जी.एस.टी. - पूंजी के संकेंद्रण, कर लगाने के अधिकार के केंद्रीकरण और मज़दूर वर्ग से जबरदस्ती वसूली को बढ़ाने का साधन

Submitted by cgpiadmin on शनि, 02/09/2017 - 17:35

जुलाई 2017 से लागू किया गया वस्तु एवं सेवा कर (जी.एस.टी.), देशभर में लागू होने वाला एकमात्र कर होगा, जो वस्तुओं और सेवाओं पर अभी तक लागू अलग-अलग अप्रत्यक्ष करों की जगह लेगा। केंद्र सरकार द्वारा अब तक लगाए जा रहे करों व शुल्कों - उत्पादन शुल्क, विशेष उत्पादन शुल्क, विशेष सीमा शुल्क, केंद्रीय बिक्री कर (सी.एस.टी.), सेवा कर, विभिन्न प्रकार के अधिभार और सेस की जगह अब जी.एस.टी. ने ले ली है। यह कर राज्य सरकारों द्वारा वसूले जा रहे करों - मूल्य वर्धित कर (वैट), विलासिता कर (लक्ज़री टैक्स), मनोरंजन कर, राज्य की सीमा में प्रवेश का कर और खरीदी कर सहित लगाए गए अन्य अप्रत्यक्ष करों की भी जगह लेगा।

GST Protest Surat textile traders

“एक राष्ट्र, एक कर, एक बाज़ार”, हिन्दोस्तान के इज़ारेदार बड़े पूंजीपति पिछले कई वर्षों से यह मांग करते आये हैं। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि बड़े सरमायदारों के तमाम संगठनों ने इसका स्वागत किया, जिनमें सी.आई.आई., एफ.आई.सी.सी.आई. (फिक्की), ए.एस.एस.ओ.सी.एच.ए.एम. (एसोचैम) शामिल हैं। उन्होंने जी.एस.टी. को हाल के दशक में लागू किया गया सबसे बड़ा आर्थिक नीति सुधार बताया है। शेयर बाज़ार में शेयरों की कीमतें नयी ऊंचाइयां छू रही हैं।  
लाखों छोटे और मंझोले उत्पादक और व्यापारी जी.एस.टी. के खिलाफ़ सड़कों पर उतर आये हैं। देशभर में और खास तौर से सबसे अधिक औद्योगिकृत इलाकों में, जैसे कि गुजरात और तमिलनाडु में, विशाल प्रदर्शनों की खबरें आई हैं।

पूंजी का और अधिक संकेंद्रण

व्यापार जगत के कई विश्लेषकों ने बड़ी पूंजीवादी कंपनियों की एक सूची तैयार की है, जिनकी बाज़ार में हिस्सेदारी जी.एस.टी. के लागू होने से बढ़ेगी। ये कंपनियां अर्थव्यवस्था के तमाम क्षेत्रों में फैली हुई हैं, जिनमें कपड़ा और बने-बनाये वस्त्र, जूते-चप्पल, टाइल और सेनेटरीवेयर, प्लाईवुड, बिजली के उपकरण, प्लास्टिक और पैकेजिंग, इत्यादि शामिल हैं। ऐसा पूर्वानुमान लगाया जा रहा है कि जी.एस.टी. के लागू होने से टाइल के उद्योग में छोटे उत्पादकों की हिस्सेदारी मौजूदा 40 प्रतिशत से घटकर 20 प्रतिशत हो जाएगी।

बड़ी कंपनियां जो पूरे हिन्दोस्तान में अपने माल का उत्पादन और बिक्री करती हैं, उनको जी.एस.टी. का कई तरह से फायदा होगा।

पहली बात यह है कि इन कंपनियों को केंद्रीय बिक्री कर, राज्य की सीमा के प्रवेश शुल्क और खरीदी कर से बचने के लिए, उन सभी राज्यों में अलग-अलग भण्डार रखने की ज़रूरत नहीं होगी, जिन राज्यों में वे अपनी वस्तुओं की बिक्री करती हैं। बिक्री के लिए राज्यों की सीमाओं को खत्म कर देने से अब देश के स्तर पर व्यापार करने वाली बड़ी कंपनियों के किये भण्डारण और यातायात के खर्च में बचत होगी।

दूसरी बात यह है कि जी.एस.टी. की वजह से एक ही वस्तु पर बार-बार टैक्स लगाने की प्रक्रिया को ही खत्म कर दिया गया है। उदाहरण के लिए, अब तक चली आ रही कर व्यवस्था में उत्पादन की जगह पर केंद्रीय उत्पादन शुल्क लगाया जाता था और बिक्री के समय राज्य सरकार उस पर वैट लगाती थी। इस वजह से केंद्रीय उत्पादन शुल्क की मात्रा पर भी वैट लगाया जाता था।

संचालन और क्रियान्वयन, भण्डारण और यातायात के खर्चे में गिरावट और कर के ऊपर लगने वाले कर को हटाये जाने से, बड़े स्तर का उत्पादन और व्यापार करने वाली कंपनियों के मुनाफ़े बढ़ जायेंगे। छोटे और मंझोले उत्पादकों और व्यापारियों की तुलना में बाज़ार में उनकी हिस्सेदारी बढ़ जाएगी।  

जो भी उद्यमी अपनी वस्तु या सेवाएं बेचना चाहता है, उसे जी.एस.टी. में पंजीकरण कराना होगा। लेकिन यदि उसकी कुल वार्षिक आय 20 लाख रुपये से कम है, तो उसको पंजीकरण करने की ज़रूरत नहीं है (उत्तर-पूर्व तथा जम्मू और कश्मीर के लिए यह सीमा 10 लाख रुपये रखी गयी है)। इससे यह आभास होता है कि इसमें छोटी और मंझोली यूनिटों के लिए सहूलियत दी जा रही है। लेकिन, असलियत में ऐसा है नहीं। जिन कंपनियों का जी.एस.टी. में पंजीकरण नहीं किया गया है, उन कंपनियों को अपना माल बेचने के लिए ग्राहक जुटाना बेहद मुश्किल होगा, क्योंकि जो भी कंपनी उनके साथ व्यापार करेगी, और उनसे कोई वस्तु या सेवा खरीदेगी, तो वह अपनी खरीदी पर इनपुट टैक्स क्रेडिट का फायदा नहीं उठा पायेगी (बॉक्स देखिये)।

इनपुट टैक्स क्रेडिट

जी.एस.टी. और मूल्य वर्धित कर (वैट) के बीच एक समानता है। जो भी करदाता कर का भुगतान करता है वह उत्पादन के लिए खरीदी गयी वस्तु पर अदा किये गये कर की वापसी की मांग कर सकता है।

उदाहरण के लिए मान लीजिये कि कंपनी “ए” बने-बनाये वस्त्रों का उत्पादन करती है और उनको बेचती है और इसके लिए लगने वाला सारा कपड़ा वह कंपनी “बी” से खरीदती है। तो कंपनी “ए” अपने द्वारा बेचे गए वस्त्रों पर ग्राहक से जी.एस.टी. वसूल करेगी और उसे सरकार को सौंप देगी। इसके अलावा वह कंपनी सरकार से उस जी.एस.टी. की मात्रा की मांग कर सकती है, जो उसने कपड़ों की खरीदी करते समय कंपनी “बी” को अदा किया था। इसे “इनपुट टैक्स क्रेडिट” कहा जाता है।

जी.एस.टी. के कानून छोटे-स्तर के उद्यमों को विकल्प देते हैं कि वे या तो जी.एस.टी. से खुद को बाहर रख सकते हैं, या फिर एक कम्पोजीशन स्कीम को अपना सकते हैं जिसमें वे सरकार को एक निर्धारित दर पर कर की अदायगी करेंगे, जो उनके वार्षिक मूल्य के आधार पर तय की जाएगी। लेकिन ऐसे उद्यम न तो अपने द्वारा उत्पादन के लिए खरीदी गयी सामग्री पर अदा की गयी जी.एस.टी. पर क्रेडिट पर दावा कर सकते हैं, और न ही जी.एस.टी. पंजीकृत बिल जारी कर सकते हैं। जो भी ऐसी कंपनी से कोई वस्तु खरीदेगा, वह खरीदी पर इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा नहीं कर सकेगा। इसलिए जो कंपनी जी.एस.टी. पंजीकृत नहीं है या, जिसने कम्पोजीशन स्कीम चुनी है, ऐसी कंपनी से कोई भी बड़े-स्तर का उत्पादक या व्यापारी वस्तु या सेवा नहीं खरीदेगा।

यहां तक कि सबसे छोटे स्तर के ऑपरेटरों को भी जी.एस.टी. में पंजीकरण करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इसके अलावा जो भी जी.एस.टी. में पंजीकरण करना चाहता है उसकी पहुंच कम्प्यूटर और इंटरनेट तक होनी ज़रूरी है। कई छोटे उत्पादक जो कम्प्यूटर और इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते अब उनको ये सब चीजें खरीदनी होंगी। जी.एस.टी. की व्यवस्था कैसे काम करती है, उनको या तो खुद सिखना होगा या फिर ऐसे लोगों को काम पर रखना होगा, जो जी.एस.टी. की व्यवस्था को समझते हैं। देश के कई हिस्सों में, बड़े शहरों से दूर जहां कई-कई घंटों तक बिजली नहीं आती वहां पर उत्पादकों और व्यापारियों को बिजली के जेनसेट खरीदने होंगे। कई इलाकों में जहां इंटरनेट की सेवायें खराब हैं, ऐसे इलाकों के छोटे और मंझोले-स्तर के उत्पादकों का तो धंधा ही ठप्प हो जायेगा।

देश के अधिकतर व्यापारियों पर जी.एस.टी. से होने वाले बुरे प्रभाव के बारे में बताते हुए भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के महासचिव ने बताया कि :

“जी.एस.टी. से संबंधित कानून और नियम बेहद पेचीदे हैं, हम पर इसका बहुत बुरा असर होने वाला है और हम, खासकर छोटे व्यापारी इसका कभी पालन नहीं कर पायेंगे। इसके अलावा सरकार सारा काम ऑन-लाइन कराना चाहती है। देश के 6 करोड़ व्यापारियों में से केवल 2 प्रतिशत से भी कम व्यापारियों के पास कम्प्यूटर हैं। एक छोटा व्यापारी कहां से कम्प्यूटर खरीद पायेगा?”

इस तरह से बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों की अगुवाई में केवल बड़े पैमाने पर काम करने वाले ऑपरेटरों को इसका सबसे ज्यादा फायदा होगा। इसके चलते संकेंद्रण और इज़ारेदारी का पैमाना और अधिक बढ़ना लाजमी है। छोटे और मंझोले उत्पादकों और व्यापारियों पर जी.एस.टी. का असर वैसे ही होगा जैसे नोटबंदी के समय हुआ था। दरअसल इसका असर और अधिक तीव्र और दीर्घकालिक होने वाला है।

कर लगाने के अधिकार का केंद्रीकरण

जी.एस.टी. के लागू किये जाने से राज्य सरकार द्वारा कर लागू करने के अधिकार को बहुत हद तक कम कर दिया गया है। अब किसी भी राज्य सरकार को अपने राज्य में बेची गयी वस्तुओं पर अप्रत्यक्ष करों की दर तय करने का कोई अधिकार नहीं है। इसमें केवल शराब पर उत्पादन शुल्क को छोड़ दिया गया है। अलग-अलग वस्तुओं और सेवाओं पर लगाये जाने वाले जी.एस.टी. की दर को केंद्रीय वित्त मंत्री के अध्यक्षता में गठित एक परिषद तय करेगी।

अब राज्य सरकारें अपने राजस्व के लिए केंद्र सरकार पर और अधिक निर्भर हो गयी हैं। अभी तक किसी वस्तु की अंतर्राज्यीय बिक्री पर केंद्रीय बिक्री कर से मिलने वाला राजस्व उस राज्य की तिजोरी में जाता था, जहां से उसकी बिक्री हुई है। इसको हटाये जाने से औद्योगिकृत तौर पर अधिक विकसित राज्यों के राजस्व में गिरावट आएगी और इस नुकसान की भरपाई के लिए वे केंद्र सरकार पर निर्भर हो जाएंगे।

मज़दूर वर्ग से जबरदस्ती वसूली को बढ़ावा

इनपुट टैक्स क्रेडिट सभी वस्तुओं के विक्रेताओं पर लागू होता है, सिवाय उनके जिनके पास बेचने के लिए अपनी श्रम शक्ति के अलावा और कुछ नहीं है। मज़दूर वर्ग को खुद को जीवित रखने के लिए खरीदी जाने वाली हर एक चीज पर और अधिक कर देना होगा और उसको इसमें से कुछ भी वापस नहीं मिलेगा।

जी.एस.टी. की वजह से रोजमर्रा के इस्तेमाल की अधिकांश
वस्तुओं की क़ीमतों में बढ़ोतरी होने की संभावना है जिनमें मोबाइल का बिल, बैंक सेवायें, घर का किराया, स्वास्थ्य सेवायें और स्कूल फीस शामिल हैं। अंतर्राष्ट्रीय अनुभव भी यही दिखाता है कि जिन वस्तुओं पर पुराने करों की कुल दर की तुलना में जी.एस.टी. की दर अधिक है, उसका बोझ उन लोगों पर पड़ता है जो उसकी खरीदी करते हैं और जिन वस्तुओं पर जी.एस.टी. की दर कम है, उसका फायदा बेचने वाले को जाता है, क्योंकि वस्तुओं की क़ीमत कम नहीं होती है। जिन देशों में जी.एस.टी. लागू किया गया है, उन देशों में उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति की दर में बढ़ोतरी हुई है।

पूंजीपति वर्ग और उसके प्रवक्ता यह झूठा प्रचार करते हैं कि हिन्दोस्तान में बहुत कम लोग अपना कर अदा करते हैं। जबकि प्रत्यक्ष कर देने वाले लोगों की तादाद कम है, दरअसल जो भी व्यक्ति कोई भी वस्तु बाज़ार से खरीदता है, वह अप्रत्यक्ष कर देता है। हमारे देश में कुल जमा कर में अप्रत्यक्ष कर की वसूली पहले से ही बहुत अधिक है। जी.एस.टी. के लागू किये जाने से यह वसूली और अधिक बढ़ जायेगी।

जबकि प्रत्यक्ष कर की दर, जैसे कि व्यक्तिगत आयकर, ज्यादा आमदनी वालों के लिए अधिक है। लेकिन वस्तुओं और सेवाओं पर अप्रत्यक्ष कर की दर, सबके लिए एक समान है। इसलिए जी.एस.टी. लागू किया जाना पीछे की ओर जाने वाला एक कदम है।


जी.एस.टी. से देश के सबसे अमीर पूंजीपतियों को फायदा होगा। जी.एस.टी. देश के मज़दूर वर्ग, किसानों और अन्य छोटे उत्पादकों और व्यापारियों के हितों के खिलाफ़ है।

 

Tag:    GST    जी.एस.टी.    विरोध प्रदर्शन    Sep 1-15 2017    Struggle for Rights    Economy     Rights     2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

(Click thumbnail to download PDF)

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)