ब्रिटेन में चुनाव - जून 2017 : ब्रिटेन में राजनीतिक व्यवस्था का संकट

Submitted by cgpiadmin on रवि, 16/07/2017 - 22:30

जून में आयोजित ब्रिटेन के मध्यावधि चुनावों के परिणामों से पता चलता है कि ब्रिटेन तीव्र राजनीतिक संकट से जूझ रहा है। 2015 में, ब्रिटेन के सरमायदार, कंसर्वेटिव पार्टी के लिए जीत हासिल करने में सफल हुए और डेविड कैमरून को प्रधानमंत्री बनाया गया। आपसी तीव्र अंतर्विरोधों का सामना करते हुए, बर्तानवी सरमायदार वर्ग ने 2016 में ब्रेक्सिट (यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के निकलने) पर एक जनमत संग्रह का आयोजन किया। जनमत संग्रह के परिणामों से यह पता चलता है कि पूंजीपति वर्ग के भीतर गहरे विभाजन हैं। डेविड कैमरून ने इस्तीफा देकर प्रधानमंत्री का पद थेरेसा मे के लिए खाली कर दिया।

थेरेसा मे की सरकार ने जून में मध्यावधि चुनावों के लिए बुलावा दिया, संसद में अपना बहुमत बढ़ाने तथा मज़दूर वर्ग और लोगों पर हमलों को तेज़ करने के लिए, वे इसे “लोगों के जनादेश” के रूप में घोषित करने की आशा कर रहे थे। हालांकि कंसर्वेटिवों को बहुमत में आने के लिए ज़रूरी वोटों में कमी आई। इसलिए थेरेसा मे अब उत्तरी आयरलैंड की डेमोक्रेटिक यूनियन पार्टी से प्राप्त समर्थन पर चल रही अल्पमत वाली सरकार की प्रधानमंत्री हैं।

एक तरफ मज़दूर वर्ग और लोगों तथा दूसरी तरफ बर्तानवी सरमायदार वर्ग के बीच में तेज़ अंतर्विरोध के चलते, चुनावों को निर्धारित समय से पहले करवाया गया। पिछले कई दशकों से “मितव्ययिता” के नाम पर बर्तानवी पूंजीपति वर्ग छात्रों, युवाओं, सेवानिवृत्त लोगों और मज़दूर वर्ग पर अपने हमलों को तेज़ कर रहा है। नौकरियों में कटौती, शिक्षा शुल्क में वृद्धि और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं व पेंशन लाभों में कटौती की वजह से मज़दूर वर्ग और लोगों में बहुत गुस्सा है और उनका सरकार के ऊपर से विश्वास उठ गया है। वे अपने अधिकारों पर हो रहे हमलों का अंत करने की मांग कर रहे हैं।

साथ ही, बर्तानवी पूंजीपति वर्ग के भीतर तीव्र अंतर्विरोध भी हैं। यूरोप के साथ वाणिज्य और व्यापार का सवाल, आप्रवासी मज़दूरों का मुद्दा और इसी तरह के अन्य मुद्दों पर पूंजीपतियों के भीतर कोई स्पष्ट एकता या समझ नहीं बन पायी है। इसकी वजह से हर स्तर पर अराजकता पैदा हो गई है। पूंजीपतियों ने अपने अंतर्विरोधों को सुलझाने के लिए और देश में मज़दूर वर्ग और लोगों पर हमलों को और तेज़ करने के लिए, मध्यावधि चुनावों का आयोजन किया।

यह सच है कि ब्रिटेन जैसी पूंजीवादी व्यवस्था में, पूंजीपति वर्ग ही, निर्धारित करता है कि उसकी ओर से सरकार चलाने का काम कौन सी पार्टी करेगी। संसदीय लोकतंत्र और सर्वव्यापक मताधिकार, इस वास्तविकता को छिपाने का काम करते हैं। जून 2017 के चुनावों में कंसर्वेटिव स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर पाए, जिससे बर्तानवी पूंजीपति वर्ग के भीतर तीव्र हो रहे अंतर्विरोधों का पता चलता है। यह राजनीतिक व्यवस्था, जिसे प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र भी कहा जाता है, एक ऐसे संकट में फंस गई है जिसमें कुछ भी हल नहीं हो सकता।

चुनाव आयोजित करके, पूंजीपति वर्ग मेहनतकश लोगों के जीवन की रोजमर्रा की समस्याओं से उनका ध्यान हटाने की कोशिश कर रहा है।

मज़दूर वर्ग और लोगों के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि यह पूंजीवादी लोकतंत्र उनकी समस्याओं का कोई समाधान नहीं कर सकता। जितना भी बर्तानवी पूंजीपति यह ढिंढोरा पीटते रहें कि चुनाव “लोगों की इच्छा” की अभिव्यक्ति है, यह और भी स्पष्ट हो रहा है कि इस “प्रतिनिधित्ववादी” लोकतंत्र की कोई विश्वसनीयता नहीं है। हाल के चुनावों में, प्रतिस्पर्धात्मक राजनीतिक दलों ने लोगों के बीच में स्वयं प्रचार भी नहीं किया, बल्कि उन्होंने अपने अभियानों को चलाने के लिए निजी एजेंसियों को नियुक्त किया, जो ख़ास निजी हितों के लिए काम करती हैं। वास्तव में यह हिन्दोस्तान और साथ ही ब्रिटेन में भी हो रहा है। जो मतदाताओं को सबसे ज़्यादा झूठी जानकारी देकर गुमराह कर सकता है, उन निजी एजेंसियों को रखा जाता है। नतीजतन, लोग अपने हितों के बचाव में एक राजनीतिक दृष्टिकोण विकसित करने के दायरे से वंचित हो जाते हैं। बल्कि, लोगों को विश्वास दिलाया जाता है कि उन्हें सिर्फ इस या उस पूंजीपति राजनीतिक दल के बीच में से चुनाव करने का अधिकार है।

ऐसा भी बताया जाता है कि लोग व्यक्तित्व के आधार पर इस या उस पार्टी का चयन कर रहे हैं। ऐसे प्रचार का प्रयोग भ्रम फैलाने के लिए भी किया जाता है, क्योंकि यह व्यवस्था ही ऐसी है जो लोगों को अपने अधिकारों से वंचित रखती है और इसमें राज करने वालों को कोई फर्क नहीं पड़ता भले ही ये या वो नेता “करिश्माई” हैं या अधिक प्रेरक वक्ता हैं।

एक मितव्ययिता-विरोधी एजेंडे के लिए और विदेशी युद्धों में बर्तानवी भागीदारी का अंत करने के लिए लोगों की मांग, सत्ताधारी वर्ग के उस दावे के खिलाफ़ संघर्ष कर रही है, जिसमें यह कहा गया है कि निजी इज़ारेदारों के हितों को सुरक्षित रखना चाहिए। थैचर के शासनकाल के दौरान, जब से मितव्ययिता एजेंडा लागू किया गया था और लगातार सरकारों ने इसका बचाव किया था, तब से यह संघर्ष और भी तीव्र होता जा रहा है। राजनीतिक व्यवस्था और प्रणाली का मूल रूप से लोगों के हित में नव-निर्माण करना होगा। यह एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जो लोगों को सशक्त बनाती हो ताकि वे अपने जीवन और रोज़गार की सुरक्षा के लिए किये गये प्रयासों में सफलता सुनिश्चित कर सकें।  

Tag:    ब्रिटेन में चुनाव    व्यवस्था का संकट    कंसर्वेटिव पार्टी    Jul 16-31 2017    Struggle for Rights    Privatisation    2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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