किसानों ने अपना संघर्ष और तेज़ किया

Submitted by cgpiadmin on बुध, 02/08/2017 - 00:30

17 जुलाई, 2017 को जब संसद का मानसून सत्र शुरू ही हुआ था, तब सैकड़ों संगठनों से जुड़े हजारों किसान देश के विभिन्न इलाकों से दिल्ली में संसद भवन के नज़दीक जंतर-मंतर पर पहुंचे। उनके इकट्ठे होने का मकसद था सरकार का कृषि के गहरे संकट की ओर ध्यान आकर्षित करना, जिससे किसानों की व्यापक तौर पर आर्थिक बरबादी हो रही है। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (ए.आई.के.एस.सी.सी.) द्वारा आयोजित किसान मुक्ति यात्रा भी मंदसौर से 6 जुलाई को शुरू होकर, छः राज्यों से गुजरती हुई 18 जुलाई को जंतर-मंतर पर पहुंच गयी। तमिलनाडु के किसान भी अपने पुराने आंदोलन को जारी रखने के लिये जंतर-मंतर पर वापस आ गये हैं ताकि पिछले सौ सालों में हुये सबसे भयंकर सूखे से पीड़ित किसानों की परिस्थिति पर सरकार का ध्यान खींचा जा सके। पंजाब से भी बहुत से किसान आये। महाराष्ट्र से ऐसे बहुत से बच्चों को लामबंध करके लाया गया था, जिनमें से प्रत्येक के पिता ने कृषि संकट से परेशान होकर आत्महत्या कर ली थी। उन्होंने अपने परिवारों की अत्यंत बुरी परिस्थिति को सबके सामने रखा।

Children of farmers who have committes suicide protesting
आत्महत्या किये हुये किसानों के बच्चे रैली में भाग लेते हुये

देशभर के किसान दो मांगों पर एकजुट हुए हैं। पहली मांग है कि सरकार को सभी फसलों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य को लागत कीमत से 50 प्रतिशत ज्यादा तय करना चाहिये व वास्तव में तत्काल भुगतान के साथ खरीद होनी चाहिये। दूसरी मांग है कि ऋण में डूबे किसानों के पूरे ऋण को माफ़ किया जाना चाहिये ताकि किसान ऋण के चक्रव्यूह से मुक्त हो सकें। ये मांगें किसानों की बरबादी को रोकने के लिये ज़रूरी हैं और पूरी तरह से न्यायसंगत भी हैं।

बड़े और छोटे, सभी किसानों के लिये खेती से जीविका कमाना मुश्किल होता जा रहा है और वे ऋण में डूबते जा रहे हैं। उन्हें बैंकों के वसूली एजेंटों, बिजली विभाग के अधिकारियों, आदि के द्वारा अपमानित किया जा रहा है और धमकियां दी जा रही हैं कि उनके घर व ज़मीन को छीन लिया जायेगा, अगर वे बकाया राशि का भुगतान नहीं करते हैं। उदाहरण के लिये, ऐसी ही खबर ग्वालियर इलाके से मिली है जहां बिजली विभाग ने घरों के बाहर नोटिस लगा दिये हैं, जिनमें लिखा हुआ है कि अगर वे एक लाख से ऊपर के अपने बकाया बिलों का भुगतान नहीं करते हैं तो उनके घर छीन लिये जायेंगे।

2014 में आम चुनाव के दौरान भाजपा ने अपने प्रचार अभियान में किसानों को बिल्कुल वही वादा किया गया था, जिसकी मांग आज किसान रहे हैं। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार, नरेंद्र मोदी ने अप्रैल 2014 में महाराष्ट्र की एक रैली में कहा था, “अपने चुनावी मेनीफेस्टो में हमने एक बात रखी है, ... और बड़ी हिम्मत के साथ रखी है। हमने कहा है कि किसान का जो इनपुट कॉस्ट होता है - खाद का होता है, पानी का होता है, बिजली का होता है, दवाई का होता है, उनको जितनी लागत लगती है, उसके ऊपर 50 प्रतिशत मुनाफ़ा तय करके, उसका सपोर्ट प्राइस तय होना चाहिये। बहुत बड़ा निर्णय हम करने वाले हैं, हम भाइयों, बहुत बड़ा निर्णय करने वाले हैं ... ” परन्तु चुनाव में जीत के बाद सरकार ने एकदम उल्टा रास्ता अपनाया है। सरकार के आने के एक साल के अंदर ही, उसने सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफनामा दर्ज़ किया है जिसमें कहा गया है कि सरकार अपने चुनावी वादे को पूरा नहीं कर सकती क्योंकि “इससे बाज़ार विकृत हो जायेंगे।” कृषि मंत्री ने, एक कदम बढ़कर, झूठा दावा किया है कि नरेंद्र मोदी ने चुनावी रैलियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात ही नहीं की थी।

Farmers protesting at Jantar Mantar
रैली में आयीं किसान परिवारों की महिलाएं

अपने खुद के अनुभव से हिन्दोस्तान के किसान इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि हिन्दोस्तानी राज्य व उसके संस्थान उनके हित के खिलाफ़ काम करते हैं। जंतर-मंतर की रैली के पश्चात, उन्होंने दृढ़ता से उचित क़ीमतों व ऋण-मुक्ति के अपने संघर्ष को जिला और राज्य स्तर पर जारी रखने का निर्णय लिया है। महाराष्ट्र के किसान संगठनों ने हाल ही में अपनी स्थानीय किसान मुक्ति यात्रा का समापन पुणे में किया है और यह संकल्प लिया है कि वे महाराष्ट्र सरकार द्वारा घोषित ऋण-मुक्ति के ढोंग का पर्दाफाश करेंगे। उन्होंने निर्णय लिया है कि स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या, 14 अगस्त को वे पूरे महाराष्ट्र के रास्तों पर चक्का जाम करेंगे। इसी तरह राजस्थान व अन्य राज्यों के किसानों ने भी अपने संघर्ष को आगे बढ़ाने की योजनाएं बनाई हैं।

जो भी सच्चाई समझना चाहता है, वह साफ-साफ देख सकता है कि अपने मेहनती किसान तब तक सुरक्षित व खुशहाल नहीं हो सकते, जब तक उत्पादन के संबंधों को मेहनतकश लोगों के हित में नहीं बनाया जाता। उपनिवेशवादी काल की तरह ही आज भी हिन्दोस्तानी राज्य किसानों की लूट-खसोट का ही एक साधन है। किसानों की सुरक्षा और खुशहाली की गारंटी तभी मिल सकती है जब इज़ारेदारों के नेतृत्व में पूंजीवादी शोषकों के राज्य की जगह मज़दूरों और किसानों का एक नया राज्य स्थापित किया जाये।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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