1857-19वीं सदी का सबसे महान युद्ध

Submitted by cgpiadmin on शनि, 17/06/2017 - 00:30

1857 का विशाल ग़दर पूर्व में दमदम से लेकर पश्चिम में रायगढ़, उत्तर में पेशावर और दक्षिण में तंजावुर तक हजारों वर्ग किलोमीटर में फैला था। 

यह विद्रोह 20 से अधिक शहरों में फैला था, जो उपनिवेशित हिन्दोस्तान में उत्पादन के प्रमुख केंद्र थे (नक्शा देखें)। इनमें शामिल शहर थे - रावलपिंडी, गुगेरा, पेशावर, मुल्तान, पटना, पूर्णिया, जलपाईगुड़ी, मुजफ्फराबाद, संबलपुर, दानापुर, सुगौली, छोटा नागपुर, बरेली, बनारस, जौनपुर, अयोध्या, फैजाबाद, चिंगलपेट, सेलम, भवानी, नरगुंड, मुधोल, सुरपुर, जामखंडी, सूपा, दांदेली, उल्वी, अंकोला, मुंदर्गी, तंजावुर, उत्तर आर्कोट, मालाबार, गोदावरी का तटवर्तीय इलाका, आदिलाबाद, वारंगल, कड्डप्पा, नेल्लोर, खानदेश (नाशिक-जलगांव-धुले), गुलबर्गा, धारवाण, रायचूर, उडुपी, मैंगलोर, रायगढ़ और कई अन्य।

London News, 3 October 1857
यह चित्र मई-जुलाई 1857 में सेना की गतिविधिायों को दर्शाता है जो उत्तर से दक्षिण में कम से कम 1500 किलोमीटर और पूर्व से पश्चिम तक 800 किलोमीटर लम्बा था।

देश के विभिन्न हिस्सों में विद्रोह के विस्तृत और बारीकी से आयोजन, योजना और क्रमबद्धता से संदेशों को भेजने के चतुर तरीके, उपनिवेशवादी इतिहासकारों द्वारा प्रचारित इस व्याख्या को गलत ठहराते हैं कि 1857 का ग़दर अफ़वाहों पर आधारित एक स्वतः स्फूर्त विद्रोह था। इन इतिहासकारों ने ग़दर को केवल सिपाहियों का चर्बी लगाये गये कारतूसों, जिनका इस्तेमाल उन्हें करना पड़ता था, इसके खिलाफ़ विद्रोह बताया और उसके महत्व को कम कर दिया।

यहां तक कि अवध के अधिग्रहण के बाद 1856 के शुरुआती दिनों में, लोगों को लड़ाई के लिए तैयार होने के लिए संचार के रूप में गांवों को रोटियां भेजे जाने की खबरें मिली थीं। सन्देशवाहक गांव के बाहर से रोटियों को लाकर गांव के मुखिया को इन निर्देशों के साथ देते थे कि - और रोटियां बनवाकर आगे के अधिक गांवों में भेज दी जाएं। इस तरह, रोटियां और उनके माध्यम से संदेश हजारों गांवों तक पहुंचते थे।

उसी प्रकार, 1856 के अंत में, लगभग सभी सैन्य स्टेशनों में जहां बंगाल सेना की तैनाती थी, लाल कमल के फूल दिखाई देने लगे। जब लाल कमल के फूल छावनियों पर पहुंचते थे तो सैनिक जोर से प्रचार करते थे कि “सब लाल हो जाएगा” और इससे वे युद्ध के लिए अपनी तैयारी को दर्शाते थे। प्रत्येक सिपाही, जो कमल से एक पत्ती को तोड़ता था वह अपनी प्रतिबद्धता का संकेत देता था। यह अनुमान लगाया गया है कि 50,000 हिन्दोस्तानी सैनिकों ने विद्रोह में भाग लिया और दो से तीन हजार कमल के फूल विभिन्न छावनियों में भेजे गए थे।

जबकि संचार के सामान्य तरीकों का बर्तानवी जासूस तुरंत पता लगा लेते थे, विद्रोहियों ने रोटी और कमल के वितरण के ज़रिये एक निपुण संचार रणनीति प्रदर्शित की। इस निपुण संचार रणनीति का प्रयोग बर्तानवी अधिकारियों की नाक के नीचे किया जाता था। जिसे बर्तानवी अधिकारी एक “अजीब देशी प्रथा” समझकर नजरंदाज़ कर देते थे।

इसके साथ ही, 1857 के ग़दर के नेताओं ने हिन्दोस्तान के आस-पास तैनात बर्तानवी सैनिकों की स्थिति तथा उनकी कमज़ोरियों का आंकलन करने के लिए और तुर्की व रूस में संभावित सहयोगियों की तलाश के लिए अपने दूतों को भी विदेशों में भेजा था। नाना साहब के दूत के रूप में लंदन में अजीमुल्ला खान की यात्रा एक ऐसी ही कोशिश थी।

ग़दर के दौरान हिन्दोस्तानी सैनिक गतिविधियों का विश्लेषण एक उच्च स्तर की योजना को दर्शाता है। शहरों का चयन और उसके साथ ही सैनिकों की आवाजाही एक चतुर सैन्य रणनीति का होना दिखाती है। युद्ध केवल उन गढ़ों में नहीं था, जहां सैनिकों की भारी तैनाती थी। ऐसी कई जगहें थीं जहां बंगाल सेना की पलटनें तैनात थीं। इन जगहों पर ग़दर के सैनिक, दुश्मन को हराकर और उनके हथियारों पर कब्ज़ा करके, अच्छी तरह से पहले से तय किए गए और विशिष्ट स्थानों पर मार्च करते हुए जाते थे। इस प्रकार युद्ध ने किसानों, कारीगरों, व्यापारियों और यहां तक कि जमींदार जैसे लोगों के विशाल वर्गों को अपने साथ मिला लिया, जो उपनिवेशवादी प्रशासन के कमरतोड़ करों से पीड़ित थे।

आमतौर पर सेना की गतिविधियों को छावनी सेवक की आवश्यकता होती है। 1850 के दशक के हिन्दोस्तान में प्रत्येक सैनिक के साथ तीन से पांच छावनी सेवक चलते थे। इसके अलावा सैनिकों के साथ हजारों घोड़े, ऊंट, हाथी, खच्चर और बैल चलते थे जिनको खिलाना-पिलाना पड़ता था। छावनी सेवक और जानवर बर्तनों और सैन्य उपकरणों के साथ-साथ राशन, कपड़े और चिकित्सा सामग्री का परिवहन करते थे।

इसलिए, इस पैमाने के युद्ध के लिए सैनिकों की गतिविधियों के प्रबंधन की सावधानीपूर्वक योजना और आपूर्ति लाइनों के आयोजन की आवश्यकता थी। इस युद्ध में 50,000 से अधिक हिन्दोस्तानी सैनिक लड़े। छावनी सेवकों और जानवरों के भोजन को गिने बिना भी सिर्फ एक महीने के लिए, उन्हें लगभग 1500 टन अनाज की ज़रूरत होती थी। इतने अनाज का प्रबंध करना सैनिकों के लिए असंभव था, क्योंकि वे उस सेना में विद्रोह का आयोजन कर रहे थे, जो दुनिया के सबसे बड़े और सबसे क्रूर साम्राज्य की सेना थी। 1857 के ग़दर के युद्ध के रणनीतिकारों ने इस समस्या को कैसे सुलझाया? अनाज कहां से आया और खाना किसने बनाया?

हिन्दोस्तानी गांवों में रोटियों और हिन्दोस्तानी सैनिकों के बीच लाल कमलों के विस्तृत और संयोजित वितरण ने एक सुव्यवस्थित सेना की गतिविधि को सुनिश्चित किया। जिसमें आपूर्ति और आपूर्ति के साथ निकटतम रेजिमेंट का समर्थन करने के लिए आने वाले हजारों गांव शामिल थे।

विद्रोही सैनिकों ने हमेशा एक संकेत के साथ अपनी लड़ाई शुरू की थी - कई स्थानों पर यह संकेत शाम को बंदूक की गोली चलाकर या बिगुल बजाकर दिया जाता था। सबसे पहले उन्होंने हथियारों और खजाने को जब्त कर लिया। इसके बाद उन्होंने सरकारी इमारतों - जेलों, टेलीग्राफ कार्यालयों, रिकॉर्ड कक्षों, बंगलों, इत्यादि को घेर लिया। उन्होंने उपनिवेशवादियों से जुड़ी सभी चीजों और व्यक्तियों को आक्रमण का निशाना बनाया। शहरों में रहने वाले हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों को हिंदी, उर्दू और फारसी में बुलावा दिया गया कि वे एकजुट हों और उठकर फिरंगियों का विनाश करें। 

दिल्ली को मुक्त करने के बाद कानपुर, लखनऊ, ग्वालियर और बांदा को मुक्त किया गया। आक्रमण की तिथियों को अलग-अलग रखा गया, जिससे सैनिक आराम से सफर कर पाए। युद्ध के उसी स्वरूप पर चलते हुए पहले हथियार उठाकर, रेजिमेंट के बाद रेजिमेंट, दर्जनों कस्बों और शहरों में तैनात बर्तानवी सैनिकों और अधिकारियों को हरा देते, बर्तानवी सैनिक गढ़ों पर कब्ज़ा कर लेते थे और पूर्व-नियोजित स्थानों के लिए आगे बढ़ना शुरू कर देते थे। रास्ते में आने वाले गांव जहां सैनिकों के आने की पूर्व सूचना होती थी, वे विद्रोही सैनिकों के रहने का और खाने-पीने का इंतजाम किया करते थे।

इन तथ्यों ने 1857 के ग़दर को 19वीं सदी के सबसे बड़े औपनिवेशिक साम्राज्य के खिलाफ़ महायुद्ध के रूप में स्थापित किया।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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