हिन्दोस्तान की आज़ादी के 70 वर्ष :

Submitted by cgpiadmin on बुध, 02/08/2017 - 03:30

हिन्दोस्तान के लोग तभी आज़ाद होंगे जब हम 1947 में स्थापित किये गये बड़े पूंजीपतियों के राज की जगह पर अपना राज स्थापित करेंगे

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 29 जुलाई, 2017

15 अगस्त, 1947 को बर्तानवी उपनिवेशवादी राज से हिन्दोस्तानी आज़ादी की औपचारिक घोषणा की गई थी। बर्तानवी हिन्दोस्तान को धर्म के आधार पर दो भागों में बांट दिया गया और हिन्दोस्तान व पाकिस्तान के दो आज़ाद राज्य बनाये गये। पूर्वी पाकिस्तान, जो भूगोलिक तौर पर बाकी पाकिस्तान से अलग था, 1971 में अगल हो गया और बांग्लादेश का आज़ाद राज्य बन गया।

आज, 70 वर्ष बाद, हिन्दोस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के अधिकतम लोग जीवन के लगभग सभी पहलुओं में आज़ादी से वंचित हैं। सबके लिये वस्त्र पैदा करने वाले मज़दूरों के पास अपने परिवारों के लिये पर्याप्त कपड़े नहीं होते हैं। पूरी आबादी के लिये भोजन और कपड़ा पैदा करने वाले किसान खुद बहुत बुरी हालत में हैं और हजारों किसान प्रति वर्ष खुदकुशी करने को मजबूर होते हैं। अमीरों और शक्तिशाली तबकों के लिये बहुमंजिले मकान और महल बनाने वाले खुद झुग्गी-बस्तियों में, बेहद अमानवीय हालतों में जीने को मजबूर हैं।

करोड़ों मां-बाप दिनभर बेताबी के साथ इंतज़ार करते हैं कि क्या उनके बेट-बेटियां सुरक्षित घर वापस आयेंगी? क्या उनका पुलिस के साथ कोई लफड़ा तो नहीं हुआ होगा? क्या वे खास धर्म या जाति को निशाना बनाने वाले किसी अपराधी गिरोह का शिकार बन जायेंगे? या क्या वे किसी संदिग्ध बम विस्फोट से मारे जायेंगे? कश्मीर, मणिपुर, पूवोत्तर राज्यों तथा मध्य हिन्दोस्तान के विस्तृत आदिवासी क्षेत्रों के “अशांत इलाकों” में सेना और अर्ध-सैनिक बलों को यह बताया जाता है कि वे दुश्मनों के इलाके में हैं। उन्हें शक मात्र के आधार पर किसी पर भी गोली चलाने का पूरा अधिकार है। जीवन की इस असुरक्षा के साथ-साथ, रोज़गार की भी बड़ी असुरक्षा है। किसी को यह नहीं पता होता है कि कब उसकी नौकरी चली जायेगी या उसका खेती का काम या छोटा धंधा चैपट हो जायेगा।

दूसरी ओर, अति अमीर अल्पसंख्यक तबके को हमारी भूमि और श्रम का शोषण और लूट करके अधिक से अधिक धन कमाने की बेइंतहा छूट है। टाटा, अंबानी और बिरला की अगुवाई में लगभग 150 इज़ारेदार पूंजीवादी घराने खनन, विनिर्माण, ऊर्जा, निर्माण, वित्त, परिवहन, संचार, व्यापार और अन्य सेवाओं में उत्पादन के अधिकतम साधनों के मालिक हैं और प्रत्यक्ष रूप से या सरकारी मशीनरी के ज़रिये उन पर नियंत्रण करते हैं। वे अपने भरोसेमंद राजनीतिक पार्टियों और नेताओं के ज़रिये अपना काम करते हैं। वे अपने अधिकतम मुनाफ़ों को सुनिश्चित करने के लिये कानून और नीतियां बनाते हैं। वे दुनियाभर में अपने कारोबारों के साम्राज्य बना रहे हैं, जबकि हमारे मेहनतकश लोग दुनिया के सबसे अधिक ग़रीब लोगों में गिने जाते हैं।

इस भयानक स्थिति का क्या कारण है? अगर हम 70 वर्ष पहले आज़ाद हो गये थे तो आज तक हम क्यों हर प्रकार के पिछडे़पन और लगातार बढ़ते शोषण व दमन से पीड़ित हैं?

प्रधानमंत्री और शासक वर्ग के दूसरे वक्ता कभी सच नहीं बतायेंगे। वे ऐसी बातें करते हैं जैसे कि वह उद्देश्य 70 वर्ष पहले हासिल हो गया था, जिसके लिये हमारे शहीदों ने संघर्ष किया था।

उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष के अंदर दो लाइन

बीते 200 से अधिक वर्षों से हमारे लोग अनेक बार क्रांति के लिये उठ खड़े हुये हैं। 1857 के महान ग़दर में इस उपमहाद्वीप के लोग बर्तानवी राज को खत्म करने के लिये, धर्म, जाति, भाषा और संस्कृति की दरारों को तोड़कर एकजुट हुये थे। उन्होंने यह नारा बुलंद किया था कि “हम हैं इसके मालिक, हिन्दोस्तान हमारा!” उस ग़दर को बर्तानवी शासकों ने बड़ी बेरहमी से कुचल दिया। परन्तु हमारे लोगों के दिलो-दिमाग में उस नये हिन्दोस्तान की धारणा और आकांक्षा बनी रही, जिसमें लोग खुद अपने भविष्य के मालिक होंगे।

बर्तानवी शासकों ने लोगों को बांटने और उस प्रकार की क्रांतिकारी बग़ावत को रोकने के लिये, बड़े बेरहम और चतुर तरीके अपनाये। उन्होंने ज़मींदारों और पूंजीपतियों का एक तबका पैदा किया जो बर्तानवी राज के प्रति वफादार था। उन्होंने बड़ी सक्रियता के साथ, धर्म के आधार पर हिन्दोस्तानी लोगों को बांटा, जातिवादी और आदिवासी पहचानों को और मजबूत किया तथा एक-एक समुदाय पर अलग-अलग हमला किया। उन्होंने कांग्रेस पार्टी, मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा और कई अन्य राजनीतिक पार्टियां व सांप्रदायिक समुदाय पैदा किये, ताकि लोगों के क्रांतिकारी गुस्से को गुमराह और ठंडा किया जाये। उन्होंने संपत्तिवान वर्गों के राजनीतिक प्रतिनिधियों को बर्तानवी राज के अंदर शामिल करने के लिये कानून बनाये।

1913 में अमरीका और कनाडा में निवासी हिन्दोस्तानी मजदूरों, छात्रों और शिक्षकों ने हिन्दुस्तान ग़दर पार्टी की स्थापना की थी। उसका खास मकसद था एक और हथियारबंद जन-विद्रोह आयोजित करके हिन्दोस्तान पर बर्तानवी शासन का तख्ता पलट करना। मज़दूरों, किसानों और सैनिकों की इस पार्टी ने 1915-16 में, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, ऐसा विद्रोह आयोजित किया। हिन्दोस्तान व दुनिया की कई अन्य जगहों पर बर्तानवी हिन्दोस्तानी सेना की अनेक टुकड़ियों में विद्रोह हुआ।

20वीं सदी में उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष का इतिहास दो आपस में विरोधी लाइनों के बीच टकराव का इतिहास है। मज़दूर, किसान और देशभक्त जनसमुदाय उपनिवेशवादी राज्य को जड़ से उखाड़ फेंकने तथा आज़ाद हिन्दोस्तान की नई नींव डालने के क्रांतिकारी उद्देश्य से प्रेरित होकर एकजुट हुये। परन्तु बड़े पूंजीपति और बड़े ज़मींदार यह मानते थे कि बर्तानवियों के चले जाने के बाद हिन्दोस्तान पर शासन करने का अधिकार उन्हें मिलना चाहिये। उन्होंने अपने हाथ में राजनीतिक सत्ता लेने के उद्देश्य से, बर्तानवियों के साथ सौदा करने के लिये, जनता के उपनिवेशवाद-विरोधी जज़बातों का इस्तेमाल किया। उन्होंने उपनिवेशवादियों द्वारा गठित राज्य तंत्र और बांटो-और-राज करो की शासन शैली को अपने हितों के लिये बहुत ही उपयुक्त समझा। वे अपनी अमीरी बढ़ाने तथा खुद एक विश्वव्यापी साम्राज्यवादी ताक़त बनकर विकसित होने के मकसद से, हमारी भूमि और श्रम का शोषण और लूट करने के लिये इस राज्यतंत्र का प्रयोग करना चाहते थे। इसीलिये उन्होंने हर ऐसी बग़ावत का विरोध किया जो उपनिवेशवादी राज्य तंत्र के लिये खतरा बन सकती थी।

बड़े पूंजीपति दूसरे विश्व युद्ध के अंत का इतंज़ार कर रहे थे। उन्होंने यह अंदाज़ा लगाया कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद बर्तानवी साम्राज्यवाद बहुत कमजोर हो जायेगा और बढ़ते उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्षों के ख़तरे को देखते हुये, उनके हाथों में सत्ता दे देगा।

समझौता और विश्वासघात

पूरे विश्व में 1940 के दशक के बीच के वर्ष वह समय था, जब समाजवादी क्रांति और राष्ट्रीय आज़ादी के संघर्ष तेज़ी से आगे बढ़ रहे थे। जर्मनी, इटली और जापान की हमलावर फासीवादी धुरी पर जीत के बाद, विश्व क्रांति की लहर में बहुत चढ़ाव आया। कई नये आज़ाद राज्य उभरकर आये तथा सोवियत संघ की अगुवाई में एक समाजवादी मोर्चा स्थापित हुआ।

हिन्दोस्तान में तीन प्रमुख राजनीतिक हितों के बीच में टकराव चल रहा था - बर्तानवी साम्राज्यवादी, हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदार और मज़दूरों, किसानों व बर्तानवियों से समझौता न करने वाले देशभक्तों के सांझे हित।

बर्तानवी साम्राज्यवादी क्रांति को किसी भी क़ीमत पर रोकना चाहते थे। वे जिस हद तक संभव हो सके, दुनिया के इस रणनैतिक महत्व वाले भाग में अपनी आर्थिक, राजनीतिक और सैनिक ताक़त को बनाये रखना चाहते थे।

हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदार विश्व परिस्थिति का फायदा उठाकर, बर्तानवी शासकों की जगह लेना चाहते थे, उनके द्वारा निर्मित राज्य पर नियंत्रण पाना चाहते थे और उस पूरे इलाके के शासक बनना चाहते थे, जिसे उस समय बर्तानवी हिन्दोस्तान माना जाता था। सबसे बड़े पूंजीवादी घरानों ने 1944 में “बांबे प्लान” पेश किया, जो टाटा-बिरला प्लान के नाम से जाना जाता है। वह पूरे हिन्दोस्तान पर बड़े पूंजीवादी घरानों का वर्चस्व स्थापित करने के लिये उपनिवेशवादी राज्य तंत्र का संचालन करने की रूपरेखा थी।

मज़दूर और किसान, जो तमाम क्रांतिकारी और देशभक्त संगठनों में संगठित थे, शोषण की पूरी व्यवस्था तथा उसकी हिफाज़त करने वाले उपनिवेशवादी राज्य को पूरी तरह से खत्म करना चाहते थे। सोवियत संघ में समाजवाद की प्रगति से प्रेरित होकर, वे सभी प्रकार के शोषण से मुक्त होने के सपने देख रहे थे।

तेभागा और तेलंगाना किसान विद्रोहों, मज़दूर वर्ग की तमाम हड़तालों और 1946 के बहादुर नौ-सैनिक विद्रोह और वायुसेना में विद्रोह ने बर्तानवी शासन को पूरी तरह झकझोर दिया। बर्तानवियों ने हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों के साथ जल्दी से समझौता किया। कांग्रेस पार्टी और मुस्लिम लीग में बैठे उनके राजनीतिक प्रतिनिधियों के ज़रिये बड़े पूंजीपतियों ने हिन्दोस्तानी नौसेना के वीर सैनिकों और अफसरों, जिन्होंने बर्तानवियों की ओर अपनी बंदूकें घुमा दी थीं, को आदेश दिया कि उन्हें हथियार डाल देना चाहिये। बड़े पूंजीपतियों के प्रतिनिधियों ने यह दावा किया कि अब साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि वे, हिन्दोस्तान के नेता, अब सत्ता की दहलीज पर खड़े हैं।

बर्तानवी साम्राज्यवादियों और हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदारों के बीच समझौतों के कई दौर चले। बर्तानवियों ने पहले एक हिन्दोस्तानी संघीय राज्य का प्रस्ताव किया, जिसमें एक हिन्दू भाग, एक मुस्लिम भाग और रियासतों का एक भाग होगा तथा दिल्ली में स्थित एक सर्वोपरि संघीय प्राधिकरण होगा। संघीय प्राधिकरण रक्षा और वित्त विभागों पर नियंत्रण करेगा, जिसमें बर्तानवियों का प्रमुख स्थान बना रहेगा। परन्तु हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदारों को यह प्रस्ताव मंजूर नहीं था।

बर्तानवी साम्राज्यवादियों ने बड़ी चालाकी के साथ हिन्दोस्तान के सरमायदारों की आपसी गुटवादी दुश्मनी का फायदा उठाया और सांप्रदायिक आधार पर देश का बंटवारा करने की हालतें तैयार कीं। उन्होंने कांग्रेस पार्टी और मुस्लिम लीग के साथ अलग-अलग समझौते किये तथा गुप्त रूप से मुस्लिम लीग को बंटवारे पर जोर देने के लिये प्रश्रय देते रहे। इसके साथ-साथ, उन्होंने सांप्रदायिक हिंसा का अभियान भी शुरू किया। इसके बाद उन्होंने एकमात्र संभव विकल्प बतौर देश के बंटवारे को प्रस्तुत किया। सत्ता की लालच और क्रांति के डर की वजह से हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदारों ने बर्तानवी साम्राज्यवादियों द्वारा थोपे गये देश के बंटवारे के प्रस्ताव को अपनी सहमति दे दी।

15 अगस्त, 1947 की आधी रात को हिन्दोस्तान की आज़ादी की घोषणा की गई, ऐसे समय पर जब देश के तमाम इलाकों में हिन्दुओं, मुसलमानों, सिखों, आदि के खून की नदियां बह रही थीं। सांप्रदायिक कत्लेआम और भारी संख्या में बलपूर्वक विस्थापन के माहौल में हिन्दोस्तान और पाकिस्तान को आज़ाद घोषित किया गया।

सभी धर्मों और जातियों के लाखों-लाखों लोगों को भयानक अत्याचार सहना पड़ा। लोगों की आंखों के सामने उनकी मांओं और बहनों का बलात्कार हुआ। करोड़ों-करोड़ों लोगों को हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के बीच बनाई गई नई सरहद को पार कर भागना पड़ा। पंजाब और बंगाल, दोनों राष्ट्रों को धर्म के आधार पर बांटा गया। कश्मीर के लोगों के भविष्य को अनिश्चित छोड़ दिया गया।

देश के बंटवारे के साथ-साथ हुये खून-खराबे से यह मकसद पूरा हुआ कि हिन्दोस्तान के उपमहाद्वीप में क्रांति को रोक दिया गया। इससे दो राज्य बने जो हमेशा ही आपस में लड़ते रहेंगे और साम्राज्यवादी इसका पूरा फायदा उठाते रहेंगे। पाकिस्तान को पैदा करके बर्तानवी साम्राज्यवादियों ने इस रणनैतिक महत्व वाले इलाके में अपने सैनिक अड्डों को बरकरार रखने का अपना मकसद भी पूरा कर लिया।

निष्कर्ष

बर्तानवी उपनिवेशवादी शासन के सामप्त होने के बाद जो राजनीतिक व्यवस्था स्थापित की गई, उससे वह उद्देश्य पूरा नहीं हुआ जिसके लिये हमारे शहीद लड़े थे और कुर्बान हुये थे। उससे हिन्दोस्तान, पाकिस्तान या बांग्लादेश के लोगों को आज़ादी नहीं मिली। बर्तानवी साम्राज्यवादियों और हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदारों के बीच एक समझौता किया गया, ताकि क्रांति किसी भी हालत में न आ सके। इसकी वजह से वही पुरानी शोषण की व्यवस्था बरकरार रही है और दिन-ब-दिन बद से बदतर होती जा रही है। सांप्रदायिक बुनियादों पर स्थापित उसी राज्य का इस्तेमाल करके आज भी बड़े सरमायदार मेहनतकश लोगों को आपस में बांटकर अपना राज चला रहे हैं।

आज की हालतें कराह रही हैं कि हमारे शहीदों के उद्देश्य को पूरा किया जाये। ग़दरियों, भगत सिंह व उनके साथियों तथा देश के कोने-कोने से आये तमाम क्रांतिकारियों का उद्देश्य यह नहीं था कि पूंजीपतियों के एक गिरोह को सत्ता से हटाकर, दूसरे पूंजीवादी गिरोह को सत्ता पर बिठाया जाये। उनका उद्देश्य था राष्ट्रीय और सामाजिक आज़ादी हासिल करना। उन्होंने एक ऐसे हिन्दोस्तान की स्थापना करने के लिये संघर्ष किया था, जिसमें लोग खुद अपना शासन करेंगे तथा खदानों, कारखानों, बैंकों और उत्पादन व विनिमय के मुख्य साधनों के मालिक लोग खुद होंगे।

हिन्दोस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोग शांति और खुशहाली तभी हासिल कर सकेंगे जब हम बड़े पूंजीपतियों के शासन को खत्म करके, उसकी जगह पर अपना शासन कायम करेंगे।

हमारे संघर्ष का उद्देश्य वही है जो 1857 के ग़दर का उद्देश्य था, जो “हम हैं इसके मालिक, हिन्दोस्तान हमारा!” के नारे में उजागर हुआ था। हम तब तक चैन की सांस नहीं ले सकते जब तक वह उद्देश्य हासिल नहीं होता।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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