पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्ज़ा

Submitted by cgpiadmin on सोम, 01/05/2017 - 15:08

10 अप्रैल, 2017 को लोकसभा ने संविधान के (123वें) संशोधन विधेयक को संवैधानिक निकाय के रूप में एक नया आयोग, ‘पिछड़े वर्गों के लिये राष्ट्रीय आयोग’ (एन.सी.बी.सी.) बनाने का रास्ता तैयार किया। एक संवैधानिक संशोधन विधेयक को पारित होने के लिए लोकसभा में दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। लोकसभा ने संशोधन के पक्ष में मतदान किया जिसमें 360 सांसदों ने इसका समर्थन किया तथा दो ने विरोध किया। लोकसभा ने पिछड़ा वर्ग राष्ट्रीय आयोग अधिनियम-1993 को भी रद्द कर दिया, जिसके तहत पिछड़ा वर्ग राष्ट्रीय आयोग का गठन एक वैधानिक निकाय के रूप में किया गया था। विधेयक को अब पारित करने के लिए राज्यसभा के पास गया है और राज्यसभा ने इसे एक प्रवर समिति को भेज दिया है।

अनुच्छेद 338 और 338ए के बाद जो कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति राष्ट्रीय आयोग के सन्दर्भ में बने हैं, संविधान में अनुच्छेद 338बी को सम्मिलित करने का प्रस्ताव इस विधेयक में किया गया है। प्रस्तावित अनुच्छेद 338बी में कहा गया है कि “सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए एक आयोग होगा, जिसे पिछड़ा वर्ग राष्ट्रीय आयोग के रूप में जाना जायेगा।”

एक बार जब एन.सी.बी.सी. एक संवैधानिक निकाय बन जाता है तो वह अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के समकक्ष निकायों के समान शक्ति संपन्न होगा। इसे नागरिक अदालतों का दर्ज़ा होगा, जिसका अर्थ है कि यह जातियों और समुदायों के सदस्यों की शिकायतों और उन पर हुये अत्याचारों का संज्ञान ले सकेगा तथा उसे इसका निपटारा करने के लिए कानूनी कार्रवाई शुरू करने का अधिकार होगा। अब तक इस काम को अनुसूचित जाति राष्ट्रीय आयोग ने किया है।

जब एन.सी.बी.सी. एक संवैधानिक निकाय बन जाता है, तो पिछड़े वर्गों की केन्द्रीय सूची को संशोधित करने की शक्ति केन्द्र सरकार से संसद में हस्तांतरित हो जाएगी। विधेयक में एक नया अनुच्छेद, 342ए जोड़ा गया है जिसके अनुसार राष्ट्रपति, सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा, सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को नामांकित कर सकते हैं।

एन.सी.बी.सी. के रूप में एक संवैधानिक निकाय बनाने के कदम को इस पृष्ठभूमि में देखना होगा कि एक समय पर समृद्ध भूमि मालिक समझे जाने वाले कृषि परिवारों में अब जाति के आधार पर लामबंध होने की प्रक्रिया देखी जा रही है, जैसे कि हरियाणा और उत्तर प्रदेश में जाट, महाराष्ट्र में मराठा और गुजरात में पाटीदारों के बीच। कृषि में आमदनी के घटने के साथ, ऐसे कई कृषि परिवारों के युवा उच्च शिक्षा तक पहुंचना चाहते हैं, ताकि वेतनभोगी नौकरी करने के लिए उनके मार्ग खुलें। इन हालातों ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की सूची में वृद्धि की मांग की है। 2010 के बाद, जब से उच्च शिक्षा संस्थानों में सीटों का जाति पर आधारित आरक्षण बड़े पैमाने पर होने लगा है, तभी से ऐसे आंदोलन बढ़ रहे हैं। 

क्या नया विधेयक राज्य सरकारों को अपनी-अपनी ओबीसी की सूची को जारी रखने और उसे संशोधित करने के अधिकार को कायम रखेगा? या फिर यह अधिकार केवल संसद के पास होगा? ये सवाल विपक्षी दलों के नेताओं द्वारा उठाए जा रहे हैं। दूसरी ओर, केन्द्र सरकार ने यह बताया है कि किसी भी राज्य में ओबीसी की सूची में नई जातियों की अधिसूचना राज्य के राज्यपाल के परामर्श से राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी।

एन.सी.बी.सी. को संवैधानिक दर्ज़ा देने से न तो नौजवानों के लिए शिक्षा और रोज़गार के अभाव की समस्या हल होगी और न ही खास जातियों की सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन की समस्या।

हिन्दोस्तानी शासक वर्ग और उसके राजनीतिक दल जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा और नस्ल के आधार पर लोगों के बीच फूट डालने और उन्हें दबाने की कला में पहले से ही माहिर हैं। वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि मेहनतकष लोग अपने सांझे वर्ग हितों के आधार पर तथा आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ़ एकजुट न हों, जो उनकी सभी समस्याओं का सांझा स्रोत है। और वे यह भी सुनिष्चित करना चाहते हैं कि मेहनतकश लोग सत्ताधारी पूंजीपति वर्ग के खिलाफ़ एकजुट न हों, जो उनका सांझा दुश्मन है। 

लोगों को विभाजनकारी राजनीति और सत्ताधारी वर्ग की पैशाचिक साजिशों से सतर्क रहना होगा।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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