बच्चों और नवजातों की मौत के बार-बार होते हादसे : मौजूदा स्वास्थ्य व्यवस्था की गुनहगार लापरवाही

Submitted by cgpiadmin on शनि, 16/09/2017 - 20:30

पिछले महीने में गोरखपुर के एक सरकारी अस्पताल में जो कुछ हुआ, ऐसा कई बार, इससे पहले भी देश के अलग-अलग शहरों में होता रहा है। इनमें से कुछ हादसे ख़बर बनते हैं, लेकिन अधिकतर ऐसे हादसों को नज़रंदाज़ कर दिया जाता है और भुला दिया जाता है। यह चक्र बिना रुके ऐसे ही चलता रहता है। यह हमारे देश की मौजूदा सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की एक भयानक सच्चाई है। गोरखपुर में हुए हादसे ने फिर एक बार मौजूदा राज्य और उसके तमाम संस्थानों की गुनहगार और बेरहम लापरवाही का पर्दाफाश किया है।

हमारे देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए दिए जा रहे वित्तीय संसाधन ज़रूरत से बहुत ही कम हैं; इस हकीकत को सभी जानते हैं और इन्हें सरकारी और अन्य रिपोर्टों और दस्तावेज़ों में भी दर्ज किया गया है। प्राथमिक स्तर पर स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए यदि कोई सुविधा मौजूद भी है तो, वहां पर्याप्त स्टाफ नहीं है। इलाज की जरूरी मशीनें और दवाइयां नहीं हैं। यदि मशीनें हैं, तो काम नहीं करती हैं। इसका नतीजा यह होता है कि अपने परिजनों की जान बचाने के लिए अधिकांश लोगों को आखिरी समय पर, भीड़ से खचाखच भरी निम्न स्तर की स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने वाली संस्थाओं की ओर भागना पड़ता है। इसके लिए उन्हें अपनी जमा पूंजी बेचनी पड़ती है। इन स्वास्थ्य केन्द्रों में साफ-सफाई की इतनी बुरी हालत है कि इसकी वजह से रोग संक्रमण का प्रसार तेजी से होता है, और लोग इसका शिकार हो जाते हैं। यदि आप कभी राजधानी दिल्ली में ओखला में स्थित ई.एस.आई. अस्पताल को देखेंगे तो आपको देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा का असली नज़ारा देखने को मिल जायेगा। यह अस्पताल शहर के एक सबसे बड़े कूड़ेदान के पास बनाया है। इस से पता चलता है कि हमारे देश के हुक्मरान आम लोगों के स्वास्थ्य के प्रति कितने संजीदा है। 

स्वास्थ्य सेवाओं में निजी हितों को बढ़ावा

हिन्दोस्तान दुनियाभर के ऐसे देशों में एक है, जहां स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था में निजी हितों का बोलबाला है जिसमें सार्वजनिक खर्च कम से कम होता है। स्वास्थ्य पर कुल खर्च का केवल 32 प्रतिशत खर्च सार्वजनिक खजाने से आता है। इस मामले में दुनिया के 190 देशों में हिन्दोस्तान नीचे से 16वें स्थान पर है (वल्र्ड बैंक रिपोर्ट)।

राज्य अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटते हुए, स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरह से निजी मुनाफों के लिए खोलने की ओर कदम बढ़ा रहा है। अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से बाज़ार की दिशा में मोड़ते हुए, स्वास्थ्य सेवा जैसे सामाजिक क्षेत्र को नजरंदाज करना, हाल ही में ली गयी नीतियों का प्रमुख लक्ष्य है। वित्तीय घाटे को कम करने के नाम पर सामाजिक क्षेत्र पर खर्च और सब्सिडी को कम किया गया है और इस क्षेत्र में विदेशी पूंजीनिवेश के लिए रियायतें देने, सार्वजनिक उद्यमों और उपक्रमों का निजीकरण करने, जैसे कई कदम उठाये जा रहे हैं। जबकि स्वास्थ्य के लिए जरूरी सार्वजनिक संसाधनों को कम किया जा रहा है। निजी अस्पताल तेजी से बढ़ रहे हैं। इन निजी अस्पतालों को सरकार का पूरा समर्थन प्राप्त है। उनको रियायती दरों पर ज़मीन, पानी, बिजली मुहैया करायी जा रही है, सस्ते कर्ज दिए जा रहे हैं और करों में कटौती की जा रही है। यह सब कुछ देश में विश्व-स्तर के अस्पताल और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी को पूरा करने के नाम पर किया जा रहा है। यह निजी अस्पताल जरूरतमंद लोगों और उनके परिजनों का खून चूसने के लिए बड़े बदनाम हैं, जो ऐसे अस्पतालों पर विश्वास करते हुए यहां दाखिल होते है। निजी अस्पताल सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को बर्बाद करते हुए खड़े किए जा रहे हैं। सार्वजनिक-निजी-सांझेदारी (पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप या पी.पी.पी.) के नाम पर सरकार इन निजी अस्पतालों को समर्थन दे रही है।

राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे कई राज्य, देहाती इलाकों में मौजूदा स्वास्थ्य केन्द्रों को, निजी हाथों में देने की योजना बना रहे हैं। हाल ही में नीति आयोग ने सरकार की एक योजना का ऐलान किया। इस योजना के तहत, सरकार द्वारा चलाये जा रहे जिला-स्तर के अस्पतालों को निजी कंपनियों को चलाने के लिए 30 साल के लिए भाड़े पर दिया जायेगा।

एक तरफ तो देश में ऐसी बीमारियां आज भी पनप रही हैं, जिनका दुनिया के अधिकांश इलाकों से बहुत पहले नामोंनिशान मिट चुका है। दूसरी तरफ, हमारा देश दुनियाभर में स्वास्थ्य पर्यटन के लिए स्वर्ग बन गया है, यहां निजी “मल्टी स्पेशलिटी” अस्पताल राज्य के पूरे समर्थन के साथ कुकुरमुत्तों की तरह तेज़ी से फैल रहे हैं। गोरखपुर में बच्चों की मौत की हुई घटनाओं से फिर एक बार निचले और प्राथमिक स्तर के स्वास्थ्य केन्द्रों में सुविधाओं और साफ़-सफाई के अभाव की हकीकत सामने आई है। देश के अधिकांश लोगों को ऐसी ही सुविधाओं का इस्तेमाल करना पड़ता है। स्वास्थ्य चिकित्सा के बुनियादी ढांचे के अभाव के अलावा, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के स्तर पर डॉक्टरों की एक चैथाई जगह खाली रहती है। अधिकतर पदों पर डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों को ठेके (कॉन्ट्रेक्ट) पर अस्थायी तौर से रखा जाता है।

हिन्दोस्तान में प्रत्येक 10,000 की आबादी पर केवल 7 डॉक्टर मौजूद हैं। इनमें से अधिकतर डॉक्टर शहरों एवं प्राइवेट प्रेक्टिस में हैं, और केवल 10 फीसदी डॉक्टर सार्वजनिक क्षेत्र में लगाए गए है। ऐसा अनुमान है कि देहातों में केवल 2 फीसदी डॉक्टर उपलब्ध है, जबकि देश की 68 फीसदी आबादी गांवों में बसती है।

हमारे देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र की असली चालक शक्ति, उसमें काम करने वाले लोग हैं। जिनको कोई सम्मान नहीं दिया जाता है। उनके साथ भेदभाव किया जाता है और उनको सही वेतन नहीं मिलता। जैसा कि मजदूर एकता लहर के पहले के एक अंक (“नौकरी और मजदूरी के बिना काम: महिला स्वास्थ्य कर्मियों का शोषण” शीर्षक के लेख में जो मई 16-31 2012 के अंक में छापा गया था) में बताया गया है, कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की शृंखला में आखरी कड़ी है, आशा जो लोगों तक पहुंचती है। लेकिन इस महत्वपूर्ण कड़ी को तो सरकार मज़दूर मानने तक को तैयार नहीं है। उनको “स्वयंसेवी” के तौर पर रखा जाता है और सरकार की तमाम स्वास्थ्य सेवाओं का बोझ उन पर डाल दिया जाता है, लेकिन हर महीने केवल 3000-5000 रुपयों का मानधन दिया जाता है।

कई राज्यों में आशा कार्यकर्ता अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं। देश भर के अस्पतालों की रीड़ माने जाने वाले, रेजिडेंट डॉक्टर, काम के बेहतर हालातों और मरीजों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए लगातार संघर्ष करते आये हैं। देश भर में नर्सें अपने लिए वाजिब वेतन के लिए, काम के बेहतर हालात के लिए और दुव्र्यवहार के खिलाफ संघर्ष कर रही है।

अच्छी गुणवत्ता की स्वास्थ्य सेवा के लिए सबसे जरूरी मानव संसाधनों के बेरहम अति-शोषण की वजह से स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था चरमरा रही है।

केंद्र और राज्य स्तर पर आई तमाम सरकारें अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में नाकामयाब रही है, लेकिन इसकी जिम्मेदारी वे डॉक्टरों, नर्सों, और अस्पताल का देखरेख कर रहे कर्मचारियों पर डालती है। अब सार्वजनिक क्षेत्र के अस्पतालों की खस्ता हालत दिखाते हुए सरकार उनके निजीकरण की वकालत कर रही है, ताकि निजी कंपनियां लोगों की जान की कीमत वसूल करते हुए बड़े मुनाफे बना सके।

2017 का बजट पेश करने से पहले सरकार द्वारा जारी की गयी इकॉनॉमिक सर्वे की रिपोर्ट में सरकार बड़ी बेशर्मी से यह मानती है कि “हमारे देश की आर्थिक व्यवस्था के मॉडल की एक खासियत यह है कि मौजूदा राज्य ख़ास तौर से लोगों को स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी सेवा प्रदान करने में बेहद ‘कमजोर’ है।” राज्य की इस “कमजोरी” का बहाना देकर अब जिला स्तर के अस्पतालों को भी निजीकरण के दायरे में लाया जा रहा है। नीति आयोग द्वारा हाल ही में दिए गए प्रस्ताव में इसका जिक्र है। सरकार अब यह मानती है कि मौजूदा व्यवस्था पूरी तरह से फेल हो गयी है, और अब स्वास्थ्य सेवा में निजी हितों को बढ़ावा देने से हालात और भी बिगड़ने वाले है। (बॉक्स देखें)

लोगों की जान के साथ खिलवाड़ करते हुए निजी पूंजीवादी हितों को दिए जा रहे बढ़ावे को रोकना होगा - वह हित चाहे हिन्दोस्तानी हो या विदेशी। सभी स्वास्थ्य मजदूर जैसे कि डॉक्टर, आशा और ए.एन.एम. कार्यकर्ता, साफ़-सफाई कर्मचारी, स्वास्थ्य तकनीकी कर्मचारी, इन सभी को वाजिब वेतन के साथ, उनको जरूरी समर्थन दिया जाना चाहिए ताकि वो हर एक घर में और इलाके में साफ़-सफाई और प्राथमिक स्तर पर अच्छी स्वास्थ्य सुविधा पहुंचा सकें। काम के लिए बेहतर हालात और मरीजों व उनके परिजनों की सेवाओं की बेहतरी के लिए जो मुद्दे स्वास्थ्य मजदूरों ने उठाएं हैं, उनका तुरंत हल निकाला जाना चाहिए। एक राज्य जो खुद को आधुनिक होने का दावा करता है, इस तरह के हादसों में अपनी गुनहगार लापरवाही को छुपा नहीं सकता, “प्राकृतिक आपदा” का नाम देकर अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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