किसान मुक्ति यात्रा, 6 से 18 जुलाई, 2017 :

Submitted by cgpiadmin on सोम, 17/07/2017 - 02:30

सैकड़ों संगठनों ने किसानों के रोज़ी-रोटी के अधिकार की मांग उठाई

सैकड़ों किसान संगठनों और कई अन्य संगठन जो मेहनतकश लोगों के हितों की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं, इन सभी के द्वारा 18 जुलाई, 2017 को नई दिल्ली में एक रैली करने का बुलाया दिया गया है। इस रैली का बुलावा इस मांग को लेकर किया गया है कि सरकार देषभर में किसानों के जीवन में हो रहे विनाषकारी संकटों को सुलझाने के लिए ज़रूरी कदम उठाए।

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (ए.आई.के.एस.सी.सी.) द्वारा किसानों की दुर्दशा को उजागर करने और रैली के लिए, एक यात्रा का आयोजन किया गया है और यह यात्रा, रैली के लिए समर्थन जुटाने के लिए भी की जा रही है। यह यात्रा 6 जुलाई को मध्य प्रदेष के मंदसौर जिले के बुधा गांव से शुरू हुई जो कि ठीक एक महीने पहले मंदसौर में गोलीबारी की याद में थी, जिसमें 6 किसानों की मृत्यु हो गई थी। यह यात्रा 18 जुलाई, 2017 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर पहुंचने से पहले मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के विभिन्न शहरों और कस्बों से होकर गुजरेगी।

Maharashtra-peasant-meetingकिसान मुक्ति यात्रा के चैथे दिन, महाराष्ट्र में विशााल जन सभा

किसानों को अपनी रोज़ी-रोटी के लिए एक गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है। इज़ारेदार घरानों के आक्रामक वैश्विक विस्तार के अनुकूल, बढ़ते तौर पर राज्य के हस्तक्षेप में सुधार किया जा रहा है; किसानों को दी जा रही सुविधाओं को पूरी तरह से खत्म किया जा रहा है और उन्हें बाज़ारों में अपना बचाव खुद करने के लिये कहा जा रहा है। किसान मांग कर रहे हैं कि उनकी सारी उपज को लाभकारी मूल्य पर खरीदा जाए। वे मांग कर रहे हैं कि सरकार को उनकी उपज की तत्काल खरीदी की लागत को 1.5 गुना पर सुनिश्चित करना चाहिए और इसका तुरंत भुगतान करना चाहिए। वे यह भी मांग कर रहे हैं कि उनका कर्ज़ एक बार में ही माफ़ कर दिया जाए, ताकि वे कर्जे़ के जाल से मुक्त हो जाएं।

किसानों पर संकट की सीमा का अंदाज़ा इस वर्ष की शुरुआत में हुए कुछ विरोध प्रदर्शनों की मीडिया रिपोर्टों के छोटे से नमूने से लगाया जा सकता है।

1 मार्च को पंजाब के जलंधर के किसानों ने अपनी उपज के लिए कम कीमत के विरोध में राष्ट्रीय राजमार्ग-1 पर अपने आलू की पैदावार को फेंक दिया। उन्होंने राज्य की एजेंसियों के द्वारा किये जाने वाले भुगतान में देरी के साथ-साथ अपर्याप्त खरीदी का भी विरोध किया। जून 2017 में किसानों की 62 यूनियनों ने विरोध प्रदर्षन किया और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) के भुगतान की मांग को लेकर अपने ट्रेक्टर से तीन घंटे तक राष्ट्रीय राजमार्गों को जाम रखा। हिमाचल प्रदेश में किसानों ने अपनी टमाटर की पैदावार के लिए मिल रही कम कीमतों के खिलाफ़ विरोध किया। राजस्थान के कोटा में, जहां हिन्दोस्तान के कुल लहसुन की पैदावार का 90 प्रतिशत पैदा होता है, वहां के किसान अपनी लहसुन की फसल के लिए एम.एस.पी. की मांग को लेकर सड़कों पर निकल आए। पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसानों ने सरकार द्वारा किये जा रहे कम भुगतान और बाज़ार में मिल रही कम कीमतों का विरोध किया। झारखंड में भी किसानों ने राज्य सरकार की एजेंसियों के खिलाफ़ विरोध किया था, क्योंकि उन्हें पिछले साल सरकार द्वारा की गई खरीदी के लिए भुगतान नहीं हुआ है। जिसकी कुल राशि 28 करोड़ है। गुजरात में किसान मूंगफली और कपास के लिए एम.एस.पी. से कम कीमत मिलने का विरोध कर रहे हैं। पिछले महीने, किसानों ने अपने विरोध के रूप में राज्य के कृषि मंत्री की टेलीफोन लाइन को जाम कर दिया। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में किसान सोयाबीन, गेहूं, अरहर दाल, प्याज और आलू जैसी फसलों के लिए मिल रही कम कीमत का विरोध कर रहे हैं। महाराष्ट्र के किसानों ने अपनी मांगों के लिए दवाब डालते हुए सभी कृषि उत्पाद बाज़ारों का बहिष्कार करने का आह्वान किया था। छत्तीसगढ़ में भी, किसान धान के लिए एम.एस.पी. में वृद्धि की मांग कर रहे हैं। उन्होंने जनवरी में, कम कीमत मिलने के विरोध में एक लाख किलो सब्जी का मुफ्त वितरण किया।

धान की खरीदी की कमी के बारे में गुस्सा प्रकट करने के लिए, ओड़िशा में किसान देशव्यापी आंदोलन में शामिल हो रहे हैं। तेलंगाना में मिर्च का उत्पादन करने वाले किसानों ने खम्माम जिले में बाज़ार में मिलने वाली कम कीमत के कारण अपनी फसल को आग लगा दिया। तमिलनाडु के किसानों ने पिछले कुछ वर्षों में सूखे से 50 लाख एकड़ में धान की फसल के नष्ट हो जाने के लिए मुआवजे़ की मांग को लेकर दिल्ली में लंबे समय तक धरना दिया। असम, छत्तीसगढ़, हिमाचल और अन्य ऐसी कई जगहों पर, किसानों ने कोल्ड स्टोरों की कमी के विरोध में प्रदर्शन किया है, इनकी कमी की वजह से उन्हें अपने उत्पादों को कम कीमतों पर बेचने को मजबूर होना पड़ता है।

यह स्पष्ट है कि किसान अपनी रोज़ी-रोटी पर अब और हमलों के लिए तैयार नहीं हैं। वे शासकों को स्पष्ट संदेश भेजने के लिए विभिन्न राज्यों से मिलकर एकत्रित हो रहे हैं। विभिन्न सरकारें प्रतिक्रिया के रूप में उन पर लाठियों और गोलियों की बारिष कर रही हैं। ऐसे दमनकारी हमलों का मुकाबला करते हुए, किसान आंदोलन को आगे ले जाने के लिए डटकर खड़े हैं।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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