चीन की बेल्ट एंड रोड पहल

Submitted by cgpiadmin on गुरु, 01/06/2017 - 12:20

पेइचिंग में 14-15 मई को हुए शिखर सम्मलेन में, चीन ने अपनी बेल्ट एंड रोड पहल को औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया।

सम्मलेन में 28 देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री उपस्थित थे। उनमें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी थे। ब्रिटेन और फ्रांस समेत 30 और देशों के मंत्रियों ने सम्मलेन में भाग लिया। 40 अन्य देशों के राजदूत भी वहां उपस्थित थे।

China's Belt and Road Initiative

Land and Sea routes proposed under
the Belt and Road Initiative

अमरीका, फ्रांस, जापान और दक्षिण कोरिया - जिन्होंने इससे पहले बेल्ट एंड रोड परियोजना के पीछे चीन के भू-राजनीतिक इरादों के बारे में सवाल उठाये थे - उन सभी ने शिखर सम्मलेन में उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजे।

संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव, संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा के अध्यक्ष, विश्व बैंक के अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रबंधक संचालक, विश्व व्यापार संगठन के मुख्य संचालक, विश्व आर्थिक फोरम के कार्यकारी अध्यक्ष, जैसे अनेक विशिष्ट लोगों ने सम्मलेन में भाग लिया।

बेल्ट एंड रोड पहल चीन और व्यापक यूरोप-एशिया क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ने की एक विशाल परियोजना है। इस परियोजना के तहत, दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों, पाकिस्तान, मध्य एशिया के देशों और अफ्रीका व यूरोप के अनेक देशों की अर्थव्यवस्थाओं को चीन की अर्थव्यवस्था के साथ नजदीकी से जोड़ा जायेगा। इसमें रेलवे, महामार्गों, बंदरगाहों और तेल व गैस पाइपलाइनों का पूरा नेटवर्क होगा। इसके तहत, चीन और यूरोप के बीच सीधा स्थल मार्ग स्थापित होगा। बंदरगाहों के नेटवर्क के ज़रिये चीन को अफ्रीका और यूरोप के साथ समुद्री मार्ग से जोड़ा जायेगा।

अलग-अलग देशों की चिंताओं को संबोधित करते हुए, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सम्मलेन का उद्घाटन करते हुए कहा कि “बेल्ट एंड रोड को शांति का रास्ता बनाना होगा। हमें आपसी वार्ता की सांझेदारी बनानी चाहिये न कि एक-दूसरे का मुकाबला करने की। सभी देशों को एक-दूसरे की संप्रभुता, सम्मान और क्षेत्रीय अखंडता, एक-दूसरे के विकास के रास्तों और सामाजिक व्यवस्थाओं, एक-दूसरे के मुख्य हितों और प्रमुख चिंताओं का आदर करना चाहिए।” उन्होंने ऐलान किया कि यह दूसरे देशों के साथ चीन की “सहकारी” परियोजना है। शिखर सम्मलेन के बाद, संवाददाता सम्मलेन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ऐलान किया कि “यह पहल एक खुली वैश्विक अर्थव्यवस्था सुनिश्चित करेगी, भूमंडलीकरण को पुनः संतुलित करेगी और व्यापर के उदारीकरण की दिशा में आगे बढ़ेगी।”

बेल्ट एंड रोड सम्मलेन के माध्यम से चीन खुलकर यह दावा कर रहा है कि वह पूंजी और उत्पादन के भूमंडलीकरण में अगुवा भूमिका अदा करना चाहता है। एशिया, अफ्रीका और यूरोप के विभिन्न देशों में रणनैतिक ढांचागत निर्माण करने के लिए, चीन अत्यधिक मात्रा में उपलब्ध अपनी बेशी पूंजी का निवेश करने का प्रस्ताव कर रहा है, लोहा, इस्पात और सीमेंट के अपने प्रचूर अतिरिक्त भंडार तथा अपनी उच्च प्रौद्योगिकी का दूर-दूर तक इस्तेमाल करने का प्रस्ताव कर रहा है। इसके साथ-साथ, चीन वैश्विक वित्त पूंजी और विभिन्न विशाल वैश्विक इज़ारेदार कंपनियों को बेल्ट एंड रोड पहल में “सांझेदार” बनाकर, पूंजी निवेश करके उन्हें बेशुमार मुनाफ़े कमाने के मौके भी दे रहा है।

यह अनुमान लगाया गया है कि बेल्ट एंड रोड परियोजना में 1 खरब डॉलर से अधिक धन लगाया जायेगा। चीनी वाणिज्य मंत्री ज्होंग शान ने वादा किया है कि उनका देश अगले पांच वर्षों में, बेल्ट एंड रोड परियोजना के देशों से 2 खरब डॉलर का माल खरीदेगा। उम्मीद की जा रही है कि बेल्ट एंड रोड परियोजना से 60 से अधिक देश जोड़े जायेंगे।

2008 से शुरू हुए और लम्बे अरसे से चल रहे वैश्विक संकट की हालतों में, अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी और वैश्विक इज़ारेदार कंपनियों को बेल्ट एंड रोड परियोजना में बहुत अच्छी संभावनाएं दिख रही हैं। सम्मलेन में उपस्थित वैश्विक वित्त पूंजी के संस्थानों और प्रमुख साम्राज्यवादी ताक़तों के प्रतिनिधियों की प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट था।

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बाद, तुर्की के राष्ट्रपति एरदोगन, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ तथा दूसरे देशों के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों ने इस पहल के लिए चीन की सराहना की। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और अमरीका ने भी अपना समर्थन प्रकट किया।

“इस पहल का महत्वाकांक्षी प्रसार वास्तव में प्रथम ऐसी कोशिश है”, ब्रिटेन के राजकोष के चांसलर फिलिप हैमोंड ने कहा। “ब्रिटेन इस पहल का स्वाभाविक सांझेदार होगा”।

फ्रांस के भूतपूर्व प्रधानमंत्री, जो-पिएर रफ्फरिन, जो अपने देश के प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई कर रहे थे, ने कहा कि उनका देश “इस पहल की सफलता के लिए चीन और अन्य सांझेदारों के साथ मिलकर काम करने को तैयार है”।

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सलाहकार और अमरीका के प्रतिनिधिमंडल के नेता मैट पोटिंगर ने कहा कि वाशिंगटन अनेक देशों को जोड़ने की चीन की इस पहल का “स्वागत” करता है और अमरीकी कम्पनियां इस परियोजना में अपनी सेवाएं प्रदान कर सकती हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रधान, विश्व बैंक के अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रबंधक संचालक, विश्व व्यापार संगठन के मुख्य संचालक, विश्व आर्थिक फोरम के कार्यकारी अध्यक्ष, सभी ने बेल्ट एंड रोड परियोजना की सराहना की। सभी अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों और सम्मलेन में भाग लेने वाले अनेक देशों को दूसरे देशों की संरक्षणवादी प्रवृत्तियों के बारे में चिंता है। अनेक वैश्विक इज़ारेदार पूंजीवादी कंपनियों के प्रतिनिधि सम्मलेन में उपस्थित थे। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने खुद को व्यापार के उदारीकरण के नेता बतौर पेश करते हुए, यह ऐलान किया कि बेल्ट एंड रोड परियोजना से भूमंडलीकरण की ताक़तों को प्रोत्साहन मिलेगा। “हमें बहु-तरफा व्यापार की व्यवस्था का अनुमोदन करना चाहिए, मुक्त व्यापार के क्षेत्रों को बढ़ावा देना चाहिए और व्यापार व पूंजी निवेश के उदारीकरण और सुगमता को प्रोत्साहित करना चाहिए”, शी जिनपिंग ने ऐसा कहा।

जर्मनी और फ्रांस ने बेल्ट एंड रोड परियोजना का समर्थन प्रकट तो किया, परन्तु ये साम्राज्यवादी बहुत चिंतित हैं कि यूरोपीय संघ तथा संघ के अन्दर उनकी प्रधानता पर बेल्ट एंड रोड परियोजना का क्या असर होगा। उन्हें इस बात का डर है कि बेल्ट एंड रोड परियोजना से चीनी इज़ारेदार पूंजीपतियों को ज्यादा फायदा होगा और यूरोपीय इज़ारेदार पूंजीपतियों को कम। जर्मनी के आर्थिक मंत्री ब्रिजिट जिप्रिस ने एक व्यापार गोष्ठी में कहा कि “हमारे लिए और हमारी कंपनियों के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि बेल्ट एंड रोड पहल के तहत हमारी परियोजनाओं की मांग पारदर्शी हो, उसमें कोई भेदभाव न हो तथा वे अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार हों। मैं मानती हूँ कि इस मामले में उन्नति लाने की काफी गुंजाइश है”।

बेल्ट एंड रोड पहल के पीछे चीन के असली इरादे

2008 में शुरू हुए वैश्विक आर्थिक संकट और चीन की अर्थव्यवस्था में मंदी की हालतों में, चीन खुद को भूमंडलीकरण के दूसरे दौर की चालक शक्ति बतौर पेश करने की कोशिश कर रहा है।

चीन के पास बहुत बड़ी मात्रा में डॉलर के भंडार हैं, जो उसने विभिन्न देशों के साथ व्यापार अधिशेष के ज़रिये अर्जित किया है। चीन ने खुद को दुनिया की “फैक्ट्री” के रूप में रचित किया है। उसके पास इस्पात, सीमेंट और निर्माण की मशीनरी में अत्यधिक अतिरिक्त संसाधन व क्षमता है, जो इस समय अनुपयुक्त पड़े हैं, क्योंकि बीते कुछ वर्षों से चीन की अर्थव्यवस्था में मंदी आ गयी है। एशिया, अफ्रीका और यूरोप के कई देशों में चीन पहले से ही, विशाल ढांचागत परियोजनाओं के निर्माण के लिए, अपने अतिरिक्त डॉलर के भंडार तथा इस्पात और सीमेंट में अपनी अतिरिक्त क्षमता का इस्तेमाल कर रहा है। लाओस में रेल मार्ग बनाए जा रहे हैं, जो पूरा होने पर, चीन को 8 अन्य एशियाई देशों के साथ जोड़ेंगे। केन्या और इथियोपिया में रेल मार्ग बनाये गये हैं और यूरोप में, बुडापेस्ट और बेलग्रेड के बीच रेल मार्ग बनाए जा रहे हैं। श्रीलंका, पाकिस्तान, केन्या, यूनान और अन्य देशों में चीन बंदरगाह बना रहा है। चीन को मध्य एशिया के देशों के साथ जोड़ते हुए, सड़क, रेल मार्ग, तेल व गैस की पाइपलाइनें बनायी जा रही हैं। इन सभी परियोजनाओं को अब बेल्ट एंड रोड परियोजना में शामिल कर दिया गया है।

बेल्ट एंड रोड पहल के ज़रिये, चीन ढांचागत क्षेत्रों में इस प्रकार के पूंजीनिवेश को और बढ़ाने तथा उसमें यूरोप को भी शामिल करने की योजना बना रहा है। चीन यूनान में पिरयूस पर तथा चीन से यूरोप जाने वाले सड़क और रेल मार्ग के अंतिम स्टेशन बतौर, नीदरलैंड्स में रॉटरडैम पर, नए बंदरगाहों का निर्माण कर रहा है।

हाल के वर्षों में चीन ने रोबोटिक्स, सौर ऊर्जा, बायो-फार्मा, बिजली से चलने वाली गाड़ियाँ, इत्यादि जैसी आधुनिकतम प्रौद्योगिकी में भारी निवेश किया है। बेल्ट एंड रोड पहल के ज़रिये, चीन अपने उच्च स्तरीय उत्पादों के लिए यूरोप में बाज़ारों को हासिल करने की कोशिश कर रहा है।

बेल्ट एंड रोड परियोजना के प्रमुख रणनैतिक मकसद हैं। एशिया, अफ्रीका और पूर्वी यूरोप के विभिन्न देशों के साथ चीन नजदीकी के रणनैतिक संबंध बनाना चाहता है। इस पहल के ज़रिये उन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को अधिक से अधिक हद तक चीन की अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ दिया जाएगा।

इसके साथ-साथ, अमरीका की एशिया धुर्री नीति का मुकाबला करना भी बेल्ट एंड रोड पहल का रणनैतिक उद्देश्य है। अमरीका की एशिया धुर्री नीति का मकसद है दूसरे देशों के साथ सैनिक गठबंधन बनाकर चीन को घेरना। इस सैनिक गठबंधन में जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। अमरीका कोशिश कर रहा है कि हिन्दोस्तान को भी इस गठबंधन में जुड़ने को आकर्षित किया जाए। इसके लिए वह हिन्दोस्तान के साथ अपने सैनिक और खुफियाकर्मी संबंधों को मजबूत कर रहा है।

अमरीका की सेना का अधिकतम भाग इस समय प्रशांत महासागर में स्थित है। चीन और उसके औद्योगिक ढांचे - जो मुख्यतः समुद्र तट के पास स्थित हैं - पर हमला करने की अमरीकी सेना के पास पूरी क्षमता है। चीन को यह आशंका है कि प्रशांत महासागर और हिन्द महासागर को जोड़ने वाले मलक्का जलडमरूमध्य को अमरीकी नौसेना रोक सकती है, जिससे पश्चिम एशिया से चीन को आने वाली तेल की सप्लाई रुक जायेगी। अमरीकी घेराबंदी से पश्चिम एशिया, अफ्रीका और यूरोप के साथ उसके व्यापार के रास्ते भी बंद हो जायेंगे।

म्यानमार में बंगाल की खाड़ी में बंदरगाह तथा पाकिस्तान में अरब सागर में ग्वादर बंदरगाह का निर्माण करके, इन बंदरगाहों को भू-मार्ग से चीन के साथ जोड़ना - यह संभावित अमरीकी घेराबंदी का मुकाबला करने के लिए चीन की योजना है। इस मामले में, ग्वादर बंदरगाह का सबसे ज्यादा रणनैतिक महत्व है, क्योंकि वह पश्चिम एशिया से तेल को पाकिस्तान के अन्दर से गुजरने वाली पाइपलाइनों के ज़रिये चीन को पहुंचाएगा। चीन के शिनजियांग को अरब सागर पर ग्वादर बंदरगाह के साथ जोड़ने वाले चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का निर्माण चीन के लिए बहुत रणनैतिक महत्व रखता है।

बेल्ट एंड रोड शिखर सम्मलेन का हिन्दोस्तान द्वारा बहिष्कार

हिन्दोस्तान की सरकार ने, चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का विरोध करते हुए, बेल्ट एंड रोड शिखर सम्मलेन का बहिष्कार किया। “संयोजकता की परियोजनाओं को संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का आदर करते हुए आगे बढ़ाना चाहिए”, ऐसा हिन्दोस्तान की सरकार के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा। उनका इशारा गलियारे के उस हिस्से की ओर था, जो पाकिस्तान द्वारा आज़ाद कश्मीर कहलाये जाने वाले इलाके से गुजरता है, जिस पर हिन्दोस्तानी राज्य भी दावा करता है और जिसे वह हिन्दोस्तान का हिस्सा बताता है। परन्तु यह जानी-मानी बात है कि आज से 50 वर्ष पहले भी, चीन को पाकिस्तान के साथ जोड़ने वाला, उसी इलाके से गुजरता हुआ एक भू-मार्ग रहा है। बीते कई दशकों से चीन के साथ व्यापार और अन्य संबंध बनाए रखने में, हिन्दोस्तान को इससे कोई रुकावट नहीं महसूस हुयी है। हिन्दोस्तानी शासक वर्ग के अन्दर यह वाद-विवाद चल रहा है कि क्या, इस या किसी अन्य कारण से बेल्ट एंड रोड शिखर सम्मलेन का बहिष्कार करना उचित था या नहीं।

वर्तमान संकट की हालतों में, हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदार यह मानते हैं कि वे अमरीका की एशिया धुर्री नीति के साथ नजदीकी से जुड़कर, एक विश्व स्तरीय साम्राज्यवादी ताक़त बनने के अपने मंसूबों को पूरा कर सकते हैं। अमरीकी साम्राज्यवाद अपने प्रभुत्व के तले एक ध्रुवीय दुनिया स्थापित करने के अपने सपनों को पूरा करने के लिए, एशिया पर कब्ज़ा करना चाहता है। अपने इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए, वह ऐतिहासिक दुश्मनियों का इस्तेमाल करके, एशिया के देशों को आपस में भिड़ाने की कोशिश कर रहा है। हिन्दोस्तान की साम्राज्यवादी आकांक्षाओं को बार-बार बढ़ावा देने के साथ-साथ, अमरीका हिन्दोस्तान को क्रमशः अपने साथ एक रणनैतिक सैनिक गठबंधन में जुड़ने के लिए आकर्षित कर रहा है, जिसका मकसद है चीन को घेरना। हिन्दोस्तानी शासक वर्ग अपनी साम्राज्यवादी आकांक्षाओं को पूरा करने की उम्मीद के साथ, अमरीका की रणनीति के साथ कदम मिला रहा है।

हिन्दोस्तानी शासक वर्ग पूरे दक्षिण एशिया को अपना प्रभाव क्षेत्र मानता है। वह अपने पड़ोसी देशों की आज़ादी और संप्रभुता का आदर नहीं करता है, बल्कि उनके अंदरूनी मामलों में बार-बार हस्तक्षेप करता रहता है। हमारे पड़ोसी देशों के शासक वर्ग दूसरे देशों, खास तौर पर चीन के साथ अपने रणनैतिक संबंध बना रहे हैं। हिन्दोस्तानी शासक वर्ग को यह पसंद नहीं है। नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीप में यही हो रहा है। हाल के शिखर सम्मलेन में इन सभी देशों ने बेल्ट एंड रोड पहल से संबंधित परियोजनाओं पर चीन के साथ समझौतों पर हस्ताक्षर किये।

हिन्दोस्तानी राज्य ने बेल्ट एंड रोड शिखर सम्मलेन का बहिष्कार किया, यह सोचकर कि ऐसा करके वह चीन की रणनीति में बाधा डाल सकेगा। परन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ। हिन्दोस्तानी राज्य ने यह उम्मीद नहीं की थी कि अमरीका और जापान (जिनके साथ मिलकर हिन्दोस्तान चीन को घेरने की रणनीति में हिस्सा ले रहा है) खुद बेल्ट एंड रोड सम्मलेन में उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजेंगे।

हिन्दोस्तान द्वारा बेल्ट एंड रोड सम्मलेन के बहिष्कार से, चीन और हिन्दोस्तान के बीच नयी-नयी दरारें खड़ी करने की अमरीका की रणनीति को ही फायदा हुआ है।

Tag:    शिखर सम्मलेन    बेल्ट एंड रोड    विश्व आर्थिक फोरम    Jun 1-15 2017    World/Geopolitics    Privatisation    Rights     2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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