रूस में अक्तूबर क्रांति के 100 वर्ष : जुलाई के दिन - क्रांति की राह में निर्णायक मोड़

Submitted by cgpiadmin on मंगल, 01/08/2017 - 23:30

फरवरी 1917 में हुई रूस की क्रांति में ज़ार की सत्ता का तख़्तापलट किया गया, जिसका नतीजा था “दोहरी सत्ता” की स्थिति। तख़्तापलट के बाद एक अस्थायी सरकार बनायी गई, जिसमें पूंजीवादी पार्टियों के प्रतिनिधि शामिल थे। दूसरी ओर, मज़दूरों और सैनिकों के सोवियत मज़दूर वर्ग और किसानों के प्रतिनिधि बनकर उभर आये, जिन्होंने ज़ार की घृणित सत्ता का तख़्तापलट करने की लड़ाई को बहादुरी से अंजाम दिया था।

Lenin addressing Peasants Soviets Congress

किसानों की सोवियतों के सर्वरूसी प्रथम महाअधिवेशन को संबोधित करते हुये कामरेड लेनिन, 1917

Demonstration in Petrograd in May 1917

पेत्रोग्राद में 4 मई, 1917 को हुये प्रदर्शन में भाग लेते हुये मज़दूर व सैनिक

Lakhs of workers demonstration on 18Jun1917

पेत्रोग्राद में 18 जून, 1917 को हुये प्रदर्शन में 50 लाख मज़दूरों ने भाग लिया

Demonstration in Petrograd of Soldiers

‘सारी सत्ता सोवियतों के हाथों में दो’ की इस मांग के साथ 18 जून, 1917 के प्रदर्शन में भाग लेते हुये सैनिक

लेनिन ने अपनी प्रसिद्ध अप्रैल थीसिस (देखिये मज़दूर एकता लहर का 1-15 जून, 2017 का अंक) में विस्तारपूर्वक बताया था कि अस्थायी सरकार मज़दूर वर्ग और किसानों की रोटी, शांति और ज़मीन की मांग को पूरा नहीं कर पाएगी। बोल्शेविक पार्टी ने यह पहचान लिया था कि सोवियतें मेंशेविकों और सोशलिस्ट रेवोल्यूशनरीज़ से भरी हुई हैं, जो यह भ्रम फैला रहे थे कि अस्थायी सरकार लोगों की मांगों को पूरा करेगी। बोल्शेविक पार्टी ने मज़दूरों, किसानों और सैनिकों के सामने अस्थायी सरकार के असली चरित्र का कठोरता से और लगातार पर्दाफाश करने का बीड़ा उठाया तथा उन्होंने बताया कि यह पूंजीपतियों की सरकार है। साथ ही उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि सोवियतों को सारी सत्ता अपने हाथों में लेने की ज़रूरत है। ।

फरवरी क्रांति के बाद मज़दूर वर्ग, किसानों और आम मेहनतकश लोगों की हालतें बद से बदतर होती गयीं। हर महीने खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ती गयीं, फैक्ट्रियां बंद हो रही थीं और हजारों-हजारों मज़दूरों को काम से निकाला जा रहा था। किसानों की ज़मीन पाने की तीव्र इच्छा को पूरा करने के लिए कुछ भी नहीं किया जा रहा था और किसान बढ़ते पैमाने पर जमींदारों से ज़मीनें छीनने पर मजबूर हो गए थे। सोवियतों के भीतर और उसके बाहर, बोल्शेविकों द्वारा अस्थायी सरकार के लगातार विरोध का ज्यादा से ज्यादा लोग समर्थन करने लगे। पार्टी की सदस्यता लगातार बढ़ने लगी और साथ ही सरकार के प्रति लोगों का गुस्सा और उनकी निराशा उबलने लगी। इससे गंभीर राजनीतिक संकट पैदा हो गया।

1 मई को अस्थायी सरकार के विदेश मंत्री ने घोषणा की कि रूस इस साम्राज्यवादी युद्ध में हिस्सा लेता रहेगा। 3 मई को बोल्शेविक पार्टी के बुलावे पर 1 लाख से अधिक मज़दूरों और सैनिकों ने विशाल प्रदर्शन का आयोजन किया और ये नारे उठाये कि - “गुप्त संधियों को प्रकाशित किया जाये!”, “युद्ध मुर्दाबाद!” और “सारी सत्ता सोवियतों के हाथों में दो!”। जनसमुदाय के गुस्से से 15 मई को अस्थायी सरकार धराशायी हो गयी। गठबंधन वाली एक अस्थायी सरकार का गठन किया गया, जिसमें पूंजीवादी पार्टियों के प्रतिनिधियों के अलावा, मेंशेविक और सोशलिस्ट रेवोल्यूशनरी पार्टी के प्रतिनिधि शामिल थे। ये पार्टियां अब खुलकर क्रांति विरोधी खेमे में शामिल हो गयीं।

16 जून को सोवियतों के पहले सर्व रूसी महाधिवेशन की शुरुआत हुई। बोल्शेविक सोवियतों के अंदर अभी भी अल्पसंख्या में थे। पेत्रोग्राद सोवियत की कार्यकारी कमेटी, जो कि मेंशेविकों के नियंत्रण में थी, उसने 1 जुलाई को एक जनप्रदर्शन के लिए बुलावा दिया। उनको उम्मीद थी कि वे अस्थायी गठबंधन सरकार और जंग में शामिल रहने के समर्थन में लोगों को लामबंध कर पायेंगे। लेकिन बोल्शेविक पार्टी ने उनकी इन योजनाओं पर पानी फेर दिया। 4 लाख प्रदर्शनकारियों ने अस्थायी सरकार के साथ समझौता करने और युद्ध में शामिल रहने के मेंशेविकों और सोशलिस्ट रेवोल्यूशनरीज़ के नारों को बोल्शेविकों के नारों के समंदर में डूबो दिया। बोल्शेविकों के नारे थे - “युद्ध मुर्दाबाद!”, “सारी सत्ता सोवियतों के हाथों में दो!”

क्रांतिकारी लहर को दबाने के लिए अस्थायी सरकार ने उसी दिन (1 जुलाई को) सीमा पर तैनात सैनिकों को हमला करने का आदेश दिया। लेकिन यह हमला बुरी तरह से असफल रहा। इससे मज़दूरों और सैनिकों के बीच सरकार के खिलाफ़ गुस्सा और भी बढ़ गया और साथ ही अस्थायी सरकार के असली इरादों का भी पर्दाफाश हो गया कि वह साम्राज्यवादी युद्ध को जारी रखना चाहती है।

ऐसी हालत में 16 जुलाई को जब अस्थायी सरकार ने पेत्रोग्राद में स्थित प्रथम मशीन गन रेजिमेंट को फिर से आक्रमण करने के लिए सीमा पर जाने का आदेश दिया, तो इस रेजिमेंट ने बग़ावत कर दी। इस रेजिमेंट के साथ शहर के व्याब्रोग जिले के मज़दूर और क्रोंस्ताद के नौसैनिक भी शामिल हो गए। 16 और 20 जुलाई के बीच उनका प्रदर्शन बढ़ता ही गया, जिसने पूरी राजधानी को घेर लिया।

लेकिन इस वक्त बोल्शेविक पार्टी हथियारबंद कार्यवाही के खिलाफ़ थी, क्योंकि उनका यह मानना था कि क्रांतिकारी संकट की परिस्थिति अभी तक पूरी तरह से परिपक्व नहीं हुई है, सेना और अन्य प्रांतों के लोग राजधानी में इस तरह के विद्रोह को समर्थन देने के लिए तैयार नहीं हैं, और इस तरह के अलग-थलग और अपरिपक्व विद्रोह से, प्रतिक्रांतिकारियों द्वारा क्रांति के हिरावल को कुचलना आसान हो जायेगा। लेकिन जब बोल्शेविक पार्टी ने यह देखा कि लोगों को प्रदर्शन में उतरने से रोकना अब असंभव है तब पार्टी ने प्रदर्शन में हिस्सा लेने का फैसला किया, ताकि वह उस प्रदर्शन को शांतिपूर्ण और संगठित स्वरूप दे सके। बोल्शेविक पार्टी को इस कार्य में सफलता हासिल हुई। हजारों-लाखों महिला और पुरुष पेत्रोग्राद सोवियत के मुख्यालय पर प्रदर्शन में उतर आये और उन्होंने मांग रखी कि सोवियतें सारी सत्ता अपने हाथों में ले लें, साम्राज्यवादी सरमायदारों से रिश्ता तोड़ दें और एक प्रभावशाली शांति की नीति पर काम करें।

अस्थायी सरकार ने मेंशेविकों और सोशलिस्ट रेवोल्यूशनरीज़ के पूरे समर्थन से, भूतपूर्व ज़ारशाही की तरह, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हमला बोल दिया, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए और जख्मी हो गए। सेना में मौजूद क्रांतिकारी दस्तों से हथियार छीन लिए गए और उनको भंग कर दिया गया। सरहद पर तैनात सबसे प्रतिक्रियावादी दस्तों को वापस बुलाया गया और शहरों में प्रदर्शनकारियों पर हमला करने के लिए तैनात किया गया। बोल्शेविकों और उनके नेताओं को खोजकर उनपर हमले किये गए, पार्टी के ऑफिस और छापाखानों पर हमले किये गए और उनको तहस-नहस कर दिया गया। प्रतिक्रांति पूरे जोरों पर थी।

जुलाई के प्रदर्शन और उसके तुरंत बाद हुई घटनाएं रूस की क्रांति के इतिहास में एक अहम मोड़ थीं। दोहरी सत्ता का अंत हो गया। सारी सत्ता अब अस्थायी सरकार के हाथों में आ गयी थी, जबकि सोवियतें अपने सोशलिस्ट रेवोल्यूशनरीज़ और मेंशेविक नेताओं के साथ अस्थायी सरकार की दुम बन गयी थी। क्रांति का शांतिपूर्ण दौर अब खत्म हो गया था।

बदलते हालात का जायज़ा लेते हुए, बोल्शेविक पार्टी ने तुरंत अपने दांवपेंच में बदलाव करने का फैसला किया। पार्टी अब भूमिगत हो गयी और सरमायदारी सत्ता को सशस्त्र विद्रोह से उखाड़ फेंकने की तैयारी में जुट गयी। आतंक के माहौल के बीच पार्टी का छठा महाअधिवेशन गोपनीय तरीके से 8 से 16 अगस्त को आयोजित किया गया। महाअधिवेशन ने इस बात की पुष्टि की कि अब क्रांति का विकास शांतिपूर्ण तरीके से होना असंभव हो गया है। महाअधिवेशन ने अस्थायी सरकार का बलपूर्वक तख़्तापलट करने और राज्य सत्ता को अपने हाथों में लेने के लिए श्रमजीवी वर्ग को तैयार करने का अजेंडा सीधे तौर से पेश किया।

जुलाई का संकट जन-प्रदर्शन के रूप में फूट पड़ा था और उसके बाद प्रतिक्रांति की लहर चली थी। इन सबसे मेंशेविकों और सोशलिस्ट रेवोल्यूशनरीज़ द्वारा लोगों के बीच अस्थायी सरकार के बारे में फैलाई गयी तमाम खतरनाक भ्रांतियां अब चकनाचूर हो गयी थीं। मज़दूर वर्ग को इस सच्चाई का सामना करना पड़ा कि अब उसके सामने केवल एक ही रास्ता है - ग़रीब किसानों की सहायता से राज्य सत्ता अपने हाथों में लेना। श्रमजीवी क्रांति के लिए तुरंत तैयारी करने का कार्य अजेंडे पर आ गया। आने वाले सप्ताहों में लेनिन की अगुवाई में बोल्शेविक पार्टी ने तेज़ी से बदलते संकट की हालतों का इस्तेमाल सरमायदारों की सत्ता का तख़्तापलट करने के लिए तथा मज़दूर वर्ग को राजनीतिक और संगठनात्मक तरीके से तैयार करने में बड़ी होशियारी से और कुशलतापूर्वक काम किया। यह लक्ष्य उसी वर्ष 7 नवम्बर को हासिल किया गया जब बोल्शेविक पार्टी की अगुवाई में पेत्रोग्राद के मज़दूर वर्ग ने सरमायदारों के सत्ता के किलों पर हमला बोल दिया और श्रमजीवी अधिनायकत्व वाले राज्य की स्थापना की।

रूस की क्रांति में 1917 के जुलाई महीने के इस अहम मोड़ ने यह दिखा दिया कि क्रांति के टेढ़े-मेढ़े रास्ते पर जनसमुदाय को बिना भटके, क्रांति के लक्ष्य की ओर बढ़ने और श्रमजीवियों का अधिनायकत्व स्थापित करने के लिए, कम्युनिस्ट पार्टी की अगुवाई बेहद ज़रूरी है।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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