नीति आयोग का प्रस्ताव : इज़ारेदार पूंजीवादी घरानों के समाज-विरोधी अजेंडे का पर्दाफाश

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 16/06/2017 - 19:30

23 अप्रैल को नीति आयोग की गर्वनिंग काउंसिल की तीसरी बैठक में एक तीन वर्षीय अजेंडे का मसौदा पेश किया गया। इसमें कई कानूनी और नीतिगत परिवर्तनों का प्रस्ताव रखा गया है, कहने के लिए जिनका उद्देश्य है “विकास में तेज़ी लाना और रोज़गार के अवसर बढ़ाना”।

इन प्रस्तावों में, राजकीय स्वामित्व वाले 20 निगमों में “रणनीतिक विनिवेश” के माध्यम से निजीकरण करना, कृषि विपणन का उदारीकरण और भूमि अधिग्रहण, कृषि से होने वाली आय पर कर लगाना और विभिन्न क्षेत्रों में निजी मुनाफे़ पर सरकारी नियमन को घटाना शामिल किये गए हैं। यह एक ऐसा अजेंडा है, जिसका उद्देश्य है हिन्दोस्तानी और अंतर्राष्ट्रीय पूंजीवादी इज़ारेदारों के लाभों को बढ़ावा देने के लिए, रोज़गारों और मज़दूरों, किसानों के अधिकारों पर हमला करना है।

योजना आयोग से लेकर नीति आयोग तक

नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (हिन्दोस्तान के परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय संस्थान) या नीति आयोग, 1 जनवरी, 2015 को अपनाए गए मंत्रीमंडल के फैसले से स्थापित किया गया था। यह सरकार की कार्यवाहियों के लिए, नए विचार पैदा करने के “थिंक टैंक” बतौर स्थापित किया गया था और इसे “दिशात्मक और नीति डाइनमो” भी कहा गया। इसके बाद, योजना आयोग को ख़त्म करने का निर्णय कैबिनेट के फैसले से नवंबर 2016 में लिया गया।

योजना आयोग की जगह नीति आयोग की स्थापना करने का आधिकारिक कारण यह बताया गया कि यह देश की नई ज़रूरतों को पूरा करेगा, जो हिन्दोस्तान को “एक कम विकसित अर्थव्यवस्था से दुनिया की सबसे बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एक में बदल देगा”। यह भी दावा किया गया था कि नई व्यवस्था के तहत, हिन्दोस्तानी संघ के राज्यों के आर्थिक संवर्धन और विकास की दिशा का निर्धारण करने में, राज्यों के पास यह एक निर्णायक ताक़त होगी।

योजना आयोग की स्थापना एक संस्था के रूप में मार्च 1950 में हिन्दोस्तान के केन्दीकृत और योजनाबद्ध विकास को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। निजी औद्योगिक घरानों के हित में सार्वजनिक निवेश की योजना बनाई गई थी। इस धारणा का निर्माण किया गया था कि हिन्दोस्तान समाजवादी रास्ते पर आगे बढ़ रहा है, जबकि बनाया गया राज्य इज़ारेदार पूंजीवादी था।

योजना आयोग की जगह पर नीति आयोग की स्थापना करने का लक्ष्य है निजीकरण और उदारीकरण के माध्यम से हिन्दोस्तानी पूंजी के वैश्वीकरण के समाज-विरोधी अजेंडे को आगे बढ़ाना। यह कम्युनिज़्म-विरोधी और “मुक्त बाज़ार” की विचारधाराओं से प्रेरित है। यह पूंजीवादी इज़ारेदारों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा राष्ट्रों की भूमि और उनके श्रम के अबाधित लूट और शोषण का ही दूसरा नाम है।

योजना आयोग से नीति आयोग के बदलने में न तो नीतियां बदली हैं और न ही कानून बदला है, जो पूंजीपति वर्ग के हितों में निर्धारित किए जाते हैं, जिसकी अगुवाई इज़ारेदार घराने करते हैं। ये इज़ारेदार घराने हिन्दोस्तानी राज्य पर हावी हैं और राज्य उनके हित में काम करता है।

इस अजेंडे के मसौदे में निर्यात को बढ़ावा देने के लिए और उच्च-उत्पादकता वाले रोज़गार पैदा करने के लिए ‘तटीय रोज़गार क्षेत्र’ के निर्माण का प्रस्ताव भी है। यह “श्रम-बाज़ार में लचीलेपन को बढ़ाने” की सिफारिश करता है, जिसका अर्थ है रोज़गार के निर्माण को बढ़ावा देने के लिए मज़दूरों के अधिकारों को नकारना। यह पूंजीपति वर्ग के उस खुदगर्ज़ मंत्र के अलावा कुछ और नहीं है, जिसके मुताबिक कहा जाता है कि, मज़दूरों के शोषण को और बढ़ाने तथा मज़दूरों के कानूनी अधिकारों को कमजोर करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है।

यह अजेंडा विभिन्न परियोजनाओं के लिए भूमि के अधिग्रहण पर प्रतिबंध को कमजोर करने की भी मांग करता है। यह सिफारिश करता है कि एक उद्देश्य के लिए अधिग्रहित भूमि को बिना किसी बाधा के किसी दूसरे उद्देश्य के लिए उपयोग करने की अनुमति दी जानी चाहिए। इसका अर्थ यह है कि राज्यों को कृषि भूमि को गैर-कृषि भूमि में मुक्त रूपांतरण की अनुमति देने के लिए, अपने कानूनों में संशोधन करने चाहिए। तथ्य यह दिखाते हैं कि बड़े पूंजीपति इज़ारेदारों के अनुकूल भूमि अधिग्रहण कानून में व्यापक संशोधन के खिलाफ़ विशाल जन-विरोध के चलते सरकार ऐसा करने में नाकामयाब रही है। इसलिए इस मकसद को हासिल करने के लिए वह विभिन्न प्रतिबंधों को “नीति के मामले के रूप में” आसान बनाने की कोशिश कर रही है।

नीति आयोग ने मौजूदा कृषि उत्पाद विपणन समितियों को तेज़ी से ख़त्म करने की दिषा में प्रस्ताव रखे हैं। इन प्रस्तावों के तहत “बिजली क्षेत्र में क्रॉस-सब्सिडी को कम करने” की सिफारिश की गई है, जिसका मतलब है कि पूंजीवादी उद्योगों के लिए बिजली की दरें कम करते हुए, किसानों से बिजली के लिए उच्च दरों पर वसूली करना।

यह अजेंडा ई-पेमेंट बढ़ाने और वित्तीय लेन-देन का और डिजिटलीकरण करने के सरकार द्वारा पहले से ही लिये गये कदमों का समर्थन करता है। इससे डिजिटल वित्त और ई-कॉमर्स सेक्टरों में वैश्विक इज़ारेदारों के लिए बड़ा बाज़ार खुल जायेगा।

इज़ारेदार पूंजीपतियों के हितों द्वारा निर्धारित अजेंडे को “रोज़गार के अवसरों को बढ़ाने” के नाम से बेचा जा रहा है। यह दर्शाता है कि मोदी सरकार के लिए तेज़ी से बढ़ती बेरोज़गारी शर्मिंदगी का स्रोत बन गई है। “मेक इन इंडिया” और “स्टार्ट अप इंडिया” के बारे में प्रधानमंत्री ने बड़े जोर-शोर से प्रचार किया है। लेकिन आई.टी. और आई.टी. समर्थित सेवाओं सहित, कई क्षेत्रों में भारी छंटनी के परिणामस्वरूप इस अवधि में पैदा की गई नई नौकरियों की तुलना में, कहीं अधिक नौकरियां खत्म हो गई हैं।

जब से भाजपा की अगुवाई वाली मोदीनीत राजग सरकार सत्ता में आई है, तब से उन्होंने कई लोक-लुभावन नारे देकर लोगों को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि यह सरकार नई नौकरियां पैदा करने और गरीबों के उत्थान के लिए हर प्रकार के प्रयास कर रही है। इसकी शुरुआत “सबका साथ, सबका विकास“ और “अच्छे दिन” के नारों के साथ हुई थी। अब तीन साल बाद नए वादे किए जा रहे हैं, जैसे कि “2020 तक सभी को आवास” और “2022 तक किसानों की आय दोगुनी करना”।

हालांकि हकीक़त इन खोखले शब्दों से ज्यादा शक्तिशाली है। तथ्य दिखाते हैं कि पिछले तीन वर्षों में, मोदी सरकार ने लोगों के हितों को दांव पर लगाकर इज़ारेदार पूंजीपतियों के अजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अपनी पूरी ताक़त लगाई है। हिन्दोस्तानी और विदेशी वित्त पूंजी विभिन्न प्रतिबंधों को खत्म करने के लिए जोर दे रही है।

नीति आयोग के सुझाव इसी दिशा में आगे के कदम हैं। ये सुझाव हिन्दोस्तानी सरमायदारों के वैश्विक ताक़त बनने के रणनीतिक कदमों का एक हिस्सा हैं। हाल के सप्ताहों में एयर इंडिया के निजीकरण से शुरू करके, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के निजीकरण को जोर-शोर से आगे बढ़ाया जा रहा है। सत्ताधारी और विपक्षी पार्टियों की मज़दूर यूनियनों ने आयोग के अजेंडे का विरोध किया है।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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