झारखण्ड भूमि अधिग्रहण विधेयक पारित : इज़ारेदार बड़े पूंजीपतियों के हितों को बढ़ावा

Submitted by cgpiadmin on शनि, 02/09/2017 - 16:31

ध्वनिमत से यह नया विधेयक पारित कर दिया। यह नया कानून जिसे, ‘झारखण्ड भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवज़ा और पारदर्शिता का अधिकार, पुनर्वास और पुनस्र्थापन (संशोधन) विधेयक 2017’ कहा गया है। इसमें मौजूदा कानून के कुछ प्रावधानों में संशोधन किया गया है, ताकि बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों द्वारा खनन, ऊर्जा उत्पादन और अन्य परियोजनों के लिए भूमि अधिग्रहण को और अधिक आसान बनाया जा सके। भूमि अधिग्रहण के खिलाफ़ व्यापक जन-विरोध के चलते ऐसी कई परियोजनाएं शुरू नहीं हो पाई हैं।

इस नए अधिनियम के मुताबिक, यदि भूमि अधिग्रहण “सार्वजनिक लक्ष्य” के लिए किया जा रहा है, तो उस परियोजना में निहित सामाजिक प्रभाव आकलन के प्रावधान को हटा दिया गया है। इसके अलावा इस नए अधिनियम में 70 प्रतिषत भूमिधारकों की सहमति हासिल करने के प्रावधान को भी हटा दिया गया है, जो कि केंद्रीय भूमि अधिग्रहण अधिनियम में मौजूद है। अब केवल पंचायती राज अधिनियम में लागू अनुसूचित क्षेत्र अधिनियम के तहत आने वाले अनुसूचित इलाकों में अधिग्रहण के लिए ही ग्राम सभा की मंजूरी लेना अनिवार्य होगा।

इससे पहले 23 नवम्बर, 2016 को राज्य सरकार ने भूमि संबंधी दो कानूनों में संशोधन किये थे - छोटा नागपुर टेनेंसी अधिनियम और संथाल परगना टेनेंसी अधिनियम, जिसकी वजह से जोतने के लायक भूमि का इस्तेमाल, गैर-खेती के काम में किया जा सके। इन संशोधनों ने जनजातियों की ज़मीनों को और खेती की ज़मीनों को किसी भी कार्य या लक्ष्य के लिए हथियाने की ताक़त राज्य के हाथों में दे दी। राज्य किसी भी कार्य को “सार्वजनिक लक्ष्य” का कार्य घोषित कर सकता है।

राजधानी से 60 कि.मी. दूर खुंती के पुलिस अधीक्षक व 80 अफसरों को बंदी बनाया गया

State forces held hostage in Jharkhand

आदिवासी गांववासियों ने खुंती के 80 तक की संख्या में प्रशासनिक अधिकारियों को 12 घंटे तक बंदी बनाकर रखा। रातभर बंदी बनाये गये लोगों में, जिला के पुलिस अधीक्षक (एस.पी), पुलिस उपाधीक्षक (डी.एस.पी.), कुछेक कार्यपालक न्यायाधीश तथा कम से कम 50 सशस्त्र सी.आर.पी.एफ. के जवान शामिल थे। आदिवासी लोग बाहर के लोगों के आने पर प्रतिबंध के साथ-साथ, राज्य सरकार से मांग कर रहे थे कि राज्य सरकार ग्राम सभा की इच्छानुसार चले। ऐसा 12 अगस्त को पारित किये गये एक नये भूमि अधिग्रहण विधेयक की प्रतिक्रिया में किया गया था।

इसके पहले विरोध आंदोलन की वजह से सरकार को भू-धारण कानून संशोधन विधेयक को वापस लेना पड़ा था। हाल के कानून से एक बार फिर गांववासियों का सरकार पर से भरोसा टूटा है।

झारखण्ड में भाजपा की सरकार, हिन्दोस्तानी और विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को झारखण्ड की ज़मीन, श्रम और समृद्ध खनिज संसाधनों को लूटने के लिए जी-जान से आमंत्रित कर रही है। 16-17 फरवरी, 2017 को हुई ‘मोमेंटम झारखण्ड इन्वेस्टर समिट 2017’ के दौरान हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों के साथ 200 से अधिक समझौता दस्तावेजों (एम.ओ.यू.) पर हस्ताक्षर किये गए।

झारखण्ड सरकार ने ऐलान किया है कि उसके पास भावी निवेशकों के लिए 20 लाख एकड़ से भी अधिक ज़मीन उपलब्ध है। इससे यह साफ हो जाता है कि झारखण्ड सरकार राज्य की इस सारी ज़मीन और प्राकृतिक संपदा को बेचने के लिए तैयार है, जिससे पूंजीपति अधिकतम मुनाफे़ बना सकें।

कोयला, लोहा और अन्य खनिज पदार्थों से समृद्ध झारखण्ड की प्राकृतिक संपदा पर हिन्दोस्तानी और विदेशी इज़ारेदार पूंजीपतियों की नज़रें टिकी हुई हैं। पूंजीपति चाहते हैं कि सरकार भूमि अधिग्रहण के रास्ते में आने वाली सभी रुकावटों को हटा दे।

2014 में जब केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार आई, तो उसने भूमि अधिग्रहण अधिनियम-2013 में संशोधन लाने की कोशिश की, लेकिन जन-विरोध के चलते वह ऐसा करने में कामयाब नहीं हुई। अब राज्य सरकारों को भूमि अधिग्रहण कानूनों में बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों के कार्यक्रम के हित में संशोधन करने की खुली छूट दे दी गयी है। गुजरात, तमिलनाडु, गोवा और तेलंगाना सहित कई राज्यों ने भूमि अधिग्रहण कानून में इस तरह के संशोधन कर दिए हैं।

झारखण्ड में, पिछले एक साल से राज्य द्वारा बलपूर्वक भूमि अधिग्रहण किये जाने के खिलाफ़, हजारीबाग, बारकागांव और रामगढ़ जैसे कई इलाकों में जन-प्रदर्शन चल रहे हैं। प्रदर्शन कर रहे लोग यह मांग कर रहे हैं कि ज़मीनें छीने जाने के बदले में, उनको मुनासिब मुआवज़ा दिया जाना चाहिए और साथ ही विस्थापितों का पूरा पुनर्वास किया जाना चाहिए। जन-विरोध पर पुलिस द्वारा कई बार हमला किया गया, गोलीबारी की गई, जिसमें कई लोग मारे गए हैं और घायल हुए हैं। इन प्रदर्शनों की वजह से कई बड़ी खनन और ऊर्जा की परियोजनाएं रोक दी गयी हैं।

भूमि अधिग्रहण के खिलाफ़ चल रहे, लोगों के संघर्षों को भटकाने और उनकी एकता को तोड़ने के लिए, झारखण्ड की सरकार ने धर्म परिवर्तन को रोकने के नाम पर 12 अगस्त को भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक के साथ ही झारखण्ड धर्म स्वातंत्रय विधेयक 2017 को भी पारित कर दिया। इस कानून में कारावास और भारी जुर्माने का प्रावधान है इस कानून का मकसद है अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ़ भड़काना और बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों के हितों की रक्षा में सरकार के जन-विरोधी हमलों के खिलाफ़ लोगों की बढ़ती एकता को तोड़ना।

जो लोग इन इलाकों में सदियों से रहते आये हैं, ज़मीन जोतकर अपनी रोज़ी-रोटी कमाते आये हैं, वे सभी भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि वे अपने अनुभव से जानते हैं कि इस भूमि अधिग्रहण का मकसद उनकी खुशहाली, उनके लिए स्कूल, अस्पताल और संसाधन देना बिल्कुल नहीं है, बल्कि पूंजीपतियों के लिए अधिकतम मुनाफे़ सुनिश्चित करना है। इन पूंजीपतियों की लालची नज़रें यहां की ज़मीनों पर तथा उसके नीचे दबे खनिज संसाधनों पर टिकी हुई हैं। लोगों का यह डर एकदम सही है, कि भूमि अधिग्रहण से उनकी ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी। राज्य द्वारा “मुआवज़ा, पुनर्वास और पुनस्र्थापन” का इतिहास यही दिखाता है कि जिन लोगों को विस्थापित किया जाता है, उनको सुरक्षित रोज़गार मुहैया कराने के प्रति राज्य का रवैया हमेशा क्रूर रूप से उदासीन रहा है।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी का यह मानना है कि एक नए भूमि कानून की ज़रूरत है। यह नया कानून इस असूल के आधार पर बनाया जाना चाहिए कि इससे ज़मीन का इस्तेमाल करने वाले तमाम लोगों के हितों और समाज के आम हितों के बीच सामंजस्य बने। ज़मीन का इस्तेमाल एक सामाजिक योजना के मुताबिक नियंत्रित किया जाना चाहिए, जहां कृषि, उद्योग, सेवाएं, आवास और तमाम सामाजिक ज़रूरतों को ध्यान में रखा जायेगा। लेकिन ऐसी सामाजिक योजना को अमल में लाने के लिए अर्थव्यवस्था की वर्तमान दिशा को बदलना ज़रूरी है - जिसमें, बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों के लिए अधिकतम मुनाफे़ सुनिश्चित करने की वर्तमान दिशा से बदलकर, उसे ग्रामीण और शहरी आबादी की निरंतर-बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में किया जाये।

Tag:    झारखण्ड    आदिवासी    अधिकारों के लिए संघर्ष    Sep 1-15 2017    Struggle for Rights    Rights     2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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