बैंकों को समाज के हित में काम करना चाहिये, कॉर्पोरेट घरानों के हितों में नहीं

Submitted by cgpiadmin on मंगल, 15/08/2017 - 16:46

मज़दूर एकता लहर ने कामरेड जे.पी. शर्मा, उपाध्यक्ष, आल इंडिया बैंक एम्प्लाइज एसोसिएशन, और महासचिव, दिल्ली स्टेट बैंक एम्प्लाइज फेडरेशन के साथ साक्षात्कार किया। कामरेड शर्मा ने इस दौरान बैंक क्षेत्र के मौजूदा हालात, बैंक मज़दूरों के संघर्ष के बारे में अपने विचार बताये।

मजदूर एकता लहर (म.ए.ल.): बैंक कर्मचारियों की मुख्य मांगें क्या हैं, जिसको लेकर वे संघर्ष कर रहे हैं?

कामरेड शर्मा: हम बैंक क्षेत्र के निजीकरण के खिलाफ़ लगातार संघर्ष कर रहे हैं। हमारी प्रमुख मांगें हैं - जन-विरोधी बैंक सुधारों को बंद करो; सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण को रोको; बैंकों के विलयन की योजना को रोको; कर्ज़ा वापस न करने वाले कॉर्पोरेट घरानों को हमारे बैंकों को बर्बाद करने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए; जानबूझकर कर्ज़ों को वापस न करने वालों की खिलाफ़ फौज़दारी की कार्यवाही की जाए; कॉर्पोरेट घरानों को दिए गए कर्ज़ की वसूली की जाए, और उन्हें कर्ज़ माफ़ी न दी जाये; और कॉर्पोरेटों को दिए गए खराब कर्ज़ एन.पी.ए. (न चुकाया गया कर्ज़) का बोझ सामान्य ग्राहकों पर अतिरिक्त सेवा शुल्क के रूप में न लादा जाए। 19 जुलाई को कांस्टीट्यूषन क्लब में यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस के झंडे तले, एक सभा का आयोजन किया गया था। यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस सभी सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र के बैंकों की यूनियनों का एक संयुक्त मंच है। इसमें कई निजी बैंकों की यूनियनें भी शामिल हैं जैसे कि फेडरल बैंक, स्टैण्डर्ड चार्टेड बैंक, एच.एस.बी.,सी., सिटी बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, आई.एन.जी. वैश्य बैंक, इत्यादि। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को छोड़कर अन्य सभी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की यूनियन भी इसमें शामिल हैं। स्टेट बैंक का अपना अलग एम्प्लाइज एसोसिएशन है। अगला विरोध कार्यक्रम 22 अगस्त को आयोजित किया जा रहा है।  

म.ए.ल.: क्या सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर निजीकरण करने का दबाव है?

कामरेड शर्मा: जी हां! करीब 25 साल पहले, जब से उदारीकरण और निजीकरण का कार्यक्रम लागू किया जा रहा है, तब से अलग-अलग तरीके से बैंकिंग क्षेत्र के निजीकरण की कोशिश की जा रही है। इसके कई तरीके हैं - जैसे कि धीरे-धीरे बैंकों के 40 प्रतिषत तक शेयरों को बेचना, और अधिक निजी बैंकों को खोलने की इजाज़त देना, और बैंकों में सरकारी संस्थानों की हिस्सेदारी को कम करना, जिसका नतीजा अंत में संपूर्ण निजीकरण में होगा।

म.ए.ल.: बैंक क्षेत्र में निजी बैंकों के आने से क्या सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के ग्राहकों की संख्या में कमी आई है?

कामरेड शर्मा: शहरों में ऐसा ज़रूर हुआ है। ग्राहकों की संख्या कम हुई है। नौजवान मज़दूरों को आकर्षित करने के लिए, निजी बैंक ग्राहकों को अलग-अलग सेवाएं देने का वायदा करते हैं, जैसे कि आकर्षक सेवाओं के साथ क्रेडिट कार्ड, घर में ही बैंक की सुविधा, इत्यादि। लेकिन यह सब शहरी इलाकों तक ही सीमित है, जहां ग्राहकों की संख्या ज्यादा है, जो इस तरह की सुविधाओं और सेवाओं से आकर्षित होंगे। इसके अलावा निजी बैंकों को ग्रामीण क्षेत्रों तक अपनी सेवाएं पहुंचाने का कोई दबाव नहीं है, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए ऐसा करना अनिवार्य है। जनधन खाता खोलना, कृषि कार्य के लिए कर्ज़ देना, इत्यादि सेवाओं और कार्यक्रमों को चलाने की जिम्मेदारी केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर डाल दी जाती है। जैसे कि आप देख रहे हैं निजी क्षेत्र के बैंकों को ग्रामीण और कम विकसित इलाकों में सेवाएं नहीं देनी पड़ती हैं, जो कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक देने के लिए बाध्य हैं। ऐसे हालात में यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक निजी क्षेत्र के बैंकों के साथ प्रतिस्पर्धा कर पाएंगे?

म.ए.ल.: इन सबका सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के कर्मचारियों की काम की हालतों पर क्या असर हुआ है? 

कामरेड शर्मा: निजी बैंकों से स्पर्धा करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की और ज्यादा शाखाएं खोली जा रही हैं, लेकिन कर्मचारियों की संख्या नहीं बढ़ाई जा रही है। मौजूदा पुरानी शाखाओं में काम कर रहे कर्मचारियों का तबादला नयी शाखाओं में किया जा रहा है और उनपर काम का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। काम करने के घंटों को बढ़ाकर निजी क्षेत्र के बैंकों जैसा किया जा रहा है। निजी क्षेत्र के बैंकों में मज़दूरों को अल्पकालीन अनुबंध पर रखा जा रहा है। इससे काम का बोझ बढ़ गया है, लेकिन रोज़गार की कोई गारंटी नहीं है। अब इसी तरह के काम की हालतों में बदलाव सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में भी लाये जा रहे हैं।

म.ए.ल.: मौजूदा और भूतपूर्व सरकार के वित्त मंत्री बैंकों के एकीकरण को बढ़ावा देते आये हैं। बैंकों पर इस एकीकरण क्या असर हुआ है?

कामरेड शर्मा: बैंक के क्षेत्र में कई कार्यों का ऑटोमेशन होने की वजह से सार्वजनिक बैंकों पर बहुत दबाव है कि वे अपने संस्थापन के खर्चों को कम करें, इसके लिए अतिरिक्त कर्मचारियों का तबादला नयी शाखाओं में कर रहे हैं। इससे बैंक क्षेत्र में रोज़गार के आयाम भी कम होते जा रहे हैं। कई जगहों पर सेवा-निवृत्त कर्मचारियों के पदों को भरा नहीं जा रहा है। जहां कहीं नयी नौकरियां दी जा रही हैं, वे सभी अल्पकालीन अनुबंध पर दी जा रही हैं, जैसे कि निजी क्षेत्र के बैंकों में होता रहा है। सहायक बैंकों के मौजूदा कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इन तरीकों से सरकार अंत में सभी सार्वजनिक बैंकों के निजीकरण के लिए ज़मीन तैयार कर रही है।

म.ए.ल.: सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर एन.पी.ए. (न चुकाये गये कर्ज़) का क्या असर हुआ है?

कामरेड शर्मा: एन.पी.ए. सार्वजनिक क्षेत्र के हमारे बैंकों को बर्बाद कर रहे हैं। सरकार से हम यह मांग कर रहे हैं कि जानबूझकर कर्ज़ा न वापस करने वालों के खिलाफ़ फौजदारी का मुकदमा दायर किया जाना चाहिए। लेकिन तमाम सरकारें केवल आश्वासन देती आई हैं और कोई कार्यवाही नहीं की है। दरअसल, एन.पी.ए. के बारे में सरकार के जो आंकड़े हैं, वे सही नहीं हैं। असली आंकड़ों को अलग-अलग मदों के तहत छुपाया जाता है। कॉर्पोरेट घरानों पर बकाया ब्याज को बार-बार पुनर्गठित किया जाता है और इस तरह से कर्ज़ा वापस न करने वाले कॉर्पोरेट घरानों को माफ़ किये गए ब्याज का आंकड़ा दसों-हजारों करोड़ में है। लेकिन यह सब कभी सामने नहीं आता है। “ग्राहकों की निजता की रक्षा” के नाम पर इन कर्ज़ा न वापस करने वालों के नामों को सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है और हम कर्मचारी भी कानूनन ऐसा नहीं कर सकते।

एन.पी.ए. का निपटारा किस तरह से किया जाए, इसका फैसला प्रत्येक मामले में अलग-अलग किया जाता है। इसका फैसला बैंक का बोर्ड ऑफ गवर्नर करता है। पहले सार्वजनिक बैंकों में मुख्य कार्यकारी अधिकारी और कार्यकारी निदेशक अलग-अलग व्यक्ति हुआ करते थे और फैसला दोनों को मिलकर लेना होता था। लेकिन अब ये दोनों भूमिकायें एक ही व्यक्ति निभाता है, जिसे चेयरमैन एंड मैनेजिंग डायरेक्टर कहा जाता है। बैंकों के बोर्ड ऑफ गवर्नर पर कॉर्पोरेट घरानों के नुमाइंदे बैठे होते हैं। लेकिन इसे हितों का टकराव नहीं माना जाता है। दरअसल, बोर्ड ऑफ गवर्नर में कौन होगा इसकी परिभाषा एक राष्ट्रीय स्तर के कानून में की गयी है। इस कानून के मुताबिक बोर्ड ऑफ गवर्नर पर बैंक के कर्मचारी और अधिकारियों की यूनियनों के नुमाइंदे भी नियुक्त किए जाने चाहिए, लेकिन पिछले तीन साल से सरकार ने कर्मचारियों और अधिकारियों के यूनियनों के एक भी सदस्य की नियुक्ति बोर्ड ऑफ गवर्नर पर नहीं की है।

दरअसल, सरकार और कॉर्पोरेट घराने एक दूसरे से मिले हुए हैं, ताकि वे सार्वजनिक बैंकों को मिलकर लूट सकें और बैंकों की खस्ता हालत बनाकर उनके निजीकरण को जायज़ बता सकें। 

म.ए.ल.: बैंकों पर नोटबंदी का क्या असर हुआ है?

कामरेड शर्मा: नोटबंदी बैंकों के लिए एक बड़ा झटका थी। सरकार के तमाम दावों के बावजूद 9 महीने बाद भी बताये गए कोई भी “लक्ष्य” हासिल नहीं हुए हैं। नोटबंदी के पहले महीने में तमाम सभी बैंकों के सभी कर्मचारियों को समय सीमा से बहुत अधिक काम करना पड़ा। लेकिन इस अतिरिक्त काम के लिए उन्हें कोई भी मुआवज़ा नहीं दिया गया। नए नोटों की आपूर्ति में कमी की वजह से उन्हें लोगों के गुस्से का सामना भी करना पड़ा। इस दौरान नोटों को जल्दी से जल्दी बदलने के दबाव में और

निर्धारित प्रक्रियाओं और नियमों के आभाव में कई नकली नोट बैंकों के खजाने में पहुंच गए हैं। नियम के मुताबिक जब किसी नकली नोट की पहचान होती है तो तुरंत इसकी रिपोर्ट पुलिस में दर्ज़ करनी ज़रूरी है। लेकिन नोटबंदी के दौरान ग्राहकों की लम्बी कतारों के चलते यह करना संभव नहीं हुआ।

नोटबंदी के ऐलान के कुछ दिन बाद, मीडिया ने बैंक के कर्मचारियों को बदनाम करने की कोशिश की और उन पर आरोप लगाया कि वे नकली नोटों के बदले में नए असली नोट दे रहे हैं। उनको “चोर” कहा गया। लेकिन बैंक कर्मचारी के लिए ऐसा करना असंभव है। जो नोट बैंक को दिए जाते हैं उनका पूरा हिसाब रखा जाता है, सारी मुद्रा रिज़र्व बैंक के पास होती है, उनको बैंकों तक करेंसी चेस्ट के द्वारा पहुंचाया जाता है, जो कि रिज़र्व बैंक के ही नियंत्रण में होते हैं। बैंकों को जो भी मुद्रा दी जाती है उसका पूरा हिसाब रखा जाता है। अब ऐसे कई मामले सामने आये हैं जिनमें रिज़र्व बैंक यह दावा कर रहा है कि किसी विशिष्ट बैंक से नकली नोट आये हैं। अब यह जानना बड़ा मुश्किल है कि कौन से नोट किस बैंक से आये हैं, क्योंकि अब नोटों की गड्डियों को स्टेपल नहीं किया जाता है, और न ही कोई निशान लगाया जाता है ऐसे मामले में जब किसी बैंक को ऐसा नोटिस आता है तब सारे कर्मचारियों पर सामूहिक सज़ा थोपी जाती है, और उस बैंक के सभी कर्मचारियों को अपनी जेब से इसकी भरपाई करनी पड़ती है। बैंक के कर्मचारी इसका विरोध कर रहे हैं और उनका विरोध बिलकुल जायज़ है।  

नोटबंदी के दौरान निजी क्षेत्र के बैंकों को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की तुलना में अधिक नए नोटों की आपूर्ति की गयी थी। कोई नहीं जानता कि जमा किये गए पुराने नोट कहां गए हैं। सरकार दावा कर रही है कि सारे पुराने नोट रिज़र्व बैंक के करेंसी चेस्ट में रखे गए हैं। हमने मांग की है कि इस पूरी नोटबंदी की सी.बी.आई. द्वारा जांच की जानी चाहिए, और यह पता लगाया जाना चाहिए कि सारे नोट कहां गए।

म.ए.ल.: सरकार ने किसानों को कर्ज़ माफ़ी का ऐलान किया है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक इसको किस तरह लागू करने जा रहे हैं?

कामरेड शर्मा: पिछली बार जब किसानों को कर्ज़ माफ़ी दी गयी थी तब यह ऐलान केंद्र सरकार ने किया था। रिज़र्व बैंक और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक दोनों ही केंद्र सरकार के अधीन आते हैं। इसलिए सरकार ने कर्ज़ माफ़ी केवल बही-खतों में दर्ज की और कोई पैसे का लेनदेन नहीं हुआ। जबकि इस बार कर्ज़ माफ़ी का ऐलान राज्य सरकारें कर रही हैं, जिनका बैंकों पर कोई नियंत्रण नहीं है। इन सरकारों ने दावा किया है कि वे कर्ज़ माफ़ी के लिए बैंकों को मुआवज़ा देंगी और राज्य के बजट में इसका प्रावधान किया जायेगा। लेकिन आज तक राज्य सरकार द्वारा या केंद्र सरकार द्वारा किया गया ऐसा कोई भी प्रावधान सामने नहीं आया है। इसलिए यह बिलकुल भी साफ नहीं है कि इसे किस तरह से अमल में लाया जायेगा।

म.ए.ल.: बैंकिंग क्षेत्र पर जी.एस.टी. का क्या असर हुआ है?

कामरेड शर्मा: जी.एस.टी. का बैंक के कार्य पर असर हुआ है। सेवा कर 12 प्रतिशत से बढ़कर 15 प्रतिशत हो गया है, जिससे ग्राहकों पर बोझ बढ़ा है। सॉफ्टवेयर में भी बदलाव हुआ है जिससे कर्मचारियों पर काम का बोझ बढ़ा है।

म.ए.ल.: ब्याज दर के गिरने से बैंकों पर क्या असर हुआ है?

कामरेड शर्मा: ब्याज दर का गिरना सीधे तौर पर बड़े कॉर्पोरेट घरानों की हित में जाता है। उनको अब सस्ती ब्याज दर पर कर्ज़ मिल पायेंगे। इससे सरकार के “मेक इन इंडिया” अभियान को कुछ बढ़ावा मिलेगा, जिसको आज कोई ज्यादा महत्व नहीं दे रहा है। लेकिन इससे सामान्य बैंक ग्राहक का बहुत नुकसान है। बचत खाते पर ब्याज दर कम हो जाने की वजह से उसका नुक्सान होगा। यह ब्याज दर महंगाई की दर से और भी कम हो गयी है, जिससे बैंक में जमा रकम की कीमत हर साल कम होती जाएगी। जो लोग अपने जीवन के निर्वाह के लिए बचत खातों के ब्याज पर निर्भर हैं, जैसे कि सेवा निवृत्त लोग, उन पर इसका बहुत बुरा असर होगा। इसके अलावा ई.पी.एफ. और पी.पी.एफ. की ब्याज दरों पर भी इसका असर होने वाला है।  

म.ए.ल.: बैंकिंग क्षेत्र के भविष्य के बारे में आपका क्या नज़रिया है?

कामरेड शर्मा: हमारा नज़रिया एकदम साफ है। बैंकों को आम लोगों के हितों की सेवा करनी चाहिए। हमारे देश में 6 लाख गांव हैं, और उनमें से केवल 6 प्रतिशत गांवों में बैंक की सेवाएं उपलब्ध हैं। बैंक सेवाएं हर एक व्यक्ति को मिलनी चाहिए और उसकी ज़रूरत को पूरा करना चाहिए। हम चाहते हैं कि सामाजिक बैंकिंग हो। केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ही ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में सेवाएं प्रदान पर सकते हैं। निजी बैंक ऐसा कभी नहीं करेंगे क्योंकि उनके लिए यह मुनाफ़ेदार नहीं होगा। इसलिए हम यह मांग कर रहे हैं कि बैंकिंग को हमारा बुनियादी अधिकार बनाया जाना चाहिए।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक कुछ खास सामाजिक लक्ष्यों को पूरा करने का काम करते हैं। वे समाज के सबसे ज़रूरतमंद तबकों की सेवा करते हैं जैसे कि ग़रीब किसान, छात्र, इत्यादि। इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक रेलवे, सड़क, इत्यादि ढांचागत परियोजनाओं में भी पैसा लगाते हैं। निजी बैंक केवल घरों के निर्माण, खाद्य प्रसंस्करण, इत्यादि, मुनाफ़ेदार व्यापार पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं। उनका ध्यान खुदरा क्षेत्र पर होता है जहां उनको बेहतर मुनाफ़ा मिलता है। इसके अलावा कुछ निजी बैंक हवाला जैसे अनैतिक कार्यों में भी शामिल हैं।

म.ए.ल.: आने वाले कुछ महीनों के लिए आपकी क्या कार्य योजना है?

कामरेड शर्मा: 10 अगस्त को देशभर में सभी राज्यों में कनवेंशन किये जायेंगे। इसमें दिल्ली भी शामिल है। 16 अगस्त को हम सभी केन्द्रों पर धरना प्रदर्शन करेंगे। 17 अगस्त को सभी राज्यों की राजधानियों में धरना प्रदर्शन आयोजित किया जायेगा। 22 अगस्त को आल इंडिया बैंक हड़ताल की योजना है। 26 अगस्त को देशभर में सभी शाखाओं में कर्मचारी काले बैच लगायेंगे और खाने के अवकाश के दौरान धरना प्रदर्शन करेंगे। 16 सितम्बर को हम संसद पर रैली और प्रदर्शन करेंगे।

म.ए.ल.: हमारे पाठकों के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

कामरेड शर्मा: हम देखते हैं कि चुनाव-दर-चुनाव सरकारें तो बदल जाती हैं, लेकिन लोगों के हाथों में असली मायने में सत्ता नहीं आती है। हम इन पार्टियों को सत्ता पर बैठाते हैं लेकिन खुद सत्ताहीन हो जाते हैं। मौजूदा व्यवस्था में यह एक बड़ा अंतर-विरोध है।

चुनाव के वक्त मज़दूर वर्ग अपने हित में कार्यवाही नहीं कर पाता है तथा राजनीतिक पार्टियों द्वारा जाति और धर्म के नाम पर बांट दिया जाता। चुनाव के दौरान रोज़गार, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, इत्यादि बुनियादी मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। केवल बड़ी पार्टियों के अजेंडे, जिनको बड़े सरमायदार तय करते हंै, वही सभी पर हावी रहते हैं। ये राजनीतिक पार्टियां मंदिर-मस्जिद, तीन तलाक, गौरक्षा, इत्यादि जैसे बनावटी मुद्दे पैदा करती हैं, ताकि लोग इन मुद्दों पर आपस में लड़ते रहंे, जिनका असली ज़िन्दगी से कोई सरोकार नहीं है। मौजूदा व्यवस्था में चुनाव कोई असली विकल्प नहीं पेश करता है।   

यह बेहद ज़रूरी है कि हम इन बनावटी मुद्दों से ऊपर उठें, इनके आधार पर बंटे नहीं, भटके नहीं। यह बेहद ज़रूरी है कि हम मज़दूर वर्ग बतौर संगठित हों और अपने अधिकारों के लिए एकजुट संघर्ष करें। चुनाव के दौरान हमें मज़दूर वर्ग के उम्मीदवारों को आगे लाना चाहिए जो मज़दूर वर्ग और तमाम दबे-कुचले तबकों के हितों की रक्षा कर सके।

Tag:    बैंक    बैंकों के निजीकरण    interview    Aug 16-31 2017    Struggle for Rights    Economy     Rights     2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

(Click thumbnail to download PDF)

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)