राष्ट्रपति चुनाव 2017 : मसला यह नहीं कि राष्ट्रपति कौन बनता है, बल्कि यह सुनिश्चित करना कि संप्रभुता लोगों के हाथों में हो!

Submitted by cgpiadmin on सोम, 17/07/2017 - 01:30

17 जुलाई, 2017 को राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव किये जायेंगे और 20 जुलाई को मौजूदा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल खत्म होने से पांच दिन पहले वोटों की गिनती पूरी हो जाएगी। सत्ताधारी भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने बिहार के भूतपूर्व राज्यपाल रामनाथ कोविंद का नाम अपने उम्मीदवार के तौर पर घोषित किया है। लोक सभा की पूर्व अध्यक्षा मीरा कुमार कांग्रेस की अगुवाई में विपक्ष की उम्मीदवार हैं।

हिन्दोस्तान में राष्ट्रपति का चुनाव निर्वाचन मंडल के द्वारा किया जाता है। इस निर्वाचन मंडल में, संसद की लोक सभा और राज्य सभा के सदस्य, 29 राज्य विधान सभाओं के सदस्य और दिल्ली व पुदुचेरी विधानसभा के निर्वाचित सदस्य शामिल हैं। इस निर्वाचन मंडल में कुल 776 संसद सदस्य और 4120 राज्य विधानसभा के सदस्य हैं।

संविधान की धारा 74

(1) राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रीमंडल होगा जिसका मुखिया, प्रधानमंत्री होगा और राष्ट्रपति अपने कृत्यों का अभ्यास ऐसी सलाह के अनुसार कार्य करेगा: आम तौर पर या विशेष परिस्थिति में राष्ट्रपति मंत्रीमंडल से ऐसी सलाह पर पुनर्विचार करने की अपेक्षा कर सकेगा, और ऐसे पुनर्विचार के पश्चात राष्ट्रपति, दी गई सलाह के अनुसार कार्य करेगा।

(2) कोई न्यायालय इस प्रश्न की जांच नहीं करेगा कि मंत्रियों ने राष्ट्रपति को कोई सलाह दी या नहीं, और यदि दी तो क्या दी।

संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति हिन्दोस्तानी राज्य के मुखिया हैं। हिन्दोस्तानी संघ के सारे कार्यकारी अधिकार राष्ट्रपति में निहित होते हैं और प्रत्यक्ष रूप से उनके द्वारा या उनके अधीन अधिकारियों के द्वारा कार्यान्वित किये जाते हैं। सशस्त्र बलों की सर्वोच्च कमान राष्ट्रपति के हाथों में होती है। राष्ट्रपति प्रधानमंत्री को नियुक्त करते हैं।

संसद के दोनों सदनों में पारित किये जाने के बाद, सभी विधेयकों को कानून बनने के लिए राष्ट्रपति की सहमति मिलनी ज़रूरी है। जब संसद के दोनों सदन कार्य नहीं कर रहे होते हैं, उस दौरान राष्ट्रपति कोई भी अध्यादेश ला सकते हैं और उसकी उतनी ही ताक़त होती है, जितनी कि संसद द्वारा परित किसी कानून की। राज्यसत्ता की सभी सर्वोच्च संस्थाओं के पदाधिकारियों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जैसे सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, राज्यपाल, इत्यादि। संविधान के अनुसार राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल (धारा 352), राज्य आपातकाल (धारा 356), या वित्तीय आपातकाल (धारा 360) की घोषणा कर सकते हैं और सभी मूल अधिकारों को स्थगित कर सकते हैं।

इससे ऐसा आभास होता है कि संविधान, संप्रभुता को राष्ट्रपति में निहित करता है। परन्तु संविधान की धारा 74 में यह भी कहा गया है कि राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की अगुवाई में गठित मंत्रीमंडल की सलाह के अनुसार काम करने के लिये बाध्य है।

मंत्रीमंडल जो भी प्रस्ताव देता है, राष्ट्रपति उसको अपनी स्वीकृति देने के लिए बाध्य है। राष्ट्रपति मंत्रीमंडल के किसी भी प्रस्ताव को पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है, लेकिन यदि मंत्रीमंडल वही प्रस्ताव फिर से राष्ट्रपति के पास भेजता है, तब राष्ट्रपति के पास प्रस्ताव को अपनी स्वीकृति देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता है।

संविधान और राजनीतिक प्रक्रिया में इस तरह का पुराना हो चुका प्रावधान क्यों बरकरार रखा गया है, जहां वैसे तो औपचारिक तौर पर संप्रभुता राष्ट्रपति में निहित है, लेकिन फिर भी उनको मंत्रीमंडल की सलाह पर काम करना होता है? इसके पीछे एक सोचा-समझा और सचेत मकसद है। यह प्रावधान सत्ताधारी वर्ग को राष्ट्रपति के नाम पर मंत्रीमंडल द्वारा मनमाने ढंग से अपनी सत्ता के इस्तेमाल को जायज़ ठहराने में सहायता करता है। जैसे कि, जब शासक वर्ग संसद में सत्ताधारी पार्टी और विपक्षी पार्टियों के बीच में सहमति न होने के कारण कोई विधेयक पारित नहीं करा पाता है तब, वह संसद को नजरंदाज करते हुए और राष्ट्रपति की शक्ति का इस्तेमाल करते हुए अध्यादेश के ज़रिये उसे पारित करा सकता है।

राजनीतिक संकट के समय राष्ट्रपति बहुत अहम भूमिका अदा करता है, जैसे कि जब सत्ताधारी वर्ग चुनाव के ज़रिये अपने बीच के आपसी अंतर्विरोधों को सुलझा नहीं पाता है, जब संसद के लिए चुनाव का नतीजा “त्रिशंकु संसद” आता है, और किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, उस वक्त किस पार्टी को सरकार बनाने और अपना बहुमत साबित करने के लिए आमंत्रित करना, इसका फैसला राष्ट्रपति के हाथों में होता है। उसी तरह से जब कोई सरकार संसद में अपना बहुमत खो देती है, उस वक्त कौन सी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना है इसका फैसला भी राष्ट्रपित के हाथों में होता है।

संसदीय जानकार इस बात की अंतहीन चर्चा में लगे रहते हैं कि हिन्दोस्तान में संप्रभुता कहां पर निहित है। लेकिन वे इस सच्चाई को नहीं छुपा सकते हैं कि संप्रभुता लोगों में निहित नहीं है, जबकि यह बात भी सच है कि संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत “हम भारत के लोग”, इन शब्दों के साथ होती है।

हिन्दोस्तान की राजनीतिक व्यवस्था के बदनाम होने की वजह, केवल राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों का चरित्र नहीं है, इसकी असली वजह यह है कि मौजूदा व्यवस्था लोगों को फैसले लेने की भूमिका से वंचित रखती है। मौजूदा व्यवस्था में लोग संप्रभु नहीं हैं। राजनीतिक प्रक्रिया में उनकी भूमिका हर पांच वर्ष में केवल संसदीय और विधानसभा चुनावों में वोट देने और मंत्रीमंडल के राज को वैधता देने तक ही सीमित है।

सर्वोच्च सत्ता और उसका ढांचा व तंत्र यह सुनिश्चित करते हैं कि केवल ताक़तवर वर्गों के हितों की ही सेवा हो। असलियत यह है कि हमारे देश के 150 इज़ारेदार पूंजीपति घराने मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया के ज़रिये 125 करोड़ हिन्दोस्तानियों के भाग्य का फैसला करते हैं। इस हक़ीक़त को छुपाने के लिए हुक्मरान वर्ग और उसकी राजनीतिक पार्टियां लगातार फरेबी प्रचार चलाती रहती हैं कि मौजूदा व्यवस्था और प्रक्रिया “लोगों की इच्छा” दर्शाती है।

2017 में राष्ट्रपति के चुनाव के संदर्भ में सत्ताधारी भाजपा इस बात का प्रचार कर रही है कि राष्ट्रपति पद के लिए उसने एक दलित उम्मीदवार को चुना है, और कांग्रेस व कुछ अन्य विपक्षी पार्टियां कह रही हैं कि उनका उम्मीदवार धर्म-निरपेक्षता के प्रति वचनबद्ध है। दोनों ही पार्टियां इस सच्चाई को छुपाने की कोशिश कर रही हैं कि राष्ट्रपति के चुनाव का वास्ता न तो दलितों के उत्पीड़न की समस्या को सुलझाने से है और न ही साम्प्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा की समस्या को हल करने से। इस तरह का प्रचार केवल लोगों का ध्यान असली समस्या से भटकता है, जबकि असली समस्या यह है कि मौजूदा व्यवस्था के अंदर लोगों के पास अपना भविष्य तय करने का कोई अधिकार नहीं है।

मसला यह नहीं है कि कौन राष्ट्रपति चुना जाता है, बल्कि यह है कि संप्रभुता किसके हाथों में होनी चाहिए। हिन्दोस्तान में संकट के केंद्र में सबसे अहम बात यह है कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया लोगों को संप्रभुता से वंचित करती है। संप्रभुता को लोगों में निहित करना ही इस संकट को खत्म करने का एकमात्र रास्ता है।

लोगों के हाथों में अपने जीवन की बागडोर देने के लक्ष्य से सुसंगत एक आधुनिक जनतंत्र का निर्माण करने की ज़रूरत है। यदि समूचे तौर पर लोगों के हाथों में संप्रभुता होनी है तो, वह लोगों पर अपना शासन चलाने वाली सर्वोच्च सत्ता के रूप में नहीं हो सकती है।

इस वक्त हमारा फौरी कार्य है, मौजूदा पूंजीवादी जनतंत्र की जगह पर, इससे भी बेहतर एक आधुनिक जनतंत्र की व्यवस्था कायम करने के लक्ष्य और कार्यक्रम के इर्द-गिर्द लोगों की एकता बनाना। यह एक ऐसा जनतंत्र होगा, जहां सर्वोच्च सत्ता मेहनतकश लोगों के हाथों में होगी। प्रतिनिधियों का चयन और चुनाव करने का अधिकार, चुने गए प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार और कानून प्रस्तावित करने का अधिकार लोगों के हाथों में होगी। कार्यकारी सत्ता विधिमंडल के अधीन होगी और

विधिमंडल मतदाताओं के अधीन होगा। इस नयी व्यवस्था में यह सुनिश्चित किया जायेगा कि मतदाता किसी भी वक्त अपनी सारी सत्ता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को नहीं सौंप देते हैं, बल्कि फैसले लेने का अधिकार खुद अपने पास बरकरार रखते हैं।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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