1857 के महान ग़दर की 160वीं वर्षगांठ ज़िंदाबाद! लोगों के हाथों में संप्रभुता सौंपने के संघर्ष को आगे बढ़ायें!

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 19/05/2017 - 12:59

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की आह्वान, 10 मई, 2017

आज 1857 के महान ग़दर की 160वीं वर्षगांठ है, जिसे हिन्दोस्तान की आज़ादी की पहली लड़ाई के नाम से भी जाना जाता है। इसी दिन 10 मई को बर्तानवी हिन्दोस्तानी सेना की मेरठ की टुकड़ी के जवानों ने बग़ावत कर दी थी और दिल्ली पर कब्ज़ा करने के लिए कूच कर दिया था। पूरे उपमहाद्वीप में बर्तानवी हुकूमत के खि़लाफ़ बग़ावत के लिए यह एक संकेत था।

Ghadar Jaari Hai

ग़दर जारी है प्रस्तुति की सी.डी. का कवर

लड़ाई का भौगोलिक विस्तार और उसमें शामिल लोगों की संख्या को यदि देखा जाये, तो 1857 का ग़दर 19वीं शताब्दी की सबसे बड़ी लड़ाई थी। बर्तानवी हिन्दोस्तानी सेना के सैनिकों से लेकर देशभक्त राजाओं व रानियों, जनजातियों के लोगों, किसानों और कारीगरों, सभी ने इस हथियारबंद बग़ावत में हिस्सा लिया। बाग़ियों को कई व्यापारियों, बुद्धिजीवियों तथा तमाम तरह के धार्मिक गुरुओं और नेताओं का भी सक्रिय समर्थन प्राप्त था। वे सब एक मकसद और कार्यक्रम के लिए एकजुट हुए थे - बस्तीवादी लूट को ख़त्म करना, किसानों, कारीगरों और उन सभी लोगों की ज़रूरतों को पूरा करना जो हिन्दोस्तान की संपत्ति पैदा करते हैं।

मेरठ से निकले बाग़ी सैनिकों ने दिल्ली पर कब्ज़ा जमा लिया और ईस्ट इंडिया कंपनी की दमनकारी और विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंका, बहादुर शाह ज़फर को नई राजनीतिक सत्ता के प्रतिनिधि के रूप में दिल्ली के तख़्त पर बैठाया। दिल्ली में शासन का एक दरबार स्थापित किया गया, जिसमें आम जनता और सैनिक दोनों शामिल थे और इस दरबार के फैसले को मानने के लिए राजा बाध्य था।

बहादुर शाह ज़फर ने यह खुलेआम ऐलान किया कि उन्हें इस तख़्त पर लोगों ने बैठाया है और वे लोगों की इच्छा पूरी करने के लिए वचनबद्ध हैं। उन्होंने तर्क दिया कि बर्तानवी हुकूमत नाजायज़ है और उसे पूरी तरह से ख़त्म कर देना चाहिए और कहा कि “भविष्य में क्या होगा, इसका फैसला हिन्दोस्तान के लोग करेंगे”।

12 मई, 1857 को बहादुर शाह ज़फर ने यह शाही फरमान जारी किया :

“हिन्दोस्तान के सभी हिन्दुओं और मुसलमानों, सभी लोगों के प्रति अपने फर्ज़ को मद्देनज़र रखते हुए, मैंने यह फैसला किया है कि मैं अपने लोगों के साथ खड़ा रहूंगा। इस नाज़ुक घड़ी में जो कोई कायरता दिखाएगा या फिर अपने भोलेपन में धूर्त अंग्रेजों की मदद करेगा, उनके वादों पर विश्वास करेगा, उसका भ्रम जल्दी ही टूट जायेगा। उनको याद रखना चाहिए कि अंग्रेज उनकी वफादारी के साथ उसी तरह विश्वासघात करेंगे, जैसे उन्होंने अवध के शासक के साथ किया था। सभी हिन्दुओं और मुसलमानों का यह परम कर्तव्य है कि वे अंग्रेजों के खिलाफ़ इस बग़ावत में शामिल हों। उन्हें अपने शहर और इलाके के नेताओं से निर्देश लेते हुए, उनकी अगुवाई में देश में कानून और व्यवस्था बहाल करने के लिए कदम उठाने चाहिए। यह सभी लोगों का परम कर्तव्य है कि वे इस फरमान की प्रतियां बनाएं और जहां तक हो सके शहर के हर महत्वपूर्ण जगह पर प्रदर्शित करें। लेकिन इसके पहले वे खुद को हथियारबंद करें और अंग्रेजों के खिलाफ़ जंग छेड़ दें”।

इसके अलावा उन्होंने एक और फरमान जारी किया जिसमें लोगों को खबरदार किया गया था:

“अंग्रेज, हिन्दुओं को मुसलमानों के खि़लाफ़ और मुसलमानों को हिन्दुओं के खि़लाफ़ भड़काने की कोशिश करेंगे। उनकी बातों की ओर ध्यान मत दो और उनको देश से खदेड़ दो”।

सर्वोच्च सत्ता, जिसके प्रति लोगों के दिलों में बेहद सम्मान था, इसके द्वारा जारी किये गए इन फरमानों से क्रांतिकारी बग़ावत को गति मिली और यह बर्तानवी हिन्दोस्तान में चारों ओर तेज़ी से फैल गयी। मई और जून के दौरान बंबई और मद्रास में बर्तानवी सेना के केन्द्रों में पर्चे निकाले गए, जिनमें बहादुर शाह ज़फर को “हिन्दोस्तान का सम्राट” घोषित करते हुए बर्तानवी हुकूमत के ख़त्म हो जाने की बात कही गई।

दो वर्षों तक चली इस कठोर लड़ाई के अंत में बर्तानवी बस्तीवादियों की जीत हुई और उन्होंने कुछ गद्दार राजाओं और राजकुमारों, बड़े जमींदारों और पूंजीपति व्यापारियों की मदद से इस क्रांति को सबसे बड़े कत्लेआम के समंदर में डुबो दिया।

1857 का ग़दर हमारे इतिहास की धारा को तय करने वाला एक महत्वपूर्ण क्षण था। इस ग़दर ने एक नई राजनीतिक हस्ती के विचार और नज़रिए को जन्म दिया - यह नई राजनीतिक हस्ती एक ऐसा हिन्दोस्तान है, जहां लोग मालिक हैं। इस नए विचार ने एक ऐसे हिन्दोस्तान का नज़रिया पेश किया, जिसने इस महाद्वीप के हर एक हिस्से में बसे अलग-अलग राष्ट्रीयताओं, भाषाओं, जातियों, जनजातियों और धर्मों में आस्था रखने वाले सभी लोगों को लामबंध किया।

“हम हैं इसके मालिक, हिन्दोस्तान हमारा!” ग़दर के बाग़ियों का यह नारा लोगों के हाथों में संप्रभुता सौंपने की लड़ाई का एक ताक़तवर बिगुल बन गया।

पैगाम ए आज़ादी, 1857

हम हैं इसके मालिक हिन्दोस्तान हमारा
पाक वतन है कौम का जन्नत से भी प्यारा
ये है हमारी मिल्कियत हिन्दोस्तान हमारा
इसकी रूहारियत से रोषन है जग सारा

कितनी कदीम कितना नईम, सब दुनिया से न्यारा
करती है जरखेज़ जिसे गंगों - जमुन की धारा
ऊपर बर्फीला पर्वत पहरेदार हमारा
नीचे सहिल पर बजता, सागर का नक्कारा

इसकी खानें उगल रहीं सोना हीरा पारा
इसकी शान-षौकत का दुनिया में जयकारा
आया फिरंगी दूर से ऐसा मंतर मारा
लूटा दोनों हाथ से प्यारा वतन हमारा

आज शहीदों ने है तुमको अहले वतन ललकारा
तोड़ो गुलामी की जंजीरें बरसाओ अंगारा
हिन्दु मुसलमां सिख हमारा भाई भाई प्यारा
यह है आजादी का झंडा इसे सलाम हमारा

जबकि इस क्रांतिकारी बग़ावत को अंग्रेजों द्वारा कुचल दिया गया लेकिन इससे निकली विचार-सामग्री और नज़रिया लोगों की अंतर-आत्मा से न मिटाया जा सका। हम, लोग हिन्दोस्तान के मालिक हैं, यह मांग 20वीं सदी में आने वाली क्रांतिकारियों की तमाम पीढ़ियों को प्रेरित करती रही और आज भी करती है।

आज हमारे समाज में पनप रही हर समस्या का स्रोत इस बात में है कि 1857 में ग़दरियों के लक्ष्यों को 1947 में पूरा नहीं किया गया। 1947 में संप्रभुता को लंदन से दिल्ली में हस्तांतरित किया गया, लेकिन वह लोगों के हाथों में नहीं आई। आज हिन्दोस्तान के लोग, हिन्दोस्तान के मालिक नहीं हैं। समाज और उसके विकास की दिशा तय करने में बहुसंख्य लोगों की कोई भूमिका नहीं है। हिन्दोस्तान का भविष्य तय करने वाले फैसले लेने की सर्वोच्च ताक़त चंद मुट्ठीभर शोषकों के हाथों में है, जिनकी अगुवाई हिन्दोस्तान के 150 इज़ारेदार पूंजीपति घराने करते हैं। परस्पर विरोधी राजनीतिक पार्टियां इन इज़ारेदार पूंजीपति घरानों का प्रतिनिधित्व करती हैं और बारी-बारी से इनके राज्य को चलाने का काम करती हैं, जबकि लोग शोषण की इस व्यवस्था में मात्र शक्तिहीन शिकार और वोट देने वाली भेड़-बकरी बनकर रह जाते हैं।

लोगों के हाथों में संप्रभुता सौंपना, समाज को इस संकट की दलदल से निकालने और समाज के सब-तरफा विकास के रास्ते को खोलने की चाबी है। समाज को तमाम तरह के शोषण, दमन, भेदभाव और गुलामी से पूरी तरह से मुक्त करने के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण कार्य है।

हिन्दोस्तानी समाज को इस रास्ते पर जाने से वे लोग रोक रहे हैं, जो देश के अधिकांश लोगों को सत्ताहीन बनाये रखना चाहते हैं। ऐसे लोग देश और विदेश दोनों जगह बैठे हुए हैं। ये ताक़तें मौजूदा राज्य और उसके राजनीतिक सिद्धांत की हिफाज़त करती हैं, जो राजनीतिक सिद्धांत यह मानता है कि हिन्दोस्तान के लोग खुद अपनी हुकूमत चलाने के काबिल नहीं हैं।

1858 में महारानी विक्टोरिया के फरमान से शुरू होकर, जिसके तहत हिन्दोस्तान की संप्रभुता बर्तानवी ताज के पास चली गयी थी और ईस्ट इंडिया कंपनी की सत्ता ख़त्म की गई थी, उस वक्त से इस विशाल उपमहाद्वीप के लोगों को बांटकर, उनपर अपनी हुकूमत स्थापित करने के लिए बर्तानवी हिन्दोस्तान की राज्य मशीनरी का सुनियोजित तरीके से निर्माण किया गया। बस्तीवादी लूट और लोगों की गुलामी की हिफाज़त में “कानून का शासन” लागू करने के लिए तमाम संस्थाएं और तंत्र बनाये गए। जिन पूंजीपति और ज़मींदार ग़द्दारों ने अंग्रेजों का साथ दिया उन्हें ईनाम दिया गया और उनको इस बस्तीवादी लूट से बड़ा फायदा मिला। अंग्रेजों ने एक ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया बनाई जिसमें इन ग़द्दार वर्गों के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया, जबकि बहुसंख्य जनसमुदाय को सत्ता से बाहर रखा गया।

अंग्रेजों द्वारा निर्मित यह राज्य इस सिद्धांत पर आधारित है कि हिन्दोस्तान के लोग परस्पर-विरोधी और दुश्मनीपूर्ण धार्मिक समुदायों में बंटे हुए हैं और वे खुद अपनी हुकूमत चलाने के काबिल नहीं हैं। तथाकथित तौर से उनपर अपनी हुकूमत चलाना “श्वेत व्यक्ति का बोझ” है ताकि हिन्दोस्तानियों को एक दूसरे का कत्ल करने से रोका जा सके।

बड़े पूंजीपति और बड़े जमींदारों के प्रतिनिधियों से भरी हुई और अंग्रेजों द्वारा सांप्रदायिक आधार पर बनायी गयी संविधान सभा ने 1950 में आज़ाद हिन्दोस्तान का संविधान स्वीकार किया। इस संविधान सभा ने बर्तानवी बस्तीवादी राज्य के मूल ढांचे और उसके सिद्धांत को बरकरार रखा, जिसके मुताबिक हिन्दोस्तानी लोग खुद अपनी हुकूमत चलाने के काबिल नहीं हैं। केवल संसद और राज्य विधान सभाओं को कानून बनाने का अधिकार है और इन संस्थाओं के भीतर केवल सत्ताधारी गुट को नीति निर्धारित करने का अधिकार है। मेहनतकश बहुसंख्य आबादी को केवल वोट डालने का अधिकार है, जिसके द्वारा वह सारी सत्ता चुने गए “लोगों के प्रतिनिधियों” के हाथों में सौंप देती है। चुनाव से पहले न तो उनको उम्मीदवार का चयन करने का अधिकार है और न ही चुने गए प्रतिनिधियों से काम का हिसाब मांगने का अधिकार है तथा न ही कोई कानून प्रस्तावित करने का अधिकार है। इस बात से यह एकदम साफ है कि यह संविधान लोगों के हाथों में संप्रभुता नहीं देता है।

आज दो खेमों के बीच कभी न मिट सकने वाला संघर्ष चल रहा है। एक खेमा उन लोगों का है, जो संप्रभुता लोगों के हाथों के सौंपना चाहते हैं। और दूसरा खेमा उन लोगों का है, जो इस राज्य और उसके संविधान की हिफाज़त कर रहे हैं। यह टकराव 1857 की बग़ावत के सार और महत्व के मूल्यांकन में भी साफ झलकता है। इन दोनों खेमों के मूल्यांकन में ज़मीन आसमान का अंतर है।

बर्तानवी बस्तीवादियों ने यह झूठ फैलाया कि 1857 का ग़दर “मुसलमानों की बग़ावत” थी। इस प्रचार का उन्होंने मुसलमानों के कत्लेआम को जायज़ ठहराने के लिए इस्तेमाल किया, जिसे उन्होंने पटियाला, जींद और फरीदकोट के ग़द्दार राजाओं के साथ मिलकर अंजाम दिया। उन्होंने यह झूठ फैलाया कि सिख लोगों ने 1857 की बग़ावत में हिस्सा नहीं लिया। उन्होंने इस ग़दर को “सैनिकों की बग़ावत” का नाम दिया, ताकि वे इस बात को छुपा सकें कि इसमें समाज के सभी तबकों के लोगों ने हिस्सा लिया था।

1857 के बारे में इस दुष्प्रचार को आज भी लगातार फैलाया जा रहा है। जो लोग मौजूदा राज्य और उसके संविधान को बरकरार रखना चाहते हैं, वे 1857 की छवि को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं। वे इस बात से इंकार करते हैं कि 1857 का ग़दर, हिन्दोस्तान के लोगों की इस चाहत को दर्शाता है कि उन्हें खुद समाज का मालिक बनना होगा। झूठ का दुष्प्रचार फैलाने वाले नहीं चाहते हैं कि हिन्दोस्तान के लोग अपनी क्रांतिकारी परंपरा से प्रेरणा लें। खुद को अपनी किस्मत का मालिक बनने की लोगों की बरसों पुरानी इच्छा को वे हमेशा के लिए दफन कर देना चाहते हैं।

ऐसे भी कई इतिहासकार और बुद्धिजीवी हैं, जो यह दावा करते हैं कि 1857 का ग़दर सामंती और पिछड़ी ताक़तों की बग़ावत थी, जो तथाकथित तौर से समाज को बस्तीवाद-पूर्व के काल में वापस ले जाना चाहती थी। दूसरे शब्दों में, बर्तानवी बस्तीवादी राज्य और उसका “कानून का राज” नए समाज का प्रतिनिधित्व करता था, जबकि 1857 की बग़ावत पुराने समाज की झलक थी। इस तरह वह सच्चाई को उल्टा करके पेश करते हैं।

1857 के ग़दर के दौरान, बहादुर शाह जफर यह नहीं तय कर रहे थे कि लोगों को किस बात के लिए लड़ना है, बल्कि इसके ठीक विपरीत जनसमुदाय की क्रांतिकारी बग़ावत ने राजा को लोगों के साथ खड़ा होने के लिए बाध्य कर दिया था। लोगों की परिषद का बनाया जाना, जिसका फैसला राजा के लिए मानना ज़रूरी था, यह पूर्णतया एक नयी चीज उभर कर आई थी। यह पूरी तरह से जनतांत्रिक और गहरी क्रांतिकारी सोच थी। इसके ठीक विपरीत “श्वेत पुरुष का बोझ” के सिद्धांत पर आधारित बर्तानवी राज्य पूरी तरह से प्रतिक्रियावादी था जो कि बस्तीवाद-पूर्व के समाज की हर एक पिछड़ी चीजों, परंपराओं और रीतियों को बरकरार रखने पर आधारित था, ताकि लोगों को हमेशा के लिए बांटकर, गुलाम बनाकर रखा जा सके।

हमारे देश के मज़दूर वर्ग, किसानों और सभी मेहनतकशों तथा देशभक्तों के लिए 1857 का ग़दर और उसका नारा “हम हैं इसके मालिक!” एक नए हिन्दोस्तान का सिद्धांत और नज़रिया पेश करता है, जो जन्म लेने के लिए तड़प रहा है। आओ, हम सब पूरे दिल से हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के कार्य में जुट जायें - एक नए राज्य और राजनीतिक प्रक्रिया के लिए काम करें, जो इस असूल पर आधारित होगी कि संप्रभुता लोगों के हाथों में निहित होनी चाहिए और सभी के लिए सुख, समृद्धि और सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य का फर्ज़ है।

मज़दूर, किसान, औरत और जवान - हम हैं हिन्दोस्तान! हम इसके मालिक हैं!

ग़दर जारी है!

Tag:    May 16-31 2017    Voice of the Party    History    Popular Movements     Theory    2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

(Click thumbnail to download PDF)

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)