एस.आई.टी.) द्वारा कराई जानी चाहिये। 

सरकार के मुख्य अधिवक्ता, मुकुल रोहतगी ने सरकार का प्रतिनिधित्व करते हुए यह तर्क दिया है कि सर्वोच्च अदालत के फैसले से “सशस्त्र बलों के हौसले को ठेस पहुंचेगी”, और “बग़ावत और आतंकवाद की हालत में कार्यवाही करने की उनकी क्षमता” में बाधा आएगी। सरकार ने अपनी याचिका में आगे ऐलान किया है कि मणिपुर में हालात “युद्ध” और “बग़ावत” जैसे हैं, और “ऐसे हालात में सशस्त्र बलों द्वारा की गयी कार्यवाही, अदालत द्वारा जांच के अधीन नहीं हो सकती”।

केन्द्र सरकार की यह याचिका मणिपुर के लोगों के प्रति हिन्दोस्तानी राज्य के मानवद्वेशी और घृणा की भावना को साफ दिखाती है। हिन्दोस्तानी राज्य “सशस्त्र बलों के हौसले” को बरकरार रखने के लिए सशस्त्र बलों द्वारा बेगुनाह लोगों के बलात्कार, यातना और कत्ल को जायज़ ठहराता है। यह राज्य, जो सशस्त्र बलों की आतंकी हुकूमत को जायज़ ठहराता है, यही राज्य लोगों पर समय-समय पर चुनाव थोपता है और उसे “कानून का राज” और “लोकतंत्र” की जीत बताकर प्रचार करता है। 

सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम-1958 एक ऐसा काला कानून है जो सशस्त्र बलों को केवल शक के आधार पर, बिना किसी उकसाहट के या किसी और बहाने से लोगों पर कत्ल के इरादे से गोली चलाने, महिलाओं का बलात्कार करने, लोगों को लूटने, उनका अपहरण करने, उनको गिरफ्तार करने, यातनायें देने, घरों और उनकी संपत्ति पर छापा मारने, खोजने और लूटने का अधिकार देता है। इस कानून के चलते सशस्त्र बलों पर किसी भी अदालत में कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती और लोगों के खिलाफ़ किसी भी तरह का गुनाह करने की उनको पूरी छूट है।

हिन्दोस्तानी राज्य ने हमेशा से मणिपुर और पूर्वोत्तर के अन्य लोगों के साथ एक बस्तीवादी साम्राज्यवादी ताक़त की तरह बर्ताव किया है और उनकी जायज़ मांगों को हथियारों के बल पर कुचला है। हिन्दोस्तानी राज्य ने हमेशा से मणिपुर के लोगों के अधिकारों के संघर्ष को “अलगाववाद” और “राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय अखंडता के लिए खतरे” के रूप में पेश किया है, ताकि सशस्त्र बलों द्वारा वहां के लोगों पर चलाये जा रहे पाश्विक हमलों को जायज़ ठहराया जा सके। 

मणिपुर के लोगों की और देश की तमाम जनवादी ताक़तों की लम्बे समय से यह मांग रही है कि आफ्स्पा को रद्द किया जाना चाहिए। लेकिन केन्द्र में बैठी हर सरकार, वह चाहे जिस भी पार्टी की अगुवाई में हो, हमेशा से इस मांग को पूरा करने से इंकार करती आई है। वह हमेशा से वही घिसा-पिटा बहाना देती आई है कि यह “अशांत क्षेत्र” है मानव अधिकारों का सम्मान करना और कानून के राज के तहत काम करने से उनके सशस्त्र बलों के “हौसले” को ठेस पहुंचेगी।   

असलियत यह है कि लोगों के राष्ट्रीय अधिकारों, जनतान्त्रिक अधिकारों और मानव अधिकारों का खुलेआम उल्लंघन ही मणिपुर के “अशांत क्षेत्र” में तब्दील होने का कारण है। लोकतंत्र और राष्ट्रीय मुक्ति के लिए लम्बे समय से चलता आ रहा मणिपुरी लोगों का आंदोलन, जिसे हिन्दोस्तानी राज्य “बग़ावत” का नाम देता है, दरअसल राज्य द्वारा लोगों के अधिकारों के उल्लंघन और उसकी दरिंदगी का ही नतीजा है।

आफ्स्पा को रद्द करने की मांग और यह मांग कि सशस्त्र बलों को वापस बैरक में भेजा जाना चाहिए, पूरी तरह से जायज़ है। यह मणिपुर के लोगों की समस्याओं के स्थायी समाधान की दिशा में पहला और सबसे ज़रूरी कदम है।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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