किसानों ने तमिलनाडु के तूतूकुड़ी जिले में सभा का आयोजन किया

Submitted by cgpiadmin on रवि, 16/07/2017 - 19:30

जून 2017 में तमिघा विवासयीगल संगम (संगम) ने तमिलनाडु के तूतूकुड़ी जिले में पसुवंदानी के पास एक किसान सभा का आयोजन किया। आस-पास के गांवों के किसानों ने इस सभा में सक्रियता से हिस्सा लिया। संगम के नेताओं और कार्यकर्ताओं के अलावा कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी, वर्कर्स यूनिटी मूवमेंट और असंगठित मज़दूर फेडरेशन के कार्यकर्ताओं और नेताओं ने भी सभा में हिस्सा लिया। सभा की शुरुआत दिवंगतों को श्रद्धांजलि देकर की गई। हाल ही में जिन नेताओं और समर्थकों का देहांत हो गया था उन्हें याद किया गया, उनमें शामिल हैं - चिल्लोंग कुलम के करुपस्वामी, रामसुब्बू नायकर और रामकृष्ण चेट्टियार, जम्बुलिंगापुरम के मुथैया रेड्डीयर और तूतूकुड़ी के कामरेड जॉर्ज गोम्स।

तूतूकुड़ी के श्री सरवाना मुथुवेल, जम्बुलिंगापुरम के श्री रामास्वामी, संगम के नेता श्री देवराज, असंगठित मज़दूर फेडरेशन के कामरेड कृष्णामूर्ति, वर्कर्स यूनिटी मूवमेंट के कामरेड भास्कर और कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के कामरेड विल्सन ने सभा को संबोधित किया।

संगम के वक्ताओं ने तमिलनाडु में सूखे की व्यापकता के बारे में बताया, कि इसकी वजह से किसानों को बेहद मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। सिंचाई की सुविधा के अभाव में किसान अपनी फसल नहीं बचा पा रहे हैं। कई वर्षों के सूखे की वजह से, अब तो कई क्षेत्रों में पीने का पानी भी नहीं मिल रहा है और किसानों के पशु मर रहे हैं। अपनी ज़मीन और पशुओं की हालत को देखकर किसान बहुत संकट में हैं। कुछ किसान जिन पर कर्ज़ बकाया था, वे अपनी तकलीफ़ और बदनामी को बर्दाश्त नहीं कर पाए और उन्होंने आत्महत्या कर ली। कई अन्य किसान रोज़गार की तलाश में शहरों को चले गए हैं। सभी वक्ताओं ने इस हालत के लिए सरकार को दोषी करार दिया, जो न तो किसानों को सस्ते दाम पर खेती में इस्तेमाल होने वाली सामग्री देती है और न ही उनकी फसलों को लाभकारी मूल्य पर खरीदती है, जिसकी वजह से किसान गहरे संकट में आ गए हैं।

वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि अर्थव्यवस्था की मौजूदा दिशा ऐसी है कि सरकार सभी ज़रूरी सेवाओं का निजीकरण कर रही है, और अपनी जिम्मेदारी निभाने से इंकार कर रही है, किसानों पर इसका बहुत बुरा असर हुआ है। नोटबंदी और बाज़ार में नोटों की कमी की वजह से परिस्थिति और भी खराब हो गयी है। वक्ताओं ने मांग रखी कि किसानों के कर्ज़ों को माफ़ किया जाना चाहिए जो उन्होंने खेती के लिए उठाये हैं। वक्ताओं ने इस बात को भी ज़ोरदार तरीके से रखा कि कावेरी नदी का पानी न तो तमिलनाडु के किसानों और न ही कर्नाटक के किसानों के हित में इस्तेमाल किया जा रहा है, और सभी सरकारें “बांटो और राज करो” की नीति चला रही हैं। संकट के समय कृषि सहकारी बैंक और प्रशासन किसानों को मदद करने की बजाय उनको परेशान कर रहे हैं। किसानों को तालाब की सूखी और उपजाऊ मिट्टी को अपने खेतों में ले जाने से रोका जा रहा है, जबकि पारंपरिक तौर से यह मिट्टी किसानों को मुफ्त में मिल जाया करती थी। वास्तविकता में सरकार किसानों को पंप सेट चलाने के लिए बिजली उपलब्ध नहीं कर रही है, और झूठा प्रचार कर रही है कि किसानों को मुफ्त में बिजली दी जाती है। उन्होंने सरकार की निंदा करते हुए बताया कि सूखा राहत लोगों तक पहुंचे, यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार कुछ भी नहीं कर रही है, वक्त्ताओं ने इसके लिए सरकार की निंदा की।

सभी वक्ताओं ने किसानों की संघर्षशील एकता की सराहना की और उनकी जायज़ मांगों के लिए पूरा समर्थन दिया। कामरेड विल्सन ने कहा कि किसानों के सभी मसले हमेशा के लिए तभी हल होंगे, जब राजनीतिक सत्ता मज़दूरों और किसानों के हाथों में होगी। 

किसानों की तमाम मांगों पर जोर देने के साथ-साथ सभी कृषि कर्ज़ माफ़ी, नदियों के पानी का मसला सुलझाना, आदि पर सभा ने अनेक प्रस्ताव पारित किए।

सभी किसानों की एकता बनाने और किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक मजबूत संगठन तैयार करने के फैसले के साथ सभा का समापन किया गया।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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