1947 का बंटवारा :

Submitted by cgpiadmin on मंगल, 15/08/2017 - 17:12

1947 का बंटवारा : बर्तानवी बस्तीवादियों द्वारा आयोजित महाभयंकर त्रासदी

1947 का बंटवारा हिन्दोस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोगों को आज भी एक भयंकर त्रासदी के रूप में याद आता है। इस बंटवारे की वजह से दो राष्ट्रों पंजाब और बंगाल को धार्मिक आधार पर बेरहमी से बांट दिया गया था। कश्मीर के लोग आज तक इस महाभयंकर सांप्रदायिक बंटवारे के नतीजे का शिकार बने हुए हैं।

दो पड़ोसी देशों के बीच सहकार्य और व्यापार का दरवाज़ा होने की बजाय हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के बीच लगभग 3000 किलोमीटर लम्बी सरहद, हथियारबंद टकराव और कभी भी भड़कने वाली जंग की आग का मैदान बनी हुई है। बार-बार होने वाली जंग के चलते सरहद के दोनों ओर की विशाल ज़मीन बंजर हो गयी है।

70 साल पहले जहां इन दोनों देशों के बीच कोई सरहद नहीं थी। आज उसी जगह पर हिन्दोस्तान के साथ, दोनों पड़ोसी देशों के बीच कंटीले तारों की राजनीतिक खड़ी है। सरहद के दोनों तरफ ऐसे लाखों परिवार हैं, जो एक-दूसरे से मिलने के लिए तड़प रहे हैं लेकिन मिल नहीं पाते हैं। सामान्य नागरिक और सैनिक दोनों ही समय-समय पर होने वाली गोलीबारी का शिकार बनते रहते हैं।

हिन्दोस्तान-पाकिस्तान की सरहद के दोनों ओर के हुक्मरान वर्ग अपने देश के लोगों को, सुनियोजित तरीके से दूसरे देश के खिलाफ़ भड़काते रहते हैं। बचपन से ही हिन्दोस्तान के लोगों को बताया जाता है कि पाकिस्तान और उसके लोग उनके सबसे बड़े दुश्मन हैं। सरहद के उस पार पाकिस्तान के लोगों को भी हिन्दोस्तान के बारे में ऐसा ही पाठ पढ़ाया जाता है। पंजाबी, कश्मीरी और हिन्दोस्तान के अन्य लोगों के संघर्षों में हिन्दोस्तान के हुक्मरान वर्ग पाकिस्तान की करतूत होने का दवा करते हैं। इसी तरह से पाकिस्तान के हुक्मरान वर्ग पाकिस्तान के कई इलाकों में फैली अशांति के लिए हिन्दोस्तान पर आरोप लगाते हैं। 

रोज़गार की तलाश में हिन्दोस्तान आये बांग्लादेश के लोगों के साथ बेहद अमानवीय बर्ताव किया जाता है। उनको “गैर-कानूनी” करार दिया जाता है, एक बिना राज्य के लोग जिनके कोई अधिकार नहीं हैं। समय-समय पर उनको पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया जाता है, विशेष जेलों में बंद किया जाता है और विशेष रेलगाड़ियों में बैठाकर सरहद तक पहुंचाया जाता है, जहां उन्हें जबरदस्ती बंदूक की नोक पर सरहद के उस पार बांग्लादेश में जाने को मजबूर किया जाता है।

यह बंटवारा 20वीं सदी में इंसानों द्वारा आयोजित सबसे बड़ी त्रासदी थी। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि एक करोड़ से लेकर, एक करोड़ 20 लाख लोगों को अपना घर-बार, ज़मीन-जायदाद छोड़कर दूसरे देश में शरणार्थी बनने को मजबूर कर दिया गया था। 20 लाख से अधिक लोगों को बड़ी क्रूरता से मौत के घाट उतार दिया गया था। बर्तानवी साम्राज्यवादियों के नियंत्रण में सेना, पुलिस और नागरिक प्रशासन ने इस सांप्रदायिक कत्लेआम की निगरानी की थी।    

असली मकसद

बर्तानवी हुक्मरानों ने यह झूठ फैलाया कि, हिन्दोस्तान के लोग धर्म के आधार पर बंटे हुए हैं, और यह बंटवारा इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि वे एक-दूसरे का कत्ल करना न शुरू कर दें। मगर हकीक़त में हिन्दोस्तान का बंटवारा बर्तानवी बस्तीवादियों की सोची-समझी साज़िश थी, ताकि रस्मी आज़ादी के बाद भी हिन्दोस्तानी उपमहाद्वीप पर बर्तानवी अपनी मजबूत पकड़ को बरकरार रख सकें।

द्वितीय विश्वयुद्ध के शुरू होने से पहले बर्तानवी साम्राज्यवादियों का हिन्दोस्तान छोड़ने का कोई इरादा नहीं था। लेकिन जब द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म हुआ, तब तक सभी पुरानी बस्तीवादी ताक़तें बहुत कमजोर हो गयी थीं। बर्तानवी बस्तीवादियों को यह समझ में आ गया कि अब उनको हिन्दोस्तान पर अपनी सीधी हुकूमत को खत्म करना पड़ेगा। उनके सामने यह सवाल था कि वे ऐसा क्या करें कि बर्तानवियों की सीधी हुकूमत के खत्म होने के बाद भी, हालात उनके लिए सबसे अधिक फायदेमंद हों।

बंटवारे के पीछे बर्तानवियों का भू-राजनीतिक लक्ष्य

5 मई, 1945 को जब जर्मनी आत्मसमर्पण कर रहा था, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने “हिन्दोस्तान और हिन्द महासागर में बर्तानवी साम्राज्य के रणनैतिक हितों की हिफाज़त के लिए ज़रूरी दीर्घकालीन नीति” का मूल्यांकन करने का आदेश दिया। 19 मई को यह मूल्यांकन रिपोर्ट उनके सामने पेश की गयी, जिसे “अति-गुप्त” चिन्हित किया गया था। इस रिपोर्ट की मुख्य बात यह थी कि ब्रिटेन को इस उपमहाद्वीप के साथ अपने सैनिक संबंध बरकरार रखने चाहिए। इस रिपोर्ट में ब्रिटेन के लिए हिन्दोस्तान के रणनैतिक महत्व के चार मुख्य कारण दिए गए थे कि :

“हिन्दोस्तान में तैनात बर्तानवी सेना को हिन्द महासागर इलाके में और मध्य-पूर्व और सूदूर पूर्व के इलाके में आसानी से भेजा जा सकता है। हवाई और समुद्र के बीच संचार के लिए यह अच्छा संक्रमण स्थल है। हिन्दोस्तान के पास उच्च दर्जे के सैनिक बड़ी संख्या में मौजूद हैं। हिन्दोस्तान के उत्तर-पश्चिम से बर्तानवी हवाई दल सोवियत सैनिक अड्डों पर आक्रमण की धमकी दे सकते हैं। इन सभी कारणों से हिन्दोस्तान हमारे लिए एक आधार के रूप में बेशकीमती है”।

बंटवारे के सैनिक-रणनैतिक महत्व को बर्तानवी हिन्दोस्तान के अंतिम वाइसराय माउंटबेटन द्वारा लिखे गए इन शब्दों से और भी बेहतर ढंग से समझा जा सकता है : 

“सिंधु घाटी, पश्चिमी पंजाब और बलूचिस्तान के इलाके हमारे लिए... ये संपूर्ण-मुसलमान इलाके... और मध्य-पूर्व से तेल की आपूर्ति... की हिफाज़त के नज़रिये से रणनैतिक योजना के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं... केवल कराची के समंदर में खुले बंदरगाह से ही सोवियत संघ के खिलाफ़ फौरी और प्रभावी आक्रमण किया जा सकता है... यदि बर्तानवी राष्ट्रमंडल और संयुक्त राज्य अमरीका को मध्य-पूर्व में अपने महत्वपूर्ण हितों की हिफाज़त करनी है तो इसके लिए पाकिस्तान का इलाका सबसे अच्छा और स्थिर साबित होगा।”

स्रोत : नरेन्द्र सिंह सरीला द्वारा लिखित “द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ इंडियाज़ पार्टीशन”

बस्तीवादी एकजुट हिन्दोस्तान की संभावना को पूरी तरह से मिटाना चाहते थे, जिसकी वजह से एशिया में उनके रणनैतिक हितों को खतरा हो सकता था। वे एक ऐसा उपमहाद्वीप पीछे छोड़ना चाहते थे जो हमेशा के लिए जंग और टकराव में फंसा रहे। वे इस उपमहाद्वीप में अपने सैनिक और नौसैनिक अड्डों को बनाये रखना चाहते थे, ताकि वे कच्चे तेल से भरपूर पश्चिम एशियाई इलाके पर अपना दबदबा बनाये रख सकें और सोवियत संघ के लिए खतरा बने रहें। सोवियत संघ और ईरान की सीमा पर पाकिस्तान का निर्माण करके वे अपने लक्ष्य को हासिल करना चाहते थे। (देखिये बॉक्स-बंटवारे के पीछे बर्तानवियों के भू-राजनीतिक लक्ष्य)।

1940 के मध्य का काल, ऐसा वक्त था जब दुनियाभर में समाजवादी क्रांति और राष्ट्रीय मुक्ति के संघर्ष आगे बढ़ रहे थे। सोवियत संघ की अगुवाई में फासीवाद-विरोधी युद्ध में दुनियाभर के लोगों की जीत एशिया और यूरोप के कई देशों की मुक्ति, दुनियाभर में बस्तीवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ़ लड़ रहे लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गयी। पूरे एशिया में लोग बस्तीवादियों की हुकूमत को उखाड़ कर फेंकने के लिए उठ रहे थे। चीन, वियतनाम, इंडोनेशिया, बर्मा और पश्चिम एशिया में मुक्ति संघर्षों की लहरें उठ रहीं थीं।

1945 के अंत तक मज़दूरों, किसानों और विशाल जनसमुदाय के संघर्षों की लहर ने पूरे हिन्दोस्तानी

उपमहाद्वीप को घेर लिया था। “बर्तानवी साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!” और “हिन्दू-मुस्लिम एकता जिंदाबाद!” के नारे देशभर में गूंज रहे थे। ऐसे समय में एक सबसे अहम विद्रोह, जिसने बर्तानवी बस्तीवादियों के शासन की बुनियाद को हिला डाला - वह था सैनिकों का विद्रोह, जिसकी शुरुआत रॉयल इंडियन नेवी के विद्रोह के साथ हुई।

फरवरी 1946 में रॉयल इंडियन नेवी के विद्रोह ने बर्तानवी हुकूमत को हिला कर रख दिया। मुंबई, कराची, कलकत्ता और हिन्दोस्तान के अन्य बंदरगाहों में हिन्दोस्तानी नौसेना के 20 हजार सैनिकों ने दमनकारी बस्तीवादी सत्ता के खिलाफ़ विद्रोह कर दिया। उन्होंने बर्तानवी झंडे को हटाकर कांग्रेस, मुस्लिम लीग और कम्युनिस्ट पार्टी के झंडे लगा दिए। नौसैनिकों के समर्थन में रॉयल एयर फोर्स के सैनिकों ने भी हड़ताल कर दी। विद्रोही जहाजों पर हवाई हमले करने से उन्होंने मना कर दिया। मुंबई, कराची और कई अन्य शहरों में मज़दूरों ने नौसैनिकों के समर्थन में आम हड़तालें आयोजित कीं। (देखिये बॉक्स हिन्दोस्तानी सेना में विद्रोह)।

हिन्दोस्तानी सेना में विद्रोह

रॉयल इन्डियन नेवी के तलवार नामक जहाज पर 18 फरवरी, 1946 को हिन्दोस्तानी नौसैनिकों का विद्रोह शुरू हुआ। यह विद्रोह तेज़ी से समुद्र तट के बॉम्बे बंदरगाह की बैरकों में और अन्य 22 जहाजों में फैल गया। अगले दिन शाम होने तक एक नौसेना केंद्रीय हड़ताल कमेटी का गठन हो गया।

अपने सबसे उच्च स्तर पर इस विद्रोह में 78 जहाज, 20 तटवर्ती संस्थान और 20,000 नौसैनिक शामिल थे। अलग-अलग चल रहे विद्रोह का संचालन एच.एम.आई.एस. तलवार पर लगे हुए संचार उपकरणों से किया जा रहा था। अलग-अलग जहाजों और तटों पर तैनात नौसैनिक तलवार की तरफ कूच करने लगे। मुंबई की सड़कें “हिन्दू मुस्लिम एक हों!, “इंक़लाब ज़िंदाबाद!” के नारों से गूंज उठीं।

बम्बई की कपड़ा मिलों के मज़दूरों ने नौसैनिकों के समर्थन में 22 फरवरी को आम हड़ताल आयोजित की। विद्रोही नौसैनिकों के लिए उन्होंने खाद्य वस्तुओं और रसद का इंतजाम किया। पूरी यातायात व्यवस्था को ठप्प कर दिया गया। रेल की पटरियों और रास्तों को बंद कर दिया गया, दुकानों ने भी अपने दरवाजे़ बंद कर दिए। कराची और कलकत्ता के औद्योगिक मज़दूरों ने विद्रोही नौसैनिकों के समर्थन में आम हड़ताल का आयोजन किया। मद्रास, कराची, पूना, इलाहाबाद और दिल्ली में रॉयल हिन्दोस्तानी वायु सेना ने, जबलपुर में रॉयल इंडियन सेना सिग्नल कोर ने और मद्रास में 1600 रॉयल एलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल इंजिनीयर, भी विद्रोह में शामिल हो गए।

इसके बाद बर्तानवियों ने नौसैनिकों के विद्रोह को कुचलने के लिए हिन्दोस्तानी सेना के जवानों को तैनात किया। लेकिन नौसेना के विद्रोहियों ने सेना के जवानों को लाऊड स्पीकर से संबोधित करते हुए कहा, “भाइयों! हम अपनी रोटी और आसान ज़िन्दगी के लिए नहीं लड़ रहे हैं। हम देश की आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं। आप भी हमारी तरह ही इस धरती की संतान हैं। हमारे ऊपर बंदूकें तानकर हमारे पूर्वजों के सर को शर्म से मत झुकाओ।” यह सुनकर सैनिकों ने गोलीबारी तुरंत बंद कर दी। कराची में गोरखा रेजिमेंट के सैनिकों ने, हिन्दोस्तान नाम के जहाज पर गोली चलाने से इंकार कर दिया, जो बर्तानवियों के खिलाफ़ बहादुरी से लोहा ले रहा था।

इसके बाद बर्तानवियों को अपनी अंग्रेजी सेना “टॉमी” को लोगों पर हमला करने के लिए तैनात करना पड़ा। उन्होंने जबरदस्त दमनचक्र चलाया जिसमें 228 लोग मारे गए और हजारों घायल हुए। अंत में हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों और जमींदारों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों द्वारा बर्तानवियों के साथ सांठ-गांठ करने की वजह से इस विद्रोह को पराजय का सामना करना पड़ा। खुद को हिन्दोस्तानी लोगों के “नेता” होने का दावा करने वालों की गद्दारी की हकीक़त बयान करते हुए, विद्रोह के एक नेता बी.सी. दास ने लिखा कि:

“जिन व्यक्तियों से हमने अगुवाई देने की उम्मीद की थी, उन्होंने हमारे इस विद्रोह को नज़रंदाज करने की कोशिश की। उनके लिए हम बिल्कुल अनजान थे और उनके ख्याल में हम आज़ादी के लिए कोई भी योगदान देने के क़ाबिल नहीं थे। वल्लभ भाई पटेल ने हमारे बारे में कहा था कि ‘ये सिरफिरे नौजवान है, जिनका ऐसी कार्यवाही से कुछ लेना-देना नहीं है’ (यह मैंने खुद उनको मुंबई में चैपाटी की एक जनसभा में आज़ादी के कुछ ही महीने पहले कहते हुये सुना, तब मै एक पत्रकार बन गया था।)... तब हमको इस बात का अंदाजा नहीं था कि हम ऐसे नेताओं की अगुवाई में कभी भी क्रांति को आगे नहीं ले जा सकते, जो नेता सुधारों, अहिंसा और असहयोग में विश्वास रखते हों। असूलों की तो बात ही छोड़ो, हाथों में सत्ता आने के ख्याल से ही इन नेताओं के चेहरे चमक उठे थे। जो लोग सत्ता में होते हैं उनके लिए सेना में अनुशासन का उल्लंघन किसी भयानक सपने जैसा है। अब सब कुछ हो जाने के बाद, हम उम्मीद करते हैं कि काश उस वक्त हमें यह पता होता कि ये लोग मानसिक तौर से इसी व्यवस्था को बरकरार रखने का फैसला कर चुके हैं, जिसका वे अहिंसा के रास्ते विरोध कर रहे थे! शर्म की बात है! वाकई, शर्म की बात है!”

स्रोतः सास्वती सरकार, शंमुख और दिक्गज द्वारा लिखित, “हाऊ गांधी, पटेल एण्ड नेहरू कोल्यूडिड विथ बिट्स टू सपरेस नेवल म्यूटिनी ऑफ 1946”

इन विद्रोहों से बर्तानवी बस्तीवादियों को समझ में आ गया कि, वे दिन अब खत्म होने वाले हैं, जब वे अपनी दमनकारी हुकूमत के आधार-स्तंभ बतौर, बर्तानवी हिन्दोस्तानी सेना का इस्तेमाल लोगों को दबाने के लिए किया करते थे।

बर्तानवी हिन्दोस्तानी सशस्त्र बलों के प्रमुख, फील्ड मार्शल क्लॉड औचिंलेक ने एक बेहद गुप्त विश्लेषण में लिखा था कि :

“अब हम इस हकीक़त को नज़रंदाज नहीं कर सकते हैं कि हर एक हिन्दोस्तानी नमक हलाल सैनिक राष्ट्रवादी बन गया है...” और आगे लिखते हैं कि “हिन्दोस्तानी सेना से बड़े पैमाने पर सैनिकों द्वारा बर्तानवियों का साथ छोड़कर हिन्दोस्तानियों का साथ देने और पूरी सेना के टूट जाने की संभावना है”।

नौसैनिक विद्रोह के एक नेता सी.आर. दास ने बाद में लिखा कि :

“हमारा संघर्ष धीरे-धीरे हिन्दोस्तानी सेना को भी प्रभावित कर रहा था... यदि लड़ाई होती तो शायद हममें से कई लोग मारे जाते, लेकिन उसके बाद खून-खराबा तो नहीं होता जैसा कि 1947 में हुआ था”। 

बस्तीवादी सत्ता को उखाड़ फेंकने और अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए मज़दूरों, किसानों और सैनिकों द्वारा विद्रोह की संभावना से हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपति और बड़े जमींदार बेहद घबरा गए थे। उनका मकसद था मौजूदा दमनकारी राज्य मशीनरी को बरकरार रखते हुए, बर्तानवियों के बस्तीवादी राज की जगह पर खुद अपनी सत्ता कायम करना। सशस्त्र बलों में बग़ावत से उनकी योजना खतरे में पड़ गयी थी, बड़े पूंजीपतियों और बड़े जमींदारों के राजनीतिक प्रतिनिधि - गांधी, पटेल, नेहरू और जिन्ना ने सैनिकों के विद्रोह की खुलकर निंदा की।

इससे पहले की हालात उनके काबू से बाहर हो जाएं, और क्रांति की संभावना बढ़ जाये, बर्तानवी बस्तीवादियों और हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों और जमींदारों के प्रतिनिधियों के बीच समझौते की कोशिश तेज़ हो गयी। एटली के ऐलाननामे में जून 1948 में सत्ता के हस्तांतरण का प्रस्ताव किया गया था। जबकि माउंटबेटन की योजना में प्रस्ताव किया गया कि इसे 15 अगस्त, 1947 कर दिया जाये।

बस्तीवादियों ने सोच-समझकर हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों और बड़े जमींदारों के अलग-अलग तबकों के बीच गुटवादी टकरावों को बढ़ावा दिया और एक गुट को दूसरे गुट के खिलाफ़ इस्तेमाल किया। तब उन्होंने अपनी शैतानी योजना को लागू किया। उन्होंने खुफिया तरीके से अलग-अलग गुटों के साथ सौदेबाजी की, जिनका प्रतिनिधित्व कांग्रेस पार्टी और मुस्लिम लीग करती थीं, और जानबूझकर उनको एक-दूसरे के खिलाफ़ खड़ा किया।

उनकी योजना थी बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे आयोजित करना, हिन्दोस्तान का धर्म के आधार पर बंटवारा करना, पंजाब और बंगाल इन दोनों राष्ट्रों के टुकड़े-टुकड़े कर डालना, लाखों-करोड़ों लोगों को शरणार्थी बनाना और हिन्दोस्तान में अपने सैनिक अड्डों को बरकरार रखना।

16 अगस्त को कलकत्ता में सांप्रदायिक दंगों की शुरुआत हुयी, जो चार दिन तक चले। इन दंगों ने देश के अन्य इलाकों में सांप्रदायिक कत्लेआम के लिए हालात तैयार किये। कलकत्ता में चार दिन तक कत्लेआम के बाद बिहार में हिंसा फैल गयी।

एन.पी.ए. स्मिथ, जो कि खुफिया ब्यूरो के निदेशक थे, उन्होंने वाइसराय वेवल को एक ज्ञापन में लिखा कि :

“गंभीर सांप्रदायिक गड़बड़ी को देखकर हमें कोई कार्यवाही नहीं करनी चाहिए, जिससे बर्तानवी-विरोधी संघर्ष फिर से शुरू हो जायेगा... जो कुछ हो रहा है, (यह) बिलकुल प्राकृतिक है, फिर वह भले ही बेहद घिनौना क्यों न हो, यही प्रक्रिया हमारे लिए, अपने ही तरीके से हिन्दोस्तानी समस्या का हल निकालेगी।”

दूसरे शब्दों में वह ये कह रहा था कि सांप्रदायिक कत्लेआम फैलते रहने देना चाहिए, क्योंकि यह क्रांति को रोकने और हिन्दोस्तान के सांप्रदायिक बंटवारे के बर्तानवी बस्तीवादियों की योजना के हित में है।

हिन्दोस्तानी लोगों की क्रांति के डर ने, बड़े पूंजीपतियों और बड़े जमींदारों को बस्तीवादी शासकों के साथ धूर्ततापूर्ण सौदेबाजी करने को प्रेरित किया। बस्तीवादियों की जगह वे खुद शोषण पर आधारित सत्ता को हासिल करने के लिए तड़प रहे थे। इसीलिये उन्होंने हिन्दोस्तान के सांप्रदायिक बंटवारे के लिये बर्तानवी शासकों द्वारा दिये गये प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। बड़े पूंजीपति और बड़े जमींदारों की इस गद्दारी की सज़ा हिन्दोस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोग आज तक भुगत रहे हैं।

निष्कर्ष

बंटवारे की बस्तीवादी विरासत हिन्दोस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोगों की एकता और इस इलाके में शांति के रास्ते की रुकावट बनी हुई है। अमरीका, ब्रिटेन और अन्य साम्राज्यवादी ताक़तों को इस इलाके में लगातार हस्तक्षेप करने का मौका यह बंटवारा देता है। समय-समय पर कातिलाना वारदातें, जंग और पड़ोसी देशों के बीच शांति भंग होने की वजह भी यही बंटवारा है। इन देशों के शासक वर्ग अपने देश में मौजूद तमाम समस्याओं की असली वजह से लोगों का ध्यान हटाने के लिए इस बंटवारे का इस्तेमाल करते रहते हैं।

हिन्दोस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोगों को एकजुट होकर इस बंटवारे की विरासत को खत्म करना होगा, ताकि वे अपने राष्ट्रीय और सामाजिक मुक्ति के संघर्ष को तथा दीर्घकालीन शांति व सब-तरफा विकास के संघर्ष को आगे बढ़ा सकें।

Tag:    partition    1947    Aug 16-31 2017    Voice of the Party    History    2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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