मज़दूर अपने अधिकारों के लिए लड़़ रहे हैं

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 16/06/2017 - 15:30

कई राज्यों में, अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के मज़दूर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यहां पर हम मज़दूरों के कुछ संघर्षों पर रिपोर्ट दे रहे हैं।

कर्नाटक में सफाई मज़दूरों का संघर्ष

25 मई, 2017 को 20,000 से अधिक ठेके पर काम करने वाले पौरकर्मिका (सफाई मज़दूर), जिनमें अधिकतर महिलाएं हैं, विरोध करने के लिए अपनी झाडुओं के साथ बेंगलूरू के फ्रीडम पार्क में इकट्ठे हुए। ये मज़दूर राज्य सरकार से अपनी नौकरियों को नियमित करने की मांग कर रहे थे। उन्होंने इससे पहले, इस साल की शुरुआत में, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन इसी मांग के लिए प्रदर्शन किया था। हालांकि उस वक्त सरकार ने उन्हें आश्वासन दिया था कि उनकी मांग पूरी हो जाएगी, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया।

Sanitation-workers-Bengaluru
बृहत बेंगलूरू महानगर पालिका के सफाई कर्मचारी झाडू लेकर प्रदर्शन करते हुए

बृहत बेंगलूरू महानगर पालके (बी.बी.एम.पी.) के 30,000 से अधिक सफाई मज़दूर हैं, जिनमें से केवल 4,000 नियमित मज़दूर हैं। इनमें से कई मज़दूर 30 से भी अधिक वर्षों से काम कर रहे हैं। आज भी वे ठेका मज़दूर ही रह गये हैं, उन्हें सप्ताह के सातों दिनों काम करना पड़ता है, साप्ताहिक छुट्टी के दिन भी और राष्ट्रीय अवकाश के दिनों पर भी। उनके पास काम के दौरान खतरनाक अपशिष्ट पदार्थों से सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले उपकरणों की कमी है।

बहुत संघर्ष के बाद, अगस्त 2016 में सफाई मज़दूरों की वेतन वृद्धि हुई, जिससे उनका वेतन प्रति माह 14,400 रुपये हो गया। हालांकि, मज़दूरों को अभी भी उनका बकाया नहीं मिला है।

मज़दूरों ने राज्य सरकार को अपना वादा पूरा करने के लिए 15 दिनों की अंतिम चेतावनी दी है और यह धमकी दी है कि यदि सरकार उनकी मांगों को पूरा नहीं करती है, तो वे अपने विरोध प्रदर्शन को और तेज़ करेंगे।

तेलंगाना में ठेका कर्मचारियों का संघर्ष

तेलंगाना में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में ठेके पर काम करने वाले 5,000 से अधिक सफाई मज़दूरों ने 17 मई, 2017 से अनिश्चितकालीन हड़ताल का ऐलान किया था। वे अपने मज़दूरी से संबंधित सरकारी आदेश (जी.ओ. 68) के कार्यान्वयन की मांग कर रहे थे। मज़दूर संगठन ने बताया है कि, सरकार के आदेशानुसार मज़दूरों को 9,300 रुपये का न्यूनतम वेतन दिया जाना चाहिए। हालांकि, उन्हें सिर्फ 6,000 से 7,000 रुपये के बीच भुगतान किया जा रहा था। हड़ताल इसलिए की गई थी ताकि अधिकारियों को सरकार के आदेश को लागू करने के लिए मजबूर किया जा सके।

हड़ताल की संभावना को देखते हुए, दो अस्पतालों के प्रषासन ने मज़दूरों की मांगों पर सहमति व्यक्त की है। पिछले दो महीनों में, गांधी अस्पताल के मज़दूरों का वेतन बढ़ा दिया गया है। निलोफर अस्पताल के अधिकारियों ने लिखित में बताया है कि मज़दूरों को सरकारी आदेशानुसार वेतन दिया जायेगा।

मज़दूरों ने कहा कि “हमने दोनों अस्पतालों में हड़ताल को रोक दिया है लेकिन हम बाकी अस्पतालों में हड़ताल को जारी रख रहे हैं।”

टाटा मोटर्स के मज़दूरों का संघर्ष

गुजरात में टाटा मोटर्स के साणंद प्लांट के स्थायी मज़दूर, पिछले दो साल से वेतनों पर नया समझौता करने के लिए अधिकारियों से बातचीत कर रहे हैं। टाटा प्रबंधन ने प्रति माह 2,500 रुपये की वृद्धि को लागू करने के लिए अप्रैल 2015 में सहमति व्यक्त की थी। यदि यह लागू किया जाता है, तो यह मज़दूरों की पहली वेतन बढ़ोतरी होगी, जबसे उन्होंने 2009 में स्थापित इस प्लांट में काम करना शुरू किया था। इसके साथ-साथ, कंपनी ने यह भी घोषित किया है कि वह मज़दूरों से कैंटीन और परिवहन सुविधाओं के लिए 1,000 रुपये तक का शुल्क वसूलेगी - ये शुल्क इससे पहले प्रत्येक सेवा के लिए 50 रुपए के शुल्क से काफी बढ़ा दिया गया है। इसके जवाब में, मज़दूरों ने मज़दूरी बढ़ाने की पेशकश को खारिज़ कर दिया है और अपनी यूनियन का पंजीकरण किया है, जिसका नाम भारत कामगार एकता संघ (बी.के.ई.एस.) है।

जैसे ही मज़दूरों ने अपने यूनियन के गठन की घोषणा की, प्रबंधन ने दो यूनियन कार्यकर्ताओं को निलंबित कर दिया। निलंबन को रद्द करने की मांग करते हुए, मज़दूर हड़ताल पर चले गए। फरवरी 2016 में, 400 से अधिक स्थायी मज़दूरों ने प्लांट तक प्रदर्शन किया और दोनों मज़दूरों के निलंबन की स्थिति पर प्रबंधन से जवाब मांगा। प्रबंधन ने 26 मज़दूरों की एक सूची की घोषणा की, जिन्हें तत्काल निलंबित कर दिया जाएगा। यूनियन ने इस घोषणा के खिलाफ़ लगातार लड़ाई लड़ी। आखिरकार, प्रबंधन को निलंबित मज़दूरों को बहाल करने के लिए मजबूर होना पड़ा। मज़दूर नये वेतन समझौते के लिए अपना संघर्ष जारी रखे हुये हैं, जिसके लिये अब तक प्रबंधन इनकार करता आया है।

यह पता चला है कि टाटा प्रबंधन मनमाने ढंग से उन मज़दूरों को निलंबित कर देता है, जो स्थायी पद प्राप्त करने ही वाले होते हैं (तीन साल के काम का अनुभव प्राप्त करने के बाद) और उसके बाद उनके स्थान पर पर नए ठेका मज़दूरों को भर्ती कर लेता है। मज़दूर यूनियन बड़ी संख्या में ठेका मज़दूरों को जानबूझकर भर्ती करने की प्रणाली के खिलाफ़ लड़ रही है क्योंकि ठेका प्रणाली से मज़दूरों का अति शोषण किया जाता है।

बी.ए.एस.एफ. मज़दूरों का संघर्ष

बी.ए.एस.एफ. के हिन्दोस्तान के मैंगलोर प्लांट के मज़दूर विरोध प्रदर्शनों का आयोजन करते आ रहे हैं। वे मांग कर रहे हैं कि कंपनी, यूनियन के सदस्य मज़दूरों के खिलाफ़ भेदभाव रोके और अपनी स्वयं की आचार संहिता का पालन करे। ठाणे (महाराष्ट्र) और अंकलेश्वर (गुजरात) में स्थित बी.ए.एस.एफ. के अन्य प्लांटों में कार्यकर्ताओं ने भी इसी तरह के मुद्दों को उठाया है।

बी.ए.एस.एफ., जो कि विश्व की सबसे बड़ी रासायनिक कंपनियों में से एक है, दावा करती है कि वह अपने मज़दूरों के साथ व्यवहार करने में, मानवाधिकारों, श्रम और सामाजिक मानकों को लागू करने में, “विश्व स्तर के मानकों” को लागू करती है। हालांकि बी.ए.एस.एफ. के हिन्दोस्तानी प्लांट के कार्यकर्ता देख रहे हैं कि ये सिर्फ खोखले शब्द हैं। वे प्रतिदिन अपने अधिकारों पर हमलों का सामना करते हैं।

यूनियन को तोड़ने की कोशिश में, प्रबंधन ने मज़दूरों को “अधिकारी” के रूप में भर्ती किया है, ताकि उन्हें मज़दूर यूनियन के सदस्य बनने का हक़ न मिले। प्रबंधन गैर-यूनियन कार्यकर्ताओं को उच्च वेतन, नौकरी में बेहतर सुविधायें और कम काम के घंटे वाले पदों पर पदोन्नत करते हैं, भले ही वे यूनियन मज़दूरों के समान काम करते हैं। इस यूनियन-विरोधी नीति को लागू करते हुए, प्रबंधन मज़दूर वर्ग के तहत आने वाले मज़दूरों की संख्या 138 से 78 तक कम करने में सफल रहा है। यदि कोई कार्यकर्ता अपने अधिकारों की मांग करता/करती है तो उसे चेतावनी पत्र दिया जाता है।

मैंगलोर प्लांट में विभिन्न दुर्घटनाओं के बाद, स्थानीय यूनियन ने, जो कि बी.ए.एस.एफ. इंडिया वर्कर्स फेडरेशन से जुड़ा हुआ है, दुर्घटनाओं की जांच के लिए और दुर्घटना रोकने के लिए प्रबंधन द्वारा किये गए उपायों को जानने की मांग कर रहा है। यूनियन ने कंपनी को खतरनाक काम में अल्पकालिक ठेका मज़दूरों की भर्ती को रोकने के लिए कहा है और मांग की है कि कंपनी अधिक स्थायी मज़दूरों की भर्ती करे। जिन मज़दूरों को पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित नहीं किया गया है और जिनका खतरनाक रसायनों को संभालने का अनुभव कम है, उनको काम पर लगाने से गंभीर दुर्घटनाएं हुई हैं, जिनमें ये ठेका मज़दूर अक्सर शिकार बन जाते हैं।

कपड़ा उद्योग में महिलाओं ने एक होकर लड़ने का फैसला किया

कांचीपुरम जिले के महिंद्रा सिटी में एस.एल.ए.एम. कपड़ा फैक्ट्री के करीब 300 मज़दूरों, जिनमें ज्यादातर महिलाएं हैं, जो कि टेलर, ऑपरेटर, चेकर्स, हेल्पर्स और हाउसकीपिंग के काम में शामिल हैं ने 16 मई से चार दिनों तक काम रोक दिया। उन्होंने ऐसा 2014 की न्यूनतम वेतन अधिसूचना, वार्षिक वेतन वृद्धि और अपनी सामाजिक सुरक्षा के बकाए की मांग को रखते हुए किया।

उन्होंने फैक्ट्री में मज़दूरों की एक वक्र्स कमेटी का गठन किया है। उन्होंने मार्च 2017 में 20 मांगों वाला एक घोषणापत्र प्रबंधन के सामने पेश किया था। इन मांगों में शामिल हैं - उच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार बकाया राशि का भुगतान, वेतन में वार्षिक वृद्धि के साथ-साथ ई.एस.आई. और पी.एफ. का सही मूल्य जुड़ा होना।

इससे पहले, मज़दूरों ने 8 और 9 अप्रैल को दो दिन के लिये काम रोका था। इसके जवाब में, प्रबंधन ने 50 मज़दूरों को नौकरी से निकाल दिया था। मज़दूरों ने 11 से 13 अप्रैल को फिर से काम रोक दिया।   

मज़दूरों के लगातार प्रयासों के बाद प्रबंधन ने वेतन में वृद्धि करने पर सहमति व्यक्त की है। प्रबंधन ने वादा किया है कि 38 मज़दूर जिनका वेतन अभी तक नहीं चुकाया गया है उनके वेतन का भुगतान किया जाएगा और 29 बर्खास्त मज़दूरों के साथ निबटारे का भुगतान तय किया जाएगा।

गुड़गांव में मज़दूरों ने सहकर्मियों की बहाली की मांग रखी

1 जून को, गुड़गांव जिले में मज़दूरों ने औद्योगिक क्षेत्र में श्रमशक्ति को कम करने के विरोध में प्रदर्शन किया था। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया है कि कंपनियां नोटबंदी के बहाने का उपयोग कर रही हैं, जिसकी वजह से जिले में हज़ारों मज़दूर बेरोज़गार हो गए हैं।

करीब 11 बजे से मज़दूरों ने मिनी सचिवालय के बाहर इकट्ठा होना शुरू कर दिया। प्रदर्शनकारियों में विभिन्न कंपनियों के मज़दूर और एटक के सदस्य शामिल थे। उन्होंने पुराने रेलवे रोड और बेरीवाला बाग के नजदीक कई प्रदर्शन आयोजित किए और मज़दूरों के लिए न्याय की मांग करते हुए नारे लगाए। मज़दूरों ने सचिवालय के बाहर भी धरना दिया और अपनी मांगें रखीं।

मज़दूरों ने बताया कि कई कंपनियों ने ठेका मज़दूरों को लंबी छुट्टी पर भेज दिया है, साथ ही कुछ मामलों में वेतन के चेकों को भी बैंकों द्वारा नकारा गया है। उनकी मांगों में सेक्टर 46 में एमीटी इंटरनेशनल स्कूल, नेपिनो ऑटो एंड इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, सिद्रावाली में मेट्रो ऑर्टेम लिमिटेड, बिनोला में आर.जी.पी. मोल्ड्स, मानेसर में रस्किन टाइटस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और मानेसर से सीनियर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड में मज़दूरों को काम पर वापस लिये जाने की मांग शामिल है। 

मज़दूरों ने होंडा मोटरसाइकिल एंड स्कूटर इंडिया में मज़दूर-विरोधी प्रथाओं को समाप्त करने और भल्ला केमिकल वक्र्स प्राइवेट लिमिटेड में श्रम कानूनों के कार्यान्वयन की भी मांग की।

Tag:    मेट्रो ऑर्टेम लिमिटेड    सार्वजनिक परिवहन    रक्षा क्षेत्र    Jun 16-30 2017    Struggle for Rights    Revisionism    Rights     2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

(Click thumbnail to download PDF)

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)