पश्चिम एशिया के देशों में आर्थिक संकट और हिन्दोस्तानी मज़दूरों की दयनीय स्थिति

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 19/05/2017 - 12:32

कच्चे-तेल से समृद्ध खाड़ी के देशों में काम कर रहे करीब 70 लाख हिन्दोस्तानी मज़दूर वहां चल रहे आर्थिक संकट का शिकार हो रहे हैं। दुनिया के बाज़़ारों में तेल की गिरती कीमतों की वजह से इन देशों में आर्थिक संकट ज्यादा गहरा हो गया है।

आधिकारिक अनुमान के मुताबिक सऊदी अरब में 30 लाख हिन्दोस्तानी मज़दूर हैं, संयुक्त अरब अमीरात में 22 लाख मज़दूर हैं और कुवैत, कतर, बहरीन तथा ओमान में 20 लाख से अधिक हिन्दोस्तानी मज़दूर काम कर रहे हैं। हिन्दोस्तान और अन्य दक्षिण एशियाई देशों से आये मज़दूर इन देशों की मेहनतकश आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा हैं।

मीडिया में आई खबरों के अनुसार, पिछले कुछ सप्ताहों में संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत और ओमान के हुक्मरानों ने व्यवसाय के कई क्षेत्रों में कटौती, कर व्यवस्था में बदलाव, बड़े पैमाने पर मज़दूरों की छंटनी, वेतन में बढ़ोतरी नहीं या कटौती और मज़दूरों के जीवन स्तर को घटाना, जैसे कई कदमों के ऐलान किये हैं। ये सारे उपाय पिछले 3-4 वर्षों में बड़े ही सुनियोजित तरीके से अमल में लाये जा रहे हैं, जिसका मज़दूरों पर बहुत बुरा असर हुआ है।

मज़दूरों की दयनीय हालत का खुलासा तब हुआ जब अगस्त 2016 में खबरें आनी शुरू हो गयीं कि किस तरह खाड़ी के कई देशों में काम कर रहे दसों-हजारों हिन्दोस्तानी मज़दूरों को भूखा रहने पर मजबूर होना पड़ा है। बिना किसी सुविधा के बेहद बुरी हालत में कई सप्ताहों और महीनों तक शिविरों में रहना पड़ा है। दुनिया के बाज़ारों में तेल की कीमतों में तेज़ी से आई गिरावट के चलते, तेल का निर्यात करने वाले इन देशों में आई आर्थिक मंदी की वजह से निर्माण और अन्य क्षेत्रों में काम करने वाली कंपनियों ने इन मज़दूरों को बिना किसी मुआवजे के नौकरी से निकाल दिया था। इनमें से कई मज़दूरों को पिछले 6-8 महीनों का कोई वेतन तक नहीं दिया गया था। उनके पास इतने भी पैसे नहीं थे कि वे वापस हिन्दोस्तान आने के लिए टिकट खरीद सकें।

यह भली-भांति जानते हुए कि इन देशों में मज़दूरों का किस तरह से शोषण और उत्पीड़न किया जाता है, उनके साथ बदसलूकी की जाती है और उनको मूल अधिकारों से वंचित किया जाता है, हिन्दोस्तान की किसी भी सरकार ने बरसों से मज़दूरों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए कोई भी कदम नहीं उठाये। इन देशों में विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हिन्दोस्तानी मज़दूरों - निर्माण व तेल मज़दूरों या नर्सों और अन्य तकनीकी पेशेवर मज़दूरों के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए हिन्दोस्तान का इन देशों के साथ कोई समझौता भी नहीं है। हिन्दोस्तानी राज्य इन मज़दूरों को मात्र धन के स्रोत के रूप में देखता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से चली आ रही आर्थिक हालतों की वजह से देश में आने वाला धन घटता जा रहा है।

हिन्दोस्तानी राज्य इस घटती हुई आमदनी के बारे में चिंता जता रहा है और मज़दूरों द्वारा रोज़गार खोने और गरीबी में धकेले जाने को लेकर घड़ियाली आंसू बहा रहा है। लेकिन हिन्दोस्तानी राज्य ने कभी भी इन देशों में काम कर रहे हिन्दोस्तानी मज़दूरों के अधिकारों की रक्षा में कोई भी कदम नहीं उठाये हैं। हिन्दोस्तानी मज़दूरों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए हिन्दोस्तानी राज्य ने उन राज्यों की सरकारों के साथ अपने राजनयिक संबंधों का इस्तेमाल नहीं किया है।

हमारे देश में गरीबी और बेरोज़गारी के चलते, लाखों शिक्षित और कौशलवान नौजवान महिला और पुरुष मज़दूर विदेशों में नौकरी की तलाश में जाने के लिए मजबूर हैं। इनमें से अधिकांश मज़दूर सऊदी अरब और खाड़ी के अन्य देशों में हैं। इनमें से कई मज़दूरों को भारी कर्ज़ा लेना पड़ता है और बिचैलियों को खूब पैसा देना पड़ता है जो उनके लिए इन देशों में नौकरी और सफर करने के लिए दस्तावेज़ों का इंतजाम करते हैं। फिर भी इतनी कठिनाई का सामना वे इसलिए करते हैं क्योंकि इन पश्चिम एशिया के देशों में हो रही कमाई उनके और हिन्दोस्तान में रह रहे उनके परिवारों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। मौजूदा परिस्थितियों में उनके पास अपने देश में वापस आने और कमर तोड़ गरीबी का सामना करने व एक बेहद अनिश्चित भविष्य के अलावा, दूसरा कोई विकल्प नहीं है।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी खाड़ी के देशों में काम कर रहे तमाम मज़दूर भाइयों और बहनों के साथ अपनी संवेदना और समर्थन व्यक्त करती है। हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी, विदेशों में काम कर रहे हिन्दोस्तानी मज़दूरों की प्रति हिन्दोस्तानी राज्य की अपराधी बेरहमी की निंदा करती है।

Tag:    West Asia    May 16-31 2017    Struggle for Rights    Rights     2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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