मार्क्स द्वारा लिखित ‘पूंजी’ की 150वीं सालगिरह के अवसर पर : मार्क्स का वैज्ञानिक समाजवाद का सिद्धांत आज भी पूरी तरह मान्य है

Submitted by cgpiadmin on मंगल, 03/10/2017 - 18:33

इस वर्ष 14 सितम्बर को कार्ल मार्क्स द्वारा लिखित ‘पूंजी’ के प्रथम ग्रन्थ के प्रकाशन की 150वीं सालगिरह थी। इस पुस्तक, जिसके दूसरे और तीसरे ग्रंथों को एंगेल्स ने मार्क्स के देहांत के बाद पूरा किया था, का मकसद था “आधुनिक समाज - यानी पूंजीवादी, सरमायदारी समाज - की गति के आर्थिक नियम को स्पष्ट करना”। पूंजीवादी उत्पादन का पूर्ण विश्लेषण करके मार्क्स ने इस व्यवस्था के मूल अंतर्विरोध को पहचाना, जिसके समाधान से समाजवाद की स्थापना हो सकती है।

मार्क्सवाद का उद्गम, 19वीं सदी के यूरोप के सबसे उत्तम दिमागों के द्वारा विकसित की गयी सबसे उन्नत सोच-सामग्री की निरंतरता बतौर हुआ। मार्क्सवाद जर्मन दर्शनशास्त्र, अंग्रेज राजनीतिक अर्थशास्त्र और फ्रांसीसी समाजवाद के विकास का अगला स्तर मार्क्सवाद था।

मार्क्सवाद के भौतिकवादी दर्शनशास्त्र के अनुसार, समाज के किसी खास पड़ाव पर जो विभिन्न दार्शनिक, धार्मिक और राजनीतिक विचार प्रचलित होते हैं, वे उस समय के आर्थिक संबंधों का प्रतिबिम्ब होते हैं। मार्क्स ने इस बात को समझा कि राजनीतिक संस्थान और विचार आर्थिक नींव की ऊपरी संरचना हैं, और उन्होंने पूंजीवादी समाज की आर्थिक व्यवस्था के अध्ययन पर बहुत ध्यान दिया।

यूरोप में पूंजीवाद के उद्गम और वृद्धि के साथ-साथ तरह-तरह के समाजवादी सिद्धांत भी उभर कर आये, जिन सब में एक उच्च समाज, कुछ लोगों द्वारा दूसरों के शोषण से मुक्त समाज का नज़रिया पेश किया जा रहा था। परन्तु काल्पनिक आदर्शवादी (यूटोपियन) समाजवाद के प्रारंभिक सिद्धांत यह नहीं दर्शा पाए कि वह कौन सी सामाजिक ताक़त थी, जो ऐसी नयी सामाजिक व्यवस्था की रचना करेगी।

पूंजीवादी समाज में निहित अंतर्विरोधों का विश्लेषण करके, मार्क्स ने श्रमजीवी वर्ग को उस वर्ग के रूप में पहचाना, जिसमें पूंजीवाद की कब्र खोदने और उस नयी सामाजिक व्यवस्था की रचना करने की रुचि और क्षमता है। इस तरह, उन्होंने समाजवाद के आन्दोलन को एक वैज्ञानिक नींव प्रदान की।

5 मार्च, 1852 को मार्क्स ने वेदेमेयेर को एक पत्र में लिखा कि “मैंने जो नया किया, वह था, यह साबित करना कि (1) वर्गों का अस्तित्व उत्पादन के विकास के खास ऐतिहासिक पड़ावों के साथ जुड़ा हुआ है (2) वर्ग संघर्ष का अनिवार्य परिणाम श्रमजीवी वर्ग का अधिनायकत्व है (3) यह अधिनायकत्व ही सभी वर्गों के खत्म हो जाने और वर्गहीन समाज की स्थापना हो जाने का परिवर्तन काल है।”

बेशी मूल्य का सिद्धांत

‘पूंजी’ के प्रथम ग्रन्थ की शुरुआत ‘वस्तु’ (कमोडिटी) के गहन विश्लेषण के साथ होती है। वस्तु पूंजीवादी उत्पादन के शरीर की एक कोशिका है।

18वीं सदी और 19वीं सदी की शुरुआत में, यूरोप के आर्थिक सिद्धान्तकारों ने यह खोज निकाला था कि वस्तुओं की लेनदेन मूल्य के नियम से शासित है। मूल्य का नियम कहता है कि वस्तुओं की पारस्परिक लेनदेन उनके उत्पादन के लिए आवश्यक सामाजिक श्रम की मात्रा के अनुपात में होता है। अगर बाज़ार में समान मूल्य की वस्तुओं की लेनदेन होती है, तो यह कैसे हो सकता है कि पूंजीपतियों की दौलत निरंतर बढ़ती ही रहती है? वे अर्थव्यवस्था में जितना डालते हैं, उससे ज्यादा मूल्य अर्थव्यवस्था से कैसे निकाल लेते हैं, यानी मुनाफा कैसे कमाते हैं? इस सवाल का कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे पाया था, जब तक कि कार्ल मार्क्स ने अपने बेशी मूल्य के सिद्धांत को न पेश किया।

मार्क्स ने दिखाया कि पूंजीवादी मुनाफे का स्रोत मजदूर वर्ग का अवैतनिक श्रम है, यानी पूंजीवादी मुनाफा वह नया मूल्य है जो उनके श्रम से ही पैदा किया जाता है परन्तु उनके वेतनों से अतिरिक्त है। मजदूरों को वेतन में उतना ही मिलता है जितना उनके द्वारा बेची जाने वाली वस्तु, यानी उनकी श्रम शक्ति, को उत्पन्न और फिर से उत्पन्न करने के लिए ज़रूरी है।

मजदूरों के श्रम से जो मूल्य पैदा किया जाता है, वह मजदूरों को उसी जीवन स्तर पर बनाए रखने के लिए आवश्यक मूल्य से कहीं ज्यादा है। इस अतिरिक्त या बेशी मूल्य को पूंजी के मालिक मुनाफा, ब्याज और किराए के रूप में हथिया लेते हैं। वास्तव में, मजदूर प्रतिदिन अपने काम के प्रथम कुछ घंटों में अपने वेतन के समान मूल्य का उत्पादन करता है। बाकी समय में वह जो काम करता है, उससे पूंजीपति वर्ग के लिए बेशी मूल्य का उत्पादन करता है।

पूंजीवादी संचय का आम नियम

बेशी मूल्य के सिद्धांत के आधार पर, मार्क्स ने दिखाया कि पूंजीवादी व्यवस्था अनिवार्यतः एक ध्रुव पर धन संचय और दूसरे धु्रव गरीबी पैदा करती है। जैसे-जैसे मानव श्रम की उत्पादकता बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे पूंजी के मालिक अधिक से अधिक अमीर होते जाते हैं, जबकि मजदूर गरीब ही रह जाते हैं और उनका शोषण ज्यादा से ज्यादा तीव्र होता जाता है।

मानव श्रम की उत्पादकता जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे सम्पूर्ण पूंजी की रचना बदलती जाती है। स्थाई पूंजी (लागत के सामान को खरीदने के लिए जो खर्च होता है) का हिस्सा बढ़ता है, जबकि परिवर्तनशील पूंजी (जो मजदूरों के वेतनों पर खर्च होता है) का हिस्सा घटता है। इसका एक कारण मशीनों का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल है, जो श्रम की उत्पादकता को बढ़ाने वाला एक अहम कारक है। प्रति घंटे में ज्यादा कच्चे माल को तैयार वस्तुओं में बदला जाता है, जो कि उत्पादकता के बढ़ने का नतीजा है, और यह भी एक और कारक है। इन दोनों कारकों की वजह से, परिवर्तनशील पूंजी की तुलना में स्थाई पूंजी बढ़ती जाती है।

परिवर्तनशील पूंजी की तुलना में स्थाई पूंजी के बढ़ने की वजह से, समान मात्रा की स्थाई पूंजी के लिए, कम से कम मज़दूरों की जरूरत होती है। पूंजीवादी संचय की प्रक्रिया ही कुछ अतिरिक्त आबादी पैदा करती है, जिसे मार्क्स बेरोज़गारों की रिज़र्व सेना कहते हैं।

मार्क्स ने दिखाया कि बेरोज़गारों की इस रिज़र्व सेना से पूंजीपतियों को अतिरिक्त श्रम शक्ति की बनी-बनाई स्थाई सप्लाई मिलती है, जिसे वे जब भी ज़रूरत हो, इस्तेमाल कर सकते हैं। इसकी वजह से, पूंजीपति रोज़गारशुदा मजदूरों के शोषण को भी बहुत ज्यादा बढ़ा सकते हैं। मार्क्स ने लिखा कि:

“मजदूर वर्ग का काम पर लगा हुआ भाग जो अत्यधिक श्रम करता है, उससे रिज़र्व भाग की संख्या और बढ़ जाती है; दूसरी ओर, रिज़र्व भाग अपनी प्रतियोगिता के द्वारा नौकरी में लगे हुए भाग पर अब पहले से अधिक दबाव डालता है, और उसके फलस्वरूप इस भाग को अत्यधिक श्रम करने तथा चुपचाप पूंजी का हुक्म बजाने के लिए मजबूर कर देता है। मजदूर वर्ग के एक भाग से अत्यधिक काम कराके दूसरे भाग को जबर्दस्ती बेकार बनाये रखना और एक भाग को जबर्दस्ती खाली हाथ बैठाकर दूसरे भाग से अत्यधिक काम लेना - यह अलग-अलग पूंजीपतियों का धन बढ़ाने का साधन बन जाता है, और साथ ही उससे औद्योगिक रिज़र्व सेना के उत्पादन में तेज़ी आती है”

(पूंजी, ग्रन्थ 1, अध्याय 25, पूंजीवादी संचय का सामान्य नियम; अनुभाग 3, सापेक्ष बेशी आबादी या औद्योगिक रिज़र्व सेना का उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ उत्पादन)

मार्क्स ने समझाया कि ज्यादा से ज्यादा निजी मुनाफा कमाने के उद्देश्य से प्रेरित पूंजीवादी उत्पादन के विकास की वजह से, बार-बार संकट और उथल-पुथल होते रहते हंै। उन्होंने दिखाया कि उत्पादक शक्तियों की वृद्धि, और मेहनतकश लोगों की खरीदारी की घटती ताक़त, इन दोनों के बीच में अंतर्विरोध पैदा होता है। इसकी वजह से, बार-बार अत्यधिक उत्पादन का संकट होता रहता है। जब ऐसा संकट होता है, तब सामग्रियों की अत्यधिक सप्लाई होती है परन्तु मजदूरों के पास उन्हें खरीदने के लिए पैसे नहीं होते।

मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि बार-बार और बढ़ती तीव्रता के साथ होने वाले संकटों का यह सिलसिला श्रमजीवी वर्ग की अगुवाई में क्रांति के जरिये ही खत्म हो सकता है। वह क्रांति पूंजीवादी निजी संपत्ति को खत्म करेगी और उसकी जगह पर, उत्पादन के साधनों की सामाजिक मालिकी को स्थापित करेगी। उस क्रांति से उत्पादन का सामाजिक स्वाभाव और उसके फलों का निजी हाथों में चले जाना, इनके बीच अंतर्विरोध का समाधान होगा। उस क्रांति से चंद धनवानों द्वारा मेहनतकश जनसमुदाय का शोषण खत्म होगा।

मार्क्स का सिद्धांत आज भी मान्य है

बीते 150 वर्षों में, सरमायदारों के बहुत सारे तथाकथित विशेषज्ञों ने तरह-तरह के मनगढ़ंत सिद्धांत पेश किये हैं, जिनका मकसद है मार्क्सवाद को ‘गलत’ साबित करना। इसका यह कारण है कि मार्क्सवाद के निष्कर्ष सरमायदार वर्ग के हितों के लिए खतरनाक हैं। परन्तु जीवन के असली अनुभव बार-बार यही दर्शाते हैं कि पूंजीवाद के मूल अंतर्विरोध और वैज्ञानिक समाजवाद पर मार्क्स का सिद्धांत अभी भी मान्य है।

जब-जब पूंजीवादी व्यवस्था संकट के दौर से गुजरती है, तब सरमायदारों के अर्थशास्त्री उसके लिए इस या उस सरकारी नीति को दोषी ठहराते हैं। वे बार-बार यह भ्रम फैलाते रहते हैं कि नीतियों को सुधारने से हम संकट से बच सकते हैं। परन्तु जीवन के अनुभव से ये भ्रम बार-बार चूर-चूर हो जाते हैं। मिसाल के तौर पर, 2008 में हुए संकट को हल करने के नाम पर, दुनिया के मुख्य पूंजीवादी देशों ने जो-जो भी नीतिगत कदम उठाये, वे सभी समाज को संकट से बाहर निकालने में नाकामयाब रहे हैं।

दुनिया के स्तर पर, सभी तथ्य और गतिविधियां यही दिखाते हैं कि पूंजीवाद श्रमजीवी वर्ग के शोषण और गरीबी को और तेज़ किये बिना, बार-बार संकट में फंसे बिना, अपना जीवन काल और लम्बा नहीं खींच सकता है। मार्क्स द्वारा लिखित ‘पूंजी’ में, बेशी मूल्य के उनके सिद्धांत के आधार पर जो वैज्ञानिक विश्लेषण पेश किया गया है, उसकी मान्यता बार-बार साबित होती रहती है।

मार्क्स के वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांत की हिफ़ाज़त करना तथा श्रमजीवी वर्ग के अधिनायकत्व को स्थापित करने के संघर्ष को अगुवाई देना सभी कम्युनिस्टों का कर्तव्य है, ताकि पूंजीवाद का तख़्तापलट किया जा सके और सभी प्रकार के शोषण से मुक्त समाज की स्थापना की जा सके।

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सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

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