सांप्रदायिक हिंसा की असली वजह के बारे में ग़दरियों की समझ

Submitted by cgpiadmin on मंगल, 15/08/2017 - 17:24

हिंदू-मुस्लिम “दंगे” आयोजित करना बर्तानवी बस्तीवादियों की “बांटों और राज करो” की रणनीति का हिस्सा था। यह रणनीति खास तौर से 1857 के ग़दर के बाद से अमल में लायी जाने लगी। ग़दर में सभी धर्मों और जातियों के लोग एकजुट होकर अंग्रेजों के खिलाफ़ लड़े थे।

बर्तानवी राज की पुलिस और उनकी खुफिया एजेंसियां तालमेल के साथ काम किया करती थीं, और लोगों के बीच में उन्माद भड़काने और बदले के लिए कत्लेआम करवाने के मकसद से अफवाहें फैलाया करती थीं। सांप्रदायिक टकराव के समय क्या किया जाना चाहिए, यह बताने के लिए पुलिस अधिकारियों को एक निर्देश पुस्तिका दी जाती थी। इस निर्देश पुस्तिका में साफ तौर से यह बताया गया था कि सांप्रदायिक घटना होने के बाद कुछ दिनों के लिए हालातों को ऐसे ही भड़कने दिया जाना चाहिए, उसके बाद ही कानून और व्यवस्था बहाल करने के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए। 

बर्तानवी हुक्मरानों द्वारा आयोजित ये तथाकथित दंगे, लोगों की एकता को तोड़ने के लिए करवाए जाते थे। बर्तानवी राज को कानून और व्यवस्था बहाल करने के नाम से लोगों का जबरदस्त दमन करने का बहाना मिल जाता था। साथ ही बर्तानवी शासकों को एक और मौका मिल जाता था, जब वे यह ऐलान करते थे कि सारे हिन्दोस्तानी एक दूसरे के प्रति धर्म के आधार पर नफ़रत से भरे हुए हैं, उनके बीच में शांति और सौहार्द बनाये रखना “श्वेत आदमी का बोझ है”। 

1874 में बम्बई, 1885 में लाहौर और करनाल, 1886 में दिल्ली, 1889 में लुधियाना और अम्बाला, फिर से 1893 में बम्बई और 1893-94 में बिहार में, हिन्दू और मुसलामानों के बीच बड़े पैमाने पर कत्लेआम आयोजित किये गये। 1920 के दशक में मुल्तान, मालाबार, दिल्ली, नागपुर, लाहौर, लखनऊ, भागलपुर, गुलबर्गा, शाहजहांपुर, काकीनाडा, इलाहाबाद, बम्बई, कलकत्ता, अलीगढ़ और कई अन्य शहरों में साम्प्रदायिक हिंसा की कई घटनायें हुईं। 

हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी ने बर्तानवी राज द्वारा हुकूमत करने के इस बेहद चालाक और गुनहगार तरीके को अच्छी तरह से समझ लिया था। हिन्दोस्तान की कई भाषाओं में नियमित प्रकाशित किये गए अपने साहित्य में उन्होंने इस बात का पर्दाफाश किया कि ये तथाकथित दंगे लोगों के बीच धर्म के आधार पर नफ़रत की वजह से नहीं होते हैं। ये दंगे बर्तानवी शासकों द्वारा उनके राज करने के तरीके बतौर जानबूझकर कर आयोजित किये जाते हैं।

इस तरह के कई उदाहरण कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी द्वारा हाल ही में प्रकाशित पुस्तक “ग़दरियों की पुकार- इंक़लाब” में दिए गए हैं, जिनमें ग़दरियों की सूझबूझ उभरकर सामने आती है। ऐसा ही एक उदाहरण है, अक्तूबर 1926 में हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी के मासिक प्रकाशन “द इंडिपेंडेंट हिन्दुस्तान” में छपा यह लेख।

हिन्दू-मुसलमान झगड़े की वजह - लार्ड इरविन को जवाब

वाइसराय लार्ड इरविन ने, चेम्सफोर्ड क्लब, शिमला में हिन्दू-मुसलमान झगड़ों के बारे में बात करते हुए, दोनों सम्प्रदायों से “आपसी मतभेदों को सुलझाने” की अपील की।

निहत्थे, आपस में बंटे हुए और भूखे लोगों के बीच में सरकार शांति और व्यवस्था क्यों नहीं बनाये रख सकती, जब सरकार के पास सबसे ज्यादा वेतन पाने वाली सेवाएं उपलब्ध हैं?

सी.आई.डी. राष्ट्रीय नेताओं का पीछा कर सकती है और उनकी सारी गतिविधियों की रिपोर्ट दे सकती है; कम्युनिस्टों को सूंघकर निकाल सकती है और उन्हें जेल की सुरक्षा में भेज सकती है; नगर-निगम के उच्चतम कार्यकर्ताओं को सिर्फ शक के आधार पर ही गिरफ्तार कर सकती है, आधी रात को उनके घरों की तलाशी ले सकती है और बेकसूरों को अनेक घंटों तक बंद रख सकती है! पर वही सी.आई.डी., वही खुफिया सेवा और स्कॉटलैंड यार्ड कलकत्ता और दूसरे अशांत इलाकों के “गुंडों” और दंगाइयों को नहीं ढूंढ निकाल सकती है!

इसके अलावा, हालांकि हिन्दोस्तानी रियासतों में ऊंची तनख्वाह वाली पुलिस या सेना या खुफिया सेवा नहीं है, परन्तु उनमें हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच दंगों के कोई खास हादसे नहीं हुए हैं। नहीं, उनमें लोगों के बीच संबंध ज्यादातर सामंजस्यपूर्ण रहे हैं। हैदराबाद में मुसलमान शासक और अधिकतम हिन्दू आबादी है; कश्मीर में अधिकतम मुसलमान आबादी और हिन्दू शासक है; मैसूर, बड़ोदा, ग्वालियर, जोधपुर, बीकानेर, इंदौर, इत्यादि जैसे बड़े-बड़े राज्य हैं, परन्तु उनमें कोई हिन्दू-मुसलमान झगड़े नहीं होते हैं। इसके ऊपर आपको क्या कहना है, लार्ड इरविन?

Tag:    ग़दर    हिन्दोस्तानी ग़दर पार्टी    सांप्रदायिक हिंसा    Aug 16-31 2017    Voice of the Party    Communalism     History    2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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