लेनिन की अप्रैल थीसिस के बहुमूल्य सबक

Submitted by cgpiadmin on गुरु, 01/06/2017 - 12:31

कई वर्ष देश से बाहर निर्वासन में कार्य करते रहने के बाद 17 अप्रैल, 1917 (पुराने रूसी कैलेंडर के अनुसार 3 अप्रैल) को का‐ लेनिन रूस लौटे। अगले ही दिन लेनिन ने बोल्शेविक पार्टी के सदस्यों की एक सभा को संबोधित किया, जहां उन्होंने फरवरी क्रांति की जीत, जिसमें ज़ार का तख़्ता पलट हुआ था, के बाद क्रांति के अगले पड़ाव का विस्तार करते हुए 10 थीसिसें पेश कीं। बोल्शेविक पार्टी को इस अप्रैल थीसिस के अपनाने के सात महीने बाद हुई अक्तूबर क्रांति की जीत के लिए आत्मगत हालातें तैयार करने में बहुत मजबूती मिली। आगे चलकर यह अप्रैल थीसिस पार्टी के अखबार प्राव्दा में “वर्तमान क्रांति में सर्वहारा वर्ग के कार्यभार” के नाम से लेख के रूप में प्रकाशित की गयी।

Lenins giving April Theses

लेनिन ने 17 अप्रैल, 1917 को, निर्वासन से वापस आने के एक दिन बाद, पेत्रोग्राद में तौरिड महल में हुई बोल्शेविक पार्टी की सभा में इस थीसिस को पेश किया

रूसी क्रांति के शताब्दी वर्ष के अवसर पर मज़दूर एकता लहर में छपने वाले लेखों की श्रृंखला का यह दूसरा लेख है। इसके पहले लेख में 1917 की फरवरी क्रांति का विश्लेषण पेश किया गया था, जिस क्रांति के द्वारा रूस में सदियों से बरकरार ज़ार की सत्ता का तख़्ता पलट हुआ था। फरवरी क्रांति से रूस में एक अजीब सी स्थिति पैदा हो गयी, जिसे दोहरी सत्ता कहते हैं। एक ओर थी रूसी पूंजीपति वर्ग के द्वारा बनायी गयी अस्थायी सरकार, तो दूसरी ओर खड़ी थीं मज़दूरों और सैनिकों की सोवियतें, जो कि बहुसंख्यक मेहनतकश जनसमुदाय की प्रतिनिधि थीं। 

अप्रैल थीसिस मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय स्थिति के अन्दर रूस की ठोस वस्तुगत हालात के ठोस विश्लेषण से उभर कर आई थी। 

ज़ार का तख़्ता पलट करने के तुरंत बाद रूसी मज़दूर वर्ग और लोगों के सामने तीन मुख्य सवाल उभरकर आये।

1) प्रथम विश्व युद्ध से रूस को कैसे निकाला जाये जो युद्ध बड़ी साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच दुनिया के पुनः बंटवारे के लिए किया जा रहा था;

2) भूमिहीन और गरीब किसानों के बीच जोते जाने के काबिल ज़मीन का बंटवारा कैसे किया जाये, जिसमें से अधिकांश ज़मीन सामंती जमींदारों के कब्जे़ में थी; और  

3) जब खाद्यानों की जबरदस्त कमी है और अकाल का खतरा है, ऐसे हालात में सभी के लिए अनाज किस तरह से मुहैया कराया जाये;

इन तीनों मुख्य सवालों को बोल्शेविक पार्टी ने अमली तौर पर इस तरह के क्रांतिकारी नारों का रूप दिया: ज़मीन, शांति और रोटी! 

वर्तमान क्रांति में सर्वहारा वर्ग के कार्यभार (अप्रैल थीसिस - कुछ अंश)

वी.आई. लेनिन

1) युद्ध के प्रति हमारे रुख़ में, जो कि ल्वोव और उसकी मंडली की नयी (अस्थायी) सरकार के पूंजीवादी चरित्र के चलते, रूस की ओर से निर्विवाद रूप से एक लुटेरा साम्राज्यवादी युद्ध बना हुआ है, “क्रांतिकारी रक्षावाद” को रत्तीभर भी रियायत की अनुमति नहीं दी जा सकती।

वर्ग-सचेत सर्वहारा वर्ग क्रांतिकारी युद्ध को, जो क्रांतिकारी रक्षावाद को सचमुच न्यायसंगत ठहरायेगा, केवल इन शर्तों पर अपनी सहमति दे सकता है: (क) सत्ता सर्वहारा वर्ग तथा उससे जुड़े किसानों के सबसे गरीब हिस्सों के हाथों में पहुंचे; (ख) कब्जे़ में लिये तमाम राज्यों को, कथनी में नहीं, बल्कि करनी में मुक्त कर दिया जाए; (ग) पूंजीपतियों के समस्त हितों से वास्तव में पूर्ण संबंध-विच्छेद किया जाये।

क्रांतिकारी रक्षावाद में विश्वास रखने वाली जन-प्रतिनिधियों की व्यापक श्रेणियों की, जो युद्ध को कब्ज़ों का साधन नहीं, बल्कि केवल एक आवश्यकता मानते हैं, असंदिग्ध ईमानदारी को देखते हुए, उनके साथ बुर्जुआ वर्ग की धोखाधड़ी को देखते हुए, यह ज़रूरी है कि विशेष रूप से, विस्तारपूर्वक, लगातार और धैर्यपूर्वक उन्हें उनकी गलती समझायी जाये, साम्राज्यवादी युद्ध के साथ पूंजी का अटूट संबंध समझाया जाये और यह साबित किया जाये कि पूंजी का तख्ता उलटे बिना सच्ची जनवादी शांति द्वारा, (हिंसा से न थोपी जाने वाली शांति द्वारा) युद्ध का अंत नहीं किया जा सकता!

इस विचार का सर्वाधिक व्यापक अभियान युद्धरत सेना के बीच सीमा पर किया जाना चाहिए।

भाईचारापन

2) रूस में मौजूदा समय की खासियत यह है कि देश क्रांति की पहली मंजिल से जिसने, सर्वहारा वर्ग की अपर्याप्त वर्ग चेतना तथा उसके अपर्याप्त संगठन के कारण, सत्ता बुर्जुआ वर्ग को सौंप दी थी, अब वह दूसरी मंजिल में संक्रमण कर रहा है, जिसे सत्ता सर्वहारा वर्ग तथा किसानों की सबसे गरीब श्रेणियों के हाथों में सौपनी होगी।

इस संक्रमण का विशेष गुण है -  एक ओर, अधिकतम वैध रूप से माने गए अधिकार (रूस इस समय विश्व के समस्त युद्धरत देशों में सबसे अधिक स्वतंत्र देश है), दूसरी ओर, जन साधारण पर कम अत्याचार और हिंसा और अंततः पूंजीपतियों की शांति तथा समाजवाद के सबसे निकृष्ट शत्रुओं की सरकार में उनका विवेकहीन विश्वास।

यह खासियत हमसे यह अपेक्षा करती है कि हम सर्वहारा वर्ग के इस अभूतपूर्व व्यापक समुदायों के बीच, जिनमें राजनीतिक जीवन की जागृति अभी-अभी हुई है, पार्टी कार्य की विशेष अवस्थाओं के अनुकूल अपने को ढालें।

3) अस्थायी सरकार को कोई समर्थन नहीं, उसके तमाम वचनों की विशेष रूप से कब्जे़ में लिये गये राज्यों को मुक्त करने से संबंधित वचनों की, पूर्ण असत्यता स्पष्ट की जाये। ऐसी भ्रम पैदा करनेवाली “मांग” कि यह सरकार, पूंजीपतियों की सरकार, साम्राज्यवादी सरकार न रहेगी, इसकी इजाज़त नहीं दी जा सकती, इसके बजाय उसका पर्दाफाश करना होगा।

4) इस तथ्य को स्वीकार करना कि अधिकांश मज़दूर प्रतिनिधि सोवियतों में हमारी पार्टी अल्पसंख्या में है, अब तक कमजोर अल्पसंख्या में है, जबकि बुर्जुआ वर्ग के प्रभाव में आनेवाले तथा उस प्रभाव को सर्वहारा वर्ग में फैलाने वाले सारे टुटपूंजिया अवसरवादी तत्वों के पापुलर सोशलिस्ट, सोशलिस्ट रेवोल्यूशनरीज़ से लेकर संगठक समिति (छेइद्जे, सेरेतेली, आदि), स्तेक्लोव, आदि, आदि तत्वों तक के गुट बहुसंख्या में हैं और मजबूत हैं।

जन साधारण को यह स्पष्ट किया जाये कि मज़दूर प्रतिनिधि सोवियतें क्रांतिकारी सरकार का एकमात्र संभव रूप हैं, इसलिए जब तक यह सरकार बुर्जुआ वर्ग के प्रभाव में रहती है, हमारा कार्यभार, जन साधारण की कार्यनीति की ग़लतियों का धैर्यपूर्वक, क्रमबद्ध ढंग से, आग्रहपूर्वक इस तरह स्पष्टीकरण करना है, जो उनकी व्यवहारिक आवश्यकताओं के अनुकूल विशेष रूप से ढाला गया हो।

जब तक हम अल्पसंख्या में हैं, हम ग़लतियों की आलोचना तथा उनका पर्दाफाश करने का काम करते रहेंगे, साथ ही पूरी राज्य-सत्ता मज़दूर प्रतिनिधि सोवियतों को स्थानांतरित करने की आवश्यकता का प्रचार करते रहेंगे ताकि जनता अनुभव से अपनी ग़लतियों को ठीक कर सके।

5) संसदीय जनतंत्र नहीं - मज़दूर प्रतिनिधि सोवियतों से संसदीय जनतंत्र की ओर लौटना पीछे की ओर कदम होगा - लेकिन पूरे देश में, नीचे से ऊपर तक मज़दूर, खेत-मज़दूर, किसान प्रतिनिधि सोवियतों का जनतंत्र।

 पुलिस, सेना तथा नौकरशाही का खात्मा।1

सारे अफसरों का, जिनमें से सबके सब निर्वाचित हों तथा किसी भी समय हटाये जा सकें, वेतन किसी अच्छे मज़दूर के औसत वेतन से ज्यादा न हो।

6) कृषि कार्यक्रम में अधिक जोर खेत-मज़दूर प्रतिनिधि सोवियतें बनाने पर हो।

ज़मींदारों की सारी भूमि की जप्ति।

देश में सारी ज़मीन का राष्ट्रीयकरण, ज़मीन का खेत-मज़दूरों और किसानों के प्रतिनिधियों की स्थानीय सोवियतों द्वारा बंटवारा।

गरीब किसानों के प्रतिनिधियों की सोवियतों का अलग से गठन। बड़ी जागीरों में प्रत्येक पर खेत-मज़दूर प्रतिनिधियों की सोवियतों के नियंत्रण में तथा सामाजिक खर्चे पर एक मॉडल फॉर्म का गठन (इसका आकार 100 से लेकर 300 देस्यातीना तक हो, और स्थानीय तथा अन्य अवस्थाओं और स्थानीय निकायों के निर्णयों के अनुसार किया जाये)

7) देश के तमाम बैंकों को एक राष्ट्रीय बैंक में तत्काल मिलाया जाना तथा उस पर मज़दूर प्रतिनिधि सोवियतों का नियंत्रण किया जाना।

8) हमारा तात्कालिक कार्यभार समाजवाद “आरंभ करना” नहीं है, बल्कि सामाजिक उत्पादन तथा उत्पादों के वितरण को फौरन मज़दूर प्रतिनिधि सोवियतों के नियंत्रण में लाना है।

9) पार्टी के कार्यभार

(क) पार्टी कांग्रेस तुरंत बुलाया जाना;

(ख) पार्टी कार्यक्रम में परिवर्तन, मुख्यतः

(1) साम्राज्यवाद तथा साम्राज्यवादी युद्ध के बारे में,

(2) राज्य के प्रति हमारे रुख़ और “कम्यून-राज्य”2 की हमारी मांग के बारे में;

(3) पुराने पड़ चुके हमारे न्यूनतम कार्यक्रम का संशोधन;

(ग) पार्टी के नाम में परिवर्तन।3

10) इंटरनेशनल का नवीकरण।

हमें क्रांतिकारी इंटरनेशनल के सामाजिक-अंधराष्ट्रवादियों तथा ”केन्द्र“ के विरुद्ध इंटरनेशनल के निर्माण में पहल करनी चाहिये।

टिप्पणियां

1. यानी स्थायी सेना के स्थान पर पूरी जनता की हथियारबंदी

2. यानी ऐसा राज्य, जिसका आदि रूप पेरिस कम्यून था

3. “सामाजिक-जनवादी पार्टी” के बजाय, जिसके अधिकारिक नेताओं ने संसार भर में समाजवाद के साथ गद्दारी की तथा भागकर बुर्जुआ वर्ग (“रक्षावादी” तथा ढुलमुल “काउत्स्कीवादी”) की ओर चले गए, हमें अपने को कम्युनिस्ट पार्टी चाहिए। 

आम लोगों के बीच बड़े पैमाने पर यह उम्मीद थी कि अस्थायी सरकार इन ज्वलंत सवालों का हल निकालेगी। अस्थायी सरकार जंग को जारी रखकर अपने साम्राज्यवादी मंसूबों और हितों को छुपा रही थी और यह दिखावा कर रही थी कि वह तो केवल रूस को अन्य साम्राज्यवादी शक्तियों से बचाना चाहती है। सोवियतों के भीतर चुने गए बहुसंख्यक प्रतिनिधि इस भ्रम से ग्रसित थे कि अस्थायी सरकार किसी तरह से असूलों पर आधारित शांति कायम कर पायेगी।

ज़ार का तख्ता पलट करने के बाद के महीनों में उभरे वस्तुगत और आत्मगत हालातों के विश्लेषण का सार पेश करते हुए, लेनिन ने अपनी थीसिस में लिखा कि “मज़दूर वर्ग में अपर्याप्त वर्ग-चेतना और संगठन के चलते” फरवरी क्रांति ने सत्ता सरमायदार वर्ग के हाथों में सौंप दी है। क्रांति के लक्ष्य को हासिल करने के लिए - जिसमें ज़मीन, शांति और रोटी शामिल है - सत्ता को मज़दूर वर्ग और जनसमुदाय के तमाम मेहनतकश और उत्पीड़ित तबकों के हाथों में लाना होगा।

इस ठोस विश्लेषण के आधार पर लेनिन ने बोल्शेविक पार्टी के लिए मुख्य कार्यभार की पहचान इस तरह से की - अस्थायी सरकार का पर्दाफाश करना और सत्ता को श्रमजीवियों के हाथों में लाने के लिए तैयारी करना।

बोल्शेविक पार्टी मेहनतकश जनसमुदाय के अविष्कार और उनके द्वारा 1905 की क्रांति के दौरान पैदा किये गए संगठन - मज़दूरों के प्रतिनिधियों की सोवियतों को पोषित किया और उनको और विकासित किया। ये सोवियत मज़दूरों, सैनिकों और किसानों के हाथों में ऐसे औजार और तंत्र बनकर उभरे, जिनके द्वारा वे सामूहिक फैसले लेने और अपना सांझा एजेंडा बनाने की प्रक्रिया में सक्रियता से हिस्सा लेने लगे।

अप्रैल थीसिस ने नए राज्य के सार और उसकी रूपरेखा दोनों पर ही रोशनी डाली, जिसकी स्थापना ज़ार की सत्ता को गिराकर करनी ज़रूरी थी। इसका वर्गीय सार यह था कि यह राज्य श्रमजीवियों की हुक्मशाही होगी न कि सरमायदारों की हुक्मशाही। रूपरेखा के मामले में यह संसदीय जनतंत्र नहीं, बल्कि सोवियतों का जनतंत्र होगा।   

अप्रैल थीसिस ने संसदीय व्यवस्था के चरित्र के बारे में बताया कि यह व्यवस्था सोवियत व्यवस्था की तुलना में प्रतिगामी और पिछड़ी है। सोवियत व्यवस्था में सत्ता धरातल से ऊपर की ओर जाती है, जहां मज़दूरों और किसानों के जनसमुदाय फैसले लेने में सक्रिय भूमिका अदा करते हैं। लेनिन ने अपने इस निष्कर्ष को नारे के रूप में पेश किया: “सारी सत्ता सोवियतों के पास!”

अप्रैल थीसिस ने इस नीति पर जोर दिया कि अस्थायी सरकार को कोई भी समर्थन न दिया जाये और लगातार इस बात का पर्दाफाश करते रहें कि उसकी कथनी और करनी के बीच कितना अंतर्विरोध है। लेनिन ने उस वक्त पूंजीपतियों की सरकार का तुरंत तख़्तापलट करने का बुलावा देने वाला नारा नहीं दिया, क्योंकि अभी भी सोवियतों के बीच इस सरकार के बारे में बड़े पैमाने पर भ्रम फैला हुआ था कि यह सरकार साम्राज्यवादी जंग के खिलाफ़ है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बोल्शेविक पार्टी रूसी पूंजीपति वर्ग के साम्राज्यवादी मंसूबों के बारे में मज़दूर वर्ग की चेतना को ऊपर उठाने के लिए, उनकी राजनीतिक शिक्षा और उनको समझाने का कार्य लगातार चलाती रहे। इस तरह से इस थीसिस में आम दिशा के साथ राजनीति के व्यावहारिक प्रश्नों को उठाया गया, जिसमें मौजूदा स्थिति में बोल्शेविक पार्टी के सदस्यों के कार्य भी शामिल थे।

बोल्शेविक पार्टी के सदस्य बिना थके सोवियतों और खास तौर से जनसमुदाय के तमाम तबकों के बीच पूंजीपतियों की सरकार द्वारा लोगों की शांति, ज़मीन और रोटी की मांग को पूरा करने की असमर्थता का लगातार पर्दाफाश करते रहे। जैसे-जैसे अस्थायी सरकार अपने वादों से गद्दारी करती रही, क्रांतिकारी जनसमुदाय बोल्शेविक पार्टी और उसके क्रांतिकारी कार्यक्रम की ओर आकर्षित होने लगे।

अप्रैल थीसिस ने बोल्शेविक पार्टी की व्यवहारिक राजनीति को पनपने के लिए ज़रूरी सैद्धांतिक आधार और दिशा देने का काम किया। सितंबर की शुरुआत तक, देश के सभी मुख्य औद्योगिक शहरों में मज़दूर प्रतिनिधियों की सोवियतें, बोल्शेविक पार्टी के सदस्यों को अपना प्रतिनिधि चुन चुकी थीं। “सारी सत्ता सोवियतों के हाथ” यह नारा पूरे रूस में गूंज रहा था। इसके एक महीने बाद सोवियतों ने अस्थायी सरकार का तख़्ता पलट दिया और राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में ले ली। सोवियत गणराज्य की स्थापना की गयी, जो कि आज तक के समाज के सबसे शोषित और दबे-कुचले तबकों के साथ गठबंधन में श्रमजीवी वर्ग की हुकूमशाही थी।

बहुमूल्य सबक

अप्रैल थीसिस में किया गया विश्लेषण श्रमजीवी वर्ग, आधुनिक वेतन-भोगी मज़दूर और उसकी हिरावल पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी के लक्ष्य और नज़रिये पर आधारित है। इसका लक्ष्य है पूंजीवादी शोषण से श्रमजीवी वर्ग की मुक्ति और वर्ग पर आधारित भेदभाव से पूरे मानव समाज की मुक्ति। श्रमजीवी वर्ग का नज़रिया मुक्ति के इस लक्ष्य से निर्धारित होता है और इसकी जड़ें हमेशा वर्तमान परिस्थिति में होती हैं।

किसी भी वक्त ऐसे कौन से अंतर्विरोध और समस्याएं हैं, जिन्हें हल करना ज़रूरी है ताकि मज़दूर वर्ग समाजवाद और कम्युनिज़्म के अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहे? कम्युनिस्ट पार्टी के सामने हमेशा यह सवाल होता है, जिसे हल करना उसके लिये ज़रूरी होता है। इसे ही लेनिन ने ठोस परिस्थितियों का ठोस विश्लेषण और क्रांतिकारी अभ्यास को रास्ता दिखाने के लिए क्रांतिकारी सिद्धांत का विकास करना बताया है।

अप्रैल थीसिस ने मौजूदा परिस्थितियों का विश्लेषण किया और बोल्शेविक पार्टी के क्रांतिकारी अभ्यास को रास्ता दिखाया। इसके फलस्वरूप राजनीतिक सत्ता पर श्रमजीवी और उसके साथी वर्गों का कब्ज़ा हो पाया।

बस्तीवादी हुकूमत से हिन्दोस्तान की आज़ादी के 70वें वर्ष में मौजूद ठोस परिस्थितियों के ठोस विश्लेषण से हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि जब तक हिन्दोस्तानी संघ का संसदीय गणराज्य बरकरार है, जहां पूंजीवादी इज़ारेदार घराने अपनी परस्पर विरोधी पार्टियों के ज़रिये, जो बारी-बारी से एक दूसरे की जगह लेती रहती हैं, अपनी मनमर्जी लोगों पर थोपते रहेंगे, तब तक हिन्दोस्तान की किसी भी ज्वलंत समस्या का हल नहीं हो सकता।

जब तक पूंजी का शासन बरकरार है तब तक न तो मज़दूर वर्ग को सभी अधिकारों की गारंटी के साथ सुरक्षित रोज़गार मिल सकता है और न ही अपनी ज़मीन जोतने वाले किसानों को सुरक्षित आजीविका मिल सकती है। इसके अलावा मौजूदा व्यवस्था में सभी ज्वलंत सवाल और अधिक गंभीर होते जा रहे हैं जिनमें शामिल हैं साम्राज्यवादी दबदबा और लूट, राष्ट्रीय दमन, जाति पर आधारित भेदभाव, महिलाओं का उत्पीड़न, सांप्रदायिक हिंसा, अन्य व्यक्तिगत और राजकीय आतंकवाद। अमरीकी और यूरोपीय साम्राज्यवादियों के मंसूबों के अनुकूल हिन्दोस्तान का अंतर-साम्राज्यवादी जंग में घसीटे जाने और खुद हिन्दोस्तान के बंटवारे का खतरा और अधिक बढ़ जाएगा।

अगस्त 1947 में सांप्रदायिक बंटवारे और खुफ़िया सौदेबाजी के द्वारा किये गए सत्ता के हस्तांतरण से हिन्दोस्तानी उपमहाद्वीप में बस्तीवाद-विरोधी संघर्ष को बर्बाद कर दिया गया। सांप्रदायिक खून-खराबे और जबरदस्ती से किये गए लोगों के निर्वासन के बीच उपमहाद्वीप में सत्ता बर्तानवी साम्राज्यवादियों के हाथों से हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के पूंजीपतियों और जमींदारों के हाथों में चली गयी। बर्तानवी बस्तीवादियों की देखरेख में बनायी गयी एक सांप्रदायिक सभा ने 1950 में हिन्दोस्तान के संविधान को अपनाया, जो बर्तानवी व्यवस्था की रूपरेखा पर बनाये गए इस संसदीय गणराज्य का बुनियादी कानून बन गया।

हिन्दोस्तान के श्रमजीवी वर्ग और तमाम क्रांतिकारी जनसमुदाय के लिए यह सबसे ज़रूरी और फौरी कार्य है कि वे इज़ारेदार घरानों की अगुवाई में स्थापित की गयी पूंजीपति वर्ग की इस हुकूमत का अंत करें।

राजनीतिक सत्ता मज़दूर वर्ग और मेहनतकश किसानों के हाथों में लानी होगी जो हिन्दोस्तान की सारी दौलत पैदा करते हैं। तब जाकर अर्थव्यवस्था की दिशा को पूंजीवादी लालच को पूरा करने से बदलकर, इंसानों की ज़रूरत को पूरा करने की दिशा में ले जा सकते हैं। तब जाकर हमारा समाज दमन और गुलामी की तमाम परतों से पूरी तरह से मुक्त हो पाएगा।

मौजूदा संसदीय जनतंत्र और उसकी चुनावी प्रक्रिया के द्वारा राजनीतिक सत्ता कभी भी श्रमजीवी वर्ग और उसके साथी वर्गों के हाथों में नहीं आ पायेगी। मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों को अपनी सत्ता के वैकल्पिक साधन और संस्थाएं खुद विकसित करनी होंगी। उनको मौजूदा व्यवस्था से भी बेहतर जनतंत्र की व्यवस्था के लिए संघर्ष करना होगा, जहां उनके हाथों में फैसला लेने की ताक़त होगी और जहां उनको महज वोट डालने वाले भेड़-बकरी नहीं बना दिया जायेगा।

बोल्शेविक पार्टी के अनुभव से सीखने और उनको अमल में लाने का अर्थ है, हम उन तमाम नए संगठनों के रूपों को पोषित करें जिन्हें हमारे देश के क्रांतिकारी जनसमुदाय ने अपने संघर्ष के हथियार बतौर पैदा किया है।

हमें उन मज़दूर एकता समितियों को पोषित और विकसित करना होगा जो कई औद्योगिक क्षेत्रों में उभरकर आई हैं। ग्रामीण इलाकों में मज़दूर-किसान समितियों का निर्माण और मजबूत करने की ज़रूरत है। कई शहरी और ग्रामीण बस्तियों में, लोगों के राजनीतिक सशक्तिकरण के लिये उभरकर आई समितियों को पोषित करने और विकसित करने की ज़रूरत है। इन सभी संगठनों को एक नए राज्य के अंकुर बतौर विकसित करना होगा, जिसे मौजूदा राज्य को उखाड़ फेंककर स्थापित करने की ज़रूरत है।

हमें बड़े ही संयम और लगातार काम से इस संसदीय गणतंत्र और हिन्दोस्तानी पूंजीपति वर्ग की “कम बुरी” पार्टियों के बारे में फैलाये गये तमाम भ्रमों को चकनाचूर करना होगा, जो एक आक्रामक साम्राज्यवादी रास्ते पर चल रहा है। हमें इस राज्य की “धर्म-निरपेक्ष बुनियाद” की हिफ़ाज़त करने की गलत धारणा का भी पर्दाफाश करना होगा, जो राज्य हकीक़त में जड़ से ही सांप्रदायिक है।

मौजूदा हालात हम सभी कम्युनिस्टों को बुलावा दे रहे हैं कि हम एकजुट होकर मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों के एकजुट संघर्ष और सामूहिक फैसले लेने के लिए संगठन का निर्माण करने के व्यवहारिक राजनीतिक कार्य को उठायें।

आज हिन्दोस्तान को एक ऐसे इंक़लाब की ज़रूरत है, जो पूंजीवाद सहित सामंतवाद, बस्तीवाद और साम्राज्यवाद के सभी अवशेषों को मिटा दे। इस तरह के इंक़लाब की जीत सुनिश्चित करने के लिए, ज़रूरी आत्मगत परिस्थिति पैदा करने के लिए, हमें अपने क्रांतिकारी कार्य को दिशा देने के लिए, हिन्दोस्तानी क्रांतिकारी सिद्धांत की हिफाज़त करनी होगी और उसको विकसित करना होगा।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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