1857-“सभ्य” बस्तीवादी सत्ता का बर्बर बदला

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 16/06/2017 - 22:30

1857 के ग़दर को बर्तानवी बस्तीवादी आसानी से नहीं कुचल पाए थे। उत्तरी हिन्दोस्तान पर वापस अपना कब्ज़ा करने के लिए, सेना को भेजने के साथ-साथ बर्तानवी बस्तीवादियों ने विद्रोह को कुचलने के लिए, कई कानून भी पास किये। 1857 के मई और जून के महीनों में उन्होंने कई कानून पास किये और पूरे उत्तरी हिन्दोस्तान को मार्शल लॉ के दायरे में ले आये। सेना के अधिकारियों को ही नहीं, यहां तक कि बर्तानवी नागरिकों को भी, ऐसा अधिकार दिया गया था कि वे केवल इस शक के आधार पर किसी भी हिन्दोस्तानी पर मुकदमा चला सकते थे और सज़ा दे सकते थे कि वह बग़ावत में शामिल था, इसके लिए केवल एक ही सज़ा थी - मौत!

Barbaric retribution
इस चित्र के नीचे शीर्षक दिया गया है “कानपुर के हुए भयानक कत्लेआम से पूरे इंग्लैंड में जबरदस्त आक्रोश और बदले के भावना फैल गयी है।”
स्रोतः पंच पत्रिका, 12 सितम्बर 1857।

इन खास काले कानूनों से लैस होकर और ब्रिटेन से आई अतिरिक्त सैन्यशक्ति की मदद से बर्तानवी बस्तीवादी विद्रोह को कुचलने के लिए आगे बढे़। दिल्ली को अपने कब्ज़े में लेने के लक्ष्य के साथ उन्होंने दो-तरफा हमला बोल दिया। दिल्ली पर कब्ज़ा जमाने के लिए सेना की एक टुकड़ी कलकत्ता से आगे बढ़ी और दूसरी पंजाब से।

लेकिन उत्तरी हिन्दोस्तान के अलग-अलग इलाकों से देशभक्त विद्रोही राजधानी की सुरक्षा करने के लिए दिल्ली आ गए थे। हालांकि बर्तानिवों द्वारा दिल्ली पर कब्ज़ा करने की कोशिश जून 1857 की शुरुआत से ही हो गयी थी, लेकिन वे दिल्ली पर अपना कब्ज़ा सितंबर के अंत तक ही कर पाए और इस दौरान दोनों ही सेनाओं को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा।

बर्तानिवों को पूरे गंगा के मैदानी क्षेत्र पर वापस अपना कब्जा़ पाने में जबरदस्त प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। बर्तानवी सेना को इस क्षेत्र पर कब्ज़ा करने के लिए गांव दर गांव लड़़ना पड़ा। गांवों और आस-पास के रहने वाले लोग बर्तानवी बस्तीवादियों के खिलाफ़ पूरी तरह से एकजुट थे। बर्तानवियों ने जैसे ही विद्रोह-विरोधी कार्यवाही शुरू की उनको यह एहसास हो गया था कि वे केवल सैनिकों के विद्रोह का ही सामना नहीं कर रहे हैं, बल्कि इस विद्रोह को विशाल जनसमुदाय का समर्थन भी प्राप्त है। उदाहरण के लिए अवध में एक बर्तानवी अधिकारी फोरसाइथ ने अनुमान लगाया कि इस इलाके के तीन-चैथाई वयस्क पुरुषों की आबादी विद्रोह में शामिल थी। बर्तानवी इस इलाके को लम्बी लड़ाई के बाद मार्च 1858 में ही अपने काबू में कर पाए।

विद्रोह को कुचलने के लिए बर्तानवियों ने बहुत बड़े पैमाने पर सेना की शक्ति का इस्तेमाल किया। लेकिन केवल यही एक हथियार बर्तानवियों ने इस्तेमाल नहीं किया था। वर्तमान उत्तर प्रदेश के बहुत बड़े हिस्से में वहां के कई जमींदारों और किसानों ने एकजुट होकर बर्तानवियों का प्रतिरोध किया था। बर्तानवियों ने उनकी एकता को तोड़ने की कोशिश की। जिन जमींदारों ने बर्तानवियों के खिलाफ़ विद्रोह किया, बर्तानवियों ने उनकी जमीनें छीन लीं और उन जमींदारों को ईनाम बतौर दे दी, जो बर्तानवियों के प्रति वफादार थे। विद्रोह करने वाले कई ज़मींदार बर्तानवियों के साथ लड़ते हुए मारे गए या बर्तानवियों से बचते हुए नेपाल की ओर निकल गए, जहां वे बीमारी या भुखमरी के कारण मारे गए।

बर्तानवी अपनी सत्ता पर विद्रोहियों के खतरे से डर गये थे, इसलिये उन्होंने 1857 के ग़दर के देशभक्तों का जनसंहार करने की नीति शुरू की। इतनी पीढ़ियों के गुजर जाने के बाद भी बर्तानवियों द्वारा 1857 के ग़दर के देशभक्तों के खिलाफ़ किये गए ज़ुल्मों के दर्दनाक किस्से, खास तौर से उत्तर प्रदेश में आज भी याद किये जाते हैं।

Barbaric retributionदिल्ली पर फिर से कब्ज़ा करने और विद्रोह को कुचलने की खबर जैसे ही ब्रिटेन पहुंची, तो वहां बदला लेने की मांग और तेज़ होने लगी। अख़बारों में ऐसे चित्र और खबरें छापी जाने लगीं, जिसने बर्तानवियों में गुस्से की आग को हवा दी जा सके, ताकि विद्रोहियों के खिलाफ़ चलाई गई बदले की कार्यवाही और हिंसक दमन को जायज़ ठहराया जा सके। एक गुलाम बस्ती के लोगों ने दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति को चुनौती देने के लिए हथियार उठाये, यह बस्तीवादियों के लिए बहुत बेइज्ज़ती की बात थी और दुनियाभर में उनके निर्विरोध दब-दबे के लिए एक खतरा थी। अपनी अपराजेयता को पुनः स्थापित करने के लिए उन्होंने भयंकर बर्बरता का इस्तेमाल किया। पृष्ठ 3 पर दिए गए चित्र में एक काल्पनिक स्त्री को न्याय के प्रतीक के रूप में दिखाया गया है, जिसके एक हाथ में तलवार है और दूसरे हाथ में ढाल। उसका रुख़ आक्रामक है और चेहरे पर आक्रोश व बदले की भावना है। वह स्त्री विद्रोही सिपाहियों को अपने पैरों तले रौंद रही है और हिन्दोस्तानी औरतें और बच्चे डर से कांप रहे हैं।

एक शक्ति जो अपने आपको “सबसे सभ्य” होने का दावा करती थी, उसके द्वारा बेहद बर्बर तरीके से बदला लिया गया। विद्रोहियों का बड़ी बेदर्दी से कत्ल किया गया, उन्हें तोपों से उड़ा दिया गया या फांसी पर चढ़ाया गया। कत्ल की तस्वीरें और चित्र अख़बारों और पत्रिकाओं द्वारा चारों ओर प्रसारित किये गये, ताकि हमारे लोगों के दिलों में दहशत बैठा दी जाये।

पूरे के पूरे शहरों को लूटा गया, बेगुनाहों का कत्लेआम किया गया और गांवों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया। ग्रांड ट्रंक रोड के सभी पेड़ों पर कम से कम एक लाश लटकी नज़र आती थी। इतने बड़े पैमाने पर कत्लेआम हुआ था कि 1890 तक अवध और भोजपुर में मज़दूरों की भारी कमी हो गई। अवध में भेजे गए 20 लाख से अधिक खत वापस लौट आये। कत्लेआम के मज़दूर सर्वे और सड़क विभाग की रिपोर्ट साफ बताती है कि 25 लाख से अधिक लोग अकेले अवध में ही कत्ल किये गए थे। मुसलमान उलेमा और हिन्दू अखाड़ों के दस्तावेज़ भी दिखाते हैं कि 50 लाख से अधिक लोग कत्ल किये गए। बिहार के भोजपुर में करीब 25 प्रतिशत मज़दूर मारे गए। करीब एक करोड़ लोगों का कत्लेआम किया गया और उनकी ज़मीनें और संपत्ति लूट ली गयी।

बड़े पैमाने पर देश के बाहर, मॉरिशस, वेस्टइंडीज़, पूर्वी तिमोर और अन्य कई देशों में पलायन हुआ। करोड़ों लोगों ने गंगा के मैदानी इलाकों से पलायन किया। महाराष्ट्र के भिवंडी और मालेगांव शहरों, जो कपड़ा उद्योग के लिये प्रसिद्ध हैं, उनमें उत्तरी हिन्दोस्तान से भागकर आए हजारों जुलाहों को शरण मिली।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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