हिन्दोस्तानी और विदेशी इज़ारेदार पूंजीपतियों की सेवा में : निजीकरण - एक समाज-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी कार्यक्रम

Submitted by cgpiadmin on रवि, 17/09/2017 - 03:30

नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा नीत सरकार निजीकरण कार्यक्रम की गति को तेज़ी से बढ़ा रही है। जबकि 2015-16 में सार्वजनिक कंपनियों में सरकार के शेयरों की बिक्री का लक्ष्य 30,000 करोड़ रुपये था, तो उसे बढ़ाकर 2016-17 में 56,500 करोड़ रुपये तथा 2017-18 के लिए 72,500 करोड़ रुपये कर दिया गया है। कई ऐसे क्षेत्रों को, जो अब तक सार्वजनिक क्षेत्र में शामिल थे, जैसे कि कोयला, रक्षा उत्पादन और रेलवे, हिन्दोस्तानी और विदेशी निजी कंपनियों के लिए खोल दिये गये हैं। एयर इंडिया की पूरी तरह से बिक्री और बी.एस.एन.एल. के विनिवेश की तैयारी की जा रही है।

सरकार स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, बिजली की सप्लाई, आदि जैसी आवश्यक सेवाओं को प्रदान करने की अपनी जिम्मेदारी से अधिक से अधिक हद तक पीछे हट रही है। एक तरफ, सरकार इन क्षेत्रों में तथा हाईवे, हवाई अड्डों और तरह-तरह की नागरिक सेवाओं में ज़रूरी पूंजी निवेश नहीं कर रही है। दूसरी ओर, सरकार ज्यादा से ज्यादा विदेशी पूंजी को इन क्षेत्रों में प्रवेश करने का न्योता दे रही है। इसकी वजह से शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और बिजली की कीमतें आसमान छूने लगी है और यह लोगों पर बहुत भारी बोझ बन रहा है।

लगभग दो दशक पहले, जब निजीकरण कार्यक्रम शुरू किया गया था, तब सरकार के वक्ताओं ने यह दावा किया था कि नुकसान में चल रही सार्वजनिक कंपनियों से छुटकारा पाना जनता के हित में है। उन्होंने राज्य की मालिकी वाली कंपनियों को दो-दो भागों में बांटा - “रणनैतिक” और “गैर-रणनैतिक”, मुनाफ़़े वाली और नुकसान वाली कंपनियां। उन्होंने ऐलान किया कि सिर्फ नुकसान वाली “गैर-रणनैतिक”  कंपनियों का ही निजीकरण किया जायेगा। माडर्न फूड इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड, जो पौष्टिक ब्रेड बनाने वाली, मुनाफ़़ा वाली कंपनी थी, उसे सुनियोजित तरीके से नुकसान वाली कंपनी बना दिया गया, ताकि 2000 में उसकी बिक्री को जायज़ ठहराया जा सके। विशाल निजी इज़ारेदार कंपनी हिन्दुस्तान लीवर ने माडर्न फूड को खरीदने के लिए सिर्फ 105 करोड़ रुपये दिये। इसके जरिये वह दिल्ली, मुंबई, चैन्नई, बैंगलुरू और कोलकाता में कीमती जमीन पर हजारों-करोड़ों रुपयों के मूल्य के रियल इस्टेट का मालिक बन गया। उस पूंजीवादी कंपनी के निजी मालिकों को सार्वजनिक संपत्ति की इस बड़ी लूट से बेशुमार मुनाफ़ा मिला, जबकि ब्रेड बनाने का उस कंपनी का काम लगभग बंद हो गया।

उसके बाद से, जब-जब निजीकरण किया गया है, तब-तब यह साबित हुआ है कि ऐसा जनहित में नहीं किया गया है, बल्कि, निजीकरण कार्यक्रम का उद्देश्य सबसे बड़े इज़ारेदार पूंजीवादी घरानों की लालच को पूरा करना ही है।

भारत अल्यूमिनियम कंपनी (बाल्को) और हिन्दुस्तान ज़िंक लिमिटेड की बिक्री की वजह से अल्यूमिनियम, लेड और जिं़क के उत्पादन में वेदांत समूह का इज़ारेदार रूतबा और मजबूत हो गया। रिलायंस समूह ने इंडियन पेट्रोकेमिकल्स काॅरपोरेशन लिमिटेड के संसाधनों को हथियाने के लिए मात्र 1,491 करोड़ रुपये दिये, जबकि उस कंपनी की कीमत का अनुमान 10,000 करोड़ रुपये लगाया जाता है। इसके अलावा, रिलांयस समूह को पेट्रोकेमिकल्स क्षेत्र में लगभग संपूर्ण इज़ारेदारी मिल गई। टाटा समूह ने 2002 में विदेश संचार निगम लिमिटेड (वी.एस.एन.एल.) को खरीद लिया और इस तरह उसने उस समय की इंटरनेट और अंतर्राष्ट्रीय टेलिफोन सेवाओं में इज़ारेदारी हासिल कर ली।

निजीकरण के शुरूआती दिनों के इन सभी उदाहरणों से सरकार के उस झूठे प्रचार, कि निजीकरण सार्वजनिक हित में है, का पर्दाफाश हो गया। इसकी वजह से सभी केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों ने एकजुट होकर निजीकरण का खूब विरोध किया। मजदूर वर्ग के इस बढ़ते विरोध का सामना करते हुए, पूंजीपति वर्ग और उसकी सेवा करने वाली सरकारें बीते 15 वर्षों से निजीकरण के ज्यादा कपटी तरीकों का सहारा ले रही हैं।

पूरी-पूरी कंपनी की “रणनैतिक बिक्री” करने के बजाय, उन्होंने “विनिवेश” के झंडे तले, सार्वजनिक संसाधनों को टुकड़ों-टुकड़ों में बांटकर एक-एक हिस्सा बेचने का रास्ता अपनाया है। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, बिजली सप्लाई, पानी की सप्लाई, सड़क, पुल, आदि जैसी आवश्यक सेवाओं को ज्यादा से ज्यादा हद तक निजी मुनाफ़ाखोरों के हाथों में सौंपने के लिए, “पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप” का रास्ता अपनाया है।

भारतीय रेल में चुपके से निजीकरण किया जा रहा है। अलग-अलग कार्यों को निजी कंपनियों को आउटसोर्स किया जा रहा है। इसकी वजह से भारतीय रेल में काम करने वाले मजदूरों की संख्या, जो 1991 में 16,50,000 थी, अब लगभग 13,00,000 हो गयी है। लगभग 3,50,000 नौकरियों की कटौती हुई है। इनमें कुछ बहुत ही नाजुक और निर्णायक कार्य शामिल हैं, जैसे कि गैंगमैन के काम, जो रेल की पटरियों की देखरेख में अहम भूमिका निभाते हैं। रेलवे इन कार्यों को निजी ठेकेदारों को ठेके पर करवाने के लिए देते हैं। निजी ठेकेदार अपने मुनाफ़ों को बढ़ाने के लिए अप्रशिक्षित लोगों से वह काम करवाते हैं और शार्टकट भी लेते हैं, जरूरी सावधानी नहीं बरतते हैं। इस तरह, निजी मुनाफ़ों को बढ़ाने के लिए, रेल मजदूरों और रेल यात्रियों, दोनों को ख़तरे में डाला जा रहा है।

पूंजीपति वर्ग के वक्ता यह झूठा प्रचार करते हैं कि बार-बार होने वाली रेल दुर्घटनाओं को निजीकरण के द्वारा रोका जा सकता है। वे इस बात को छिपाते हैं कि रेलवे के अनेक जरूरी कार्यों को निजी कंपनियों को आउटसोर्स करके, उनका निजीकरण करने की वजह से ही रेल यात्रा के ख़तरे बहुत बढ़ गये हैं।

निजीकरण चाहे एक झटके में किया जाये या टुकड़े-टुकड़े में, सार्वजनिक संपत्ति और सार्वजनिक सेवाओं को बेचकर उन्हें निजी मुनाफ़ाखोरों के हाथों सौंप देना, यह उस असूल के बिल्कुल खिलाफ़ है, जिसे हिन्दोस्तान के लोग मानते हैं - कि समाज के सभी सदस्यों की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य का फ़र्ज है। दूसरे शब्दों में, निजीकरण कार्यक्रम समाज के आम हितों के खिलाफ़़ है। वह समाज-विरोधी है। 20 वर्ष पहले, निजीकरण कार्यक्रम के शुरू होने के समय, सरकार ने “रणनैतिक क्षेत्र” और “गैर-रणनैतिक क्षेत्र”, “लाभकारी” बनाम “नुकसान वाली” कंपनियों के बीच में जो अंतर किया था, आज उसे खुलेआम मिटा दिया जा रहा है। हिन्दोस्तानी और विदेशी निजी कंपनियों को बेचने के लिए जो सार्वजनिक संपत्ति आज सौंपी जा रही है, उसमें 60 ऐसे यूनिट हैं जो हिन्दोस्तान की सेना को हथियारों और यंत्रों की सप्लाई करते हैं। भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड (बी.ई.एम.एल.), जो एक मुनाफ़ाकारी रक्षा क्षेत्र की कंपनी है, उसे बिक्री के लिए रखा गया है। हिन्दोस्तानी और विदेशी या उनकी मिलीजुली हथियार बनाने वाली इज़ारेदार कंपनियों को रणनैतिक हथियार प्रणालियों के उत्पादन का काम सौंप देना, यह राष्ट्रीय संप्रभुता के हितों के बिल्कुल खिलाफ़़ है। रक्षा क्षेत्र की कंपनियों में काम करने वाले मजदूरों ने बहुत ही सही तरीके से इस बात पर रोशनी डाली है कि निजी इज़ारेदार कंपनियों की प्रधानता में सैनिक-औद्योगिक काम्लेक्स का निर्माण करना राष्ट्रीय सुरक्षा तथा इस इलाके में शांति बनाये रखने के खिलाफ़ है। निजीकरण कार्यक्रम न सिर्फ समाज-विरोधी है, बल्कि राष्ट्र-विरोधी भी है।

आज जहां-जहां राज्य जनता के प्रति अपना कर्तव्य पूरा करने में नाकामयाब साबित हो रहा है, वहां-वहां राज्य के वक्ता तथाकथित समाधान बतौर निजीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं। जब गोरखपुर में सरकारी अस्पताल में 70 से ज्यादा बच्चे मर गये, तब टीवी चैनलों पर इसके समाधान बतौर “पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप” को खूब बढ़ावा दिया गया। नीति आयोग ने प्रस्ताव किया है कि उच्च शिक्षा और अस्पताल सेवाओं, दोनों को “मुनाफ़ा के लिए” क्षेत्र माना जाये, न कि आवश्यक सेवा जिसके लिए राज्य को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। जबकि वास्तव में, शिक्षा और अस्पताल सेवाओं में जहां-जहां निजी पूंजी निवेश किया गया है, वहां इन सेवाओं के लिए लोगों को बहुत भारी कीमत देनी पड़ती है, और सेवा में कुछ खास उन्नति नहीं होती है।

निजीकरण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य इज़ारेदार पूंजीपतियों के लिए, जनता को लूटकर ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़े कमाने के नये-नये रास्ते खोलना है। इस समय हिन्दोस्तानी और विदेशी इज़ारेदार कंपनियों की लालची नज़रे हमारे देश की 157 केन्द्रीय सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों पर टिकी हुई हैं। 2014-15 में इन कंपनियों के कुल मुनाफ़े लगभग 1,30,000 करोड़ रुपये थे।

पूंजीपति वर्ग के झूठे प्रचारों का पर्दाफाश करना और निजीकरण के खिलाफ़़ संघर्ष में व्यापक जनसमुदाय का समर्थन पाना मजदूर वर्ग के लिए अति आवश्यक है। हमें इस असूल का अनुमोदन करना होगा कि सार्वजनिक धन से उत्पन्न किये गये उत्पादक संसाधन जनता की संपत्ति है और उसे जनता के हित में ही इस्तेमाल करना चाहिए। जो जनता की संपत्ति है, उसे किसी निजी कंपनी को बेचने का सरकार को कोई अधिकार नहीं है। सभी की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य का फर्ज है।

पूंजीपति वर्ग के लिए आर्थिक सफलता का मापदंड यह है कि कितना ज्यादा मुनाफ़ा कमाया जा रहा है। मजदूर वर्ग को यह मापदंड मंजूर नहीं है। बैंकों, रेलवे, बिजली क्षेत्र, एयर इंडिया आदि की सफलता का मापदंड यह होना चाहिए कि वे किस हद तक लोगों की जरूरतों को पूरा करते हैं, न कि उनसे कितना मुनाफ़ा कमाया जा सकता है।

पूंजीपति वर्ग और उनके नेता जानबूझकर, सुनियोजित तरीके से मुनाफ़ेदार सार्वजनिक कंपनियों को नुकसान वाली कंपनियों में बदल देते हैं, ताकि उन्हें निजी हाथों में बेचना जायज़ ठहराया जा सके। जिन सार्वजनिक क्षेत्र कंपनियों का वे निजीकरण करना चाहते हैं, उन्हें सुनियोजित तरीके से नष्ट करते हैं और फिर उन्हें “नुकसान वाली” कंपनी घोषित कर देते हैं। एयर इंडिया, बी.एस.एन.एल और दूसरी सार्वजनिक कंपनियों के साथ वे ऐसा करते आये हैं। इन क्षेत्रों के मजदूरों और संपूर्ण मजदूर वर्ग को इस बात का खुलासा करना चाहिए कि निजीकरण करने से पहले शासक वर्ग और उसकी सरकारें किस तरह जनता के संसाधनों का विनाश करती हैं।

संक्षेप में, निजीकरण के रूप में पूंजीपतियों के हमले का मकसद है जनता के धन से बनाये गये संसाधनों और देश की विस्तृत भूमि व प्राकृतिक संसाधनों को निजी इज़ारेदार कंपनियों के हाथों में सौंप देना। इसके फलस्वरूप, लोगों के लिए आवश्यक सेवाओं की कीमतें बहुत बढ़ जाती हैं, जबकि राज्य सड़क, रेलवे, जन-परिवहन, बिजली सप्लाई, जैसी आवश्यक ढांचागत सेवाओं तथा शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, जल-सप्लाई और अन्य नागरिक सेवाओं को मुहैया कराने की अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट जाता है।

वर्तमान अर्थव्यवस्था की समस्या यह है कि इसका उद्देश्य लोगों की जरूरतों को पूरा करना नहीं, बल्कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करना है। उत्पादन प्रक्रिया का स्वाभाव बहुत ही सामाजिक है, जबकि उत्पादन के साधनों की मालिकी निजी है तथा चंद हाथों में संकेन्द्रित है। अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों पर निजी मुनाफ़ाकारी का उद्देश्य हावी है। इसकी वजह से उत्पादन में अराजकता फैलती है। उत्पादन का उद्देश्य समाज की जरूरतों को पूरा करना नहीं, बल्कि निजी इज़ारेदार पूंजीपतियों के मुनाफ़ों को बढ़ाना है।

इज़ारेदार पूंजीवादी घराने हिन्दोस्तानी राज्य पर हावी हैं और उस पर नियंत्रण करते हैं। वर्तमान व्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्र की इज़ारेदार कंपनियां भी इज़ारेदार पूंजीपतियों के अधिकतम मुनाफ़़ा कमाने के इरादों को पूरा करने का काम ही करती हैं। वास्तव में, टाटा और बिरला जैसी सबसे बड़ी इज़ारेदार पूंजीवादी कंपनियों ने ही सबसे पहले अर्थव्यवस्था के विभिन्न निर्णायक क्षेत्रों में हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा सार्वजनिक कंपनियां स्थापित करने की जरूरत को पेश किया था। यह “टाटा-बिरला योजना” के नाम से जाना जाता है, जिसे कांग्रेस पार्टी ने “समाजवादी नमूने के समाज“ बतौर लागू किया था। लोगों से लूटे गये संसाधनों

का इस्तेमाल करके सार्वजनिक क्षेत्र को खड़ा किया गया, जबकि इज़ारेदार पूंजीपतियों ने उन क्षेत्रों में निवेश किया, जिनसे उन्हें अधिकतम मुनाफ़े मिल सकते थे। आज हिन्दोस्तानी इज़ारेदार कंपनियां यह मांग कर रही हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र को उन्हें ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़े कमाने के लिए सौंप दिया जाये।

इस समस्या का समाधान अर्थव्यवस्था को एक पूरी तरह से नयी दिशा दिलाना है, ताकि अर्थव्यवस्था लोगों के हितों की सेवा में काम करे, न कि इज़ारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने के लिए। राज्य की मालिकी और नियंत्रण में कुछ कंपनियों का होना काफी नहीं है। जब तक राज्य खुद इज़ारेदार पूंजीवादी घरानों की मुट्ठी में है, तब तक अर्थव्यवस्था की दिशा उनकी लालच को पूरा करने की दिशा ही रहेगी।

इसके समाधान के लिए मजदूर वर्ग को मेहनतकश जनसमुदाय के साथ गठबंधन बनाकर, अपने हाथों में राज्य सत्ता लेना होगा। ऐसा करके ही इज़ारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने की दिशा में चलाने के बजाय, अर्थव्यवस्था को आबादी की बढ़ती मांगे पूरी करने की दिशा में चलाया जा सकेगा।

उत्पादन और विनिमय के साधनों को इज़ारेदार पूंजीपतियों के हाथों से निकालकर सामाजिक मालिकी और नियंत्रण में लाना होगा। सामाजिक नियंत्रण का मतलब है लोगों द्वारा नियंत्रण, जिसके तहत यूनियनों में संगठित और शिक्षित मजदूर अगुवाई लेकर यह सुनिश्चित करेंगे कि सभी सार्वजनिक कारोबारों को सिर्फ जनता के हित में ही चलाया जायेगा।

मजदूर वर्ग को इस क्रांतिकारी नज़रिये के साथ, निजीकरण के खिलाफ़़ संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा!

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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