1857 का ग़दर - एक लोकप्रिय बेमिसाल विद्रोह

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 16/06/2017 - 23:30

1857 के ग़दर ने, लोगों को धर्म, भाषा और क्षेत्र में बांटने वाले उपनिवेशवादी शासकों को उखाड़ फेंकने के लिए एक मुट्ठी के रूप में एकजुट किया। हिन्दुओं, मुसलमानों और सिखों के धार्मिक संगठनों और व्यक्तियों ने विद्रोह के दौरान एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

स्वामी वृजनंद, स्वामी ओयनानंद, स्वामी पूर्णानंद, दयानंद सरस्वती, शिर्डी साईबाबा, द्वारका-बद्रीनाथ-पुरी-श्रृगेरी के शंकराचार्यों ने इस ग़दर के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। धार्मिक, शैव, वैष्णव और नागा अखाड़ों ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 18वीं सदी के एक उद्यमी/सन्यासी श्रेणी के एक प्रमुख नेता अनूपगिरी के वंशज लालपुरी गौसेन नाना साहब की सेना में लड़े थे। दिल्ली से देवबंद और पश्चमी उत्तर प्रदेश से होते हुए, हैदराबाद तक जाने वाले, मुस्लिम उलेमाओं और वलीउल्लाहवादियों ने एक यादगार भूमिका निभाई थी। उन्होंने प्रचारकों, आयोजकों और सेनानियों के रूप में काम किया। उस समय नामधारी-कूका आंदोलन के तत्कालीन सिख नेताओं ने क्रांति का समर्थन किया।

हर जगह पर ग़दर के नेता केवल रानी, राजा, नवाब और तालुकेदार ही नहीं थे। इस ग़दर का संदेश आम पुरुषों व महिलाओं तथा कई धार्मिक नेताओं के माध्यम से भी फैलाया जाता था। मेरठ में यह बताया जा रहा था कि हाथी पर सवार एक फकीर आया था और सिपाही उसे बार-बार मिल रहे थे। लखनऊ में अवध पर कब्ज़ा करने के बाद कई धार्मिक नेता और खुद को पैगम्बर कहने वाले, बर्तानवियों के शासन का विनाश करने के लिए प्रवचन दिया करते थे।

इसके अलावा अन्य जगहों पर स्थानीय नेताओं ने किसानों, जमींदारों और आदिवासियों को विद्रोह के लिए अपने साथ आने का बुलावा दिया। शाहमल ने उत्तर प्रदेश में परगना बरौट के गांववासियों को इकट्ठा किया; छोटा नागपुर में सिंहभूम के एक आदिवासी किसान, गोनू ने इस क्षेत्र के कोल आदिवासियों में एक ग़दरी नेता बतौर अपनी भूमिका अदा की।

बहादुरशाह ज़फर ने अपनी पूरी प्रजा को जिसमें हिंदू, मुसलमान और सिख थे सभी से अपील की कि यह समय अपने धार्मिक मतभेदों को भुलाकर, धोखेबाज़ बर्तानवियों को बाहर निकालने का है और फूट डालो और राज करो की नीति को पराजित करने का भी है। यद्यपि नाना साहब रूढ़िवादी चितपावन ब्राह्मण परिवार से थे, फारसी में जारी उनके फरमान पूरे हिन्दोस्तान के समुदायों में लोकप्रिय थे। दिल्ली के कई उर्दू अख़बारों ने बर्तानवियों की फूट डालने के दांवपेचों के बारे में, चेतावनी दी और लोगों से आह्वान किया कि घेराबंदी के दौरान बर्तानवी एजेंटों द्वारा फैलाई गई अफवाहों को नज़रंदाज़ करें।

विभिन्न व्यवसायों और तबकों के लोग ग़दर की तरफ इस तरह आकर्षित हुये, जैसे कि फूलों की तरफ मधुमक्खी आकर्षित होती है। कारीगरों और किसानों ने विद्रोही सेनाओं में शामिल होकर उन्हें सैन्य सहायता प्रदान की। भारी संख्या में बुनकर सशस्त्र बग़ावत में शामिल हो गए।

आदिवासियों ने हिंदुओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया। झारखंड और छोटा नागपुर में संथाल, चुअर और कोल समुदायों ने दुश्मन के खिलाफ़ बग़ावत की। नागपुर में गोंड और कर्नाटक तथा महाराष्ट्र में भील और रामोशी समुदायों के लोग ग़दर में शामिल हुए।

बहादुर शाह ज़फ़र की घोषणाओं के अनुसार और 1857 के ध्वज गान में हिन्दुओं व मुसलमानों के साथ-साथ देशभक्त हिन्दोस्तानियों के रूप में सिखों का भी उल्लेख किया गया है। आमतौर पर बहुत से लोग यह नहीं जानते हैं कि बॉम्बे इंफेन्ट्री के दो सिपाहियों, जिनमें एक हिंदू थे और एक मुसलमान, उन्हें जिस जगह पर तोप के आगे बांधकर उड़ा दिया गया था, उस जगह को आज मुंबई के आज़ाद मैदान के नाम से जाना जाता है। हिन्दोस्तान के लगभग हर जिले में चाहे वह यूपी-बिहार-मध्य प्रदेश में हो या उड़ीसा या असम-बंगाल या पश्चमी हिन्दोस्तान में हो, ‘एक हिंदू शहीद और एक मुस्लिम शहीद‘ की अद्भुत मिसालें मिलती हैं। झारखंड के छतरा में जयमंगल पांडे और शेख नादिर अली के कारनामों को याद करते हुए एक पटिका आज भी देखी जा सकती है।

1857 में महाराष्ट्र के खानदेश संघर्ष में (नासिक-जलगांव-धुले) जो कि भील और कोली समुदाय द्वारा शुरू किया गया था, इसमें पठानों और अरबों ने अहम भूमिका निभाई थी। कर्नाटक में गुलबर्गा, धारवाण और रायचूर संघर्ष में लिंगायत-रामोशी-मराठा-मुस्लिम की भी भागीदारी थी। सबसे बड़ी बात यह है कि अयोध्या में, जिस जगह पर बाबरी मस्जिद का विध्वंस किया गया था, उसमें महंत रामदास और मौलवी अमीर अली के साथ शंभु प्रसाद शुक्ला और अच्छन खान जैसे दो धार्मिक हिंदू और मुसलमान नेताओं को साथ-साथ फांसी दी गई थी।

लोगों को बर्तानवी हुकूमत के खिलाफ़ बग़ावत के लिए संगठित करने में धार्मिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल किया जाता था। धार्मिक सभाओं को ग़दर का संदेश फैलाने में और कई जगहों पर लोगों को संगठित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। रोटी और कमल के चिन्ह जिनके धार्मिक अर्थ भी थे, इनके इस्तेमाल ने ग़दर का संदेश गांव से गांव तक फैलाने में अहम भूमिका निभाई, खासकर अवध में।

उपरोक्त संघर्षों से यह स्पष्ट है कि 1857 के ग़दर का उपनिवेशवादी स्पष्टीकरण संकीर्ण धार्मिक लक्ष्य से प्रेरित था, जो पूरी तरह से उल्टा प्रचार करता था। ग़दर सिर्फ सामंती तत्वों से चलाया गया था और केवल एक सीमित बग़ावत थी, जिसको लोगों का कोई समर्थन प्राप्त नहीं था, यह स्पष्टीकरण भी पूरी तरह से गलत था।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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