प्रधानमंत्री मोदी की इस्राइल यात्रा : खतरनाक जन-विरोधी गठबंधन की मजबूती

Submitted by cgpiadmin on रवि, 16/07/2017 - 23:30

जुलाई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन दिवसीय इस्रराइल यात्रा, हिन्दोस्तान और इस्राइल के बीच एक खतरनाक जन-विरोधी गठबंधन को मजबूत करने का संकेत है।

हिन्दोस्तान और इस्राइल के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना के पच्चीस सालों के बाद यह इस्राइल में हिन्दोस्तान के प्रधानमंत्री द्वारा पहली यात्रा थी। हिन्दोस्तानी प्रधानमंत्री की यात्रा से जुड़़े महत्व पर जोर देने के लिए इस्राइल सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। तेल-अवीव हवाई अड्डे पर प्रवेश के समय से लेकर इस्राइल छोड़ने तक - इस्राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू, पूरे समय मोदी के साथ रहे। गौर करने की बात यह है कि फिलिस्तीनी लोगों या उनके लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष के बारे में पूरी यात्रा के दौरान हिन्दोस्तानी प्रधानमंत्री ने कहीं भी एक शब्द नहीं कहा। 

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2014 में गाज़ा पर इस्राइली बमबारी के विरोध में लदंन में प्रदर्शन

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2014 में गाज़ा पर इस्राइली बमबारी से पीड़ित महिला दयनीय हालत

इस यात्रा का महत्व यह है कि हिन्दोस्तानी राज्य ने इस्राइल के साथ अपने बढ़ते संबंधों पर परदे को हटाकर, इन संबंधों को और न छिपाने का फैसला किया है। यह बिना किसी परवाह के इस्राइल के साथ सामरिक संबंधों में खुले तौर पर सांठ-गांठ करने का निर्णय है।

हिन्दोस्तान एक ऐसे देश को गले लगा रहा है जिसे सारे अरब देशों में “अमरीका के स्थिर विमान वाहक” के रूप में जाना जाता है। इस्राइल पश्चिम एशिया में अमरीकी साम्राज्यवाद का सबसे विश्वसनीय सहयोगी है। यह दुनिया के सबसे सैन्यीकृत देशों में से एक है। इस्राइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने दुनियाभर में खुफिया नेटवर्क स्थापित किए हैं और कई देशों में नियमित रूप से आतंकवादी हमलों को अंजाम दिया है। साथ ही साथ, ईरानी परमाणु कार्यक्रम को नाकाम करने के लिए मोसाद ने ईरान के परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या का आयोजन किया था। इस्राइल अमरीका के साथ मिलकर पश्चिम एशिया के नक्शे को बदलने के लिए काम कर रहा है। वे मौजूदा राज्यों में दखलंदाज़ी करके सांप्रदायिक विवाद और गृहयुद्ध करवाकर उन्हें नष्ट कर रहे हैं। इस्राइल की खुफिया एजेंसियां सिरिया और पश्चिम एशिया के अन्य देशों में सक्रिय आई.एस.आई.एस. और अन्य आतंकवादी संगठनों के साथ करीबी से जुड़ी हैं।

हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा इस्राइल की इस प्रकार खुली मित्रता पश्चिम एशिया के सभी देशों और लोगों के लिए गहरी चिंता का कारण है, जो कि अपनी स्वतंत्रता और संप्रभुता की रक्षा में लड़ रहे हैं।

विशेष रूप से, यह बहादुर फिलिस्तीनी लोगों के दिल में चाकू भोंकने के बराबर है जो अपने राष्ट्रीय अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष करते आ रहे हैं।

इस्राइल एक ऐसा देश है जिसने अंतर्राष्ट्रीय राय का विरोध किया है और 1967 में युद्ध के दौरान मिस्र, जॉर्डन और सिरिया से ज़ब्त किए गए क्षेत्रों, यानी गाज़ापट्टी, वेस्ट बैंक और गोलन हाइट्स पर कब्ज़ा जारी रखा है। इस्राइली कब्जे़ वाले क्षेत्रों में अपनी बस्तियां बनाता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस्राइल के खिलाफ़ हर एक प्रतिबंध की स्वीकृति को अमरीका ने वीटो किया है।  

कब्ज़ा किए गए क्षेत्रों में, मनमाने तरीके से गिरफ्तारी और कैद के साथ वास्तव में सैनिक कानून लागू हैं। सामूहिक सज़ा, अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत बाधित है, परन्तु इस्राइल में यह एक आम बात है। परिवारों को अलग कर दिया जाता है, ज़मीन का विभाजन होता है, घरों पर बुलडोज़र चलाये जाते हैं और लोगों को सामूहिक सज़ा के रूप में क्षेत्र से बाहर निकाल दिया जाता है, आत्मघाती हमलों को रोकने के नाम पर इस्राइली कब्जे़ वाले क्षेत्रों में दीवारें बनाई गई हैं - ये कुछ उदाहरण हैं।

फिलिस्तीन के लोगों पर ऐतिहासिक अन्याय

यहूदी धर्म के लोग कई सदियों से विश्व के अलग-अलग देशों में रह रहे हैं। इन देशों में हिन्दोस्तान भी शामिल है। धर्म के नाम पर उन्हें यूरोप के कई देशों में शासक वर्ग द्वारा, उत्पीड़न और भेदभाव का सामना करना पड़ा है। उन्नीसवीं सदी के अंत में, यूरोप में यहूदी धर्म को मानने वालों के लिए एक अलग मातृभूमि की स्थापना करने का आंदोलन शुरू हुआ। इसे जिओनिस्ट मूवमेंट (यहूदी आंदोलन) के नाम से जाना गया।

पहले विश्व युद्ध के अंत में, जब तुर्की के राज्य पतन हुआ तब ब्रिटेन और फ्रांस ने तुर्की के राज्य को आपस में बांटने के लिए, साइकस-पिकोट नामक गुप्त समझौता किया। जिसमें फिलिस्तीन का क्षेत्र अंग्रेजों के नियंत्रण में आया।

यहूदी आंदोलन को बर्तानवी साम्राज्यवादियों ने बढ़ावा दिया। आर्थर बालफौर, ब्रिटेन के विदेश सचिव ने 2 नवम्बर, 1917 में यहूदी समुदाय के नेता वालटर रोथ्स्चाइल्ड को लिखा कि “हमारे सम्राट की सरकार यहूदी लोगों के लिए फिलिस्तीन में राष्ट्र बनाने की योजना को सकारात्मक मानती है...।”

पहले और दूसरे विश्व युद्ध के बीच में जब यूरोप में यहूदियों के खिलाफ़ उत्पीड़न तेज़ हुआ, तब अनेक यहूदी ब्रिटेन द्वारा शासित फिलिस्तीन में विस्थापित हुए। यह ऐसे समय में हुआ जब अमरीका और कई अन्य देश यहूदियों के लिए अपने दरवाज़े बंद कर रहे थे। इस प्रवास का वित्तपोषण धनी यहूदियों ने किया, जिनका यहूदी आंदोलन पर नियंत्रण था। निर्वासित यहूदियों ने फिलिस्तीनियों की भूमि पर बलपूर्वक कब्ज़ा करना शुरू कर दिया। बर्तानवी उपनिवेशवादियों ने बड़े मज़े से फिलिस्तीनियों और निर्वासित यहूदियों के बीच की लड़ाई को देखा।

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, नाज़ियों ने यूरोप में अपने कब्ज़े वाले क्षत्रों में यहूदी लोगों का अभूतपूर्व जनसंहार आयोजित किया। नाज़ियों ने इस जनसंहार को “अंतिम समाधान” का नाम दिया। ऑस्च्वित्ज, बिर्केनॉ और ट्रेबलिंका के बंदी शिविरों और गैस कक्षों में कम से कम छः लाख यहूदियों की हत्या कर दी गई। दूसरे विश्व युद्ध के बाद, जो यहूदी यूरोप में मौत के शिविर से जीवित निकल पाये, वे इस्राइल में जाकर बस गए।

1947 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने फिलिस्तीन के लिए एक विभाजन योजना प्रस्तावित की जिसमें स्वतंत्र अरब और यहूदी राज्यों के निर्माण की सिफारिश की गई।

इस योजना के अनुसार, इस्राइली राज्य 14 मई, 1948 को स्थापित हुआ, उस धरती पर जिसे फिलिस्तीन के रूप में जाना जाता था। अपनी स्थापना के तुरंत बाद, इस्राइल ने और अधिक प्रदेशों का अधिग्रहण करने के लिए, युद्ध करना शुरू कर दिया। लाखों फिलिस्तीनियों को अपने देश से निष्कासित कर दिया गया और पड़ोसी देशों में शरणार्थी बना दिया गया। हर साल, 15 मई को फिलिस्तीनी लोग “नकबा”- “तबाही का दिन” के रूप में मनाते हैं। तब से फिलिस्तीनी लोगों ने कभी भी अपनी खोई हुई मातृभूमि के लिए संघर्ष करना नहीं छोड़ा है।

इस्राइल अपने निर्माण के बाद से, एक यहूदी राज्य रहा है और अपने स्वयं के कानून के अनुसार, यहूदी चाहे किसी भी देश के हों, उनके लिये इस्राइल को मातृभूमि का दर्जा मिलता है।

सभी यहूदी लोगों पर “लौटने की विधि” की शुरुआत करते समय, इस्राइल ने 1948 में निष्कासित कर दिए गए फिलिस्तीनी लोगों के लौटने की विधि को अस्वीकार कर दिया।

इस्राइल ने जान-बूझकर सभी देशों में रहने वाले यहूदियों को इस्राइल में बसने के लिए प्रोत्साहित करके, मूल फिलिस्तीनी निवासियों को विस्थापित किया तथा उनकी भूमि पर कब्ज़ा किया। इसके बाद 1967 में युद्ध के दौरान इस्राइल ने अपने प्रदेशों का विस्तार किया। यह फिलिस्तीनी लोगों को अपना दुश्मन मानता है।

इस्राइल के लोगों को एक ऐसे देश में रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जिसमें सेना में अनिवार्य भर्ती, हमलों और प्रतिशोधों के भय के साथ अत्यधिक सैन्यीकरण किया जाता है। फिलिस्तीनी लोगों के लिए, दोनों, इस्राइल और उसके कब्ज़े वाले क्षेत्रों में, ज़िंदगी जीता-जागता नरक है क्योंकि उन्हें सभी अधिकारों से वंचित कर दिया गया है।

इस्राइल के राज्य ने फिलिस्तीनी लोगों के अधिकारों के सन्दर्भ में संयुक्त राष्ट्र के किसी भी प्रस्ताव को लागू करने से इंकार कर दिया है। 1975 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव 3379 के तहत ज़ाऊनवाद को नस्लवाद का एक रूप होने की घोषणा की। यह वह समय था जब फिलिस्तीनी संघर्ष बहुत ही तेज़ हो गया था और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इसे मान्यता देने पर मजबूर होना पड़ा था। हालांकि, शीत युद्ध के अंत के बाद, 16 दिसंबर, 1991 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने इस प्रस्ताव को रद्द कर दिया।

इस्राइल की जेलों में हजारों फिलिस्तीनी कैदी सड़ रहे हैं। बार-बार, यहां तक कि सिर्फ 2 महीने पहले ही, इस्राइली राज्य द्वारा उन पर अमानवीय अत्याचारों के विरोध में फिलिस्तीनी कैदी भूख हड़ताल पर चले गए हैं, और राजनीतिक कैदियों के दर्जे़ से अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं। 

इस्राइली राज्य निरंतर रूप से अपने कब्जे़ वाले क्षेत्रों पर आर्थिक नाकेबंदी लगाता है। वह गाज़ापट्टी में असैनिक आबादी के खिलाफ़ घातक भूमि और हवाई हमले बार-बार करता है, जिसके कारण बड़े पैमाने पर विनाश और सामूहिक हत्याएं हुई हैं।

इस्राइली राज्य खुद को “आतंकवाद का शिकार” के रूप में दिखाता है। वास्तविकता यह है कि इस्राइल मूल रूप से फिलिस्तीन निवासियों पर आतंकवादी हमलों के माध्यम से स्थापित किया गया था। अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे फिलिस्तीनी लोगों के खिलाफ़ इस्राइल राज्य क्रूर राजकीय आतंकवाद का आयोजन जारी रखता है। जिनको इस्राइल “आतंकवादी” कहता है, वास्तव में वे फिलिस्तीनी लोगों के अपने राष्ट्रीय अधिकारों को पाने के लिए पूरी तरह से न्यायोचित मुक्ति का संग्राम है।

हिन्दोस्तानी राज्य, पिछले दो दशकों से, “ज़वाबी कार्यवाही” के लिए इस्राइल से सहायता ले रहा है। हिन्दोस्तान ने इस्राइल के साथ नजदीकी से खुफिया सहयोग स्थापित किये हैं। इस्राइल की सशस्त्र सेना गुप्त रूप से “काउंटर गोरिल्ला युद्ध” और शहरी युद्ध में हिन्दोस्तानी सशस्त्र बलों को प्रशिक्षण देने में लगी हुई है। इस्राइल हिन्दोस्तानी सशस्त्र बलों के लिए परिष्कृत सैन्य हार्डवेयर का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो, हिन्दोस्तानी राज्य इस्राइल द्वारा फिलिस्तीनी लोगों के संघर्ष को दबाने के अनुभव से सीखना चाहता है ताकि वह हिन्दोस्तान में अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे लोगों के संघर्ष को कुचलने के काबिल हो। इस्राइल के साथ संबंधों को मजबूत करना हमारे देश के लोगों या पश्चिम एशिया में शांति के हित में नहीं है। इसका सख्ती से विरोध किया जाना चाहिए।  द

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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