दार्जिलिंग में गोरखालैंड के लिए संघर्ष :

Submitted by cgpiadmin on सोम, 17/07/2017 - 00:30

राष्ट्रों और लोगों की स्वेच्छा पर आधारित हिन्दोस्तानी संघ के पुनर्गठन की वस्तुगत आवश्यकता है

जून 2017 से दार्जिलिंग और आस-पास के इलाकों में एक अलग राज्य के लिए पश्चिम बंगाल के गोरखा लोगों का संघर्ष और अधिक तेज़ हो गया है। वैसे तो इस संघर्ष की अगुवाई गोरखा मुक्ति मोर्चा कर रहा है, लेकिन इस क्षेत्र की लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां इसमें सक्रिय रूप से हिस्सा ले रही हैं। आंदोलनकारियों ने सभी सरकारी दफ्तरों और एजेंसियों में अनिश्चितकालीन हड़ताल आयोजित की है। देश के अलग-अलग हिस्सों में बसे गोरखा छात्र और मेहनतकश लोगों ने इस आंदोलन के समर्थन में रैलियां और प्रदर्शन आयोजित किये हैं। इनमें कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय और दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र शामिल हैं।

गोरखालैंड आंदोलन का इतिहास

एक अलग गोरखालैंड के लिए आंदोलन कई दशक पुराना है। आॅल इंडिया गोरखा लीग ने 1949 में अलग राज्य के लिए आंदोलन शुरू किया था।

1980 में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट की अगुवाई में गोरखालैंड के लिए मांग तेज़ हुई। इस आंदोलन में 1986-88 के बीच 1200 लोगों को अपनी जानें गंवानी पड़ीं। दो वर्षीय लम्बे संघर्ष के बाद 1988 में दार्जिलिंग गोरखा हिल कौंसिल(डी.जी.एच.सी.) का गठन किया गया।

2007 में गोरखालैंड के लिए जनआंदोलन की अगुवाई गोरखा जन मुक्ति मोर्चा (जी.जे.एम.) के हाथों में आ गयी। 2005 में केंद्र और राज्य सरकार ने इस जनजाति बहुल क्षेत्र को संविधान के छठवें अध्याय में शामिल किया, ताकि तथाकथित तौर से उसे प्रशासनिक स्वायत्तता दी जा सके। इस बीच गोरखा लोग अपने लिए अलग राज्य की मांग करते रहे। चार वर्ष लंबा यह आंदोलन तब ख़त्म हुआ जब पश्चिम बंगाल की नयी मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने 2011 में गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन, गोरखालैंड टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जी.टी.ए.) के गठन का ऐलान किया।

2013 में तेलंगाना राज्य के गठन से एक अलग राज्य के लिए आंदोलन को जोर मिला।

दार्जिलिंग क्षेत्र के सभी लोग, जैसे कि छात्र, शिक्षक, शिक्षाविद और भाषाविद, इस संघर्ष में एकजुट हुए हैं। आंदोलनकारियों ने गोरखा क्षेत्रीय प्रशासन के अनुबंध (गोरखा टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन-जी.टी.ए.) की प्रतियां जलाईं हैं और जी.टी.ए. के लिए होने वाले चुनावों का बहिष्कार करने का आह्वान किया है। ये गोरखा लोगों के साथ की गयी गद्दारी को साफ दर्शाता है। ये साफ तौर से दर्शाता है कि जी.टी.ए. इस क्षेत्र के लोगों को खुद अपनी ज़मीन का मालिक बनने की लम्बे समय की इच्छ को पूरा करने में नाकामयाब रहा है।

गोरखा लोगों द्वारा उठाई जा रही मांग एक राजनीतिक मांग है और इसके लिए राजनीतिक समाधान की ज़रूरत है। राजनीतिक समाधान खोजने की बजाय केंद्र और राज्य सरकारें दोनों ने ही लोगों पर आतंक की मुहिम चलाई है।

राज्य सरकार के सुरक्षा बलों ने प्रदर्षनकारियों पर आंसू गैस और लाठियों से हमला किया है। दार्जिलिंग में लोगों के आंदोलन को कुचलने के लिए सेना और अर्धसैनिक बलों को तैनात किया गया है। पुलिस द्वारा गोलीबारी में 4 लोगों की जान गयी है और सैकड़ों अन्य लोग घायल हुए हैं। सुरक्षा बलों ने गोरखा मुक्ति मोर्चा के दफ्तरों पर हमला किया है। राज्य सरकार हड़ताल को तोड़ने के लिए सेना और अर्धसैनिक बलों द्वारा लोगों पर हमले करवाकर, जानबूझकर लोगों को उकसा रही है व बंद के बावजूद दार्जिलिंग और कालिपोंग जिलों में सरकारी कर्मचारियों को दफ्तर में हाज़री लगाने के लिए दबाव डाल रही है।

देश के लोगों की नज़रों में इस आंदोलन को बदनाम करने के लिए पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार झूठा प्रचार कर रही है। मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने ऐलान किया है कि आंदोलन के नेताओं के “उत्तर-पूर्व के सशस्त्र गुटों” और “पड़ोसी देशों” के साथ संबंध हैं।

गोरखा लोगों के साथ भेदभाव

उत्तर-पूर्व के अन्य लोगों की तरह ही गोरखा लोगों को हिन्दोस्तानी राज्य के हाथों भेदभाव और दमन का सामना करना पड़ता है। अपने ही देश में उनके साथ परदेसियों जैसा बर्ताव किया जाता है। दार्जिलिंग, कोलकाता, मुंबई इत्यादि जगहों पर इन लोगों को “हम हिन्दोस्तानी हैं” का बैनर हाथ में लिए, खुद को हिन्दोस्तानी बताने की ज़रूरत पड़ती है। यह बात हिन्दोस्तानी राज्य पर एक गंभीर आरोप है। 

गोरखालैंड टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जी.टी.ए.)

गोरखालैंड टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जी.टी.ए.) एक अर्ध-स्वायत्त प्रशासनिक संस्था है। जिसे पश्चिम बंगाल के तीन पहाड़ी उपखंडों - दार्जिलिंग, कुर्सेओंग और मिरिक तथा दार्जिलिंग जिले के सिलिगुड़ी उपखंड के कुछ इलाके और पूरे कलिम्पोंग जिले के लिए एक बनाया गया है। जी.टी.ए. को 1988 में बनी दार्जिलिंग गोरखा हिल कौंसिल की जगह पर बनाया गया था, जिसने 23 वर्षों तक दार्जिलिंग पहाड़ी क्षेत्र का प्रशासन चलाया था।

जी.टी.ए. के गठन का बिल 2011 में पश्चिम बंगाल की विधान सभा में पारित किया गया। उसके पहले केंद्रीय गृहमंत्री, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और गोरखा जन मुक्ति मोर्चा (जी.जे.एम.) के बीच एक समझौते (मेमोरेंडम ऑफ अग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर किये गए। जी.टी.ए. का गठन इस लक्ष्य के साथ किया गया कि उसके पास प्रशासनिक, कार्यकारी और वित्तीय अधिकार होंगे, लेकिन कानून बनाने का अधिकार नहीं होगा।

2012 में पश्चिम बंगाल सरकार ने जी.टी.ए. के लिए चुनाव का ऐलान किया। जी.जे.एम. ने सभी चुनाव क्षेत्रों में जीत हासिल की।

बस्तीवादी हुकूमत से आज़ादी के लिए संघर्ष के समय से गोरखा लोग अपने अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष करते आये हैं। (देखिये बॉक्स: गोरखालैंड के आंदोलन का इतिहास)

मौजूदा आंदोलन और इससे पहले किये गए संघर्षों के गर्भ में, लोगों द्वारा खुद अपनी ज़मीन और संसाधनों के मालिक बनने और अपनी भाषा और संस्कृति के अधिकार की मांग है। वे खुद अपना शासन चलाने के अधिकार की मांग कर रहे हैं, और वे नहीं चाहते कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार उनके इस अधिकार को कुचले। यहां तक कि मौजूदा संघर्ष भी तब भड़का जब राज्य सरकार ने ऐलान किया कि पूरे राज्य में बंगाली भाषा को अनिवार्य किया जायेगा। इस ऐलान को बाद में वापस ले लिया गया, लेकिन तब तक गोरखा लोगों के बीच उन्माद भड़क चुका था। (देखिए बॉक्स : गोरखा टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन)

उत्तरी बंगाल में जिस इलाके को गोरखालैंड के रूप में देखा जा रहा है उसमें दार्जिलिंग, कलिम्पोंग, कुर्सेओंग और अन्य पहाड़ी जिलों की 25000 की आबादी आती है। इस इलाके के बहुसंख्य लोग गोरखा हैं, जो नेपाली भाषा बोलते हैं। 1950 में बने संविधान ने नेपाली भाषा को हिन्दोस्तान की राष्ट्रीय भाषाओं में से एक के रूप में मान्यता नहीं दी थी। पश्चिम बंगाल की सरकार ने 1961 में नेपाली भाषा को राज्य की आधिकारिक भाषा का दर्ज़ा दिया था जबकि केंद्र सरकार ने 1992 में उसे आधिकारिक भाषा का दर्ज़ा दिया।

गोरखा लोग बेहद मेहनती लोग हैं। उनमें से कई सेना और अन्य अर्धसैनिक बलों में सेवा कर रहे हैं। कुछ अन्य गोरखा सुरक्षा गार्ड, वाचमैन, लोडर, घरेलू मज़दूर, दुकानदार और व्यापारी के रूप में काम करते हैं। वे जहां भी काम पर जाते हैं उन्हें दूसरे दर्ज़े का नागरिक होने का अहसास कराया जाता है।

दार्जिलिंग क्षेत्र को मुख्य तौर से पर्यटन स्थल और हॉलिडे रिसोर्ट की तरह विकसित किया गया है। इसकी पूरी अर्थव्यवस्था पर्यटन पर निर्भर है। इस इलाके का दूसरा मुख्य उद्योग है चाय, जिसके निर्यात की ऊँची कीमत मिलती है। इन चाय के बाग़ानों पर बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों की मालिकी है। इस क्षेत्र का विशाल हिस्सा टूरिस्ट रिसोर्ट, अमीरों के लिए घरों और चाय बागानों के लिए घेर लिया गया है। गोरखा, जो कि यहां के स्थानीय लोग हैं, टूटे हुए खस्ता-हाल घरों में रहने को मजबूर हैं और पर्यटकों के लिए तमाम सेवाएं देने के साथ-साथ, चाय के बागानों में मज़दूरी का काम करते हैं।

गंभीर शोषण, गरीबी, अधिकारों से वंचित होना और भेदभाव की ज़िन्दगी की खिलाफ़त ही इस आन्दोलन के पीछे का कारण है। मौजूदा हिन्दोस्तानी संघ के भीतर तमाम राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं और लोगों के अधिकारों का बर्बर तरीके से उल्लंघन किया जाना, यही वजह है कि बार-बार अलग राज्य की मांग को लेकर समय-समय पर आंदोलन फूट पड़ते हैं। (देखी बॉक्स: उत्तर-पूर्व में अलग राज्य के लिए आंदोलन) 

हुक्मरान वर्ग की राजनीतिक पार्टियां जानबूझकर उन्माद को हवा देती हैं

उत्तर-पूर्व में अलग राज्य के लिए आंदोलन

अलग राज्यों की मांग को लेकर आंदोलन के चलते उत्तर-पूर्व के 8 राज्यों में से तीन राज्यों, मेघालय, मिज़ोरम और नगालैंड का गठन, असम राज्य से किया गया था। इस वक्त ऐसे ही अलग राज्य के लिए कम से कम 8 और आंदोलन उत्तर-पूर्व में चल रहे हैं। इनमें से कई आंदोलनों ने गोरखा आंदोलन को अपने समर्थन का ऐलान किया है।

इसमें शामिल है बोडो लोगों द्वारा बोडोलैंड के लिए आंदोलन, जिसमें असम का पश्चिमी और उत्तर-मध्य क्षेत्र शामिल है। बोडो समतल इलाके का सबसे बड़ा जनजाति समुदाय है। इसके अलावा असम में अलग राज्य को लेकर दो और आंदोलन चल रहे हैं, एक है कारबी जनजाति समुदाय के लिए कारबी अंगलोंग राज्य और दूसरा है दिमसा जनजाति के लिए दिमराजी राज्य। ये दोनों जनजातिय समुदाय मध्य-असम के तीन पहाड़ी जिलों में बसे हुए हैं।

एक और आंदोलन है कामतापुर राज्य के लिए कूच बिहार-राजबोंगशी समुदाय का आंदोलन, जो असम और पश्चिम बंगाल के क्षेत्र में फैला है। मेघालय में गारोलैंड के लिए भी आंदोलन चल रहा है।

इस आंदोलन में हुक्मरान वर्ग की राजनीतिक पार्टियों की भूमिका को अगर देखें, तो यह फिर से साफ हो जाता है कि इस समस्या का न्यायपूर्वक समाधान करने में इन पार्टियों की कोई रुचि नहीं है। ये पार्टियां हिन्दोस्तानी संघ में शामिल तमाम राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं और लोगों के अधिकारों के उल्लंघन के सवाल का हल निकालने से इंकार करती हैं। इसके विपरीत, ये पार्टियां लोगों के बीच उन्माद को हवा देने का काम करती हैं। ये पार्टियां राष्ट्रीयता और भाषा के आधार पर समाज के एक हिस्से को दूसरे हिस्से के खिलाफ़ भड़का रही हैं। ये पार्टियां इस पूरे मसले को केवल प्रतिस्पर्धी राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ़ चुनावी फायदे के संकुचित नज़रिये से देख रही हैं।

केंद्र में राज कर रही भाजपा और राज्य में राज कर रही टी.एम.सी. दोनों ही पार्टियां पहाड़ी इलाकों की स्थिति को भड़काने का आरोप एक-दूसरे पर लगा रही हैं। लेकिन गोरखा लोगों को उनके अधिकार से वंचित रखने में दोनों एकजुट हैं। 2014 के लोक सभा चुनाव में भाजपा ने दार्जिलिंग की सीट इस आश्वासन पर जीती थी कि वह अलग राज्य की मांग पूरी करेगी। लेकिन लोगों के पास ऐसा कोई भी तंत्र नहीं है जिससे कि वे सुनिश्चित कर सकें कि उनकी मांग को पूरा किया जायेगा। न तो लोक सभा में उनका प्रतिनिधि और न ही राज्य में सत्ता पर बैठी पार्टी उनसे किए गए वादों को पूरा करने के लिए जवाबदेह है। लोग संप्रभु नहीं हैं। राजनीतिक पार्टियों के वर्चस्व पर आधारित मौजूदा प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र और राजनीतिक प्रक्रिया लोगों को राजनीतिक सत्ता से वंचित करती है। इस राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया के ज़रिये हिन्दोस्तानी राज्य पर नियंत्रण करने वाले देश के सबसे बड़े इज़ारेदार अपना कार्यक्रम लागू करते हैं और लोगों की आकांक्षाओं को पैरों तले कुचलते हैं।

हिन्दोस्तानी संघ के पुनर्गठन की ज़रूरत

एक अलग राज्य गोरखालैंड के लिए चलाये जा रहे आन्दोलन से यह बात सामने आती है कि मौजूदा हिन्दोस्तानी संघ के 1950 में गठित किये जाने के 67 वर्ष बाद भी देश में राष्ट्रीय समस्या को हल नहीं किया गया है। हमारा संविधान तो राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं और लोगों के अस्तित्व और उनके अधिकारों को मान्यता तक नहीं देता है। केंद्रीय राज्य अलग-अलग राष्ट्रों की ज़मीन और उनके लोगों को बस्तीवादी नज़रिये से देखता है। यह नज़रिया है अधिकतम लूट के लिए लोगों को उनके अधिकारों से वंचित रखने का नज़रिया। हमारे देश के लोगों के राष्ट्रीय अधिकारों के संघर्ष को यह राज्य “देश की एकता और अखंडता के लिए खतरे” के रूप में देखता है, जिससे वहशी दमन के साथ निपटा जाना चाहिए। कश्मीर, मणिपुर, नगालैंड, असम और उत्तर पूर्व के अन्य लोगों का यही अनुभव है।

दार्जिलिंग पश्चिम बंगाल का हिस्सा कैसे बना?

आज़ादी से पहले दार्जिलिंग कभी भी पश्चिम बंगाल का हिस्सा नहीं था।

अंग्रेजों के हाथों हार के बाद नेपाल के गोरखा राजाओं ने 1816 की सिगौली संधि के तहत दार्जिलिंग और कुछ अन्य इलाकों का कब्ज़ा अंग्रेजों को सौंप दिया। अंग्रेजों ने पहले दार्जिलिंग को सिक्किम को सौंप दिया और बाद में 1835 में किराये पर ले लिया।

1905 में बंगाल के बंटवारे से पहले, दार्जिलिंग राजशाही खंड का हिस्सा था, जो अब बांग्लादेश का हिस्सा है। 1905-12 के बीच दार्जिलिंग भागलपुर खंड का हिस्सा था, 1947 में बंटवारे के बाद दार्जिलिंग को मौजूदा हिन्दोस्तानी संघ का हिस्सा बतौर, पश्चिम बंगाल के साथ जोड़ दिया गया।

हिन्दोस्तानी संघ का संविधान किसी भी मौजूदा राज्य की सीमा को बदलने या नया राज्य बनाने की ताक़त केवल केंद्रीय संसद के हाथों में देता है। इस ताक़त का इस्तेमाल बार-बार मनमाने ढंग से किया गया है ताकि देश के अलग-अलग राष्ट्रों और लोगों के बीच दुश्मनी पैदा की जा सके। इस ताक़त का इस्तेमाल सबसे बड़े इज़ारेदारों की हितों को सुनिश्चित करने और तमाम राष्ट्रों और राष्ट्रीयताओं के लोगों को उत्पीड़ित और सत्ता से दूर रखने के लिए किया गया है। (देखिये बॉक्स: दार्जिलिंग पश्चिम बंगाल का हिस्सा कैसे बना)

वैसे गोरखा लोगों को पूरा अधिकार है कि वे अलग राज्य गोरखालैंड की मांग करें। लेकिन साथ ही उन्हें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि मौजूदा हिन्दोस्तानी संघ के भीतर केवल एक नया राज्य बन जाने से लम्बे समय से चली आ रही उनकी समस्याओं का निवारण नहीं होगा। हमारे देश के उत्तर-पूर्व के राज्यों के सभी लोगों का कड़वा अनुभव, यही दिखाता है। इन राज्यों के लोग आज भी सत्ता से वंचित हैं, और केंद्रीय राज्य के रहमोकरम पर हैं। केंद्र सरकार ने यह सुनिश्चित कर रखा है कि सबसे बड़े इज़ारेदार पूंजीपति इन राज्यों के लोगों की ज़मीन, श्रम और प्राकृतिक संसाधनों को लूट सकें।

मौजूदा हिन्दोस्तानी संघ के पुनर्गठन की ज़रूरत है, सभी राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं और लोगों की स्वेच्छा पर आधारित एक संघ के रूप में, जो इस देश, हिन्दोस्तान को बनाते हैं। उस संघ में उन सभी राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं और लोगों को आत्म-निर्धारण के अधिकार की गारंटी होगी। इस पुनर्गठित नए संघ को सभी राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं और लोगों के हितों के बीच इस तरह से समन्वय बनाना होगा जिससे सभी का आपसी हित पूरा होगा। यह संघ सभी के मानव, लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय अधिकारों को सुनिश्चित करेगा। केवल इसी राह पर चलकर अपने देश में सभी राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं और लोगों का दमन खत्म किया जा सकता है।

मौजूदा हिन्दोस्तानी संघ पर नियंत्रण चला रहे देश के सबसे बड़े सरमायदार कभी भी इस तरह का पुनर्गठन नहीं कर पायेंगे। शोषण और दमन पर आधारित इस मौजूदा व्यवस्था से उनको बहुत फायदा है, जिसमें तमाम राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं और लोगों का दमन शामिल है।

केवल मज़दूर वर्ग में ही हिन्दोस्तान के तमाम राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं और लोगों के दमन को खत्म करने की दिलचस्पी है और काबिलियत भी है। हमारे देश के सभी मज़दूरों और किसानों को मज़दूर वर्ग की अगुवाई में राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में लेनी होगी। राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में लेकर हिन्दोस्तान के मज़दूर और किसान, हिन्दोस्तानी अर्थव्यवस्था की दिशा को अधिकतम पूंजीवादी लूट से बदलकर सभी लोगों के लिए सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में मोड़ देंगे। वे हिन्दोस्तानी संघ का पुनर्गठन करेंगे जिससे इस संघ का हिस्सा बने सभी के अधिकारों की हिफाज़त की जा सके। यह नया हिन्दोस्तानी संघ हमारे देश के सभी लोगों की एकता और एकजुटता सुनिश्चित करेगा और दुनियाभर में साम्राज्यवाद के खिलाफ़ मजबूत गढ़ होगा।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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