मध्य प्रदेश के आंदोलित किसानों पर किये जा रहे आतंक की निन्दा करें!

Submitted by cgpiadmin on शनि, 17/06/2017 - 02:30

अपने अधिकारों के लिए आंदोलन कर रहे किसानों पर,मध्य प्रदेश सरकार द्वारा किए जा रहे बर्बर आतंक की हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी भारी गुस्से से घोर निंदा करती है। मंदसौर में 6 जून को पुलिस और अर्ध-सैनिक बलों द्वारा आंदोलनकारी किसानों पर किये गए गोलीकांड में कम से कम 6 किसानों की मौत हो गयी और घायल हुए दर्ज़नों किसान मौत से लड़ रहे हैं।

किसानों के आंदोलन को कुचलने के लिए केंद्र सरकार ने 7 जून को मालवा क्षेत्र में अर्ध-सैनिक बलों की कई और टुकड़ियां तैनात की हैं। मंदसौर और आस-पास के इलाकों में कर्फ्य लगाया गया है। इंदौर, उज्जैन, रतलाम, देवास और मंदसौर जैसे कई और जिलों में इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं बंद कर दी गयी हैं। मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र का बड़ा हिस्सा युद्ध क्षेत्र जैसा बन गया है।

किसानों के आंदोलन पर राज्य द्वारा चलाये जा रहे दमन से किसान और लोग बहुत आक्रोशित हुए और उन्होंने 7 जून को पूरे मध्य प्रदेश को बंद कर दिया। सरकार द्वारा लगाये गए कर्फ्य को तोड़ते हुए इस इलाके के कई गांवों के किसान बढ़ती संख्या में जगह-जगह इकट्ठा होने लगे हैं और राज्य के आतंक के खिलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद करते हुए, महामार्गों और सड़कों को बंद कर रहे हैं।

मध्य प्रदेश के किसानों ने अपना 10 दिवसीय आंदोलन 1 जून से शुरू किया था। वे मांग कर रहे हैं कि राज्य सभी फसलों, खासतौर से दूध और सब्ज़ियों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करे। इसके अलावा राज्य यह सुनिश्चित करे कि निर्धारित मूल्य पर इन चीजों की खरीदी की जाये। वे यह भी मांग कर रहे हैं कि बैंक और अन्य संस्थानों से लिये गये उनके कमरतोड़ कर्ज़ों को भी माफ़ किया जाये। पिछले तीन वर्षों से लगातार सूखे और बेमौसम बरसात की वजह से मध्य प्रदेश के बहुत से किसान बर्बाद हो गए हैं। किसानों की ये मांगें पूरी तरह से जायज़ हैं।

मध्य प्रदेश के किसानों का संघर्ष देशभर के अन्य राज्यों, महाराष्ट्र, हरियाणा और राजस्थान के किसानों के संघर्षं का हिस्सा है जो कि जून की शुरुआत से बढ़ते पैमाने पर फूट पड़ा है। तमिलनाडु में भी इन्हीं मांगों को लेकर किसान जोरदार संघर्ष चला रहे हैं।

केंद्र सरकार और राज्य सरकारें किसानों की रोज़ी-रोटी के प्रति अपनी गहरी “चिंता” के बारे में बड़े-बड़े भाषण देने से नहीं थकतीं। यह सारी भाषणबाजी केवल इस सच्चाई को छुपाने के लिए की जाती है कि अर्थव्यवस्था की दिशा और सरकारों द्वारा अपनाई गई नीति देशभर में किसानों को सुनियोजित तरीके से बर्बादी की ओर धकेल रही है। देश के कई इलाकों में किसानों को अपनी पैदावार को सड़कों पर फेंकने के लिए, या फिर खेतों में सड़ने के लिए छोड़ देने पर मजबूर होना पड़ा, क्योंकि उनकी पैदावार को मंडियों तक पहुंचाने का खर्चा, उनको मिलने वाले दाम से भी अधिक था। केंद्र और राज्य सरकारों ने सब्ज़ियों की खरीदी की गारंटी देने से इंकार किया है। इसके अलावा उन फसलों और उत्पादों के लिए, जो मूल्य निर्धारित किया गया है वह मूल्य, बिल्कुल भी लाभकारी नहीं है। सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य के गिरने की वजह से इस साल अरहर दाल उत्पादक बर्बाद हुये हैं।

केंद्र सरकार और राज्य सरकारें पूरे कृषि उत्पादन और वितरण को बड़ी-बड़ी देशी और विदेशी कृषि व्यापार इज़ारेदार कंपनियों के वर्चस्व के अधीन लाने के रास्ते पर चल रही हैं। सब्ज़ी, फल, दालें, दूध, अनाज और अन्य कृषि उत्पादों के उत्पादक - किसानों के लिए सुरक्षित रोज़ी-रोटी सुनिश्चित करने की बजाय - केंद्र सरकार और राज्य सरकारें किसानों को बड़ी-बड़ी कृषि व्यापार इज़ारेदार कंपनियों के पैरों तले रौंदने का काम कर रही हैं। किसानों की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की ज़िम्मेदारी है, वह जिम्मेदारी को मानने से इंकार कर रही है।

मध्य प्रदेश के किसान और देश के अन्य इलाकों के किसान हर रोज़ अपनी बिगड़ती हालत को देखते हुए इस नतीजे पर पहुंच रहे हैं कि अपनी जायज़ मांगों को पूरा करवाने के लिए उन्हें खुद से संगठित होना होगा। वे यह समझ रहे हैं कि वे सरकार के झूठे वादों के सहारे नहीं जी सकते।

किसानों के एकजुट संघर्ष को कुचलने के लिए मध्य प्रदेश की सरकार ने किसानों के मुख्य संगठनों - भारतीय किसान यूनियन, राष्ट्रीय किसान मज़दूर संघ और अन्य किसान संगठनों के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। जिसके बाद सरकार ने ऐसा प्रचार शुरू कर दिया कि किसानों ने अपना आंदोलन वापस ले लिया है। यही दांवपेंच महाराष्ट्र सरकार ने भी अपनाये थे। लेकिन इन दोनों ही राज्यों में ये दांवपेंच किसानों के संघर्ष को दबाने में कामयाब नहीं हो पाये हैं। किसानों ने सरकार के इस बंटवारे के खेल को अच्छी तरह से समझ लिया है और उन्होंने अपना आंदोलन और भी तेज़ कर दिया है। आंदोलन को खत्म करने की सरकार की अपील को ठुकराते हुए, उन्होंने सरकार से कहा है कि पहले किसानों की जायज़ मांगों को पूरा किया जाये।

मध्य प्रदेश के किसानों के आंदोलन को सरकार द्वारा बर्बरता से कुचलना यह साफ दिखाता है कि हिन्दोस्तानी राज्य देशी और विदेशी बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों के हितों की सेवा करने के प्रति पूरी तरह से वचनबद्ध है, जो हिन्दोस्तान के कृषि क्षेत्र को बड़े से बड़े मुनाफे़ बनाने के लिए एक विशाल बाज़ार के रूप में देखते हैं। किसानों के लिए सुरक्षा और खुशहाली सुनिश्चित करना तो दूर, हिन्दोस्तानी राज्य जिस राह पर चल रहा है, वह रास्ता किसान आबादी को बड़े पैमाने पर बर्बाद करने का रास्ता है, अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे किसानों का आंदोलन पूरी तरह से जायज़ है।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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