राष्ट्रीय आपातकाल की 42वीं वर्षगांठ :

Submitted by cgpiadmin on शनि, 17/06/2017 - 03:30

लोकतंत्र के दिखावे के पीछे सबसे बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों की बर्बर तानाशाही है!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, 5 जून, 2017

25 जून को देश में “राष्ट्रीय आपातकाल” घोषित किये जाने की 42वीं वर्षगांठ है, जब राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अली अहमद ने संविधान की धारा 352 (1) के तहत यह घोषणा की थी। राष्ट्रपति ने यह घोषणा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर की थी और इसके लिए यह कारण दिया था कि सरकार के पास ऐसी सूचना है कि “देश की सुरक्षा को आंतरिक अशांति से खतरा हो सकता है”। यह “राष्ट्रीय आपातकाल” 20 महीने तक लागू रहा और उसके खत्म होने पर संसद के लिए चुनाव कराये गए।  

आपातकाल के दौरान सभी जनतांत्रिक अधिकारों और नागरिक आज़ादियों को पूरी तरह से बर्ख़ास्त कर दिया गया। प्रेस पर पाबन्दी लगायी गयी और सरकार, उसकी नीतियों और आपातकाल लगाए जाने के फैसले की आलोचना करने पर रोक लगा दी गयी। मज़दूरों, किसानों, नौजवानों और छात्रों द्वारा किए जाने वाले सभी प्रदर्शनों को गैर-कानूनी ठहराया गया। सभी तरह की हड़तालों को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया। कॉलेज परिसरों में छात्र संगठनों को दबा दिया गया। अपने अधिकारों के लिए लड़ने, जनतांत्रिक अधिकारों और नागरिक आज़ादी पर हमलों का विरोध करने वाले हजारों लोगों को फासीवादी कानून “मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (मीसा)” के तहत जेलों में बंद कर दिया गया। कम्युनिस्टों को हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा गिरफ्तार और प्रताड़ित करके उनका कत्ल किया गया। संसदीय विपक्ष के नेताओं को उनके घरों से उठाकर जेलों में बंद कर दिया गया। गुजरात और तमिलनाडु राज्य में विपक्षी पार्टियों द्वारा चलायी जा रही सरकारों को बर्ख़ास्त कर दिया गया। कुल मिलाकर, प्रतिरोध की आवाज़ को बर्बर तरीके से दबा दिया गया।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 20-सूत्रीय कार्यक्रम की घोषणा की गयी, जिसमें जमाखोरों और कालाधन वालों पर चाबुक चलाने, भूमि सुधार पर अमल करने और अन्य “गरीबों के हितों” में झूठे वादे किये गए। जोर-शोर से यह झूठ फैलाया गया कि आपातकाल को मेहनतकश जनसमुदाय के हित में लगाया गया है, जो इसका विरोध करता है वह “देशद्रोही” है। इस प्रचार की आड़ में मज़दूर वर्ग और मेहनतकश जनसमुदाय पर फासीवादी हमले किये गए। रेल के मज़दूरों, जिन्होंने 1974 की ऐतिहासिक रेलवे की हड़ताल में मुख्य भूमिका निभाई थी, उन पर यह आरोप लगाया गया कि वे देश में आतंरिक गड़बड़ी फैलाने का षड्यंत्र रच रहे हैं, इसलिए उन्हें जेलों में बंद कर दिया गया। सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर गांवों और शहरों में लोगों को जबरदस्ती नसबंदी कराने के लिए उनपर बर्बर अभियान चलाया गया। शहरों और गांवों में गरीब लोगों को घरों, गलियों और मोहल्लों से उठाया गया और नसबंदी शिविरों में ले जाकर जबरदस्ती उनकी नसबंदी कर दी गयी। शहरों को खूबसूरत बनाने के नाम पर झुग्गी-बस्तियां उजाड़ दी गयीं और इनमें रहने वालों को बेघर कर दिया गया।

कुल मिलाकर, “आतंरिक अशांति के चलते देश की सुरक्षा को निकट भविष्य में होने वाले खतरों” से लड़ने के नारे तले, श्रमजीवी लोगों के अधिकारों और आज़ादियों पर बड़ा हमला किया गया।

25 जून, 1975 की मध्य रात्रि से कुछ ही समय पहले, घोषित “राष्ट्रीय आपातकाल” ने एक ही झटके में यह दिखा दिया कि हिन्दोस्तानी लोकतंत्र कुछ और नहीं बल्कि मेहनतकश जनसमुदाय पर बड़े सरमायदारों की बर्बर फासीवादी तानाशाही को छुपाने के लिए एक मुखौटा मात्र है। इस फैसले को लेने में न तो संसद और यहां तक कि पूरा मंत्रिमंडल भी शामिल नहीं था। उन्होंने केवल बाद में इस फैसले पर अपनी मोहर लगा दी। इससे दो चीजें संपूर्ण रूप से नग्न होकर सामने आईं - एक, इस राजनीतिक सत्ता की बेहिसाब मनमानी और दूसरी, हिन्दोस्तानी गणतंत्र के इस तथाकथित लोकतांत्रिक संविधान में राजनीतिक सत्ता असली मायने में किसके हाथ में है।

“राष्ट्रीय आपातकाल” की घोषणा हिन्दोस्तान के मज़दूरों, किसानों और क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों के खिलाफ़, हिन्दोस्तानी राज्य का नियंत्रण करने वाले सबसे बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों द्वारा जंग का ऐलान था। इसके अलावा यह शोषण करने वाले वर्गों के भीतर विरोधी गुटों को भी एक चेतावनी थी कि यदि उन्होंने नेतृत्व के लिए इज़ारेदार घरानों को चुनौती देने की हिमाकत की, तो उनको भी कुचल दिया जायेगा।

सरमायदारों के विचारक यह बताने की कोशिश करते हैं कि उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने “राष्ट्रीय आपातकाल” की घोषणा अपनी कुर्सी को बचाने के लिए की थी। ये विचारक ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वे इस बात को छुपाना चाहते हैं कि हमारे देश के सबसे बड़े इज़ारेदार पूंजीपति हिन्दोस्तानी राज्य को नियंत्रित करते हैं और जो पार्टी सरकार बनाती है उसे इन बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों के अजेंडे को ही लागू करना पड़ता है। वे जानबूझकर इस सच्चाई को छुपाते हैं कि “राष्ट्रीय आपातकाल” की घोषणा इन्हीं बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों की हुकूमत को स्थिर करने और उसकी हिफ़ाज़त करने के लिए की गयी थी।

 “राष्ट्रीय आपातकाल” थोपे जाने की पृष्ठभूमि 

“राष्ट्रीय आपातकाल” की घोषणा किये जाने के पहले कुछ वर्षों की एक खासियत यह थी कि ये सब-तरफा संकट के वर्ष थे। देशभर में मज़दूर, किसान, नौजवान, छात्र, अपनी असहनीय हालतों के खिलाफ़ विद्रोह कर रहे थे और अपने अधिकारों की हिफ़ाज़त में ज़ोरदार संघर्षों में सड़कों पर उतर रहे थे। देश के कई इलाकों में गरीब और भूमिहीन किसानों का संघर्ष फूटकर आगे आ रहा था। इंदिरा गांधी का “गरीबी हटाओ” का नारा अब लोगों को बेवकूफ बनाने में कामयाब नहीं हो रहा था। 1974 की रेलवे की हड़ताल और छात्रों व नौजवानों द्वारा विशाल विरोध प्रदर्शन यह साफ दिखा रहे थे कि लोग अपनी दयनीय हालतों को अब बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं।

बड़े पूंजीपतियों और बड़े जमींदार हुक्मरान वर्ग के बीच आपसी टकराव और अधिक तीव्र हो रहे थे। बैंकों के राष्ट्रीयकरण और अधूरे भूमि सुधारों के द्वारा पूंजीवाद का प्रसार करने की बड़े पूंजीपतियों की योजना को ज़मीनों के मालिक वर्गों के विरोध का सामना करना पड़ रहा था। 1971 में एक संवैधानिक सुधार के ज़रिये प्रिवी पर्स की प्रथा को खत्म कर दिया गया। इस प्रिवी पर्स के तहत उन राजाओं को भुगतान किया जाता था, जिन्होंने अपने राज्य हिन्दोस्तानी संघ में शामिल किये थे। शोषकों के खेमे के भीतर बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों को अपना अनिर्बाधित दबदबा और नेतृत्व कायम करने में विरोध का सामना करना पड़ रहा था। 

इस दौरान हिन्दोस्तानी उप-महाद्वीप पर अमरीका और सोवियत संघ के बीच टकराव बढ़ रहा था। सोवियत संघ और हिन्दोस्तान के बीच परस्पर सुरक्षा संधि पर हस्ताक्षर किये जाने और 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ़ युद्ध, जिसमें बांग्लादेश का निर्माण हुआ, उसके बाद सोवियत सामाजिक साम्राज्यवादियों ने हिन्दोस्तानी राज्य के भीतर और इस इलाके में अपनी जगह मजबूत कर ली थी। ऐसी परिस्थिति में अमरीका ने मेहनतकश लोगों के असंतोष का इस्तेमाल करने की कोशिश की और हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्गों के बीच आपसी टकराव का इस्तेमाल हिन्दोस्तान में खुद का दबदबा जमाने के लिए किया। “संपूर्ण क्रांति” के झंडे तले विशाल प्रदर्शन आयोजित किये गए और इंदिरा गांधी की सरकार को उखाड़ फेंकने के मांग की गयी। इन प्रदर्शनों को अमरीकी साम्राज्यवाद का गुप्त समर्थन प्राप्त था।

सब-तरफा संकट को अपने हित में सुलझाने के लिए बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों ने देश पर “राष्ट्रीय आपातकाल” थोप दिया। जनसमुदाय के बीच क्रांति की चाह और शोषकों के खेमे में अपने विरोधियों को कुचलने के लिए बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों ने बर्बर आतंक चलाया।

“राष्ट्रीय आपातकाल” की घोषणा से मज़दूरों, किसानों, नौजवानों और छात्रों के बीच इस बात का खुलासा हो गया कि तथाकथित लोकतांत्रिक अधिकार और नागरिक आज़ादी, संविधान जिनकी गारंटी देने का दावा करता है, किसी भी वक्त छीने जा सकते हैं। लोगों के पास कोई अधिकार नहीं हैं। यह संविधान राष्ट्रपति की अगुवाई में कार्यपालिका को पूरा अधिकार देता है, जिससे वह लोगों को सभी अधिकारों से वंचित कर सकता है।

इस कड़़वी बात का पर्दाफाश हो गया कि “हम भारत के लोग” संप्रभु नहीं हैं। हमारे जीवन को प्रभावित करने वाले और हमारे देश के भविष्य का फैसला करने वाले मुख्य फैसलों को लेने का अधिकार लोगों को नहीं है। यह अधिकार कार्यपालिका में निहित है। पूरी राजनीतिक सत्ता प्रधानमंत्री के हाथों में होती है, जो कि मंत्रीमंडल का नेता होता है, और यह मंत्रीमंडल लोकसभा में बहुमत प्राप्त करने वाली पार्टी बनाती है। राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर फैसले लेता है और कार्यवाही करता है। 

जो भी सरकार से सवाल करता है, उसके खिलाफ़ राज्य का दमनकारी तंत्र इस्तेमाल करने की अनिर्बाधित ताक़त इस कार्यपालिका के पास होती है। वैसे तो कार्यपालिका यह दावा करती है कि वह अपनी शक्ति संसद से हासिल करती है, लेकिन वह संसद के प्रति जवाबदेह नहीं होती है। वह संसद को दर-किनार कर अध्यादेशों के ज़रिये कानून ला सकती है और बाद में इन कानूनों पर संसद की मोहर लगवा सकती है। संसद भी लोगों के प्रति जवाबदेह नहीं है।

लोगों की नज़रों के सामने लोकतंत्र का यह फरेब बेनकाब हो गया। एक की झटके में बहुपार्टी प्रतिनिधित्वादी लोकतंत्र का पर्दाफाश हो गया, जहां परस्पर विरोधी राजनीतिक पार्टियां आपस में लड़ती हैं और जो पार्टी सबसे अधिक सीटें हासिल करती है वह सरकार बनाती है और वह दावा करती है कि उसके पास “जनादेश” है। सच्चाई तो यह है कि राज्य पर अपने संपूर्ण नियंत्रण के चलते, सबसे बड़े इज़ारेदार पूंजीपति पूरे समाज पर अपनी तानाशाही चलाते हैं, और एक बेहद छोटा समूह उनके हित में राजनीतिक सत्ता को चलाता है। समय-समय पर चुनाव कराना और सरकार बनाना, यह सब जनसमुदाय पर चलायी जा रही तानाशाही को केवल वैधता देने के लिए किया जाता है।

उस वक्त कम्युनिस्ट आंदोलन के सामने एक मौका आया था, लोकतंत्र की इस व्यवस्था का लोगों के सामने पर्दाफाश करने का और एक विकल्प के इर्द-गिर्द लोगों को और मज़दूर वर्ग को एकजुट करके और संगठित करने का। मज़दूर वर्ग और मेहनतकश जनसमुदाय की संप्रभुता को अपने हाथों में लेने के लिए संगठित करने और उनको अगुवाई देने की चुनौती कम्युनिस्टों के सामने थी, जिससे सरमायदारों की बर्बर तानाशाही को खत्म किया जा सके और उसकी जगह पर मज़दूरों और किसानों की नयी राजनीतिक सत्ता की स्थापना की जा सके।

लोकतंत्र की पुनस्र्थापना” का फरेब

मार्च 1977 में “राष्ट्रीय आपातकाल” को हटा लिया गया। आम चुनाव कराये गए और कई गैर-कांग्रेसी पार्टियों के गठबंधन की नयी सरकार बनायी गयी। हुक्मरान वर्गों के प्रचारकों ने ऐलान कर दिया कि “लोकतंत्र की पुनस्र्थापना” कर दी गई है। “राष्ट्रीय आपातकाल” का हटाया जाना, यह दिखाता है कि अब बड़े इज़ारेदारों को यह आत्मविश्वास हो गया था कि वे सामान्य और जांचे-परखे बहुपार्टी प्रतिनिधित्वादी लोकतंत्र के तरीके से, जिसमें वक्त-वक्त पर चुनाव कराये जाते हैं, इस तरीके से शोषकों के बीच के आपस के टकरावों को सुलझा सकते हैं और साथ ही लोगों को मूर्ख भी बना सकते हैं।

“लोकतंत्र की पुनस्र्थापना” करना यह हमारे मज़दूरों, किसानों और व्यापक जनसमुदाय के साथ एक भयानक फरेब था। संविधान या राजनीतिक व्यवस्था में ऐसे कोई भी बदलाव नहीं किये गए, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि संप्रभुता लोगों के हाथों में आये। हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा लोगों को अधिकारों से वंचित करने और उनपर फासीवादी दमन थोपने की ताक़त, वैसी की वैसी बरकरार रही। कुल मिलाकर लोगों को संप्रभु बनाने और उनके अधिकारों की गारंटी देने के लिए निहायत ज़रूरी बदलावों को रोक दिया गया। लोग अपनी संप्रभुता से वंचित रह गए। हिन्दोस्तानी राज्य, लोगों पर सबसे बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों की बर्बर तानाशाही का तंत्र बना रहा।

कम्युनिस्ट आन्दोलन में बंटवारा और कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रमुख तबकों की भूमिका इसके लिए जिम्मेदार थी।

कम्युनिस्ट आन्दोलन के एक भाग ने लाइन दी कि हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग दो गुटों में बंटा हुआ है - एक है “प्रगतिशील गुट” जो सोवियत संघ से जुड़ा हुआ है, और दूसरा “प्रतिक्रियावादी गुट” जो अमरीका के साथ जुड़ा हुआ है। इंदिरा गांधी और उसकी कांग्रेस पार्टी को “प्रगतिशील गुट” बताया गया जो तथाकथित रूप से हिन्दोस्तान को “गैर-पूंजीवादी” रास्ते पर ले जा रही है। कम्युनिस्ट आन्दोलन के एक गुट ने अमरीका समर्थित “दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावाद” के साथ लड़ने के नाम पर “राष्ट्रीय आपातकाल” का समर्थन किया। कम्युनिस्ट आन्दोलन के दूसरे गुट ने “लोकतंत्र की पुनस्र्थापना” को लोगों की जीत बताकर उसका प्रचार किया। हुक्मरान वर्गों के संकट का इस्तेमाल करके श्रमजीवी लोकतंत्र को स्थापित करने के बजाय, मज़दूर वर्ग को सरमायदारों के परस्पर विरोधी अलग-अलग गुटों के पीछे लामबंद कर दिया गया।

“लोकतंत्र की पुनस्र्थापना” के बाद के 40 वर्षों का हमारे लोगों का अनुभव यह दिखाता है कि इस पूरे दौर में मेहनतकश और उत्पीड़ित लोगों के तमाम तबकों के अधिकारों का सुनियोजित तरीके से उल्लंघन होता रहा है। बड़े सरमायदारों ने उदारीकरण और निजीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण का मजदूर-विरोधी, किसान-विरोधी, समाज-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी कार्यक्रम शुरू किया। यह कार्यक्रम अमरीका, ब्रिटेन और अन्य साम्राज्यवादी देशों की लाइन के अनुकूल था। इस रास्ते का विरोध करने वाले मज़दूरों, किसानों और सभी उत्पीड़ित लोगों पर सुनियोजित तरीके से हमले करते हुए राजनीति का सांप्रदायिकीकरण किया गया और जो इस कार्यक्रम का विरोध करता है, उसे “देशद्रोही” और “देश की एकता और क्षेत्रीय अखंडता” का दुश्मन करार कर दिया जाता है। राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक कत्लेआम समेत राजकीय आतंकवाद, लोगों के अधिकारों के संघर्ष को कुचलने का पसंदीदा हथियार बन गया है।

सबक

“राष्ट्रीय आपातकाल” के खत्म होने के 40 वर्ष बाद, यह एकदम साफ है कि चुनाव द्वारा फरेब करना और बंदूक द्वारा शासन चलाना, इस तरीके को हिन्दोस्तान के हुक्मरान बड़े इज़ारेदार वर्ग ने पूरी तरह से विकसित कर लिया है, जिसका इस्तेमाल वह मज़दूर वर्ग और मेहनतकश जनसमुदाय को दबाये रखने के लिए करता है। शोषक वर्गों के बीच आपसी टकराव को सुलझाने और फासीवादी और आतंकवादी हुकूमत को जायज़ बनाने के लिए नियमित तौर से समय-समय पर चुनाव कराये जाते हैं। एक पार्टी की जगह पर दूसरी पार्टी आती है, लेकिन उसी अजेंडे को लागू करने के लिये, जिसे शासक वर्ग ने निर्धारित किया है। राजनीतिक व्यवस्था और राजनीतिक प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि मज़दूरों और किसानों का जनसमुदाय सत्ता से बाहर रहे। 

इस वक्त, हमारे देश के मज़दूर और तमाम मेहनतकश जनसमुदाय के खिलाफ़ बड़े सरमायदारों का सब-तरफा हमला चल रहा है। यह हमला एक ऐसी चुनी हुई सरकार कर रही है, जो यह दावा कर रही है कि लोगों और उनके अधिकारों पर हमला करने का उसे जनादेश हासिल है। साथ ही मज़दूर वर्ग, किसान, जनजातियों के लोग, महिला, नौजवान और छात्र अपना प्रतिरोधात्मक संघर्ष तेज़ कर रहे हैं।

इन हालातों में हुक्मरान वर्ग, पूंजीपतियों के बीच आपसी टकराव की लाइन के मुताबिक, मज़दूर वर्ग और मेहनतकश जनसमुदाय को बांटने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक अखाड़े में यह भाजपा और कांग्रेस के बीच टकराव के रूप में नज़र आता है। भाजपा लोगों को बड़े इज़ारेदारों के अजेंडे के पीछे लामबंध करने की कोशिश कर रही है और “राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय अखंडता” की हिफ़ाज़त का नारा दे रही है, जिसे “देशद्रोही ताक़तों” से कथित तौर पर खतरा है। कांग्रेस पार्टी भी लोगों को बड़े इज़ारेदारों के अजेंडे के पीछे लामबंध करने की कोशिश कर रही है और इसके लिए वह हिन्दोस्तानी राज्य की “धर्म निरपेक्ष बुनियाद” की हिफ़ाज़त का नारा दे रही है, जिसे तथाकथित रूप से भाजपा से खतरा है। मज़दूर वर्ग और मेहनतकश जनसमुदाय को कहा जा रहा है कि वह “कम बुरी” कांग्रेस के साथ एकजुट हो जाये, ताकि हिन्दोस्तानी संविधान को “दक्षिणपंथी सांप्रदायिक ताक़तों” से बचाया जा सके।

सरमायदारों के अजेंडे के पीछे मज़दूर वर्ग और लोगों को बांटने और लामबंध करने की हुक्मरान वर्ग की खतरनाक चाल का पर्दाफाश करना सभी कम्युनिस्टों का फर्ज़ है। हुक्मरान वर्ग की इस चाल के साथ समझौता करने का मतलब है, मज़दूर वर्ग और मेहनतकश जनसमुदाय के साथ गद्दारी करना। 

“राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा” और “सांप्रदायिक ताक़तों” के खिलाफ़ लड़ाई, ठीक इन दो नारों के तले ही हमारे लोगों के खिलाफ़ सबसे घिनावने गुनाह किये गए हैं। “राष्ट्रीय आपातकाल” के दौरान ऐसा ही हुआ था और उसके बाद में भी होता आया है।

राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा के 42 वर्ष और “लोकतंत्र की पुनस्र्थापना” के 40 वर्ष बाद और उसके बाद के वर्षों के अनुभव से हम कम्युनिस्टों को एक सबक लेना होगा कि हम इस हिन्दोस्तानी लोकतंत्र और जिस संविधान पर यह आधारित है उस के बारे में भ्रम न फैलायें। “कम बुरी” होने के नाम पर हुक्मरान वर्ग की एक या दूसरी पार्टी या गठबंधन के पीछे लोगों को लामबंध करने से उनके अधिकारों की हिफ़ाज़त नहीं हो सकती। 

हिन्दोस्तानी राज्य पर नियंत्रण रखने वाले सबसे बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों के हित में लोगों पर सांप्रदायिक और फासीवादी हमले तेज़ किये जा रहे हैं। इसलिए मज़दूर वर्ग और मेहनतकश जनसमुदाय के सामने कार्य यह नहीं कि वह सरमायदारों की एक पार्टी की जगह किसी और पार्टी या गठबंधन को सत्ता में बिठाये। बल्कि उनके सामने यह चुनौती है, कि मौजूदा राज्य को जो कि मेहनतकश लोगों पर बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों की हुकूमत का साधन है, उसे बदलकर उसकी जगह एक नए राज्य की स्थापना करना, जो कि मज़दूरों और किसानों की हुकूमत का साधन होगा। यह नया राज्य एक नए संविधान पर आधारित होगा जो लोगों के हाथों में संप्रभुता सौंप देगा और एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था और राजनीतिक प्रक्रिया कायम करेगा, जो यह सुनिश्चित करेगी कि संप्रभुता हक़ीक़त में लोगों के पास हो। यह नया राज्य अर्थव्यवस्था की दिशा बदल देगा, जिससे सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी। यह राज्य सभी के मानव अधिकारों, जनतांत्रिक अधिकारों और राष्ट्रीय अधिकारों की गारंटी देगा। आओ, हम सब मिलकर एक ऐसा नया राज्य स्थापित करने के लिए हालतें तैयार करें, जो हमारे लोगों के लिए प्रगति का रास्ता खोल देगा।

Tag:    राष्ट्रीय आपातकाल    42वीं वर्षगांठ    तानाशाही    Jun 16-30 2017    Statements    History    War & Peace     2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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