नए हिन्दोस्तान के निर्माण के लिए ज़रूरी है कि हम इस पुराने शोषक और दमनकारी राज्य का ख़ात्मा करें!

Submitted by cgpiadmin on शनि, 02/09/2017 - 17:57

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, 23 अगस्त, 2017

बस्तीवादी राज से हिन्दोस्तान की आज़ादी की 70वीं सालगिरह के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोगों को बुलावा दिया कि अगले पांच साल में एक “नए हिन्दोस्तान” का निर्माण करने में लोग उनका समर्थन करें, एक ऐसा हिन्दोस्तान जहां न गरीबी होगी, न भ्रष्टाचार होगा, न साम्प्रदायिक हिंसा होगी और न ही जाति के आधार पर भेदभाव होगा।

हिन्दोस्तान के लोग वास्तव में एक ऐसे हिन्दोस्तान के लिए तड़प रहे हैं, जहां सभी के लिए सुख और सुरक्षा की गारंटी होगी। लेकिन सवाल यह है कि: क्या मौजूदा पुरानी व्यवस्था और राज्य का खात्मा किये बिना एक नए समाज का निर्माण किया जा सकता है?

शहीद भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारियों ने बड़ी दूरदर्शिता के साथ बताया था कि

“हिन्दोस्तान का संघर्ष तब तक चलता रहेगा, जब तक सत्ता में बैठे कुछ मुट्ठीभर लोग अपने स्वार्थ के लिए लोगों का शोषण करते रहेंगे। शोषक चाहे हिन्दोस्तानी हों या बर्तानवी या फिर इन दोनों का गठबंधन, इस संघर्ष को कोई भी नहीं रोक सकेगा।”

70 वर्ष पहले सत्ता पर बैठे शोषकों के एक गुट को हटाकर, शोषकों के दूसरे गुट ने उसकी जगह ली थी। बर्तानवी पूंजीपति वर्ग की सत्ता की जगह पर, हिन्दोस्तानी पूंजीपति वर्ग की सत्ता स्थापित की गयी, जिसकी अगुवाई टाटा, बिरला और अन्य इज़ारेदार घराने करते थे। क्रूर पूंजीवादी शोषण और साम्राज्यवादी लूट की व्यवस्था के साथ-साथ सामंतवादी व जाति पर आधारित शोषण और दमन बरकरार रहे। बहुसंख्य मेहनतकशों को बांटकर उन पर राज करने के लिए बनाये गए राज्य तंत्र को बरकरार रखा गया तथा उसे लोगों को शोषण-दमन करने तथा लोगों को बांटने के लिए और भी कुशल बनाया गया।

प्रधानमंत्री जी, इस पुरानी व्यवस्था और राज्य का ख़ात्मा किये बिना किस तरह से हम एक नए हिन्दोस्तान का निर्माण कर सकते हैं?

क्या आप इस बात से इंकार कर सकते हैं कि चंद मुट्ठीभर लोग अपने खुदगर्ज़ हितों के लिए आम हिन्दोस्तानी लोगों का शोषण कर रहे हैं? उदाहरण के लिए बैंकों के संकट को ही देख लीजिये। सौ से भी कम पूंजीवादी कंपनियों के पास बैंकों के एक लाख करोड़ रुपये का बुरा कर्ज़ बाकी है, जिसे वे वापस करने से इंकार कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री जी, बैंकों का कर्ज़ चुकता न करने वाली इन गुनहगार पूंजीवादी कंपनियों के खिलाफ़ आपने क्या कार्यवाही की है? आप दावा करते हैं कि आप गरीबों के हितों के प्रति समर्पित हैं। आप अमीर भ्रष्टाचारी लोगों के खिलाफ़ धर्मयुद्ध छेड़ने का भी दावा करते हैं। तो फिर आपकी सरकार इन पूंजीवादी गुनहगार कंपनियों की संपत्ति को जब्त क्यों नहीं करती, उनको जेलों में क्यों नहीं डालती? बैंकों के नुकसान की भरपाई करने के लिए सरकार की तिजोरी में रखे हुए लोगों के हजारों-करोड़ रुपये क्यों खर्च किये जा रहे हैं? इन चंद मुट्ठीभर पूंजीपतियों के गुनाहों की सज़ा सभी लोगों को क्यों दी जा रही है? लोग आप पर क्यों विश्वास करें, जब आप पूंजीवादी गुनहगारों के नाम तक बताने को तैयार नहीं हैं?

आप दावा करते हैं कि तमाम क्षेत्रों में विदेशी कंपनियों को निवेश करने का न्योता देने से हमारे नौजवानों के लिए नौकरियां पैदा होंगी। विदेशी पूंजीपतियों को हिन्दोस्तान में उत्पादन करने के लिये - “मेक इन इंडिया” को प्रोत्साहन देने के नाम पर, इन पूंजीपतियों को मज़दूर कानूनों का उल्लंघन करने की खुली छूट दी जा रही है और मज़दूरों को बेहद शोषक और दमनकारी परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। दरअसल, एक दानवाकार पूंजीवादी कंपनी द्वारा नए पूंजी निवेश से सैकड़ों छोटे उत्पादकों के कारोबार बंद हो जाते हैं। जितने रोज़गार पैदा हो रहे हैं, उससे कहीं अधिक रोज़गार हर रोज़ बर्बाद हो रहे हैं।

वैष्विक पूंजीवादी संकट के चलते निर्यात उन्मुख क्षेत्रों में लाखों मज़दूर अपना रोज़गार खो चुके हैं। नोटबंदी के चलते कई छोटे उद्योग बंद हो गए हैं, जिससे और अधिक रोज़गार बर्बाद हुए हैं। वस्तु एवं सेवा कर (जी.एस.टी.) को लागू करने से यह समस्या और गंभीर होती जा रही है।

आप दावा कर रहे हैं कि यदि बेरोज़गार नौजवान नयी स्टार्ट-अप कंपनियां शुरू करते हैं, तो इससे रोज़गार की समस्या हल हो जाएगी। आप कहते हैं कि ऐसा करने से नौजवान रोज़गार मांगने नहीं आयेंगे, बल्कि खुद रोज़गार पैदा करेंगे। हमारे नौजवानों के साथ सरासर धोखेबाजी की जा रही है। आप इस सच्चाई को छुपा रहे हैं कि अब तक शुरू किये गए अधिकांश स्टार्ट-अप बंद हो चुके हैं। मौजूदा व्यवस्था में जहां इज़ारेदार पूंजीवाद का बोलबाला है, वहां बहुत ही कम स्टार्ट-अप उद्यम टिक पाते हैं। इसके अलावा सरकार द्वारा लिए गए तमाम फैसलों से, वह चाहे नोटबंदी हो या जी.एस.टी. हो, आपके हर एक फैसले से पूंजी का केन्द्रीकरण होता जा रहा है और इज़ारेदारों का दबदबा बढ़ता ही जा रहा है।

प्रधानमंत्री जी, आप यदि वाकई में सभी के लिए रोज़गार पैदा करना चाहते हैं तो, आपको उत्पादन के संबंधों को बदलना होगा। वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन के प्रमुख साधनों को इज़ारेदार पूंजीवादी घरानों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता। उत्पादन और व्यापार की संपूर्ण प्रक्रिया इज़ारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने की दिशा में उन्मुख नहीं रह सकती। उसको मानव ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में मोड़ना होगा। ऐसा करने से सभी हिन्दोस्तानियों को सम्मान की जिन्दगीं प्रदान करने के लिए हमें और अधिक उत्पादन करना होगा। तब हमारे पास इतना काम होगा कि शारीरिक रूप से काबिल प्रत्येक महिला और पुरुष को हम उत्पादक रोज़गार दे पाएंगे।

आप यह भी दावा करते हैं कि आपकी सरकार आने वाले पांच वर्षों में किसानों की आमदनी को दुगुना कर देगी। देशभर में लाखों-करोड़ों किसान अपनी फसलों की क़ीमतों की गिरावट के खिलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं। नोटबंदी के विनाशकारी प्रभाव के बाद फसलों की क़ीमतों की गिरावट से उनको दूसरा झटका लगा है। उनकी आमदनी इस हद तक नीचे गिर गयी है कि उसको “दुगुना” करने की बात करना एक भद्दा मजाक बन गई है।

किसान मांग कर रहे हैं कि उनकी फसलों के लिए स्थिर और लाभकारी मूल्य की गारंटी दी जाए। किसानों को बर्बादी से बचाने के लिये और उनकी खुदकुशी को रोकने के लिए, यह एक ज़रूरी शर्त है। इस शर्त को पूरा करने के लिए आपको कृषि में लगने वाली तमाम सामग्रियों की आपूर्ति करने वाली तथा फसलों की खरीदी के क्षेत्र में अधिकतम मुनाफ़े कमाने के लिए, काम करने वाली निजी कंपनियों की भूमिका को खत्म करना होगा। लेकिन आपकी सरकार तो ठीक इसकी उल्टी दिशा में काम कर रही है, निजी मुनाफ़ाखोरों और सट्टेबाजों को कृषि व्यापार के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए दरवाज़ों को और अधिक खोलती जा रही है।

आपकी अगुवाई में चल रही यह सरकार निजीकरण और उदारीकरण के कार्यक्रम को बरकरार रखे हुए है तथा उसको और भी तेज़ी से आगे बढ़ा रही है। इस कार्यक्रम से गरीबी कभी नहीं मिटेगी। पिछले 25 वर्षों का अनुभव दिखाता है कि इस कार्यक्रम से अमीरी और गरीबी के बीच की खाई और भी अधिक गहरी होती जा रही है।

हाल ही में गोरखपुर के एक अस्पताल में हुई 70 बच्चों की मौत को आपने एक “प्राकृतिक आपदा” बताते हुए नज़रंदाज़ कर दिया। आप दावा कर रहे हैं कि बाढ़ की वजह से हुई बड़े पैमाने पर लोगों की मौत और उनका विस्थापन “भगवान की मर्जी” है। लोगों की जान बचाने में अपनी विफलता की जिम्मेदारी उठाने से आप इंकार कर रहे हैं। लेकिन प्रधानमंत्री जी, यह सब हमारे लिए कुछ नया नहीं है! आपका यह बर्ताव हमें पुराने बस्तीवादी राज्य की याद दिलाता है, जो केवल मुट्ठीभर शोषक अल्पसंख्य लोगों के प्रति जिम्मेदार था और जो समाज के तमाम अन्य लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को स्वीकार नहीं करता था।

हमारे देश में इतने सारे कुशल डॉक्टर और नर्स हैं कि वे एक कुशल सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की व्यवस्था का निर्माण कर सकते हैं। हमारे देश में ऐसे इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और तकनीकी जानकारों की कोई कमी नहीं है, जो हर साल बाढ़ से होने वाली बर्बादी और विनाश को रोकने में सक्षम हैं। लेकिन समस्या यह है कि एक के बाद एक आई तमाम सरकारों सहित आपकी सरकार भी सार्वजनिक सेवा व्यवस्थाओं को नज़रंदाज़ कर रही है उनको बर्बाद कर रही है, ताकि निजी मुनाफ़ाखोरों के हितों की पूर्ति हो सके।

आप वादा कर रहे हैं कि आपकी सरकार साम्प्रदायिकता और जातिगत भेदभाव को देश से मिटा देगी। लेकिन, कथनी से अधिक करनी बोलती है। देशभर में धर्म और जाति के नाम पर बंटवारा सुनियोजित तरीके से भड़काया जा रहा है। धर्म और जाति की पहचान के आधार पर लोगों को निशाना बनाया जा रहा है और उनका कत्ल किया जा रहा है।

बर्तानवी बस्तीवादियों ने सांप्रदायिकता की बुनियाद पर एक राज्य का निर्माण करते हुए अपनी हुकूमत को स्थापित किया था और उसे मजबूत किया था। प्रधानमंत्री जी, आप उसी पुराने राज्य की हिफाज़त कर रहे हैं! कुछ नया निर्माण करने का दावा करते हुए आप उसी पुरानी बांटो और राज करो की रणनीति को अपना रहे हैं।

आज से लगभग 50 वर्ष पहले तत्कालिक प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने “गरीबी हटाओ!” का नारा दिया था। लेकिन उनकी सरकार की नीतियों का नतीजा था “अमीरी बढ़ाओ!” उनके राज में भी इज़ारेदार पूंजीपतियों की दौलत में दिन दुगनी, रात चौगुनी बढ़ोतरी हुई थी। ग़रीब और अमीर के बीच की खाई और अधिक गहरी हुई थी।

आज हमारे देश के इज़ारेदार पूंजीवादी घराने बड़े ही आक्रामक ढंग से अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को आगे बढ़ा रहे हैं। वे अपनी संपत्ति को तेज़ी से बढ़ाना चाहते हैं और दुनियाभर में अपनी साख को मजबूत करना चाहते हैं। दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी ताक़तों के साथ वे बराबरी करना चाहते हैं, उनके साथ ऊंचे मंच पर बैठना चाहते हैं। इसलिये वे यह सब हासिल करने के लिए, विदेशी इज़ारेदार पूंजीपतियों के साथ मिलकर मज़दूरों के शोषण को और तीव्र करने, किसानों की आय पर डाका डालने और प्राकृतिक संसाधनों को लूटने की योजना बना रहे हैं। अपने इस बदनाम जन-विरोधी कार्यक्रम को देष के मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों पर थोपने के लिए वे चाहते हैं कि सांप्रदायिक उन्माद भड़के और पड़ोसी देशों के साथ जंग का माहौल बने। जो कोई उनके इस कार्यक्रम का प्रतिरोध करता है उसे वे “देशद्रोही” करार देते हैं।

प्रधानमंत्री जी, आप इज़ारेदार पूंजीपतियों के साम्राज्यवादी कार्यक्रम को “नए हिन्दोस्तान” के नाम से बेच रहे हैं। आप चाहते हो कि मज़दूर और किसान अपने संघर्ष को छोड़ दें और आप पर यकीन कर लें कि आपकी सरकार उनकी ज़रूरतों को पूरा करेगी।

 

प्रधानमंत्री जी, खबरदार हो जाओ! हिन्दोस्तान के मज़दूर और किसान आपके झूठे वायदों पर यकीन नहीं करते हैं और वे अपना संघर्ष नहीं छोड़ेंगे। शहीद भगत सिंह के इन शब्दों को वे भूले नहीं हैं:

हिन्दोस्तान का संघर्ष तब तक चलता रहेगा, जब तक सत्ता में बैठे कुछ मुट्ठीभर लोग अपने स्वार्थ के लिए लोगों का शोषण करते रहेंगे!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी को पूरा विश्वास है कि वह दिन दूर नहीं जब टाटा, बिरला, अम्बानी और अदानी की अगुवाई में चलाये जा रहे मुट्ठीभर शोषकों के इस राज का तख्ता पलट किया जायेगा। मज़दूर और किसान संगठित होकर राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में लेंगे और एक नए हिन्दोस्तान का निर्माण करेंगे, एक नयी व्यवस्था और राज्य का निर्माण करेंगे जो सभी के लिए सुख और सुरक्षा की गारंटी देगा।

Tag:    दमनकारी    70वीं सालगिरह    शहीद भगत सिंह    Sep 1-15 2017    Statements    History    Political Process     Rights     2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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