आर्थिक सर्वेक्षण पर टिप्पणियां

Submitted by cgpiadmin on शनि, 16/09/2017 - 21:30

आर्थिक सर्वेक्षण सरकार का एक वार्षिक दस्तावेज है, जिसे वित्त मंत्रालय पेश करता है। यह दस्तावेज़ देश की अर्थव्यवस्था में पिछले 12 महीने में हुए विकास की समीक्षा पेश करता है। यह दस्तावेज सरकार की हाल ही में बनायी गयी नीतियों को रेखांकित करता है तथा लघु और मध्यम अवधि में अर्थव्यवस्था की संभावनाओं को भी उजागर करता है। इस दस्तावेज को बजट सत्र के दौरान, संसद के दोनों सदनों में पेश किया जाता है।

sakalसरकार ने इस वर्ष अगस्त में, वित्तीय वर्ष 2017-18 के लिए एक और मध्य-वार्षिक आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया है। इस आर्थिक सर्वेक्षण में फरवरी 2017 के बाद से, अर्थव्यवस्था के सामने उभरकर आये नए कारकों पर प्रकाश डाला है। इससे पहले फरवरी 2017 में ऐसा ही एक आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया गया था।

फरवरी 2017 में किये गए आथिक सर्वेक्षण के पहले खंड में, सकल घरेलू उत्पाद में 6.75-7.5 फीसदी तक की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया था। ऐसी उम्मीद थी कि पिछले कई महीने लगातार गिरावट के बाद, निर्यात क्षेत्र में फिर से जान आ जाएगी। कई महीने लगातार निर्यात में गिरावट की वजह से, लाखों नौकरियां नष्ट हो गई है और निर्यात उद्योग से जुड़े छोटे और मंझोले उत्पादक दिवालिया हो गए हैं। इस आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी कहा गया था कि नोटबंदी की वजह से वस्तुओं और सेवा के उपभोग में आई गिरावट जल्दी ही पलट जाएगी।

हाल ही में पेश किये गया मध्य-वार्षिक सर्वेक्षण बताता है कि यह भविष्यवाणियां गलत साबित हुई हैं।  

आथिक सर्वेक्षण में आर्थिक संकट के बरकरार रहने के कई कारकों की सूची बनायी गयी है। इनमें से कुछ कारक हैं - बिजली और टेलिकॉम उद्योगों पर बढ़ता कर्जा, बैंकों से कर्जा लेने में बढ़ता खतरा, कृषि संकट, नोटबंदी और जी.एस.टी. के लागू करने से हुए विपरीत परिणाम।

अर्थव्यवस्था में अप्रैल-जून की तिमाही के हाल ही में जारी किये गए आंकड़े इस बात की पुष्टि करते है कि अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में वृद्धि अनुमान से कम थी। यह आंकड़े आर्थिक सर्वेक्षण-2 के बाद आये हैं।

Aarthik Halat
Rojgar

आर्थिक सर्वेक्षण ने यह स्वीकार किया है कि उद्योग क्षेत्र में भारी संकट है, ख़ास तौर से विनिर्माण और निर्माण के उप-क्षेत्रों में। औद्योगिक प्रदर्शन 2015-16 में 7.7 फीसदी से घटकर 2016-17 में 5.6 फीसदी तक गिर गया है (चार्ट देखिये)। औद्योगिक क्षेत्र में भी खनन, विनिर्माण और निर्माण इन सभी उप-क्षेत्रों में बढ़ोतरी की दर गिर गयी है।

निर्माण के क्षेत्र में गिरावट की वजह से सीमेंट और स्टील (इस्पात) की मांग में भी गिरावट आई है। इससे बड़े पैमाने पर नौकरियां नष्ट हुई हैं।

आर्थिक सर्वेक्षण यह भी दर्शाता है कि बैंक से उद्योगों को दिए जाने वाले कर्ज में 2016-17 की तुलना में 1.6 फीसदी की गिरावट आई है। इससे कुल निश्चित पूंजी निर्माण (जी.एफ.सी.एफ़.) की दर धीमी हो गयी है। जी़.एफ.सी.एफ. का अर्थ है पूंजीपति द्वारा अपने मुनाफे से कुछ पूँजी निकालकर पुनः उत्पादन में निवेश करना। पिछले वर्ष 6.5 फीसदी की तुलना में जी़.एफ.सी.एफ़. की दर 2016-17 में गिरकर केवल 2.4 फीसदी हो गई है। पूँजी निवेश में भारी गिरावट इस सच्चाई को उजागर कर रही है कि आर्थिक संकट अभी भी बरकरार है।

विनिर्माण क्षेत्र, टेलिकॉम और ऊर्जा क्षेत्र को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

ऊर्जा के क्षेत्र में मौजूदा क्षमता, बिजली की मांग से बहुत ज्यादा है। पिछले कुछ वर्षों में निजी क्षेत्र की ताप बिजली क्षमता में बहुत तेजी से बढ़ोतरी हुई, जब सरकार ने उज्वल डिस्कॉम बीमा योजना (उदय) शुरू की थी, जिसके तहत ऊर्जा उत्पादन कंपनियों को भारी रियायतें दी गयी थी। ताप बिजलीघरों पर औसतन लोड 60 फीसदी हो गया है, और ऐसे में उसे मुनाफे पर नहीं चलाया जा सकता। ऐसे कई बिजलीघर हैं, जिनका निर्माणकार्य अधूरा ही रह गया है। ऊर्जा क्षेत्रों की इजारेदार कंपनियों ने राष्ट्रीकृत बैंकों से भारी कर्ज उठाया है, और यह कर्ज अब “गैर निष्पादित संपत्ति (एन.पी.ए.)” में बदल चुका है।     

टेलिकॉम के क्षेत्र में नयी टेक्नोलॉजी की वजह से टेलिकॉम सेवाओं के दामों में गिरावट आई है, और इससे कई मौजूदा टेलिकॉम कंपनियों का व्यापार घाटे में आ गया है। इन कंपनियों का कर्जा 1.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया है। इसका नतीजा यह होगा कि कई हजारों मजदूर अपनी नौकरी खोने वाले हैं, और इन कंपनियों के नुकसान को मेहनतकश लोगों के कंधों पर लादा जायेगा। 

इस आर्थिक सर्वेक्षण में मौजूदा कृषि संकट को भी उजागर किया गया है, जो कि उत्पादों की गिरती कीमतों और खेती पर निर्भर परिवारों की गिरती आय में झलकता है। सर्वेक्षण में कहा गया है कि पिछले साल की तुलना में इस वर्ष अरहर और मूंग दाल से होने वाली असली आमदनी में क्रमशः 10 और 28 फीसदी की गिरावट आई है। मध्यप्रदेश में इस साल गेंहू की फसल का अच्छा-खासा हिस्सा न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम दाम में बेचा गया है। इससे यह साफ़ नजर आता है कि सरकार धीरे-धीरे सार्वजनिक खरीदी की व्यवस्था को नष्ट कर रही है।

सर्वेक्षण से यह भी नजर आता है कि 2015-16 में निर्यात के कुल मूल्य में 15.5 फीसदी की गिरावट आई थी। 2016-17 में निर्यात में 5.3 फीसदी की कुछ बढ़त हुई है। लेकिन यह बढ़त पिछले वर्ष की तुलना में छोटे पैमाने पर है। इससे साफ़ है कि निर्यात क्षेत्र में नौकरियों का कम होना अभी भी जारी है। दवाईयां, कपड़ा, और चमड़े की वस्तुओं के निर्यात में इससे भी ज्यादा गिरावट आई है।

वैसे तो सर्वेक्षण में आर्थिक संवर्धन पर नोटबंदी के विपरीत परिणामों की साफ़ झलक नज़र नहीं आती है, ऊपर दिए गए आंकड़ों से यह साफ होता है कि नोटबंदी से निर्यात, विनिर्माण और निर्माण के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर नौकरियां नष्ट हुई हैं। कृषि सहित कई क्षेत्रों के छोटे और मंझोले उत्पादकों का दिवालिया निकल गया है।

सर्वेक्षण में यह अनुमान लगाया गया है कि देशभर में किसानों को कर्ज माफ़ी देने के लिए 2.7 लाख करोड़ रुपयों की जरूरत है। किसानों को दिवालियापन से बचाने और आत्महत्या करने से रोकने के लिए इतने वित्तीय संसाधनों की जरूरत को स्वीकार करने की बजाय, सर्वेक्षण में कहा गया है कि, ऐसा करने से राज्यों पर वित्तीय घाटे का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

साथ ही सर्वेक्षण यह उम्मीद करता है कि रिज़र्व बैंक इस संकट का हल निकालेगा। यह संकट वित्तीय पूंजीपति गुनाहगारों द्वारा कर्जा वापस न करने, उनको कुछ कर्जमाफ़ी दिए जाने, अन्य कर्जों का पुनर्गठन करने, करदाताओं और लोगों के धन से बैंकों का पुनः पूंजीकरण करने और “कमजोर” बैंकों के कार्यक्षेत्र को कम करने से पैदा हुआ है। 

अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में गहरे संकट के बारे में जो सर्वेक्षण में लिखा गया है, इसकी पुष्टि रिज़र्व बैंक द्वारा मई के महीने में किये गए एक सर्वेक्षण से होती है। रिज़र्व बैंक के इस सर्वेक्षण में कई अन्य बातों के अलावा, रोजगार के हालात के बारें में परिवारों से उनकी राय पूछी गयी थी। यह सर्वेक्षण बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता, और नयी दिल्ली, इन 6 महानगरों में किया गया था। 39.2 फीसदी उत्तरदाताओं ने बताया कि रोजगार के हालात खराब हुए हैं। यह आंकड़ा पिछले चार वर्षों में सबसे अधिक है (केवल दिसंबर 2016 में नोटबंदी के दौरान यह आंकड़ा इसी स्तर पर था)।

इन सबका सार निकाला जाए तो सर्वेक्षण से यह साफ़ नजर आता है कि आर्थिक संकट बरकरार रहेगा तथा और अधिक गहरा होगा। संकट से बाहर निकलने के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारें जो कदम उठा रही है, उससे यह संकट और भी अधिक गहरा होता जायेगा। मजदूरों को नौकरी से निकाला जायेगा, वस्तुओं और सेवाओं के उपभोग में गिरावट आएगी, बैंकों की संपत्ति पर और अधिक दबाव आयेगा, और करों में बढ़ोतरी होगी।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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