“निजता के अधिकार” पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला

Submitted by cgpiadmin on रवि, 17/09/2017 - 01:30

सर्वोच्च न्यायालय की एक 9-सदस्यीय संविधान पीठ ने यह फैसला दिया है कि देश के लोगों को “निजता का बुनियादी अधिकार है” और यह अधिकार उनके “जीवन और आज़ादी के अधिकार” का अभिन्न हिस्सा है।  

सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला, कर्नाटक उच्च न्यायालय के भूतपूर्व न्यायाधीश के. एस. पुत्तस्वामी और कुछ अन्य लोगों द्वारा दायर की गयी याचिका के जवाब में, सुनाया गया है। याचिकाकर्ताओं ने इस बात की ओर इशारा किया था कि आधार कार्ड जारी करने के लिए की जा रही बायोमेट्रिक जानकारी और आईरिस स्कैन, लोगों की निजता के अधिकार का उल्लंघन है, क्योंकि उनकी इस निजी जानकारी को सुरक्षित नहीं रखा जा रहा है, इससे निजता भंग होने और गलत काम के लिए इस्तेमाल किये जाने का खतरा है।  

याचिकाकर्ताओं का यह तर्क है कि संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए जीने के अधिकार में निजता के अधिकार को भी शामिल किया जाना चाहिए, हालांकि संविधान में ऐसा कुछ स्पष्ट रूप से कहा नहीं गया है। उन्होंने यह भी कहा कि निजता की संकल्पना और अधिक व्यापक है और जानकारी सांझा करना इसका केवल एक पहलू है।

अन्य बातों के अलावा, उनका मानना है कि “निजता का संबंध विचारों की आज़ादी, ज़मीर की आज़ादी और व्यक्तिगत स्वायत्तता के साथ जुड़ा है, और कुछ हद तक निजता सुनिश्चित किये बिना, इनमें से किसी भी बुनियादी अधिकार को लागू नहीं किया जा सकता”।

सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने टिप्पणी की है कि जीवन और व्यक्तिगत आज़ादी के अधिकार अलंघनीय हैं, अनिवार्य हैं और इन अधिकारों को मानव जैसी सम्मान की ज़िन्दगी जीने के अधिकार से अलग नहीं किया जा सकता। आगे उन्होंने कहा कि “जीवन और व्यक्तिगत आज़ादी संविधान द्वारा बनाये नहीं गए हैं। इन अधिकारों को संविधान में मान्यता दी गयी है क्योंकि यह अधिकार हर एक व्यक्ति के भीतर निहित है, जिसे मानव तत्व से अलग नहीं किया जा सकता, और उसमें वास करते है”।

सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला, सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा, इससे पहले दिए गए फैसलों को निरस्त करता है, जिनमें यह कहा गया था कि निजता का अधिकार बुनियादी अधिकार नहीं है।

जीवन, आज़ादी और ज़मीर का अधिकार, निजता का अधिकार और तमाम अन्य अधिकार जो मानव के सम्मानीय जीवन के लिए ज़रूरी हैं, अलंघनीय हैं, अनिवार्य हैं, और इनको मानव से अलग नहीं किया जा सकता। यह अधिकार, राज्य न तो दे सकता है और न ही छीन सकता है। समाज को यह सुनिश्चित करना होगा कि इन अधिकारों की गारंटी हो, और इनको हक़ीक़त में लागू किया जाए।

लेकिन हक़ीक़त यह है कि हिन्दोस्तानी राज्य और उनके तमाम संस्थाओं द्वारा हर रोज लोगों के अधिकारों का उल्लंघन किया जाता है।

मौजूदा संविधान में मानव अधिकारों की गारंटी नहीं दी गयी है। हर रोज लोग भुखमरी, बीमारी, तथा बाढ़ और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदा में मारे जाते हैं क्योंकि राज्य उनकी हिफ़ाजत करने से इंकार करता है। करोड़ों लोगों को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, साफ़-सफाई, पीने योग्य साफ पानी और आवास से वंचित रखा जाता है। कश्मीर और उत्तर-पूर्व में हर दिन लोगों का आफ्स्पा जैसे काले कानूनों के तहत क़त्ल कर दिया जाता है। बगावत-विरोधी कार्यवाही के नाम पर, सेना और सुरक्षा बल “खोजी” कार्यवाही के दौरान, लोगों की निजता का क्रूरूता से उल्लंघन करते हैं। यु.ए.पी.ए. कानून के तहत, कई बेगुनाह लोग बरसों से जेलों में बंद हैं। राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा में हजारों बेगुनाह लोग अपनी जान गंवा बैठे हैं।

हक़ीक़त यह है कि पूंजीपतियों के राज में निजता के अधिकार सहित तमाम नागरिक आज़ादियों का खुला उल्लंघन होता है। संविधान की हर एक धारा, जिसमें नागरिक आज़ादियों की गारंटी मिलने का आभास होता है, के साथ ऐसी भी धाराएं जोड़ दी गयी हैं, जिनके द्वारा राज्य को इन अधिकारों पर पाबंदी लगाने की इज़ाज़त दी गयी है। हुक्मरान वर्ग इन प्रावधानों का इस्तेमाल सबसे पहले मज़दूर वर्ग और मेहनतकश जनसमुदाय के खिलाफ़ करता है, जो अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसके अलावा, इसका इस्तेमाल समय-समय पर, पूंजीपतियों के बीच आपसी विरोध को कुचलने के लिए किया गया है।

उदाहरण के लिए, संविधान के अनुच्छेद 19 की धारा 1 में अभिव्यक्ति की आज़ादी (जिसमें प्रेस की आज़ादी भी शामिल है), संगठित होने की आज़ादी, एक जगह जमा होने की आज़ादी, और अन्य अधिकार दिए गए हैं। लेकिन इसी अनुच्छेद की अन्य धाराएं इन अधिकारों पर पाबंदी लगाती है, या फिर इन अधिकारों को “देश की एकता और अखंडता के हित में”, “राज्य की हिफ़ाजत” के लिए, “सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता”, “न्यायालय की अवमानना”, “मानहानि या अपराध के लिए उत्तेजना” इत्यादि के बहाने छीन लेती है।

पूंजीपतियों के राज की यही हक़ीक़त है, जिसे यह संविधान वैधता प्रदान करता है। हमारे देश का हुक्मरान वर्ग, जिसकी अगुवाई लगभग 150 इजारेदार घराने करते हैं, उनके मुनाफों के लक्ष्य के लिए लोगों के अधिकारों की बलि चढ़ाई जाती है।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाते हुए खुद इस बात को स्वीकार किया है कि राज्य के “वैध लक्ष्यों” को पूरा करने के लिए निजता के अधिकार पर पाबंदी लगायी जा सकती है। हमारे आज तक के अनुभव से यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि हमारे हुक्मरान वर्ग और उनका राज्य, “निजता के अधिकार” पर “स्वीकार्य पाबंदी” जरूर लगायेगा। इसका मतलब है हिन्दोस्तानी राज्य अपने नागरिकों के बारे में जानकारी इकठ्ठा करता रहेगा और बड़े पूंजीपतियों की हुकूमत को बरकरार रखने के लिए लोगों की निजता का उल्लंघन करता रहेगा। इस जानकारी का इस्तेमाल उन लोगों को डराने, धमकाने और आतंकित करने के लिए करता रहेगा, जो इस हिन्दोस्तानी राज्य की नाइंसाफियों के खिलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं।

सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला ऐसे वक़्त पर आया है, जब लोगों के अधिकारों और आज़ादियों पर राज्य द्वारा हमलों के खिलाफ़, जनसमुदाय के बीच व्यापक प्रतिरोध बढ़ता जा रहा है। इसके साथ यह पंूजीपतियों के कुछ तबकों के बीच उभर रही चिंता को भी दर्शाता है, जो यह चाहते है कि सत्ता में बैठे उनके प्रतिस्पर्धी, राज्य का इस्तेमाल करते हुए, उनकी “निजता के अधिकार” का कहीं उल्लंघन न कर दें।

कुछ वर्ष पहले रतन टाटा ने सर्वोच्च न्यायालय से राडिया टेप्स के प्रकाशित किये जाने पर रोक लगाने के लिए कहा, और दावा किया कि इनके प्रकाशन से उनकी निजता का उल्लंघन होगा। इन टेपों में इस बात का पर्दाफाश हुआ था कि किस तरह से सबसे बड़े इजारेदार पूंजीपति सरकार को नियंत्रित करते हैं और उसके फैसलों को प्रभावित करते हैं। इसके अलवा, हिन्दोस्तानी राज्य सर्वोच्च न्यायालय में यह तर्क दे रहा है कि जिन पूंजीपतियों ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को लूटा है, उनके नामों का खुलासा “राष्ट्रीय हित” में नहीं किया जाना चाहिए।

संक्षेप में, मज़दूर वर्ग और लोगों के अन्य दबे-कुचले तबके इस बात से संतुष्ट नहीं हो सकते कि सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला, उनके लिए नागरिक आज़ादी और निजता के अधिकार की गारंटी देगा। इस हक़ीक़त को समझते हुए कि केवल मज़दूर वर्ग ही सभी लोगों को उनके अधिकार सुनिश्चित करने में रूचि और काबिलियत रखता है। सभी लोगों के अधिकारों की संवैधानिक गारंटी के लिए, हमें अपने संघर्ष को और भी तेज़ करना होगा। हक़ीक़त में केवल मज़दूर वर्ग का राज ही सभी लोगों के लिए अधिकारों की गारंटी दिला सकता है।

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सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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