नोटबंदी के छः महीने बाद तथ्य क्या दिखाते हैं?

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 19/05/2017 - 11:38

Hindi Note Ban

हाल में प्रकाशित भारतीय रिज़र्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, 28 अप्रैल, 2017 को देश में कुल मिलाकर 14.32 लाख करोड़ रुपये की मुद्रा चलन में थी। 8 नवम्बर, 2016 को नोटबंदी के पहले चल रही मुद्रा, 17.97 लाख करोड़ रुपयों की तुलना में यह 20 प्रतिशत कम है। दूसरे शब्दों में, पहले के नगदी रुपयों के मुकाबले, छः महीनों में सिर्फ 80 प्रतिशत तक ही नगदी वापस लायी गयी है।

यह तथ्य चार महीने पहले किये गये निम्नलिखित मूल्यांकन की पुष्टि करता है:

“लम्बे समय के लिये नगदी की भारी कमी बहुत सोच समझकर पैदा की गई है ताकि लोगों को नगदी से हटाकर डिजिटल लेन-देन करने को मजबूर किया जा सके।” (स्रोत: नोटबंदी के असली इरादे और झूठे दावे, जनवरी 2017) तथ्य साफ दिखा रहे हैं कि नोटबंदी का असली उद्देश्य भ्रष्टाचार और आतंकवाद के वित्त पोषण को रोकना नहीं था, न ही इसका उद्देश्य गरीबों का उत्थान था, जैसा कि प्रधानमंत्री का दावा था। इसका असली उद्देश्य हिन्दोस्तानी और विदेशी इज़ारेदार पूंजीपतियों को माला-माल बनाना था, जिन्होंने अब डिजिटल लेन-देन से वसूले शुल्कों से बहुत अधिक मुनाफ़ा बनाना शुरू कर दिया है।

उपलब्ध आंकड़े दिखाते हैं कि दिसम्बर 2016 में डिजिटल लेन-देन 6.81 लाख करोड़ रुपयों के ऊंचाई पर पहुंच गया था जब नगदी का अभाव सबसे ज्यादा था। उसके बाद यह कुछ कम होकर फरवरी 2017 में 5.99 लाख करोड़ रुपये हो गया था। यह दिखाता है कि जब अभाव कुछ कम हुआ और नगदी उपलब्ध होने लगी तो लोग वापस डिजिटल से नगदी लेन-देन पर आने लगे। यह दिखाता है कि लोग अभी भी नगदी का इस्तेमाल पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें डिजिटल लेन-देन में साईबर चोरी के डर के साथ-साथ अतिरिक्त शुल्क देना पसंद नहीं है।

नोटबंदी के बारे में छः प्रश्न जिनका जवाब भारतीय रिज़र्व बैंक को देना चाहिये

1. जमा करने और अदला-बदली के माध्यम से व्यवस्था में कितने पुराने नोट जमा किये गये?

2. नोटबंदी से कितना काला धन पाया गया है?

3. सरकार के पास कितने जाली नोट आये?

4. 15.44 लाख करोड़ पुराने नोट जिन्हें अमान्य बनाया गया है, उनके स्थान पर नये नोट लाने की क्या अवस्था है?

5. अर्थव्यवस्था में नोटबंदी से होने वाले सुस्पष्ट कुप्रभाव के बावजूद ऐसा किये जाने के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं का भारतीय रिज़र्व बैंक कैसे मूल्यांकन करता है?

6. नोटबंदी के बाद सरकार के डिजिटल लेन-देन के कदमों के लिये भारतीय रिज़र्व बैंक कितने हद तक तैयार था?

भारतीय रिज़र्व बैंक ने इन प्रश्नों का उत्तर देने से इंकार किया है। उसकी जिन बैठकों में नोटबंदी पर बहस की गयी थी उनको सार्वजनिक करने से भी उसने इंकार किया है इस आधार पर कि अगर ऐसी सूचना को सार्वजनिक किया जायेगा तो यह राष्ट्र के आर्थिक हितों के लिये हानिकारक होगा

नोटबंदी ने इज़ारेदार पूंजीपतियों के लिये अधिकतम मुनाफे़ बनाने के नये रास्ते खोल दिये हैं। दूसरी तरफ, इससे करोड़ों दिहाड़ी मज़दूरों के काम और जीविका का विनाश हुआ है। इससे हुई नगदी की कमी की वजह से किसानों को अपनी फसलों को कम दामों पर बेचने के लिये मज़बूर होना पड़ा है। इससे निर्माण व दूसरे बहुत से क्षेत्रों में मंदी आयी है।

हिन्दोस्तानी सरकार का दावा सरासर झूठा है कि नोटबंदी के बावजूद, 2016-17 में अर्थव्यवस्था 7 प्रतिशत से बढ़ी है। जैसा कि सरकारी मुख्य सांख्यिकी विश्लेषक ने खुद माना है कि यह अनुमान सिर्फ बड़े स्तर के उद्योगों के आंकड़ों पर आधारित है। चूंकि नोटबंदी का सबसे बड़ा नुकसान असंगठित और अपंजीकृत क्षेत्रों के कारोबारों को हुआ है और उनके आंकड़ों को छोड़ दिया गया है, यह अनुमान वास्तविकता से अधिक संवर्धन दिखाता है।जहां तक भ्रष्टाचार और काले धन का सवाल है, हाल में हुये पांच राज्यों के चुनावों में देखा गया है कि कितनी हेलीकॉप्टर रैलियां व रोड शो किये गये और कितने नेताओं की खरीद-फ़रोक्त हुई थी। चेन्नई के एक विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र की रिपोर्ट है कि 90 करोड़ रुपये मतदाताओं के बीच बांटे गये थे।

जहां तक आतंकवाद की बात है, हाल में दो सिपाहियों का गला काटने की घटना, जिसका उद्देश्य अमरीकी भू-राजनीतिक हित में हिन्दोस्तान और पाकिस्तान को आपस में भिड़ाना है, यह घटना दिखाती है कि जब तक अमरीकी साम्राज्यवाद को इस इलाके से बाहर नहीं फेंका जाता, आतंकवादी अपराधों को खत्म नहीं किया जा सकता है।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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